दीक्षा का क्या अर्थ है ?

दीक्षा का अर्थ है सतगुरु द्वारा अपने शिष्य को दिया गया ~ मंत्र उपदेश ।

जहाँ सतगुरु का ज्ञान समझने के बाद व्यक्ति को  केवल उनके किताबों में ही लिखे नियमों का पालन करने और किताबों द्वारा ही दी भक्ति साधना को करने से लाभ प्राप्त नहीं होता, इसके लिए उसे परमेश्वर के ही आधिकारी संत से दीक्षा लेनी पड़ती है दीक्षा की प्रक्रिया में इच्छुक व्यक्ति को सतगुरु द्वारा ही निर्धारित पाठ्यक्रम को गुरु वचन से शिष्य को प्रदान किया जाता है अर्थात "नाम" (मंत्र) प्रदान किया जाता है इसे "नाम दीक्षा" या "नामदान" भी कहा जाता है। "दीक्षा", "नाम", "नामदान" "नाम उपदेश" और "नाम दीक्षा" ये एक ही शब्द के पर्याय है।

दीक्षा का उद्देश्य

दीक्षा प्राप्ति का एकमात्र उद्देश्य मोक्ष है अर्थात जीवन मरण के चक्र से मुक्ति और शिष्य को मुक्ति तभी सम्भव होती है जब व्यक्ति परमेश्वर के  अधिकारी संत से गुरु दीक्षा ले । सच्चे गुरु से मिली सतभक्ति ( नाम दीक्षा ) से "अच्छा स्वास्थ्य", "समृद्धि", "खुशी / संतोष" मिलने वाले निशुल्क लाभ हैं। अतः दीक्षा इन सुखो को प्राप्त करने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ नहीं लेनी चाहिए उद्देश्य केवल मोक्ष का ही होना चाहिए।

मानव जीवन में दीक्षा कितनी जरूरी ?

“जब तक पूर्ण गुरु का सत्संग सुनने को नहीं मिलता तब तक इस बात का अंदाजा ही नहीं लगता कि मनुष्य जीवन कितना कीमती है ।“

चाहे आप कितने भी धनी पुरुष हो, गोरखनाथ जी जैसे सिद्ध पुरुष हो, अनगिनत कलाओं के स्वामी हो,  समाज में मान-सम्मान प्राप्त शख्सीयत हो, चाहे इस पृथ्वी के राजा भी क्यों न हो, अगर गुरु दीक्षा नही ली है तो स्वर्ग में भी स्थान नहीं मिलता। इस संबंध में सुखदेव मुनि की कथा प्रमाणित है

कबीर साहेब कहते हैं ।

गुरु बिन माला फेरते,गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन दोनों निष्फल है, चाहे पूछ लो वेद पुराण।।

किसी भी दान, धर्म, पूजा, साधना, धर्म-कर्म का कोई महत्व नहीं अगर आपके पास गुरु दीक्षा नही है तो और ऐसे प्राणी मनुष्य जन्म पाने के अधिकारी भी नही होते क्योंकि गुरु दीक्षा के बगैर देवी देवता किसी भी दान को स्वीकार्य नहीं करते। पवित्र गीता इस तथ्य को स्पष्ट करती है ।

नाम दीक्षा ना लिया हुआ मनुष्य अपने कीमती मानव जीवन को यूं ही व्यर्थ गंवा देते है और अगले जन्म में गधे कुत्तों की योनियों में अपने द्वारा किए हुए सभी पुण्य को भोगते हैं और जन्म मरण का चक्र यूं ही अन्य योनियों मे कर्म आधार पर चलता जाता है ।

इस संबंध में पूर्ण अक्षर ब्रह्म, पूर्ण परमेश्वर हम सभी आत्माओं के जनक कबीर साहब कहते हैं

एक हरि के नाम बिना, ये राजा ऋषभ (गधा) होए।
मिट्टी लदे कुम्हार कै, घास न नीरै कोए।।

बहुत विचारणीय और गंभीर विषय है कि मानव जीवन यूं ही व्यर्थ ना जाए।

ये एक ही उदाहरण यहां इसकी महत्ता को स्पष्ट कर देता है इसलिए विनम्र निवेदन है मनुष्य जीवन पाकर नाम दीक्षा जरूर ले ताकी जन्म मरण का चक्र सदा के लिये छूट सके और आतम कल्याण हो सके।

दीक्षा लेने के लिए आवश्यक नियम

दीक्षा लेने के लिए, कुछ नियमों का पालन करने की आवश्यकता होती है। यह अतयंत महत्वपूर्ण है कि दीक्षा और भक्ति सफल /लाभप्रद  होने के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए। यदि कोई शिष्य किसी भी नियम को तोड़ता है, तो भक्ति सफल नहीं होती है और यह एक निरर्थक प्रयास रह जाता है। कृपया भक्ति के नियमों से खुद को परिचित करें।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि दीक्षा लेने के इच्छुक व्यक्ति संत रामपाल जी महाराज द्वारा प्रदान किए गए तत्वज्ञान से परिचित हों। ज्ञान ही भक्ति व नाम के समेकन (Consolidation) का आधार है। तत्वज्ञान प्राप्त करने के लिए आप ज्ञान गंगा नामक पुस्तक पढ़ सकते हैं, जिसे हमारे प्रकाशन पृष्ठ से मुफ्त डाउनलोड किया जा सकता है। संत रामपाल जी के आध्यात्मिक प्रवचनों को भी सुना जा सकता है जो इस वेबसाइट पर उपलब्ध हैं और इन्हें  YouTube पर भी देखा जा सकता है।

किताब डाउनलोड करें:

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दीक्षा या नाम कैसे ले सकते हैं?

यदि किसी व्यक्ति ने दीक्षा लेने के लिए अपना मन बना लिया हो, आगे की प्रक्रिया सीधी और आसान है। आपको अपने नज़दीकी "नामदान" केंद्र से संपर्क करने की ज़रूरत है जहाँ आप जा कर दीक्षा (नाम या नामदान) ग्रहण कर सकते हैं। अधिकांश नामदान केंद्रों के संपर्क सूत्र हमारे संपर्क पृष्ठ पर मिल सकते हैं।

विदेशों में रहने वाले लोगों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, इटली, बेल्जियम, नेपाल आदि कुछ अन्य देशों में नामदान केंद्र हैं। अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क पृष्ठ पर जाएँ।

जो लोग विदेश में रह रहे हैं और किसी नामदान केंद्र पर जाने में असमर्थ हैं, उनको वीडियो कॉल / स्काइप कॉल के माध्यम से दीक्षा ऑनलाइन भी दी जा सकती है। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया हमसे संपर्क करें

नामदीक्षा के चरण

नाम मंत्र 3 चरणों में दिए जाते हैं

  • प्रथम मंत्र या प्रथम दीक्षा - यह प्रारंभिक मंत्र है जिससे व्यक्ति दीक्षा आरंभ करता है।
  • दूसरा मंत्र या दूसरी दीक्षा या सतनाम - भक्त के पास पहला मंत्र कम से कम 4 महीने होने के बाद, दूसरा मंत्र यानि सतनाम लेने का पात्र हो जाता है। इस मंत्र को प्राप्त करने के लिए भक्त को व्यक्तिगत रूप से देश या विदेश में किसी नामदान केंद्र पर जाना होगा।
  • तीसरा मंत्र या तीसरी दीक्षा या सारनाम - सारनाम केवल तभी दिया जाता है जब सतगुरु इसका आदेश देते हैं। आमतौर पर यह कुछ सालों की प्रकिया होती है, तभी भक्तआत्मा सारनाम प्राप्ति के योग्य होता है। संत रामपाल जी महाराज खुद ही किसी भी शिष्य को यह नाम दिए जाने का आदेश देते हैं, जब उन्हें ये दिखता है कि वह व्यक्ति सही में पात्र बन गया है। वर्तमान में यह मंत्र केवल भारत में दिया जाता है और इसे प्राप्त करने के लिए भक्तात्मा को भारत आना होगा।

दीक्षा की प्रक्रिया

  • दीक्षा पूर्व-रिकॉर्ड किए गए वीडियो के माध्यम से स्वयं संत रामपाल जी महाराज द्वारा प्रदान की जाती है।
  • सबसे पहले इछुक से दीक्षा लेने की इच्छा के बारे में पूछा जाता है। अगर वह दीक्षा लेने के लिए तैयार हैं, तो उनसे नियमों के बारे में पूछा जाता है, यदि वह नियमों का पालन करने के लिए तैयार हों। यदि वह व्यक्ति नियमों को स्वीकार करता है और उसने तत्वज्ञान को भली भांति समझ लिया है, तो उसे नामदान या नाम दीक्षा प्रदान की जाती है।
  • इस प्रक्रिया मे एक पूर्व-रिकॉर्ड किया गया वीडियो चलाया जाता है, जिसके तहत संत रामपाल जी महाराज सभी मंत्रों की व्याख्या करते हैं, कि उन्हें कैसे जपना है और मंत्रों के बारे में अन्य विवरण भी देते हैं ।
  • संत रामपाल जी महाराज हिंदी भाषा में सब कुछ समझाते हैं। मंत्रों का पाठ गुरूदेव के बताए अनुसार करना है। संत रामपाल जी महाराज वीडियो में इन्हें  दो बार दोहराते हैं। फिर भी अगर कोई इसे पूरी तरह से समझने में असमर्थ है, तो नामदान के लिए उपस्थित भक्तजन समझाने में मदद करते हैं। भाषा के लिए, लोगों को अनुवाद कर्ताओं से मदद मिलेगी जो अंग्रेजी भाषा में बताएंगे कि संत रामपाल जी क्या कह रहे हैं। हालाँकि मंत्रों को मूल भाषा में ही जपना होगा। थोड़े से अभ्यास से भक्तात्माओं द्वारा मंत्रों को आसानी से सीखा और याद किया जा सकता है।
  • एक लिखित कार्ड और एक पुस्तिका साथ में प्रदान की जाती है जिसमें लिखित मंत्र होता है (क्योंकि कोई भी मंत्र जल्दी याद नहीं कर पाता है) जिसमें से आसानी से मंत्र रोज पढ़े  जा सकते हैं। जैसे सदगुरुदेव जी बताते हैं ~ प्रतिदिन न्यूनतम १०८ मंत्र का जाप करना होता है। ये एक बार में किए जा सकते हैं या २-३  बार में परंतु एक दिन में कम से कम १०८ मंत्र किए जाते हैं। इनका रोज जाप करना होता है।

नाम दीक्षा के लिए कोई शुल्क नहीं है।

क्या कुछ और है जो मंत्रों के जप के अलावा करना है ?

जी हाँ। मंत्रों के साथ, एक शिष्य को दिन में 3 बार प्रार्थना भी करनी होती है। इसे रोजाना दोहराना है।

ये प्रार्थनाएँ मूल रूप से कबीर साहिब और गरीब दास जी महाराज की वाणियाँ हैं। ये प्रार्थनाएँ सुबह, दोपहर और शाम की जाती है। इसे और भली भांति  नीचे समझाया गया है।

`सुबह की आरती (जिसे नित नियम भी कहा जाता है) - इसे दोपहर 12 बजे से पहले करना होता है। इस प्रार्थना को पूर्ण होने में लगभग 30-40 मिनट लगते हैं। इसे "भक्तिबोध" नामक पुस्तक से पढ़ सकतें है, mp3 फ़ाइल के माध्यम से सुना जा सकता है या वीडियो भी देखा जा सकता है। इस प्रार्थना द्वारा दिए गए संदेश को सुनने और उस पर अमल करने के मूल विचार से ये वाणियाँ एकत्रित की गई हैं।

`दोपहर की प्रार्थना (जिसे असुर निकंदन रमैणी भी कहा जाता है) - इसे पूर्ण होने में 10-15 मिनट लगते हैं। इसे भी पढ़ा या सुना या देखा जा सकता है। यह दोपहर 12 बजे के बाद में की जाती है, लेकिन रात 12 बजे से पहले।

`शाम की आरती (जिसे संध्या आरती भी कहा जाता है) - इसे पूर्ण होने में लगभग 25-30 मिनट लगते हैं। अन्य दो प्रार्थनाओं की तरह यह भी पढ़ी जा सकती है, या सुनी जा सकती है या वीडियो के माध्यम से देखी जा सकती है। यह दिन और रात के संगम पर या कभी भी रात के 12 बजे तक, मूलतः शाम को की जानी चाहिए।

"भक्तिबोध" पुस्तक दीक्षा प्रक्रिया के दौरान शिष्य को  (नि: शुल्क) दी जाएगी। शिष्य इसे वेबसाइट से मुफ्त में भी डाउनलोड कर सकते हैं। यह प्रकाशन पृष्ठ से डाउनलोड के लिए उपलब्ध है। यह विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध है।

इन प्रार्थनाओं के लिए mp3 फाइलें वेबसाइट पर डाउनलोड पेज पर मुफ्त डाउनलोड के लिए भी उपलब्ध हैं या यहीं से सुनी जा सकती हैं

इन प्रार्थनाओं के वीडियो वेबसाइट या YouTube पर देखने के लिए भी उपलब्ध हैं।

कैसे मिलता है एक सतनाम यानि दूसरा मंत्र ?

पहले मंत्र का पाठ करने का उद्देश्य हमारे शरीर के कमल में निवास करने वाले 5 प्रमुख देवताओं के ऋण का भुगतान करना है। उन देवताओं के लिए मंत्र विशिष्ट हैं। यदि भक्तात्मा ने बिना किसी नियम को तोड़े हुए कम से कम 4 महीने तक नाम जाप किया है, तो वह दूसरा मंत्र या "सतनाम" प्राप्त करने के योग्य हो जाता / जाती है।

"सतनाम" प्राप्त करने की प्रक्रिया पहले मंत्र के समान है। यह संत रामपाल जी महाराज द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो के माध्यम से प्रदान किया जाता है। इसे प्राप्त करने के लिए भक्तआत्मा को स्वयं नामदान केंद्र जाना होगा। एक छोटा सा परीक्षण होता है जिसे दूसरा मंत्र देने से पहले लिया जाता है। (परीक्षण में पहले मंत्र, उसके महत्व और संबंधित देवताओं के बारे में पूछा जाता है)। दूसरे मंत्र / सतनाम दीक्षा के लिए भी कोई शुल्क नहीं है ।

क्या सतनाम / दूसरे मंत्र प्राप्ति के लिए किसी अन्य नियमों का पालन करना पड़ता है?

हाँ जी, कुछ अतिरिक्त नियम हैं जिन्हें किसी को भी सतनाम लेने के बाद करना है। ये नामदान केंद्रों पर उपलब्ध हैं और पहली दीक्षा के दौरान या बाद में शिष्य को दिए जाएंगे। यदि आपको ये नहीं दिए गए हैं, तो कृपया इसके बारे में नामदान केंद्र से पूछें।

क्या कोई भी दीक्षा ले सकता है?

हां जी, जब तक वे नियमों का पालन करने और संत रामपाल जी महाराज के निर्देशानुसार भक्ति करने के इच्छुक हैं, तब तक कोई भी उनके जीवन की पिछली पृष्ठभूमि कैसी भी रहने के बावजूद, दीक्षा ले सकते हैं।

मानव जीवन का उद्देश्य परमेश्वर कबीर द्वारा स्थापित भक्ति करना और हमारे मूल निवास स्थान, सतलोक (सचखंड, अनन्त लोक) में वापस जाना है, जहाँ 84 लाख योनि में जनम-मरण, रोग अथवा बुढापे का कोई भय नहीं है। परमेश्वर कबीर की भक्ति करने की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति संत रामपाल जी महाराज से जाति, पंथ, रंग, आस्था या धर्म से परे, नाम (दीक्षा) ले सकता है क्योंकि परमात्मा ने हर आत्मा को समान बनाया है।

दीक्षा प्राप्ति की सबसे कम उम्र क्या है?

जब भी कोई बच्चा बोलना शुरू कर दे और निर्देशों का पालन करने में सक्षम हो, और मंत्र जाप की क्षमता रखे, तो वह नाम ले सकता है। यह आमतौर पर 3-4 साल की उम्र के बाद होता है।

अगर कोई नियम टूटता है या कोई नियम का पालन ना हो सके तो क्या होता है?

यदि कोई किसी नियम का पालन नहीं करता है तो वह दीक्षा (नाम) से वंचित हो जाता है। नाम खंडित हो जाता है व लाभदायक नहीं रहता। इसी प्रकार भक्ति भी सफल नहीं होगी कभी-कभी एक नियम अनजाने में / गलती से टूट जाता है, जिसे आमतौर पर संत रामपाल जी महाराज द्वारा माफ कर दिया जाता है। परंतु  किसी को जानबूझ कर नियम नहीं तोड़ना चाहिए।

नाम को फिर से जोड़ने / पुनः आरंभ करने के लिए क्या करना होगा ?

संत रामपालजी महाराज जी से क्षमा मांगनी है और पुनः नाम दीक्षा लेने के लिए, किसी भी नियम को नहीं तोड़ने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए। पुनः दीक्षित होने के बाद ही, भक्ति फिर से सफल होने लगेगी। जिसका नाम खंडित है, उसकी भक्ति किसी भी लाभ को प्राप्त नहीं कर पाएगी।

क्या वीडियो के माध्यम से दीक्षित होने का प्रभाव वैसा ही होगा, जैसा कि स्वयं गुरूदेव द्वारा दीक्षा देने का होता है?

जी हां, संत रामपाल जी महाराज का कहना है कि पूर्व-रिकॉर्डेड वीडियो के माध्यम से दी गई दीक्षा का ठीक वैसा ही प्रभाव होगा, जैसा कि उनके द्वारा स्वयं दिया गया हो इसमे तिल बराबर भी संदेह नहीं ।

 विशेष

परम पूज्य गुरुदेव बताते हैं नाम दीक्षा देने के बाद शिष्य गुरु की वचन (शब्द) की संतान बन जाता है। और वचन रूप में जो नाम मंत्र शिष्य को गुरु देता है वह उतने ही प्रभावी और लाभप्रद होते हैं चाहे नाम दीक्षा की प्रक्रिया का माध्यम कुछ भी हो।

संत रामपाल जी महाराज पूर्ण संत है और जिस वक्त वह नाम दीक्षा देते हैं वह शब्द रूप में शिष्य के साथ हो लेते हैं इसलिए यह नाम मंत्र पूर्ण रूप से प्रभावी होते हैं।संत रामपाल जी महाराज के आदेश से ही इस प्रकिया को कार्यान्वित किया गया है। संत रामपाल जी महाराज द्वारा ऐसा करने के आदेश दिए जाने के बाद ही भारत और विदेशों में सभी नामदान केंद्रों की स्थापना की गई है।संत रामपाल जी व्यक्तिगत रूप से व्यक्तियों के एक समूह को दीक्षा देते थे, लेकिन जैसे-जैसे इछुको की संख्या बढ़ती गई, उन्होंने नाम को एक पूर्व-दर्ज वीडियो के माध्यम से दिए जाने के लिए आज्ञा दी। आश्रम में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसलिए लोगों को प्रभाव के रूप में एक वीडियो के माध्यम से नाम लेने की चिंता करने की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं, अंततः परिणाम बिल्कुल समान है।

महत्वपूर्ण सूचना: महिलाओं और पुरुषों दोनों को परमात्मा प्राप्ति का अधिकार है। महिलाओं को अपने मासिक (मासिक धर्म) के दौरान भी अपनी दैनिक पूजा और दीपक जलाने आदि को नहीं रोकना चाहिए, और न ही भक्तात्माओं को किसी की मृत्यु या जन्म के दिन पूजा रोकनी है।

यदि कोई शिष्य संत रामपाल जी द्वारा बताए अनुसार सतभक्ति करता है और मोक्ष प्राप्त करने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ नियमों का पालन करता है,अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि स्वतः प्राप्त होते हैं। यदि कोई व्यक्ति भौतिक सुख प्राप्त करने या किसी दुख या संकट या बीमारी से छुटकारा पाने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ नाम लेता है,तो दुख निवारण परम पूज्य गुरुदेव जी के आशीर्वाद से ही होते है लेकिन भौतिक  लाभों को प्राप्त करने के लिये तत्वज्ञान प्राप्त करना और विश्वास विकसित करनाअतिआवश्यक होता है। ये आवश्यक है कि सभी परिस्थितियों में, नाम लेने का उद्देश्य इस जीवात्मा की मुक्ति या मोक्ष ही होना चाहिए।