Satyuga-in-Kalyuga-Part-6-Hindi-Photo

संत रामपाल जी महाराज के अनुसार, सत्ययुग अथवा "सुखी संसार" की स्थापना की आधारशिला 32 वर्षों से रखी जा रही है। उनके द्वारा बताए गए मूल मंत्र, नियम, सिद्धांत और जीवन जीने के दिशा-निर्देश आंतरिक रूप से सकारात्मक बदलाव लाते हैं, जिससे परम शांति और वैश्विक शांति की प्राप्ति में सहायता मिलती है। यह वीडियो मानव जीवन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से विश्व शांति के इन गूढ़ रहस्यों और सिद्धांतों को स्पष्ट करता है। संदेश यह है कि व्यक्ति खुले मन से इन विचारों को समझे और जो कुछ भी सत्य और उचित प्रतीत हो, उसे अपने जीवन में धारण करे। स्थायी विश्व शांति संत रामपाल जी महाराज के ज्ञान और सच्ची भक्ति से ही संभव है। यह वीडियो इसके प्रमाण प्रस्तुत करता है और लोगों से विश्व शांति के इस महाअभियान से जुड़ने का आह्वान करता है।

क्या ईश्वरीय शक्ति ने तीसरे विश्व युद्ध को टाल दिया?: संत रामपाल जी द्वारा आयोजित विश्व शांति महायज्ञ (1-3 मई) के पीछे का रहस्य

बीबीए, भारत ब्रेकिंग न्यूज़ और ग्रामीण भारत चैनल के पत्रकारों ने संभावित विश्व युद्ध और वैश्विक अशांति की आशंका के बीच विश्व शांति के इस अभूतपूर्व आह्वान पर एक महत्वपूर्ण परिचर्चा आयोजित की।

ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव और संभावित विश्व युद्ध की आशंका को देखते हुए, संत रामपाल महाराज ने जेल में रहते हुए ही 1 से 3 मई तक 'विश्व शांति महायज्ञ' आयोजित करने का आदेश दिया। इसके उपरांत, इन देशों के बीच कटुता शांत होती प्रतीत हुई और प्राप्त जानकारियों के अनुसार अचानक युद्धविराम की दिशा में कदम बढ़े। इस महायज्ञ का उद्देश्य युद्ध को टालना, शांति स्थापित करना और पूरे विश्व में सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करना था।

7 अप्रैल 2026 को परमाणु युद्ध के संबंध में ट्रम्प की चेतावनी ने तीसरे विश्व युद्ध के खतरे और संभावित परमाणु विनाश को लेकर पूरी दुनिया में भय का वातावरण निर्मित कर दिया था।

आज रात एक पूरी सभ्यता राख में तब्दील हो सकती है और कभी वापस नहीं लौट सकती। मैं ऐसा नहीं चाहता, फिर भी शायद यही होने वाला है। हालांकि, अब जब नेतृत्व में कुछ समझदार और कम कट्टरपंथी चेहरे सामने आए हैं, तो शायद कुछ क्रांतिकारी और सकारात्मक घटित होगा; हमें आज रात ही इसका पता चल जाएगा। यह इतिहास के सबसे निर्णायक पलों में से एक है। भ्रष्टाचार और मृत्यु का 47 वर्ष पुराना दौर समाप्त होने की कगार पर है। ईश्वर ईरान की जनता की रक्षा करे’।

समूचा विश्व सांसें थामे उस महाविनाश की प्रतीक्षा कर रहा था। किंतु तभी इतिहास के पन्नों में एक युगांतरकारी चमत्कार दर्ज हो गया। ज़रा इन तिथियों के संयोग पर विचार कीजिए:

● 28 फरवरी 2026: एक भीषण युद्ध का आरंभ हुआ।

● 7 अप्रैल 2026: ईरान को महाविनाश की अंतिम चेतावनी जारी की गई।

● 8 अप्रैल 2026: बिना किसी पूर्व संकेत के अचानक युद्धविराम प्रभावी हो गया।

● 10 अप्रैल 2026: शांति वार्ता की पृष्ठभूमि तैयार हो गई।

● 1 मई 2026: युद्ध समाप्त होने का समाचार प्राप्त हुआ।

प्रश्न: आख़िर ऐसा क्या हुआ कि विनाश का बढ़ता हुआ पंजा अचानक पीछे खिंच गया?

इसका सूत्र भारत की पावन भूमि पर मिलता है।

● 28 फरवरी को, जिस दिन युद्ध छिड़ा, उसी दिन जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने 1, 2 और 3 मई 2026 के लिए ‘विश्व शांति महा धार्मिक अनुष्ठान’ की घोषणा की।

● 7 अप्रैल को, जब वैश्विक संहार की धमकियाँ दी जा रही थीं, उसके ठीक अगले ही दिन संत रामपाल जी महाराज की जेल से रिहाई की पुष्टि का समाचार आया।

● 8 अप्रैल को उनकी रिहाई का मार्ग प्रशस्त हुआ। ठीक उसी समय युद्ध की ज्वाला मंद पड़ी और युद्धविराम लागू हो गया।

● 10 अप्रैल को संत रामपाल जी जेल से बाहर आए और उधर विश्व की प्रमुख महाशक्तियाँ शांति वार्ता की ओर अग्रसर हुईं।

● अंततः 1 मई को, जैसे ही विश्व शांति महायज्ञ का पहला दिन प्रारंभ हुआ, वैसे ही दुनिया भर से सबसे बड़ी खुशखबरी आई: युद्ध का पूर्ण विराम।

यह कोई साधारण घटना नहीं है; बल्कि यह शब्द शक्ति का एक ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण है जिसे नकारा नहीं जा सकता। अब विश्व के प्रबुद्ध विचारकों के सम्मुख एक सीधा प्रश्न उपस्थित होता है:

● क्या कोई साधारण मनुष्य जेल में बैठकर ऐसी सटीक तिथियाँ निर्धारित कर सकता है?

● क्या कोई सामान्य संत हज़ारों मील दूर स्थित सरकारों और सेनाओं के मन को नियंत्रित कर सकता है?

पवित्र वेदों और धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि पूर्ण परमात्मा के मुख से निकला शब्द अटल होता है, ऐसा अकाट्य विधान जिसे स्वयं काल (शैतान) भी नहीं बदल सकता। जेल से रिहाई की तिथियों का निर्धारण और युद्धविराम व वैश्विक शांति की पहल शुरू होते ही युद्ध समाप्ति की सूचना मिलना इसी सत्य का प्रमाण है। संत रामपाल जी महाराज कोई सामान्य मानव नहीं हैं; वे स्वयं सोलह महाकलाओं के अधिपति अनादि परमेश्वर श्री जगन्नाथ महाप्रभु हैं, जिनकी सत्ता से यह समस्त ब्रह्मांड संचालित होता है। प्रमाण हमारे समक्ष उपस्थित हैं।

‘भविष्य मालिका’ के गर्भ से दुर्लभ और असाधारण साक्ष्य, जो अब तक अज्ञात थे, निकलकर सामने आए हैं:

● नारद मुनि और मार्कंडेय जैसे ऋषि तथा बजरंगबली हनुमान जी को भी अभी तक पूर्ण मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ है; वे भी वर्तमान में मानव शरीर धारण किए हुए हैं।

● भविष्य मालिका का उद्धरण देते हुए पंडित काशीनाथ मिश्र ने स्पष्ट किया है कि स्वर्ग के राजा इंद्र सहित समस्त तैंतीस करोड़ देवी-देवता कल्कि अवतार के इस पावन काल में अपना उद्धार (मोक्ष) कराने के लिए मृत्युलोक में मनुष्य रूप में अवतरित हो चुके हैं। फलस्वरूप, स्वर्ग का सिंहासन यानी इंद्र का पद वर्तमान में रिक्त पड़ा है।

● त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं मानव शरीर धारण करके पृथ्वी पर विद्यमान हैं। आश्चर्यचकित करने वाला तथ्य यह सामने आया है कि अभी तक उन्हें भी पूर्ण मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ है।

महा-रहस्योद्घाटन: ईश्वरीय अवतार, आध्यात्मिक विज्ञान और स्वर्णिम काल

यह परम पावन स्वर्णिम काल है, वास्तविक 'स्वर्ण समय', जो इस समय घटित हो रहा है एक ऐसा कालखंड जब सोलह कलाओं के स्वामी और संपूर्ण सृष्टि के रचयिता श्री जगन्नाथ महाप्रभु, जिन्हें कबीर परमेश्वर जी भी कहा जाता है, एक भक्त के रूप में नर-तन धारण कर प्रकट हुए हैं। उनका यह प्राकट्य इस नश्वर लोक के प्रत्येक प्राणी को मोक्ष प्रदान करने हेतु हुआ है। वे कलियुग के दुष्प्रभावों को मिटाकर सत्ययुग जैसा पवित्र वातावरण स्थापित कर रहे हैं, जिससे वैश्विक शांति, प्रेम और भाईचारे का विस्तार हो रहा है तथा भक्ति का मार्ग सुगम बन रहा है। यह वीडियो आध्यात्मिक विज्ञान और अकाट्य प्रमाणों के साथ विस्मयकारी घटनाओं और महत्वपूर्ण विषयों का विश्लेषण करता है, जो सदियों पुराने अंधविश्वासों की जड़ों को हिलाकर रख देता है। यह अंक उस गूढ़ सत्य को उजागर करेगा जिसे इतिहास, धर्मग्रंथों और धर्मगुरुओं ने जनमानस से छिपाकर रखा था।

श्री राम, शबरी और बेर: धर्मग्रंथ बनाम लोककथा

यह एक चिरकालिक जनश्रुति रही है कि श्री राम ने भक्त शबरी के जूठे बेर खाए थे; यद्यपि, महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण' अथवा गोस्वामी तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' में इस विशिष्ट घटना का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। परिणामस्वरूप, इसे धर्मग्रंथों द्वारा प्रमाणित घटना के स्थान पर लोककथा और जनश्रुति अधिक माना जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, वे श्री राम नहीं थे, अपितु स्वयं भगवान जगन्नाथ थे जिन्होंने शबरी के प्रेम और समर्पण भाव से भेंट किए गए बेरों को स्वीकार किया था। यह प्रसंग परमेश्वर के प्रति भक्त के अनन्य विश्वास, प्रेम और पूर्ण समर्पण को रेखांकित करता है।

सुदामा को वास्तव में महल किसने दिया? श्री कृष्ण ने या जगन्नाथ महाप्रभु ने

सुदामा के राजमहल का प्रसंग

चावल की भेंट स्वीकार करके सुदामा की दरिद्रता दूर करने और उन्हें भव्य महल प्रदान करने का श्रेय केवल श्री कृष्ण को देना एक भ्रम है। वास्तव में, यह सोलह महाकलाओं के स्वामी श्री जगन्नाथ महाप्रभु की ही दिव्य कृपा थी।

कर्म, प्रारब्ध और ईश्वरीय हस्तक्षेप: सुदामा का प्रसंग

विश्व भर के अधिकांश हिंदू आध्यात्मिक गुरु और संत यही मानते हैं कि 'प्रारब्ध' यानी पूर्व जन्मों के कर्मों का फल हर परिस्थिति में भोगना ही पड़ता है। उदाहरणार्थ, देवर्षि नारद के शाप के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी को भी वनवास के कष्ट झेलने पड़े थे। इसी प्रकार स्वयं श्री कृष्ण भी कर्म के इस अटल चक्र से मुक्त नहीं रह सके; मान्यता है कि त्रेतायुग में राम रूप में उन्होंने छिपकर बालि का वध किया था, और द्वापरयुग के अंत में उन्हें उसी कर्म का फल भुगतना पड़ा जब बालि की आत्मा एक बहेलिए के रूप में आई और उनके चरण में विषैला बाण मारा। इसी आधार पर यह कहा जाता है कि मनुष्य को वर्तमान के पाप और पुण्य कर्मों का फल आगामी जन्मों में भोगना ही पड़ता है। किंतु, सुदामा की दरिद्रता इसी जन्म में समाप्त कर दी गई और उन्हें अकूत ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। यह दर्शाता है कि कर्म फलों का ऐसा परिमार्जन केवल श्री कृष्ण या श्री राम के अधिकार क्षेत्र में नहीं था; बल्कि यह केवल सोलह कलाओं के पूर्ण स्वामी श्री जगन्नाथ महाप्रभु अर्थात् कबीर परमेश्वर ही हैं, जो ऐसा विशेष वरदान दे सकते हैं।

आगे बढ़ते हुए हमें कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर प्राप्त होंगे:

● सोलह परम दिव्य कलाओं के अधिपति भगवान जगन्नाथ वास्तव में कौन हैं और उनका यथार्थ नाम क्या है?

● इतनी कठोर साधना और तपस्या करने के उपरांत भी भक्त दुखी क्यों रहते हैं? इसका यथार्थ समाधान क्या है?

● संपूर्ण विश्व में शांति और आपसी भाईचारा कैसे स्थापित हो सकता है?

संत रामपाल जी महाराज अपने यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश से वैश्विक अशांति के अंधकार को दूर करने में पूर्णतः समर्थ हैं। उनके अनुसार, परम शांति का अचूक सूत्र यह है कि व्यक्ति मन, कर्म और वचन से स्वप्न में भी किसी के प्रति दुर्भावना न रखे। जीवन के इस सिद्धांत को समझ लेने पर व्यक्ति के भीतर क्रांतिकारी परिवर्तन आता है, जिससे वह न केवल बुरे कार्यों का बल्कि हानिकारक विचारों का भी त्याग कर देता है। सोच में परिवर्तन आने से व्यक्ति की सूक्ष्म तरंगें (क्वांटम फ्रीक्वेंसी) सकारात्मक होने लगती हैं। करोड़ों व्यक्तियों की इन सकारात्मक ऊर्जा-तरंगों से ईर्ष्या, द्वेष और युद्धों का अंत होगा तथा विश्व शांति की स्थापना होगी। आज यह इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि उनके पास वह शब्द-शक्ति है जो जन-जन को प्रेरित करती है और जिसके प्रभाव से विश्व शांति का स्वप्न आज धरातल पर साकार हो रहा है। वे अपने सत्संगों में यही संदेश देते हैं। उनका अमर उद्घोष है:

जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा।

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।।

संत रामपाल जी महाराज के अनुसार, भारत की पवित्र भूमि पूर्ण परमात्मा की विशेष उपस्थिति और उनकी अमर लीलाओं की प्रत्यक्ष साक्षी रही है। सृष्टि के रचयिता 1398 से 1518 तक सशरीर यहाँ रहे, और प्रभु 1997 से पुनः इस धरा पर विद्यमान हैं। यह भारत में दया, धर्म और मानवता की पावन परंपरा का परिचायक है।

परम सत्य: सृष्टि रचना, पुनर्जन्म और पूर्ण मोक्ष

सनातनी धर्मग्रंथों में आध्यात्मिकता के संपूर्ण पहलू हमारे मूल अस्तित्व से जुड़े हुए हैं, जिन गूढ़ सत्यों से अन्य धर्मों के अनुयायी सर्वथा अनभिज्ञ हैं:

● हमारी रचना किसने की?

● हम कहाँ से आए हैं?

● हमारा जन्म और मरण क्यों होता है?

इन प्रश्नों के उत्तरों के अकाट्य प्रमाण सनातन धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 10 श्लोक 2 और अध्याय 2 श्लोक 22 में मिलते हैं।

यह प्रमाणित करता है कि जीवन का यह चक्र अपने आप नहीं चल रहा है; बल्कि यह एक पूर्व-निर्धारित और सुव्यवस्थित व्यवस्था है जो एक सर्वोच्च सत्ता के नियंत्रण में कार्य कर रही है। सृष्टि रचना, प्रलय और जन्म-पुनर्जन्म की यह अवधारणा पवित्र बाइबल और पवित्र कुरान में भी प्रमाणित है। ईश्वर ने अपनी शब्द शक्ति से संपूर्ण सृष्टि की रचना की। बाखबर संत रामपाल जी महाराज इन सभी प्रसंगों पर शास्त्र-प्रमाणित सत्संग प्रदान करते हैं:

● पवित्र कुरान की सूरह अल-अंबिया (21) आयत 104, सूरह अल-अन'आम आयत 133 और सूरह अल-मुल्क (67) आयत 2। ● बाइबल उत्पत्ति (जेनेसिस) अध्याय 1 आयत 1-3, अध्याय 1:3-5, 11:1-13, 1:14-19, 1:20-25, 1:26-27; यूहन्ना (जॉन) आयत 1-3।

जन्म और पुनर्जन्म का यह अनवरत चक्र तब तक चलता रहता है जब तक कि साधक किसी तत्वदर्शी संत/बाखबर की शरण में नहीं आ जाता।

महत्वपूर्ण: श्रीमद्भगवद्गीता, पवित्र बाइबल (तौरात, इंजील, ज़बूर का संग्रह) और कुरान शरीफ का ज्ञान देने वाला एक ही प्रभु काल (ब्रह्म) है।

इन तथाकथित धर्मगुरुओं ने न तो स्वयं धर्मग्रंथों के गूढ़ रहस्यों को समझा और न ही जनसाधारण के सम्मुख इस सत्य को उजागर करना चाहा।

आज वही पूर्ण परमात्मा, सोलह कलाओं के स्वामी जगन्नाथ महाप्रभु, संत रामपाल जी महाराज के साकार रूप में हमारे मध्य उपस्थित हैं। केवल उनके द्वारा बताई गई शास्त्रानुकूल सच्ची भक्ति ही हमें जन्म-मरण के इस दीर्घ चक्र से मुक्त कर अमर लोक, परम शांति के सागर सतलोक पहुँचा सकती है।

ईसाई और इस्लाम धर्म के अनुयायी पुनर्जन्म को स्वीकार नहीं करते, जबकि हिंदू जन्म-पुनर्जन्म के चक्र पर विश्वास करते हैं। हिंदू-मुस्लिम कट्टरता और आपसी वैमनस्य का मूल कारण यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है। संत रामपाल जी महाराज बताते हैं कि प्रत्येक जीव अपने कर्मों का फल भोगता है। शरीर मात्र एक वस्त्र है, जबकि आत्मा अजर-अमर है; अतः यह पूर्णतः संभव है कि जो आज हिंदू-मुस्लिम के नाम पर एक-दूसरे का विरोध कर रहे हैं, वे पिछले जन्मों में एक-दूसरे के धर्म से संबंध रखते रहे हों। इसलिए मनुष्य को धर्म के नाम पर की जाने वाली हिंसा को त्यागकर सत्य को अंगीकार करना चाहिए।

सृष्टि के आदि में एक ही आदि सनातन धर्म था, जिसे बाद में हिंदू धर्म कहा गया, जिससे आगे चलकर विभिन्न पंथ और धार्मिक परंपराएँ उत्पन्न हुईं। परिणामस्वरूप, हमारी आध्यात्मिक जड़ें परस्पर जुड़ी हुई हैं, और जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों और कुलों में जन्म लेती है। इसलिए हिंदू और मुस्लिम के बीच का यह द्वेष सर्वथा निरर्थक है। यदि गीता जी के ज्ञान को यथार्थ रूप में समझ लिया जाए, तो धर्म के नाम पर कभी कोई संघर्ष न हो। आज जो हिंदू है, हो सकता है पिछले जन्म में वह मुसलमान रहा हो, और जो आज मुसलमान है, वह पिछले जन्म में हिंदू रहा हो।

एक पूर्ण परमात्मा, एक मानवता: सत्य और भाईचारे का दिव्य संदेश

श्री जगन्नाथ महाप्रभु बारंबार भारत की इस पावन धरा पर प्रकट हुए हैं, जिसे प्राचीन काल में जंबूद्वीप कहा जाता था। परमात्मा द्वारा अपनी दिव्य लीलाओं के लिए भारत भूमि को चुनने के पीछे एक विशेष प्रयोजन है; यहाँ के जनमानस में मानवता, दया और धार्मिकता रची-बसी है और उनका जीवन वेद तथा गीता जैसे महान ग्रंथों पर आधारित रहा है। इसलिए, परमात्मा सर्वप्रथम भारतवासियों को सत्यज्ञान देकर जाग्रत करना चाहते हैं, ताकि धर्म और मजहब के नाम पर होने वाली नफरत, हिंसा और रक्तपात का अंत हो सके तथा शांति स्थापित हो सके। इसके उपरांत, भारत के दयालु और परोपकारी भक्त समूचे विश्व को सत्य का मार्ग दिखाएँगे। 'कबीर सागर' में दर्ज परमात्मा की पावन वाणी के अनुसार, कबीर साहेब ने 600 वर्ष पूर्व आदरणीय धर्मदास जी से कहा था कि जब तक कलियुग के 5,505 वर्ष नहीं बीत जाते, तब तक उनके नाम पर बारह पंथ चलेंगे।

उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनके अंश का अवतरण बारहवें पंथ संत गरीबदास जी महाराज के पंथ में होगा, और वे अपने परम भक्त के शरीर में प्रकट होकर अपनी दिव्य लीला करेंगे। इसी अटल विश्वास के अनुसार, आज यह उद्घोष किया जा रहा है कि स्वयं श्री जगन्नाथ महाप्रभु अर्थात् कबीर परमेश्वर ही संत रामपाल जी महाराज के रूप में अवतरित हुए हैं। मानवता से यह करबद्ध प्रार्थना है कि वह इस दिव्य शक्ति को पहचाने, सत्य के पथ पर चले और प्रेम, शांति तथा भाईचारे के साथ जीवन यापन करे। सभी धर्मों के लोगों को यह बोध होना चाहिए कि हम सब एक ही परमपिता परमेश्वर की संतान हैं और ईश्वर एक है। पुनर्जन्म के सिद्धांत को समझ लेने से आपसी आत्मीयता और एकता की भावना दृढ़ होती है। आध्यात्मिक विवेक यह प्रकट करता है कि मूल रूप से धर्म कभी एक-दूसरे से भिन्न थे ही नहीं। अतः हिंदू, मुस्लिम सहित समस्त मानव जाति को एकजुट होकर सत्य को समझना चाहिए और समाज से हिंसा, भेदभाव तथा शत्रुता को समाप्त करने में अपना योगदान देना चाहिए। इसी में संपूर्ण मानवता का सच्चा कल्याण निहित है।

आज हम सत्ययुग के पुनरागमन के विषय में चर्चा कर रहे हैं। वर्षों पूर्व संत रामपाल जी महाराज ने कहा था कि एक ऐसा विशिष्ट कालखंड आएगा जब संसार में पाप अपनी चरम सीमा पर होंगे, और ठीक उसी क्षण एक ऐसा महापरिवर्तन घटित होगा जो युगों को बदल कर रख देगा। उनके अनुसार, एक दिन धर्म की यथार्थ परिभाषा प्रकट होगी और वही दिन सत्ययुग के बीजारोपण का दिन होगा। वर्ष 2025 के आसपास वैश्विक रूपांतरण की लहरें उठने लगेंगी, जो प्राकृतिक आपदाएं, युद्ध, तकनीकी उथल-पुथल और मानसिक अशांति लेकर आएंगी। संत रामपाल जी महाराज के अनुसार, ये सभी कलियुग के अंतिम चरण के लक्षण हैं। अब सतगुरु के तत्वज्ञान के माध्यम से ही मनुष्य पूर्ण मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है।

उनके अनुसार, सत्ययुग कोई भौतिक कालखंड नहीं है, बल्कि तत्वज्ञान और सतगुरु की कृपा से उत्पन्न होने वाली दिव्य चेतना की एक अवस्था है। जब कोई व्यक्ति सत्संग वचनों को समझकर सत्य को हृदयंगम कर लेता है, तो वही काल उसके लिए सत्ययुग बन जाता है और इसका शुभारंभ हो चुका है। उनका संदेश है कि सतगुरु को पहचानें और अपने भीतर के सत्ययुग को जाग्रत करें। संत रामपाल जी महाराज कहते हैं कि यथार्थ ज्ञान से बड़ा कोई तीर्थ नहीं है, और आत्म-बोध ही मोक्ष का द्वार है। सत्ययुग का आरंभ तभी होगा जब मानवता अपने मूल स्वरूप को पहचानेगी; तब न जाति का कोई महत्व रहेगा और न ही किसी संप्रदाय का; केवल आत्मा की शुद्धि ही सर्वोपरि होगी। उनके अनुसार, सत्ययुग में पृथ्वी स्वयं को पावन करेगी, प्रकृति में सकारात्मक परिवर्तन आएगा, नदियाँ निर्मल हो जाएंगी और चहुंओर शांति का साम्राज्य होगा। यह वास्तव में मानव चेतना के अभूतपूर्व विस्तार का परिचायक होगा।

सत्ययुग का प्रथम लक्षण सत्य का प्राकट्य और पाप कर्मों का खात्मा है। संत रामपाल जी महाराज के सत्संगों में उन गूढ़ धर्मग्रंथों और ज्ञान का उल्लेख मिलता है जो सत्ययुग के आधारस्तंभ हैं। उनके अनुसार, एक ऐसा समय आएगा जब समूची पृथ्वी पर केवल एक ही धर्म होगा, सत्य का धर्म। तब समस्त वाद-विवाद और संघर्ष समाप्त हो जाएंगे; भौतिक कर्मकांडों का स्थान ज्ञान-यज्ञ ले लेगा, और वेदों, गीता तथा पुराणों का वास्तविक सार जन-जन के घर तक पहुँचेगा।

नफरत से सद्भाव की ओर: विश्व शांति का मार्ग

वर्तमान में समूचा विश्व युद्ध, पारस्परिक घृणा और अशांति के अत्यंत त्रासद दौर से गुजर रहा है। मानवता कराह रही है, किंतु शांति का मार्ग अब भी उसकी दृष्टि से ओझल है। संत रामपाल जी महाराज ने विश्व शांति का शंखनाद किया है; उनके द्वारा बताए गए सिद्धांत में संसार की हर समस्या का समाधान समाहित है। यदि हम आज ही उनके दिखाए मार्ग को आत्मसात कर लें, तो हमारे जीवन में एक युगांतरकारी परिवर्तन का सूत्रपात हो सकता है। विश्व में शांति केवल तभी संभव है जब यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान और परमात्मा की कृपा का प्राबल्य हो। केवल इसी माध्यम से कलियुग के भीतर सत्ययुग जैसी अनुभूति संभव होगी, जिससे वर्तमान दुखों और अशांति का समूल नाश होगा और मानवता शांति के पथ पर अग्रसर होगी।

सार-संक्षेप: वर्तमान समय को ‘मोक्ष काल’ कहा गया है यानी एक ऐसा समय जब दुनिया में व्याप्त हिंसा, चोरी, लोभ, धन का संचय और पारिवारिक कलह समाप्त होंगे, जिससे सुख और शांति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होगा। भौतिक माया और सांसारिक भोग-विलासों की अंधी दौड़ में फंसा मानव आज अशांति और संताप भोग रहा है। माता-पिता के प्रति सम्मान, भाई-बहनों में प्रेम और आपसी सामंजस्य निरंतर घटता जा रहा है। अनुचित साधनों से अर्जित धन केवल पाप को बढ़ाता है, जिसका दुष्परिणाम अंततः मनुष्य को ही भुगतना पड़ता है। परमात्मा ही सर्वोच्च सत्ता हैं; सच्चा ज्ञान, विनम्रता और निष्कपट भक्ति ही व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है। यह विश्वास भी दृढ़ हो रहा है कि प्रभु का यह ज्ञान पूरे विश्व में फैलेगा, मानवता को बुराइयों से विमुख करेगा और सत्ययुग के समान शांति और सुख की स्थापना करेगा।

कलियुग के 5,500 वर्ष व्यतीत होने के उपरांत, परमात्मा का सच्चा ज्ञान और कबीर परमेश्वर की पावन वाणी घर-घर पहुँचने लगी है। वर्तमान में अनेक परिवारों में मोबाइल, टेलीविज़न, मेमोरी कार्ड और अन्य आधुनिक माध्यमों से आरती, सिमरन और आध्यात्मिक ज्ञान का श्रवण किया जा रहा है। लोग यात्रा करते समय भी मंत्र जाप और भक्ति में लीन रहते हैं, जिससे आध्यात्मिक विचारों का निरंतर प्रसार हो रहा है। नाम जाप, ईश्वरीय शब्द और यथार्थ ज्ञान का प्रभाव केवल साधक तक ही सीमित नहीं रहता; यह आस-पास के संपूर्ण वातावरण पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव डालता है। जिस प्रकार अशुद्ध वायु ऊपर उठती है और शुद्ध प्राणवायु नीचे बैठती है, उसी प्रकार आज समाज में व्याप्त निंदा, चुगली, बैर-विरोध और नकारात्मक विचार धीरे-धीरे क्षीण होंगे, जबकि शांति और सद्भावना के विचारों को प्रधानता मिलेगी। यह परिवर्तन धीरे-धीरे परिवारों, गांवों और मुहल्लों से विस्तृत होता हुआ समूचे समाज और पूरे विश्व को अपने आगोश में ले लेगा।

इसके साथ ही यह पावन संदेश भी दिया जा रहा है कि समस्त मानव एक ही परमपिता परमेश्वर की संतान हैं। चाहे कोई हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिख हो या ईसाई, अथवा किसी भी देश का निवासी हो, परमात्मा की दृष्टि में सभी समान रूप से प्रिय हैं। अतः मानव जीवन का एकमात्र ध्येय परस्पर धार्मिक और सामाजिक वैमनस्य को समाप्त कर शांति, प्रेम और बंधुत्व के साथ रहना होना चाहिए। इस आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार को इस दिशा में एक युगांतरकारी आरंभ माना गया है।

शब्द कभी नष्ट नहीं होते: ऊर्जा का विज्ञान और वाणी की शक्ति

संत रामपाल जी महाराज ने समाज में उन नियमों और सिद्धांतों के पालन की अलख जगाई है जिन्हें लागू करने में व्यवस्थाएं भी निष्फल रहीं। अब यह पूर्ण संभावना दिखाई दे रही है कि उनके द्वारा दी गई व्यवस्था सफल सिद्ध होगी। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो जब हम बोलते हैं, तो वायु के कणों में कंपन उत्पन्न होता है। यद्यपि कुछ दूरी के बाद वह ध्वनि कानों को सुनाई देना बंद हो जाती है, किंतु उससे जुड़ी ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती।

ऊर्जा संरक्षण का नियम, जिसे भौतिकी का मौलिक सिद्धांत माना जाता है, यही कहता है कि ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है; इसका केवल एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरण होता है। उदाहरण के लिए, ताली बजाने पर हाथों की यांत्रिक ऊर्जा ध्वनि और तापीय ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। इसी प्रकार, वाणी से उत्पन्न ध्वनि ऊर्जा अंततः वायु के कणों के घर्षण के कारण आंतरिक ऊर्जा और अत्यंत सूक्ष्म ऊष्मा में बदल जाती है।

ऊष्मागतिकी (थर्मोडायनामिक्स) के प्रथम नियम के अनुसार, ऊर्जा अपना स्वरूप बदलती है, समाप्त नहीं होती। सन् 1837 में चार्ल्स बैबेज ने 'द नाइंथ ब्रिजवाटर ट्रीटीज़' के अध्याय "ऑन द परमानेंट इम्प्रेशन ऑफ अवर वर्ड्स एंड एक्शंस ऑन द ग्लोब वी इनहैबिट" में लिखा था कि यह वायुमंडल स्वयं में एक विशाल पुस्तकालय है, जिसके पन्नों पर मनुष्य द्वारा बोले गए या फुसफुसाए गए शब्द अनंत काल के लिए अंकित हो जाते हैं। इस वैज्ञानिक दृष्टि से भी शब्द और दृश्य कभी समाप्त नहीं होते; वे केवल अपना रूप बदलते हैं।

उदाहरण के लिए, श्री रामचंद्र जी त्रेतायुग में हुए थे, जो लाखों वर्ष पूर्व का समय था, किंतु उस दीर्घ कालखंड के बीच की घटनाओं का कोई प्रत्यक्ष और विस्तृत ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं था। बहुत समय बाद, कलियुग में तुलसीदास जी ने लगभग 400 वर्ष पूर्व 'रामचरितमानस' की रचना की।

यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है: वे लाखों वर्ष पूर्व घटित घटनाओं का इतना सजीव और विस्तृत वर्णन कैसे कर पाए?

संत रामपाल जी महाराज ने इसके पीछे का गहरा वैज्ञानिक रहस्य उजागर किया है। संसार में घटित होने वाली प्रत्येक घटना किसी चलचित्र की भाँति इस ब्रह्मांड में सूक्ष्म रूप से सदा के लिए अंकित हो जाती है। उनकी तरंगें, ध्वनियाँ और दृश्य वायुमंडल तथा आकाश तत्व में विद्यमान रहते हैं। इस ब्रह्मांड में कभी कुछ भी नष्ट नहीं होता।

लोककथाओं और प्रामाणिक आख्यानों में मिलने वाला एक सुप्रसिद्ध प्रसंग कर्मफल के इसी रहस्य को उजागर करता है। धृतराष्ट्र ने श्री कृष्ण से पूछा कि अपने पूर्व के सौ जन्मों को देख सकने के बाद भी उन्हें ऐसा कोई पाप कर्म दिखाई नहीं दिया जिसके दंड स्वरूप उन्हें इस जन्म में अंधा होना पड़ा। तब श्री कृष्ण ने उनसे अपने 101वें जन्म का लेखा-जोखा देखने को कहा। वहाँ धृतराष्ट्र ने देखा कि अपने उस जन्म में उन्होंने एक निर्दोष टिड्डे की दोनों आँखों में बबूल के कांटे चुभोकर उसे अंधा कर दिया था और उसकी पीड़ा देखकर हंसे थे। वही संचित कर्म इस जन्म में उनके सम्मुख इस दारुण दंड के रूप में प्रकट हुआ था।

ठीक इसी प्रकार, तुलसीदास जी ने त्रेतायुग में घटित रामायण की घटनाओं का वैसा ही यथार्थ वर्णन किया जैसा वे वास्तव में घटित हुई थीं।

आज का मानव विज्ञान पर गर्व करता है और यह मानने लगा है कि विज्ञान ही सब कुछ है, जबकि आधुनिक विज्ञान आध्यात्मिक विज्ञान के समक्ष अत्यंत बौना है। तुलसीदास जी ने त्रेतायुग की लंका और अयोध्या की तत्कालीन भाषाओं के भावों को आत्मसात किया और उन घटनाओं का अपनी भाषा में शब्दशः जीवंत चित्रण कर दिया।

इसी प्रकार, कबीर परमेश्वर अपनी प्रिय आत्मा संत गरीबदास जी को जो उस समय मात्र दस वर्ष के बालक थे ऊपर के लोकों, स्वर्ग, नर्क, सतलोक आदि का भ्रमण कराने ले गए। उन्होंने उन्हें संपूर्ण सृष्टि रचना का रहस्य समझाया, दिव्य दृष्टि प्रदान की और 'ज्ञान योग' का बोध कराया। इसके बाद मात्र तेरह वर्ष की आयु में उनसे अरबों वर्ष पूर्व की घटनाओं के साथ-साथ भविष्य में घटित होने वाले वृत्तांतों का अत्यंत सूक्ष्मता से आलेखन करवाया।

संत रामपाल जी महाराज के मुखारविंद से आपने यह आध्यात्मिक विज्ञान समझा कि बोले गए शब्द और जीवन की कहानी का कभी अंत नहीं होता। मनुष्य की प्रत्येक घटना, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक विचार इस ब्रह्मांड में एक फिल्म की भांति सदा के लिए सुरक्षित हो जाते है।

बोले गए शब्दों के साथ उनका गतिमान दृश्य और उनकी अंतर्निहित शक्ति सदा जुड़ी रहती है। भक्ति-युक्त शब्दों में एक विशेष भार होता है, ठीक ऑक्सीजन की तरह, जो भारी होने के कारण पृथ्वी के निकट रहती है और समस्त जीवों को सकारात्मक जीवन-ऊर्जा प्रदान करती है। इसके विपरीत, भक्ति-रहित शब्द जैसे निंदा, अपशब्द, असत्य, अभिशाप, अश्लील गीत और दूसरों के प्रति दुर्भावना कार्बन डाइऑक्साइड की तरह अत्यंत हल्के होते हैं। वे ऊपर उठकर आकाश में फैल जाते हैं और समूचे वातावरण को दूषित करते हैं। दोनों का प्रभाव निश्चित होता है। शब्द यद्यपि अदृश्य हैं, किंतु उनका प्रभाव अत्यंत वास्तविक है।

जिस प्रकार रेडियो तरंगें दिखाई नहीं देतीं किंतु उन पर प्रसारित होने वाला संगीत स्पष्ट सुनाई देता है, उसी प्रकार शब्द मानव मन, पशु-पक्षियों के व्यवहार और वनस्पतियों की वृद्धि को गहराई से प्रभावित करते हैं। आधुनिक विज्ञान भी, विशेष रूप से पादप तंत्रिका विज्ञान (प्लांट न्यूरोबायोलॉजी), पौधों के विकास पर मधुर और शांत ध्वनि के सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार करता है।

संत रामपाल जी महाराज ने स्पष्ट किया है कि विश्व में शांति और आपसी भाईचारा केवल और केवल 'शब्द शक्ति' के माध्यम से ही स्थापित होगा। यह शब्द शक्ति स्वयं पूर्ण परमेश्वर कबीर जी की है।

सरल शब्दों में, शब्द शक्ति से तात्पर्य उस ईश्वरीय आदेश से है जिसमें सृष्टि की वास्तविकता को रूपांतरित करने का सामर्थ्य होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी देश का राजा किसानों के ऋण माफ करने का एक शासकीय आदेश जारी कर दे, तो वह एक आदेश समूचे राष्ट्र की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन ला देता है।

उदाहरणार्थ, 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि ₹500 और ₹1000 के नोट उस मध्यरात्रि से चलन से बाहर हो जाएंगे। उस एक उद्घोषणा के बाद उन नोटों का वैधानिक मूल्य समाप्त हो गया। यह सिद्ध करता है कि शब्दों की शक्ति का प्रभाव संबंधित व्यक्ति के अधिकार और सामर्थ्य के अनुपात में होता है। किंतु यहाँ हम उस परम शब्द शक्ति की बात कर रहे हैं जो इस ब्रह्मांड के कण-कण को स्थूल जगत से लेकर सूक्ष्म जगत तक रूपांतरित करने का सामर्थ्य रखती है, और जिसके माध्यम से शून्य से अनंत ब्रह्मांडों की रचना हुई। अध्यात्म में इसे ही 'शब्द शक्ति' कहा गया है एक ऐसी शक्ति जो केवल पूर्ण परमात्मा के ही पास है।

पवित्र बाइबल के यूहन्ना 1:1-3 में लिखा है कि आदि में शब्द था, और शब्द परमेश्वर के साथ था, और शब्द ही परमेश्वर था। सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ। इससे यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि परमेश्वर और उनका शब्द एक-दूसरे से भिन्न नहीं हैं।

इस संदर्भ में संत रामपाल जी महाराज ने स्पष्ट किया कि संपूर्ण सृष्टि के रचयिता पूर्ण परमात्मा ने स्वयं अपने अमृतमय वचनों में फरमाया है:

हम हैं शब्द, शब्द हम माहीं। हमसे भिन्न और कछु नाहीं।।

बाइबल 'उत्पत्ति' (Genesis) 1–3 से यह प्रकट होता है कि ईश्वर ने केवल अपने शब्द मात्र से प्रकाश और संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना की। उन्हें किसी भौतिक औजार या शारीरिक श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ी; यह उनके शब्द के असीम सामर्थ्य को दर्शाता है। यशायाह (Isaiah) 55:10–11 के अनुसार, परमेश्वर का वचन कभी व्यर्थ नहीं लौटता, बल्कि जिस कार्य के लिए भेजा जाता है, उसे निश्चय ही पूरा करता है।

यही प्रमाण इस्लाम धर्म के पवित्र ग्रंथ कुरान शरीफ में भी मिलता है। सूरह अल-बकराह (2:117) के अनुसार, अल्लाह ने जब सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने केवल एक शब्द कहा: "कुन फया-कून", जिसका भावार्थ है "उसने कहा 'हो जा', और संपूर्ण ब्रह्मांड अस्तित्व में आ गया।"

सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ जपुजी साहिब की पौड़ी 16 में तथा आदरणीय संत गरीबदास जी महाराज की पावन वाणी में भी ठीक यही प्रमाण प्राप्त होता है:

गरीब, रचनहार रचना रची, पुरुष प्रवीन। एक शब्द में सब किया, पांच तत्व गुन तीन।।

गरीब, सूक्ष्म मूर्ति सोहना, बहुरंगी विस्तार। एक शब्द में सब किया, ऐसा समरथ सार।।

'शब्द शक्ति' उस अलौकिक ईश्वरीय सत्ता का द्योतक है जिसे यहाँ सृष्टि रचना का मूल आधार माना गया है। इस तत्वज्ञान के अनुसार, स्वर्ग, पाताल और पंचतत्वों सहित यह संपूर्ण दृश्यमान और अदृश्य जगत केवल पूर्ण परमात्मा के शब्द मात्र से अस्तित्व में आया है। विभिन्न धर्मग्रंथ इस अवधारणा को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं जैसे 'वचन', 'कुन' या 'एक शब्द'। भाषाएं और नाम भले भिन्न हों, किंतु सबका संकेत उसी एक परम सत्ता और उनकी सृजनशील शब्द शक्ति की ओर है। वास्तविक रहस्य उस समर्थ, सार शब्द की पहचान करने में ही निहित है।

शब्दों की शक्ति किस प्रकार कार्य करती है?

राजा और किसान का उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक आदेश के रूप में निकले शब्द किस प्रकार बाह्य व्यवस्था में बदलाव ला सकते हैं। इसी प्रकार कोई मंत्री, मुख्यमंत्री, अधिकारी या साधारण व्यक्ति अपने-अपने अधिकार और सामाजिक स्थिति के दायरे में ही वातावरण को प्रभावित कर सकता है। फिर भी, उनके क्षेत्रों में अशांति बनी रहती है; संघर्ष, अपराध, व्याधियाँ, कष्ट और तनाव कभी समाप्त नहीं होते।

कोई भी शासक अपने राज्य को 'रामराज्य' के समान शांत और समृद्ध बनाने की अभिलाषा रख सकता है, किंतु यह लक्ष्य मानवीय प्रयासों से अप्राप्य ही रहता है। इसका कारण यह है कि उनके पास उस परम शब्द शक्ति का अभाव है जो मनुष्य के विचारों, भावनाओं और उसके अंतर्मन के संचित संस्कारों को आमूलचूल रूपांतरित कर सके। वे बाह्य नियम और व्यवस्थाएं तो स्थापित कर सकते हैं, किंतु मानव के मन और चेतना का कायाकल्प नहीं कर सकते। जब तक व्यक्ति के भीतर आंतरिक रूपांतरण नहीं होगा, तब तक समाज में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकती। यह चिरस्थायी शांति संत रामपाल जी महाराज के पावन वचनों की शक्ति से ही प्राप्त होगी।

यह ठीक एक बंजर भूमि के समान है, जहाँ पहले मिट्टी को जोतकर बुवाई योग्य बनाया जाता है; फिर जब उसमें बीज बोया जाता है, उसकी सिंचाई की जाती है और पशुओं से उसकी रक्षा की जाती है, तभी वह लहलहाती फसल देती है। इसी प्रकार, विश्व शांति की स्थापना के लिए पहले हृदय रूपी खेत से अज्ञानता की कंटीली झाड़ियों को साफ करना होगा। तत्पश्चात, सच्चे ज्ञान का बीज बोकर सच्ची भक्ति की सिंचाई करनी होगी। सच्ची भक्ति ही अंतःकरण को शुद्ध करेगी और उसी से स्थायी शांति का मधुर फल प्राप्त होगा।

संत रामपाल जी महाराज के पावन वचनों से अज्ञान का अंधकार छंटेगा, तत्वज्ञान की प्राप्ति होगी और सच्ची भक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा। आइए, हम पूर्ण एकाग्रता से इस आंतरिक साधना में प्रवृत्त हों, जहाँ अज्ञानता का उच्छेदन होता है और यथार्थ ज्ञान का बीजारोपण होता है।

संत रामपाल जी के अमृत वचनों में इस बात के पर्याप्त शास्त्र-प्रमाण मिलते हैं कि मनुष्य इतने कष्ट क्यों भोगता है? वे इसका मूल कारण यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में देवी-देवताओं की जाने वाली शास्त्र-विरुद्ध पूजा को बताते हैं।

विश्व शांति केवल तभी स्थापित होगी जब विभिन्न धर्मों और संप्रदायों को बांटने वाली संकीर्ण दीवारें ढह जाएंगी, और प्रत्येक मनुष्य सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर आपसी प्रेम और भाईचारे के साथ मिलकर रहेगा। मनुष्य को समय रहते सच्चे संत की पहचान कर लेनी चाहिए; उनके संसार से विदा हो जाने के बाद उन्हें ईश्वर मानकर पूजना व्यर्थ है। संसार में अशांति का यही सबसे बड़ा कारण रहा है। उदाहरणार्थ, द्वापरयुग में श्री विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को तत्कालीन समाज ने ईश्वर के रूप में स्वीकार नहीं किया और उन्हें अनेक कष्ट उठाने पड़े; किंतु आज अज्ञानतावश उनकी पूजा की जाती है। यह विवेकहीनता का परिचायक है।

लोकप्रचलित धारणाओं के आधार पर लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि श्री कृष्ण ने अपने दरिद्र सखा सुदामा के लिए महलों का निर्माण करवाया था; लेकिन वास्तव में सुदामा के लिए स्वर्ण महल का निर्माण करने वाले स्वयं पूर्ण परमात्मा थे। ब्रह्मा, विष्णु और महेश पूर्ण परमात्मा नहीं हैं। इक्कीस ब्रह्मांडों के भीतर वे मात्र विभागीय मंत्री हैं जिनका अधिकार क्षेत्र केवल स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक तक ही सीमित है, और वे स्वयं प्रलय के आधीन हैं।

अच्युतानंद दास जी की भविष्य मालिका पर पंडित काशीनाथ मिश्र: जगन्नाथ का अवतरण और दिव्य आत्माओं का प्राकट्य

भविष्यवक्ता श्री काशीनाथ मिश्र जी ने एक पॉडकास्ट में व्यक्त किया है कि: ‘श्री अच्युतानंद महाराज जी ने भविष्य मालिका में जो कुछ लिखा है, मैं उसी का गूढ़ार्थ प्रकट कर रहा हूँ’।

प्रश्न - पंडित जी, 'भविष्य मालिका' में यह भी उल्लेख मिलता है कि महाराणा प्रताप, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसी महान विभूतियाँ पृथ्वी पर पुनः जन्म लेंगी, अथवा उनका कोई अंश इसी रूप में प्रकट होगा। क्या आपको लगता है कि इन ग्रंथों में बताया गया वह समय निकट आ गया है?

पंडित काशीनाथ जी - समस्त देवी-देवता जन्म ले चुके हैं। देवराज इंद्र सहित सभी 33 करोड़ देवी-देवता मनुष्य रूप में पृथ्वी पर अवतरित हो चुके हैं। और क्या महत्वपूर्ण है? उनका जन्म कहाँ हुआ है? 90% का जन्म भारत में और 10% का जन्म अन्य देशों में हुआ है। जब स्वयं देवता जन्म ले चुके हैं, तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? इस समय स्वर्ग में इंद्र की गद्दी रिक्त पड़ी है। ध्रुव जी का भी जन्म हो चुका है। सबका प्राकट्य हो चुका है। आख़िरकार, जब प्रभु स्वयं पधारते हैं, तो उनकी पूरी सेना भी साथ आती ही है, है न?

पंडित काशीनाथ मिश्र जी ने उड़िया भाषा से भविष्य मालिका ग्रंथ का हिंदी में अनुवाद किया है। संत अच्युतानंद दास और उनके चार सहयोगियों यानी पाँचों संतों ने मिलकर इसे मूल रूप से उड़िया भाषा में लिपिबद्ध किया था, जिसका अब हिंदी में अनुवाद हो चुका है। इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि जब कलियुग में मानवता का पतन होगा, विशेषकर जब इस युग के लगभग 5,500 वर्ष बीत जाएंगे, तब सर्वसमर्थ पूर्ण परमात्मा जगन्नाथ एक साधारण मनुष्य के वेश में अपनी पावन लीला करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित होंगे। उस समय समस्त देवी-देवता और अन्य पुण्यात्माएं जन्म धारण करेंगी; उनमें से 90% भारत भूमि पर और 10% अन्य देशों में जन्म लेंगी।

कल्कि अवतार पर संत जय जगदीश लाला के विचार

श्री नीला सरस्वती आश्रम, पुरी (ओडिशा) के संत जय जगदीश लाला जी भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। वे उड़िया भाषा के प्रकांड विद्वान हैं।

ओडिशा के 'भविष्य मालिका' ग्रंथों में कल्कि अवतार के विषय में क्या लिखा गया है?

● भगवान कल्कि कौन हैं?

● कल्कि लीला रचने के लिए कौन आ रहा है?

ग्रंथों में स्पष्ट लिखा गया है कि स्वयं श्री जगन्नाथ भगवान जगन्नाथ महाप्रभु ही अपनी दिव्य लीला प्रकट करेंगे।

● जगन्नाथ महाप्रभु कौन हैं?

ओडिशा और उसके बाहर के लोग भगवान जगन्नाथ को भगवान श्री कृष्ण का ही एक रूप मानते हैं। किंतु 'भविष्य मालिका' के अनुसार, भगवान जगन्नाथ सोलह 'महाकलाओं' (सर्वोच्च ईश्वरीय शक्तियों) के स्वामी हैं, जबकि श्री कृष्ण को इन महाकलाओं में से केवल एक महाकला का प्रकटीकरण माना गया है। द्वापरयुग में श्री कृष्ण अवतरित हुए थे; केवल एक महाकला से उत्पन्न होने के कारण वे चौंसठ कलाओं से युक्त थे। उनकी समस्त शक्तियाँ भी भगवान जगन्नाथ के उसी एक अंश का विस्तार मात्र हैं।

संत श्री जगदीश लाला जी के अनुसार, ओडिशा के 'पंचसखा' संतों ने अपने ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख किया है कि स्वयं भगवान जगन्नाथ ही कल्कि लीला संपन्न करेंगे। ओडिशा सहित भारत के कई क्षेत्रों में यह सामान्य मान्यता है कि श्री जगन्नाथ वास्तव में भगवान श्री कृष्ण के ही स्वरूप हैं। स्थानीय परंपरा और भक्तिभाव में उन्हें श्री कृष्ण का अवतार माना जाता है, और यह आस्था केवल ओडिशा ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों के भक्तों में भी रची-बसी है।

किंतु, भविष्य मालिका की व्याख्या करते हुए श्री जगदीश लाला जी ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन किया है। उनके अनुसार, कलियुग के 5,505 वर्ष पूर्ण होने पर जो कल्कि अवतार अवतरित होगा, वह भगवान श्री कृष्ण से भी अनंत गुना अधिक शक्तिशाली और सामर्थ्यवान होगा। वे बताते हैं कि परमात्मा उस समय एक भक्त या संत के वेश में अवतरित होंगे, जो समस्त सोलह महाकलाओं से परिपूर्ण होंगे। इसके विपरीत, श्री कृष्ण जी के विषय में वे स्पष्ट करते हैं कि उनके पास इन 16 महाकलाओं का केवल एक अंश अर्थात् मात्र एक महाकला थी। इस आधार पर, दोनों के सामर्थ्य के मध्य एक विशाल अंतर रेखांकित किया गया है।

कल्कि या कबीर? परम सत्य का अनावरण

इस लेख के माध्यम से एक बहुत बड़े भ्रम का निवारण हो जाता हैं। जिस शक्ति को संसार 'कल्कि अवतार' कहकर पुकार रहा है, वह वास्तव में कल्कि नहीं हैं। आध्यात्मिक तत्वज्ञान के अनुसार, वास्तविक कल्कि अवतार का प्राकट्य तो कलियुग के बिल्कुल अंतिम दौर में होना निश्चित है। वह महान आत्मा, जो कलियुग के 5,505 वर्ष बीत जाने के बाद आज हमारे मध्य प्रकट हुई है और जिसे संसार भूलवश कल्कि समझ रहा है, वे वास्तव में स्वयं पूर्ण परमेश्वर कबीर जी हैं। वे ही संपूर्ण सृष्टि के सच्चे तारणहार हैं, और उनकी शक्ति तथा ज्ञान श्री कृष्ण से अनंत गुना अधिक है। संक्षेप में कहें तो, कल्कि अवतार का आना अभी शेष है; आज तो स्वयं पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब अवतरित हुए हैं।

संत जगदीश लाला - ओडिशा की भविष्य मालिका के अनुसार, 'कल्कि लीला' का मंचन करने के लिए एक दिव्य महापुरुष का प्राकट्य होगा; स्वयं सृष्टि के रचयिता, भगवान जगन्नाथ महाप्रभु भक्ति और प्रेम के वशीभूत होकर उस महाचेतना को इस संसार चक्र में अवतरित कराएंगे।

तारणहार के विषय में विभिन्न भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियाँ

अमेरिका की प्रसिद्ध भविष्यवक्ता फ्लोरेंस ने भविष्यवाणी की थी कि तीसरा विश्व युद्ध नहीं होगा; भारत के शांति प्रयासों से इसे टाल दिया जाएगा। यह भविष्यवाणी स्पष्ट रूप से उस महान संत की ओर संकेत करती है जो विश्व को विनाश से बचाएंगे और शांति का मार्ग प्रशस्त करेंगे। जिस समय तीसरे विश्व युद्ध जैसी भयावह परिस्थितियाँ तीव्र गति से निर्मित हो रही थीं, उस समय इस आसन्न प्रलयंकारी संकट को संत रामपाल जी महाराज के हस्तक्षेप से टाल दिया गया। वे अपने सत्संगों में भी 'गोल्डन लाइट ऑफ न्यू एरा' पुस्तक से उनकी इस भविष्यवाणी के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

मथुरा के जय गुरुदेव जी की भविष्यवाणी, भाई बाले वाली जनम साखी में प्रह्लाद द्वारा अवतार की भविष्यवाणी, राजस्थान के सुप्रसिद्ध संत बाबा रामदेव जी की वाणी, तथा सूक्ष्म वेद कबीर सागर और 'भविष्य मालिका पुराण' में भी ऐसी भविष्यवाणियाँ दर्ज हैं।

श्री जगदीश लाला द्वारा प्रस्तुत भविष्यवाणी

भारत के 'विश्वगुरु' बनने और उसकी आध्यात्मिक शक्ति के उदय के संदर्भ में यह भविष्यवाणी है कि हरियाणा की पावन धरा से एक ऐसा आध्यात्मिक महापुरुष प्रकट होगा जो राजनीति और चुनावों से सर्वथा निर्लिप्त रहकर राष्ट्र का मार्गदर्शन करेगा और संपूर्ण विश्व को अपनी आध्यात्मिक सत्ता से प्रभावित करेगा। इस घटनाक्रम के लिए वर्ष 2024 और 2028 का समय अत्यंत निर्णायक बताया गया है।

प्रश्न: क्या मोदी जी भारत के अंतिम प्रधानमंत्री होंगे?

शास्त्रों में ऐसा ही उल्लेख है। उनके बाद कोई अन्य प्रधानमंत्री नहीं होगा; वे ही अंतिम प्रधानमंत्री सिद्ध होंगे। वे देश को सत्ययुग की ओर ले जाएंगे। आख़िरकार, वे सत्ययुग के सारथी जो हैं।

प्रश्न: तो फिर राजनीति के पश्चात मोदी जी क्या करेंगे?

वे प्रभु के अनन्य भक्त हैं, अतः वे वही करेंगे जो एक सच्चे भक्त का परम कर्तव्य होता है।

प्रश्न: क्या योगी जी केवल उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहेंगे?

'श्रीमद्भागवत' में यह वर्णित है कि भविष्य में संपूर्ण विश्व पर सनातन व्यवस्था का राज्य स्थापित होगा और प्रभु स्वयं अयोध्या में धर्म की मर्यादा को पुनर्प्रतिष्ठित करेंगे। इसी आधार पर युगांतरकारी परिवर्तन होगा और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का समापन हो जाएगा। उस समय शासन की बागडोर केवल और केवल प्रभु की इच्छा से किसी योग्य पात्र को सौंपी जाएगी।

ये समस्त भविष्यवाणियाँ इस बात को अकाट्य रूप से प्रमाणित करती हैं कि प्रत्येक लक्षण, प्रत्येक संकेत और प्रत्येक वचन वर्तमान समय में पूर्ण ब्रह्म के साक्षात स्वरूप संत रामपाल जी महाराज पर ही अक्षरशः चरितार्थ होता है। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जिस अवतार की युगों-युगों से प्रतीक्षा की जा रही थी, वह आज हमारे मध्य साक्षात विद्यमान है। अब संशय का कोई लेशमात्र भी स्थान नहीं रह जाता।

सुदामा से शबरी तक: भक्तों पर कबीर परमेश्वर की असीम अनुकंपा

जब कोई जीवात्मा पूर्ण परमात्मा कबीर देव जी की शरण में आ जाती है, तो वे एक सेवक की भाँति सदा उसकी रक्षा करने और उसके समस्त कार्यों को सिद्ध करने के लिए उसके अंग-संग रहते हैं। संत रामपाल जी महाराज ने इस गूढ़ रहस्य को उजागर किया है। इस संदर्भ में:

● पूर्ण परमात्मा कबीर जी ने ही श्री कृष्ण का रूप धारण करके सुदामा के कच्चे चावल खाए थे।

● त्रेतायुग में अपनी पावन लीला के अंतर्गत कबीर साहेब मुनीन्द्र ऋषि के नाम से प्रकट हुए थे। उस समय कबीर परमेश्वर ने ही श्री रामचंद्र का रूप धारण कर अनन्य भक्त शबरी (भीलनी) के जूठे बेर खाए थे, जो वर्षों से परमेश्वर के दर्शनों के लिए विरह में रो रही थी।

यही वह मौलिक तत्वज्ञान है जिसे कबीर परमात्मा ने गुप्त रखने का आदेश दिया था। उन्होंने आदरणीय धर्मदास जी से स्पष्ट कहा था कि इस यथार्थ ज्ञान को तब तक छिपाकर रखना है जब तक कि कलियुग के 5,505 वर्ष व्यतीत न हो जाएं। वर्ष 1997 तक कलियुग के 5,505 वर्ष पूरे हो चुके थे। ठीक इसी समय अनंत कोटि ब्रह्मांडों के सृजनहार, सोलह दिव्य कलाओं के स्वामी जगन्नाथ महाप्रभु अर्थात् कबीर परमेश्वर जी ने अपनी अलौकिक लीला करने हेतु श्री प्रभु रामपाल जी महाराज के रूप में स्वयं को प्रकट किया। वे ही हैं जिन्होंने इस परम गूढ़ और गुप्त सत्य को संपूर्ण विश्व के सम्मुख उद्घाटित किया है।

संत रामपाल जी महाराज द्वारा एक और परम सत्य उजागर किया गया है कि किस प्रकार सुपच सुदर्शन जी ने पांडवों के यज्ञ को सफल बनाया था?

छह सौ वर्ष पूर्व पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब काशी की पावन धरा पर प्रकट हुए थे; वे 120 वर्षों तक इस धरा पर रहे, अपने यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार किया और अगणित लीलाएं रचीं। एक विशेष लीला के तहत अपनी सर्वसमर्थ शक्ति का परिचय देते हुए परमात्मा ने एक मृत बालक और एक मृत बालिका को नवजीवन प्रदान किया; वे ही आगे चलकर उनके पुत्र कमाल और पुत्री कमाली कहलाए और उनका पालन-पोषण स्वयं परमात्मा द्वारा किया गया। परमात्मा का कभी विवाह नहीं हुआ; अतः लोककथाओं और कुछ ग्रंथों में उनकी पत्नी के विषय में जो भी प्रचारित किया गया है, वह सर्वथा मिथ्या और निराधार है।

सृष्टि रचना, ब्रह्मा, विष्णु और महेश के वास्तविक पद के साथ-साथ पूर्ण परमेश्वर कबीर साहेब जी की सर्वोच्च सत्ता को संत रामपाल जी महाराज ने उजागर किया है। वे ही पूर्ण मोक्ष के एकमात्र प्रदाता हैं। उन्होंने बलख के सुल्तान इब्राहिम इब्न अधम, गुरु नानक देव जी, संत दादू दयाल जी और अन्य अनेक पुण्य आत्माओं को भवसागर से पार उतारकर मोक्ष प्रदान किया।

पवित्र श्रीमद्भगवद्गीता, दुर्गा पुराण और कूर्म पुराण में भी ऐसे प्रमाण है जो त्रिदेवों की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करते हैं। ये तीनों देव और इनके पिता काल ब्रह्म (गीता ज्ञान दाता इक्कीस ब्रह्मांडों का स्वामी) सभी नाशवान हैं। चारों वेद केवल अविनाशी पूर्ण परमात्मा कबीर जी की ही महिमा का गुणगान करते हैं।

महत्वपूर्ण: संत अच्युतानंद जी और उनकी भविष्य मालिका भी उसी एक भगवान जगन्नाथ की ओर संकेत करती है, जो इस संपूर्ण सृष्टि के रचयिता और सोलह दिव्य कलाएँ (महाकलाएँ) के स्वामी हैं।

भविष्य मालिका: ओडिशा के पंचसखा संतों की भविष्यवाणियाँ और भगवान कल्कि से उनका संबंध

ओडिशा के श्री पुलिन पांडा जी लगभग 30 वर्षों से भविष्य मालिका पर शोध कर रहे हैं। उन्होंने उड़िया भाषा में ‘कल्कि लीला’ नामक एक पुस्तक भी लिखी है। उनकी हार्दिक इच्छा है कि यह पुस्तक हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में भी उपलब्ध हो, ताकि अधिकाधिक लोग भगवान कल्कि के यथार्थ स्वरूप से परिचित हो सकें।

लगभग 600 वर्ष पूर्व ओडिशा के संतों ने भविष्य के संबंध में अनेक ग्रंथों की रचना की थी। इस संदर्भ में कुल 17 प्रमुख संतों का उल्लेख मिलता है; उनमें से पाँच प्रमुख संतों—अच्युतानंद दास, बलराम दास, यशवंत दास, अनंत दास और जगन्नाथ दास को 'पंचसखा' के नाम से जाना जाता है।

इनके अतिरिक्त महात्मा अंकित दास और महात्मा हरिदास की भविष्यवाणियाँ भी इसी श्रेणी की मानी जाती हैं। अकेले संत अच्युतानंद दास जी ने 38 से अधिक ग्रंथों की रचना की जिनमें उन्होंने भविष्य से जुड़े अनेक रहस्यों को उद्घाटित किया। इसी प्रकार पंचसखा के अन्य संतों ने भी विभिन्न ग्रंथों में भविष्यवाणियाँ दर्ज कीं। अतः अलग-अलग ग्रंथों में संकलित इन भविष्यवाणियों के संपूर्ण संग्रह को लोकभाषा में 'मालिका' कहा जाता है।

इसमें भारत, ओडिशा और संपूर्ण विश्व के भविष्य को लेकर अनेकानेक भविष्यवाणियाँ संकलित हैं। इनमें से कई भविष्यवाणियों को शोधकर्ता समकालीन ऐतिहासिक घटनाओं से जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए, यह माना जाता है कि 1947 में भारत की स्वतंत्रता, महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी की हत्या, तथा अटल बिहारी वाजपेयी जी के 13 दिन और 13 महीने के शासनकाल का पूर्वाभास इन ग्रंथों में पहले ही दे दिया गया था।

इसी प्रकार ओडिशा में जिलों की संख्या में वृद्धि और वर्तमान जिलों के नामों का भी उसमें स्पष्ट उल्लेख मिलता है। ये दावे भविष्य मालिका की विलक्षणता और उसकी अचूक सत्यता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं।

पंचसखा संतों ने अपने ग्रंथों में यह भी स्पष्ट किया है कि वे विभिन्न युगों में भगवान के अवतारों के साथ अवतरित होते रहे हैं। सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग में उनके भिन्न-भिन्न नामों और स्वरूपों का विवरण प्राप्त होता है:

● अच्युतानंद दास जी के विषय में कहा गया है कि वे सत्ययुग में कृपाजला मुनि, त्रेतायुग में नल, द्वापरयुग में सुदामा और कलियुग में अच्युतानंद दास हुए।

● यशवंत दास जी के विषय में बताया गया है कि वे सत्ययुग में महर्षि गर्ग, त्रेतायुग में जांबवंत, द्वापरयुग में सुबाहु और कलियुग में यशवंत दास के रूप में आए।

● अनंत दास जी को 'शिशु अनंत' के नाम से जाना जाता है; पूर्व के युगों में उनके अवतारों के संदर्भ भी प्राप्त होते हैं।

● बलराम दास जी के विषय में कहा गया है कि वे सत्ययुग में मार्कंडेय, त्रेतायुग में हनुमान, द्वापरयुग में सुवर्ण और कलियुग में बलराम दास हुए।

● जगन्नाथ दास जी के विषय में उल्लेख मिलता है कि वे सत्ययुग में देवर्षि नारद, त्रेतायुग में नील, द्वापरयुग में दामोदा (दाम सखा) और कलियुग में जगन्नाथ दास के रूप में अवतरित हुए।

मान्यता के अनुसार, जब-जब भगवान अवतार लेते हैं, तब-तब ये पंचसखा भी उनके साथ आते हैं, उनकी लीला में सहभागी बनते हैं और लीला संवरण के पश्चात अंतर्ध्यान हो जाते हैं। कहा जाता है कि वर्तमान समय में भी वे गुप्त रूप से ओडिशा में मानव शरीर में निवास कर रहे हैं; कोई नहीं जानता कि वे वास्तव में कहाँ हैं।

संत अच्युतानंद दास जी की वाणी के अनुसार, जब तक स्वयं परमात्मा प्रकट नहीं हो जाते, तब तक ये पंचसखा अपनी वास्तविक पहचान किसी को उजागर नहीं करेंगे। वे सामान्य जन की भांति यहाँ-वहाँ भ्रमण करते रहेंगे और कोई उन्हें पहचान नहीं पाएगा; प्रभु के प्रकटीकरण पर ही वे अपने यथार्थ स्वरूप का रहस्योद्घाटन करेंगे।

समीक्षात्मक विश्लेषण- यह प्रसंग हम सभी के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण पथ-प्रदर्शक है। अनन्य साधक होने के उपरांत भी ऋषि मार्कंडेय पूर्ण मोक्ष प्राप्त नहीं कर सके; उनकी गति केवल ब्रह्मलोक तक ही सीमित रही। संत रामपाल जी महाराज ने सिद्ध किया है कि सच्ची शास्त्रानुकूल भक्ति के बिना किसी भी जीव का पूर्ण मोक्ष संभव नहीं है। इसके विपरीत, हिंदू धर्मगुरु अज्ञानतावश ब्रह्मलोक को ही मोक्ष का सर्वोच्च और अंतिम धाम मान बैठे हैं।

किंतु श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 8 श्लोक 16 के अनुसार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि ब्रह्मलोक सहित सभी लोक पुनरावर्ती हैं, अर्थात् वे जन्म और मरण के चक्र के अधीन हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि ब्रह्मलोक प्राप्त करने के पश्चात भी ऋषि मार्कंडेय आज पुनः पृथ्वी पर मानव जीवन व्यतीत कर रहे हैं और सत्ययुग से ही जन्म-मरण के बंधन में फंसे हुए हैं।

अब भगवान जगन्नाथ के सान्निध्य में सच्ची भक्ति (सतभक्ति) करके वे पूर्ण मोक्ष प्राप्त करेंगे, अर्थात् उस सतलोक को प्राप्त करेंगे जहाँ जन्म और मरण का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता है। वही पवित्र आत्मा त्रेतायुग में हनुमान जी के रूप में अवतरित हुई थी। अपनी कठोर साधना और तप के बल पर उन्होंने असाधारण आध्यात्मिक शक्तियां प्राप्त कीं तथा विशाल पर्वतों तक को उठा लिया। किंतु ऐसी अलौकिक शक्तियां कभी भी पूर्ण मोक्ष का पैमाना नहीं हो सकतीं। जब पूर्ण परमात्मा मुनिंद्र ऋषि के रूप में प्रकट हुए, तो यद्यपि हनुमान जी ने उनसे नाम दीक्षा प्राप्त की, तथापि दृढ़ विश्वास की कुछ कमी रह जाने के कारण वे उस समय पूर्ण मोक्ष को प्राप्त न कर सके।

काल जाल आत्मा को आध्यात्मिक शक्तियों से उत्पन्न अहंकार में उलझाए रखता है। अब कलियुग में उस कमी को पूरा करने का स्वर्णिम अवसर आया है। मनुष्य को अलौकिक शक्तियों और चमत्कारों के मोह से मुक्त होकर सोलह दिव्य महाकलाओं के पूर्ण स्वामी परमात्मा पर अडिग विश्वास स्थापित करना होगा।

यहाँ तक कि देवर्षि नारद भी पूर्ण तत्वज्ञान के अभाव में युगों-युगों तक मोक्ष से वंचित रहे। भविष्य मालिका के अनुसार, वही जीवात्मा त्रेता में नील, द्वापर में दाम सखा और कलियुग में बलराम दास जी के रूप में अवतरित हुई।

सार: परमात्मा अपने भक्तों का त्याग कभी नहीं करते। वे अनेक जन्मों तक जीवात्माओं को अपने समीप लाते रहते हैं और उनके आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। पूर्ण प्रभु कबीर साहेब अपने प्रिय हंसों की खोज में स्वर्ग से पाताल तक भ्रमण करते हैं और युगों की अनथक साधना और प्रेरणा से उन्हें इस भवसागर से पार ले जाते हैं।

क्या श्री कृष्ण या श्री विष्णु ही वास्तविक जगन्नाथ हैं?

तत्वज्ञान के अनुसार, वे एक ब्रह्मांड के तीन लोकों स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में से केवल एक लोक के स्वामी हैं। तमोगुण युक्त भगवान शिव, रजोगुण युक्त भगवान ब्रह्मा और सतोगुण युक्त भगवान विष्णु की भांति वे स्वयं भी जन्म, मरण और कर्मबंधन के अधीन हैं। फिर वे समस्त सृष्टि के अविनाशी स्वामी 'जगन्नाथ' कैसे हो सकते हैं? वास्तव में कबीर परमेश्वर ही संपूर्ण सृष्टि के अविनाशी जगन्नाथ हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता इस गूढ़ रहस्य को स्पष्ट करती है; प्रमाण गीता अध्याय 8 श्लोक 3 तथा 8–10, अध्याय 15 श्लोक 17, और अध्याय 18 श्लोक 62। सच्चे जगन्नाथ, परम अविनाशी पूर्ण ब्रह्म स्वयं कबीर परमेश्वर ही हैं। वे ही एकमात्र सृष्टिकर्ता हैं, और युगों-युगों से वे ही इन पाँचों सखाओं को भक्ति की शक्ति देकर तैयार करते रहे हैं। ये पाँचों पुण्यात्माएं पुनः इस धरा पर मनुष्य रूप में अवतरित हो चुकी हैं। वर्तमान में वे सभी सामान्य मानव का जीवन जी रहे हैं। अब वे भी इसी पूर्ण परमात्मा के माध्यम से पूर्ण मोक्ष को प्राप्त करेंगे। आज वे पाँचों सखा इस पृथ्वी पर गुप्त रूप से विद्यमान हैं; समय आने पर वे स्वयं इस सत्य की साक्षी भरेंगे।

अब वह समय आ चुका है जब हम देवी-देवताओं की सीमाओं से ऊपर उठें और कुल के मालिक, यथार्थ जगन्नाथ कबीर साहेब की शरण ग्रहण करें।

प्रश्न: गुरु जी, आपको अपनी ऐसी कौन-सी पुरानी भविष्यवाणियाँ स्मरण हैं जो आपने की थीं अथवा लिखी थीं, लोगों को बताई थीं, और वे अक्षरशः सत्य सिद्ध हुईं?

भविष्य मालिका में भारत के विभाजन और नए राष्ट्रों के उदय से संबंधित भविष्यवाणियों के होने का भी दावा किया जाता है। बताया जाता है कि इसमें भारत से पाकिस्तान के अलग होने और बाद में एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश के गठन का स्पष्ट उल्लेख है। इसके अतिरिक्त, वर्तमान में पश्चिमी देशों में लैंगिक पहचान और वैवाहिक संस्था में जो सामाजिक विकृतियाँ देखी जा रही हैं, कुछ विद्वान इन परिवर्तनों को वेदों में वर्णित ‘वर्णसंकर’ की स्थिति और युग परिवर्तन के लक्षणों से जोड़ते हैं। इन समसामयिक घटनाओं को भविष्य मालिका की भविष्यवाणियों से जोड़कर यह तर्क दिया जाता है कि यह कोई साधारण ग्रंथ नहीं है। जब इसमें वर्णित अतीत और वर्तमान की घटनाएँ सत्य प्रमाणित होती हैं, तो उसी आधार पर पंचसखाओं के पूर्व जन्मों के संबंध में किए गए दावों की भी स्वतः पुष्टि हो जाती है। इस प्रकार भविष्य मालिका की परंपरा में पंचसखाओं द्वारा धर्म की पुनर्स्थापना और अच्युतानंद दास जी के पूर्व जन्मों से जुड़े साक्ष्यों को अत्यंत विशिष्ट महत्व दिया जाता है।

श्री कृष्ण महाकलाओं के केवल एक अंश के अवतार थे। इसके विपरीत, इस संपूर्ण ब्रह्मांड के सृजनहार श्री जगन्नाथ महाप्रभु समस्त सोलह महाकलाओं के अधिपति हैं; वही अविनाशी परमेश्वर कलियुग के अंत में कल्कि रूप में अवतरित होंगे।

विशेष टिप्पणी: यह वीडियो अब तक समाज में फैली इस भ्रांति का भी निवारण करता है कि सत्ययुग में हिरण्यकश्यप का वध भगवान विष्णु ने किया था। यथार्थ यह है कि स्वयं भगवान जगन्नाथ (कबीर परमेश्वर) ने नृसिंह रूप धारण करके हिरण्यकश्यप का संहार किया था और अपने अनन्य भक्त प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा की थी।

वास्तव में वे कबीर परमेश्वर ही थे जो इन समस्त अलौकिक लीलाओं का संचालन कर रहे थे। किंतु अज्ञानतावश सब यही मानते रहे कि ये कार्य ब्रह्मा, विष्णु, महेश, राम और कृष्ण जैसे देवों द्वारा किए गए थे। समूचे हिंदू समाज ने उन्हें अजन्मा और अविनाशी मान लिया था; तथापि, आज धर्मग्रंथों का निष्पक्ष अध्ययन यह पूरी तरह स्पष्ट कर देता है कि वे न तो अजन्मा हैं और न ही अविनाशी। इसका स्पष्ट प्रमाण शिव पुराण में भी उपलब्ध है।

संत रामपाल जी महाराज की अनवरत मानव सेवा: पीड़ितों के लिए आश्रय, अन्न, शिक्षा और चिकित्सा

संत रामपाल जी महाराज ने संपूर्ण भारत में निर्धनों और बेसहारों के लिए 'सुदामा कुटी' जैसे हजारों आवासों का निर्माण करवाया है। यह सेवा कार्य बिना किसी रुकावट के निरंतर चल रहा है। 'अन्नपूर्णा मुहीम’ के अंतर्गत आज लाखों बच्चों और असहायों को सहायता उपलब्ध कराई जा रही है; जिनके सिर पर छत नहीं थी, उन्हें पक्के घर दिए गए हैं। भूखों को अन्न, वस्त्रहीनों को वस्त्र और सभी के लिए निःशुल्क शिक्षा तथा चिकित्सा की व्यवस्था की जा रही है।

अगस्त-सितंबर 2025 के दौरान मथुरा में आई भीषण बाढ़

तथाकथित गुरुओं की खुली पोल - उत्तर प्रदेश के मथुरा में बाढ़ के समय सबसे आश्चर्यजनक और विडंबनापूर्ण स्थिति देखने को मिली। श्री प्रेमानंद जी और अनिरुद्धाचार्य जैसे प्रसिद्ध कथावाचक, जो स्थायी रूप से वृंदावन और बरसाना में निवास करते हैं, श्री कृष्ण के नाम पर अपनी आजीविका चलाते हैं और विश्व भर के श्रद्धालुओं को गोवर्धन परिक्रमा का उपदेश देते हैं; किंतु जब उसी पावन क्षेत्र पर भीषण विपत्ति आई, तो ये तथाकथित संत चुप्पी साधे बैठे रहे, मानो वे हक्के बक्के रह गए हों।

● ब्रज क्षेत्र के दर्जनों गाँव भीषण बाढ़ और जलभराव के संकट से जूझ रहे थे। वहाँ के ग्रामीणों ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से बताया कि वे पिछले 5 से 10 वर्षों से इस नारकीय स्थिति को झेलने को विवश थे। संत रामपाल जी महाराज ने ब्रज क्षेत्र के दर्जनों गाँवों में उच्च क्षमता वाली बड़ी मोटरें और विशाल पाइप भिजवाकर जल निकासी की मुकम्मल व्यवस्था की और उन्हें एक नया जीवन दिया।

● मथुरा की बरसाना ग्राम पंचायत के किसान भीषण जल-प्रलय का सामना कर रहे थे। इस विषम परिस्थिति में संत रामपाल जी महाराज ने दो 15 एचपी की मोटरें, 2,630 फीट लंबी 8-इंच की पाइपलाइन, 2,300 फीट बिजली की केबल और अन्य सभी आवश्यक छोटे-बड़े उपकरण उपलब्ध कराए।

● गोवर्धन तहसील के बाजगोई गाँव में बाढ़ के कारण लगभग 2,000 बीघा कृषि भूमि जलमग्न हो गई थी। किसानों की फसलें पूरी तरह नष्ट हो चुकी थीं और आगामी मौसम में गेहूं की बुवाई की सारी उम्मीदें समाप्त हो चुकी थीं। संत रामपाल जी महाराज ने मथुरा जनपद की गोवर्धन तहसील के बाजगोई गाँव में छह 15-एचपी की मोटरें, एक 10-एचपी की मोटर, 38,400 फीट लंबी 8-इंच की पाइपलाइन और 12,795 फीट तार सहित प्रत्येक आवश्यक सामग्री दान स्वरूप भेंट की।

● मथुरा जिले की गोवर्धन तहसील के कमई गाँव के निवासियों की खुशियाँ पिछले 30 वर्षों से बाढ़ के गंदे पानी की बंधक बनी हुई थीं। लगभग 1,000 बीघा उपजाऊ भूमि इन तीन दशकों में एक स्थायी गंदे तालाब में तब्दील हो चुकी थी, और स्थिति इतनी भयावह थी कि गाँव की 50% आबादी निरंतर उस दूषित जल के बीच घिरकर जीने को विवश थी। इस संकट के बीच संत रामपाल जी महाराज ने चार 15 एचपी की मोटरें, एक ट्रैक्टर चालित पंप (4x4 इंच), 13,800 फीट लंबी 8-इंच की पाइपलाइन, 80 फीट केबल और अन्य सभी आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए।

उत्तर प्रदेश के आगरा में सहायता

● उत्तर प्रदेश के आगरा जिले की किरावली तहसील में स्थित साधन गाँव की लगभग 800 से 1,000 बीघा उपजाऊ भूमि पिछले दो वर्षों से पानी में डूबी हुई थी। किसान और मजदूर लाचार होकर अपनी मेहनत की कमाई को अपनी आँखों के सामने सड़ते देखने को विवश थे। इस पूरे गाँव को इस विपदा से उबारने के लिए संत रामपाल जी महाराज ने 13,000 फीट लंबी 8-इंच की पाइपलाइन, 10 एचपी की चार विशाल मोटरें और 3,200 फीट बिजली के तार भिजवाने का प्रबंध किया।

इन सभी क्षेत्रों में भेजी गई सहायता इतनी सुव्यवस्थित और सूक्ष्म थी कि मोटरों के साथ स्टार्टर, बेंड, फुट वाल्व, निप्पल और यहाँ तक कि पाइप जोड़ने वाला सोल्यूशन तक भेजा गया।

यह ऐतिहासिक घटना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सच्चा संत वह नहीं होता जो केवल एक वातानुकूलित कक्ष में बैठकर लोगों से "राधे-राधे" जपने को कहे; बल्कि सच्चा संत वह होता है जो पीड़ित मानवता के आंसू पोंछने के लिए स्वयं धरातल पर उतरता है। ब्रजवासियों की टूटी हुई उम्मीदों को संबल देने वाले वे हाथ किसी स्वार्थी कथावाचक के नहीं थे, बल्कि उस तत्वदर्शी संत के थे जो वास्तव में स्वयं पूर्ण परमेश्वर कबीर साहेब के साकार स्वरूप हैं। ये परोपकारी कार्य इस बात को पूर्णतः सिद्ध करते हैं और हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि स्वयं कबीर परमेश्वर अर्थात् जगन्नाथ महाप्रभु ही संत रामपाल जी के रूप में अपनी यह अलौकिक लीला कर रहे हैं।

इस प्राकृतिक आपदा के समय हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में भी व्यापक स्तर पर राहत सामग्री और सहायता उपलब्ध कराई गई।

1997 में संत रामपाल जी महाराज सशरीर सतलोक चले गए गया थे, और अब स्वयं पूर्ण परमात्मा ने उनका रूप धारण करके यह लोक-कल्याणकारी दिव्य लीला रची है।

संक्षेप में: संत रामपाल जी महाराज के अनुसार, भक्त सुदामा के प्रसंग का मूल उद्देश्य पूर्ण परमात्मा की वास्तविक पहचान कराना और सतभक्ति का सच्चा मार्ग समझाना है। जब तक कोई व्यक्ति यथार्थ ज्ञान और साधना की सही विधि को नहीं पहचान लेता, तब तक वह अज्ञान के अंधकार में भटकता रहता है और शास्त्र-विरुद्ध साधना करता रहता है। सुदामा का चरित्र भक्तों को सही आध्यात्मिक मार्ग अपनाने का पावन संदेश देता है। संत रामपाल जी महाराज स्पष्ट करते हैं कि दुखों का अंत और सच्चे सुख की प्राप्ति केवल सच्ची भक्ति से ही संभव है। इसके अतिरिक्त, सत्य के पथ पर चलकर ही व्यक्ति अपने आध्यात्मिक कल्याण के साथ-साथ संसार में भाईचारे, सद्भाव और शांति की स्थापना में अपना अमूल्य योगदान दे सकता है।

परम अक्षर ब्रह्म: स्थायी शांति का दिव्य मार्ग

परम अक्षर ब्रह्म (अविनाशी पूर्ण परमात्मा) की शास्त्रानुकूल भक्ति से न केवल उनके अनुयायियों को सुख-शांति प्राप्त हुई, बल्कि उनके द्वारा किए गए निःस्वार्थ दान और सेवा कार्यों से लाखों किसानों और श्रमिकों को भी एक नया जीवन मिला है। सेवा की इसी निस्वार्थ भावना के कारण ही आज आम जनमानस संत रामपाल जी महाराज और उनके अनुयायियों को अपना आत्मीय मानने लगा है। संत रामपाल जी महाराज से 'नाम दीक्षा' प्राप्त करके मानव जाति सुख प्राप्त कर सकती है और आपसी भाईचारे के निर्माण में सहयोग देकर असीम पुण्य अर्जित कर सकती है। जब यह शाश्वत सत्य प्रत्येक हृदय में गहराई से उतर जाएगा, तभी संसार में स्थायी शांति और सच्चे बंधुत्व की स्थापना होगी। संत रामपाल जी महाराज के अमूल्य और दिव्य आध्यात्मिक सत्संग ही विश्व शांति और पारस्परिक भाईचारे की स्थापना की आधारशिला हैं।

पूर्ण परमात्मा के संबंध में जिस ईश्वरीय विधान का प्रतिपादन संत रामपाल जी महाराज अपने सत्संगों में करते हैं, वह कोई कोरी कल्पना या सिद्धांत मात्र नहीं है; यह एक ऐसा जीवंत सत्य है जिसके आज लाखों लोग प्रत्यक्ष साक्षी हैं। जिन आत्माओं ने उनके बताए नियमों और मर्यादाओं को अपने जीवन में धारण किया है, वे आज सत्ययुग के समान आनंदमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनके जीवन में असीम शांति, संतुलन और वास्तविक सुख स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

संत रामपाल जी महाराज समझाते हैं कि सर्वप्रथम हमें इस मृत्युलोक की सांसारिक व्यवस्था का गंभीरता से अवलोकन करना चाहिए। हम अपने आस-पास देखते हैं कि माता-पिता अपने पुत्रों और पुत्रियों का बड़े लाड़-प्यार से पालन-पोषण करते हैं, उन्हें सुशिक्षित करते हैं, योग्य होने पर उनका विवाह करते हैं और उनके सुखमय जीवन की कामना करते हैं। किंतु कोई नहीं जानता कि भाग्य का पहिया कब प्रतिकूल घूम जाए। उदाहरण के लिए, किसी ऐसी बेटी की स्थिति पर विचार कीजिए जिसके दो छोटे-छोटे बच्चे हों और उसका पति ही परिवार का एकमात्र सहारा हो। यदि उसके पति का अचानक देहांत हो जाए, तो उस बेचारी की पूरी दुनिया में अंधकार छा जाता है। वृद्ध माता-पिता चाहकर भी अधिक सहायता करने में असमर्थ होते हैं, और भाई अपने पारिवारिक दायित्वों से बंधा होता है। ठीक उसी समय, जब संसार के सारे सहारे समाप्त हो जाते हैं, तब परमात्मा का चमत्कार प्रकट होना प्रारंभ होता है।

जहाँ मानवीय बुद्धि और तर्क की सीमा समाप्त होती है, वहीं से पूर्ण परमात्मा की असीम कृपा प्रारंभ होती है। कबीर साहेब पूर्ण परमेश्वर ही जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के रूप में अवतरित होकर मानव कल्याण के इस महायज्ञ में लगे हुए हैं। 'अन्नपूर्णा' जैसी पावन पहल के माध्यम से उन्होंने कलियुग के भीतर ही सत्ययुग जैसी व्यवस्था स्थापित करने का बीड़ा उठाया है, जिससे अनगिनत पीड़ित और दुखी हृदयों में खुशहाली लौट रही है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ‘कलियुग में सत्ययुग का आरंभ भाग 1-5’ में देखा जा सकता है।

आज यह भली-भांति सिद्ध हो चुका है कि जिस शांति और सुख की खोज में समूची मानवता युगों-युगों से भटक रही थी, उसका वास्तविक समाधान मिल गया है। समय रहते इस मोक्ष काल को पहचानें और सशरीर हमारे मध्य उपस्थित भगवान जगन्नाथ महाप्रभु (संत रामपाल जी महाराज) की शरण ग्रहण करें।

भविष्य मालिका और उद्धारकर्ता का आगमन | कलयुग में सतयुग भाग 5 →