मार्कंडेय पुराण और मार्कंडेय ऋषि की कथा का संक्षिप्त विवरण


मार्कंडेय पुराण और मार्कंडेय ऋषि की कथा का संक्षिप्त विवरण

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जिस धरती पर हम चार युगों से रह रहे हैं, वह एक शैतान का लोक है । वह शैतान जिसे ज्योति निरंजन या ब्रह्म-काल भी कहा जाता है। यह शैतान / ज्योति निरंजन / काल इस क्षेत्र का राजा है और इसने हमें अपनी पत्नी दुर्गा/ माया/ अष्टंगी/ प्रकृति देवी सहित सभी निर्दोष आत्माओं को अपने वश में कर सबको धोखा दे रखा है। ब्रह्म-काल ने सभी प्राणियों को कर्म-भ्रम और पाप-पुण्य के जाल में फँसाकर तीनों लोकों के पिंजरे में कैद कर रखा है जिस कारण आत्मा जन्म- मरण और पुनर्जन्म के दुष्चक्र में हमेशा फंसी रहती है।  ब्रह्म-काल के इस शापित संसार में सुख का नामो-निशान भी नहीं है क्योंकि यहां काल ने प्रत्येक व्यक्ति में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, मान-सम्मान, सुख-दुःख, प्रेम-घृणा आदि अनेकों विकार भर दिए हैं।

सतमार्ग से भटके हुए भोले भाले लोग शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए तथा दुखों व दोषों से छुटकारा पाने के लिए विभिन्न धार्मिक क्रियाएं करते हैं लेकिन पूजा करने का सही आध्यात्मिक मार्ग नहीं प्राप्त कर पाते। पहले के समय में ऋषि-मुनि धार्मिक कर्म यानि ध्यान (हठ योग) किया करते थे जिस के माध्यम से वे विभिन्न सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते थे लेकिन शाश्वत स्थान सतलोक यानी मोक्षमय स्थल को प्राप्त नहीं कर पाए क्योंकि वे पूजा के मनमाने तरीकों का अनुसरण कर रहे थे । पुराणों जैसी प्राचीन पुस्तकों में विभिन्न लोककथाओं और दंतकथाओं का उल्लेख किया गया है।

इस लेख का मुख्य उद्वेश्य मार्कंडेय पुराण नामक एक प्रसिद्ध पुराण में से मनमानी और शास्त्र विरुद्ध धार्मिक प्रथाओं के बारे में व्याख्या करना है जो पहले ऋषियों, मुनियों, देवताओं और हमारे पूर्वजों द्वारा किए जा रहे थे, जिससे उन्हें कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं मिल सका; बल्कि वे जन्म और मृत्यु के दुष्चक्र में बने रहे। ना ही उनके विकार भंग हो सके बल्कि वे शैतान / ब्रह्म-काल के जाल में ही फंसे रहे। यहां आपको बताएंगे कि;

  • पुराण क्या हैं?
  • मार्कंडेय पुराण क्या है और इसके लेखक कौन हैं?
  • मार्कंडेय ऋषि कौन हैं?
  • मार्कंडेय पुराण में समझाया गया ब्रह्म-काल का जाल क्या है?

तो आइए सबसे पहले यह जानते हैं कि पुराण क्या हैं?

पुराण क्या हैं?

पुराण दंतकथाओं, मिथकों, पारंपरिक विद्या से संबंधित तथ्यों को दर्शाने वाले हिंदू ग्रंथ हैं। हालांकि पुराण मुख्य रूप से संस्कृत भाषा में लिखे गए थे, लेकिन वर्तमान में पुराण कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध हैं। पुराण मुख्यतः साधु, संतों, ऋषि और मुनियों के व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित सच्ची कहानियों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। 18 पुराणों में मार्कंडेय पुराण हिंदू भक्तों के बीच एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

आइए मार्कंडेय पुराण की सच्ची कहानियों की जांच करें और ब्रह्म-काल के जाल को समझें।  

आरंभ करने से पहले यह समझना अति आवश्यक है की मार्कंडेय पुराण क्या है?

मार्कंडेय पुराण क्या है और इसके लेखक कौन हैं?

मार्कंडेय पुराण हिंदू धर्म का एक संस्कृत ग्रंथ है जिसका नाम मार्कंडेय ऋषि के नाम पर रखा गया है।  यह सबसे पुराने पुराणों में से एक है जिसमें धर्म-कर्म, संसार और श्राद्ध पर 137 अध्याय हैं।  मार्कंडेय पुराण में पौराणिक कथाओं, धर्म, समाज आदि सहित विविध विषयों को प्रस्तुत करने वाले 9000 श्लोक हैं। ऐसा माना जाता है कि मार्कंडेय पुराण का सबसे पहला संस्करण नर्मदा नदी के पास ऋषि मार्कंडेय द्वारा रचा गया था जो विध्यांचल पर्वत शृंखला और पश्चिमी भारत के बारे में बहुत कुछ बताता है। मार्कंडेय पुराण भारत के पूर्वी भाग जैसे उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में विशेष रूप से लोकप्रिय है।

एक पौराणिक मान्यता यह है कि मार्कंडेय पुराण के लेखक स्वयं ब्रह्मा जी हैं क्योंकि यह भगवान ब्रह्मा के मुख से बोला गया है।

मार्कंडेय ऋषि कौन हैं?

भगवान ब्रह्मा के शिष्य, मार्कंडेय ऋषि हिंदू परंपरा से हैं, जो ऋषि भृगु के वंश में पैदा हुए थे।  ऋषि मार्कंडेय ने बलपूर्वक धार्मिक अभ्यास (हठ योग) करके सिद्धियाँ प्राप्त कीं और ब्रह्म-काल तक पूजा की।  ध्यान करते हुए उनकी एकाग्रता ब्रह्मलोक (जिसे महास्वर्ग भी कहा जाता है) तक पहुँच जाती थी।  मार्कंडेय ऋषि अपनी उपासना को श्रेष्ठ मानते थे लेकिन सच तो यह था कि शास्त्र अनुकूल साधना ना होने के कारण उन्हें काल के जाल से मुक्ति नहीं मिल सकी।

आइए आगे बढ़ते हुए सच्ची कहानियों के आधार पर यह समझने की कोशिश करें कि वास्तव में काल का जाल क्या है और किस प्रकार निर्दोष आत्माएँ इस काल के जाल में फंसी रहती हैं।

मार्कंडेय पुराण में समझाया गया ब्रह्म-काल का जाल?

मार्कंडेय पुराण का कुछ अंश

मार्कंडेय पुराण में वर्णित तीन सच्चे अनुभव उन गलत धार्मिक प्रथाओं पर प्रकाश डालेंगे जिनका पालन पहले ऋषियों और हमारे पूर्वजों द्वारा किया जाता था, जिसके कारण जन्म-मृत्यु और पुनर्जन्म की बीमारी समाप्त नहीं हुई और देवता, ऋषि, संत, राजा आदि और इनका अनुसरण करने वाले लोग भी सभी पुनरावृत्ति में रहे।  आइए समीक्षा करते हैंः

  • स्वर्ग के राजा यानी भगवान इंद्र की सच्ची कहानी जो मृत्यु के बाद गधा बनते हैं
  • श्राद्ध करने के संबंध में अपने पुत्र के साथ मंडलसा का संवाद
  • मृत पूर्वजों की पूजा के संबंध में ऋषि रुचि की सच्ची कहानी

स्वर्ग का राजा यानी भगवान इंद्र मृत्यु के बाद गधा बनता है

एक बार की बात है ऋषि मार्कंडेय भगवान को निराकार मानकर बंगाल की खाड़ी में बहुत लंबे समय तक ब्रह्म-काल का तप कर रहे थे।  स्वर्ग में भगवान इंद्र के रूप में विराजमान आत्मा को हमेशा यह डर रहता है कि 72 चतुर्युग के अपने कार्यकाल के दौरान यदि पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य (साधक) तपस्या करता है और अपनी धार्मिक गतिविधियों में कोई गड़बड़ी किए बिना धार्मिक उपलब्धियां हासिल करता है तो वह साधक भगवान इंद्र की पदवी प्राप्त करने के योग्य हो जाता है।  चूँकि स्वर्ग के राजा का पद घोर तपस्या से प्राप्त होता है। वह सफल साधक भगवान इंद्र के रूप में विराजमान हो जाता है और वर्तमान भगवान इंद्र का पद छीन लिया जाता है।  इसलिए, जहां तक ​​संभव हो, भगवान इंद्र अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी साधक के तप या धार्मिक बलिदान को पूर्ण नहीं होने देते हैं और साधक की तपस्या को भंग कर देते हैं, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े।

जब भगवान इंद्र के दूतों ने उन्हें बताया कि ऋषि मार्कंडेय बंगाल की खाड़ी में तप कर रहे हैं, तो उन्होंने ऋषि मार्कंडेय के तप को भंग करने के लिए, अपनी सबसे अधिक खूबसूरत , युवा और अत्यंत आकर्षक पत्नी अप्सरा उर्वशी को पृथ्वी लोक पर भेजा।  उर्वशी को स्वर्ग की सभी अप्सराओं में सबसे सुंदर अप्सरा माना जाता है।

विभिन्न आभूषणों से युक्त और संपूर्ण श्रृंगार किए हुए, अप्सरा उर्वशी ऋषि मार्कंडेय के सामने नृत्य करने लगी।  उसने अपनी सिद्धियों से आसपास के वातावरण को बसंत के मौसम के समान बना दिया।  लेकिन मार्कंडेय ऋषि ने फिर भी उस अप्सरा पर कोई ध्यान नहीं दिया। उर्वशी जब सभी क्रियाएं करके थक गई और उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा तो अंत में उसने अपनी कमर का फीता खोलकर नग्न हो गई।

तब ऋषि मार्कंडेय ने कहा 'हे पुत्री, हे बहन, हे माता!  तुम क्या कर रही हो?  तुम इस घने जंगल में अकेले क्यों आई हो?' यह सुनकर उर्वशी अत्यंत शर्मिंदा हुई और उसने उत्तर दिया हे ऋषि! 'मेरी सुंदरता को देखकर इस घने जंगल में सभी साधकों ने अपना संयम खो दिया है लेकिन आप का ध्यान भंग नहीं हो रहा है।  मुझे नहीं पता आपका ध्यान कहाँ लगा था? कृपया मेरे साथ इन्द्रलोक आएं अन्यथा; सब मेरा मजाक बनाएंगे कि मैं हार कर वापस लौटी हूं।

मार्कंडेय ऋषि ने कहा 'मेरी एकाग्रता ब्रह्मलोक में थी जहाँ मैं उन दिव्य युवतियों का नृत्य देख रहा था जो इतनी सुंदर हैं कि उनके पास आपके जैसी 7-7 नौकरानियां हैं।  फिर, मैं तुम पर कैसे मोहित हो सकता हूँ?  अगर कोई आपसे ज्यादा आकर्षक है, तो कृपया उसे भेजें'। तब देवपरी ने कहा, 'मैं महारानी उर्वशी हूं, इंद्र की पत्नी।  मुझसे ज्यादा खूबसूरत कोई और महिला नहीं है'।

ऋषि मार्कंडेय ने पूछा, 'चूंकि कुछ भी अविनाशी नहीं है जब भगवान इंद्र की मृत्यु हो जाएगी तो आप क्या करोगी?' उर्वशी ने उत्तर दिया 'मैं चौदह इंद्र भोगूंगी।'

नोट: भगवान इंद्र की महारानी की उम्र =72 चतुर्युग *14=1008 चतुर्युग यानी भगवान ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) के बराबर ।

 ब्रह्मा जी का एक दिन 1008 चतुर्युग है

 एक चतुर्युग=सतयुग+त्रेतायुग+द्वापरयुग+कलयुग अर्थात कुल 43.20 लाख वर्ष।

भगवान इंद्र की आयु 72 चतुर्युग है।  इन वर्षों के लिए शासन पूरा करने के बाद इंद्र की मृत्यु हो जाती है और एक अन्य योग्य आत्मा स्वर्ग के राजा का पद पा लेती है।  ऐसे 14 इंद्र एक महारानी उर्वशी के पति बनते हैं।

यह दर्शाता है, भगवान इंद्र की रानी की आत्मा यानी उर्वशी ने किसी मानव जन्म में इतने शुभ कर्म किए होंगे कि वह इतनी लंबी अवधि के लिए स्वर्ग में विलासिता का आनंद लेती है और स्वर्ग के 14 राजाओं के साथ सहवास का आनंद लेती है।

तब ऋषि मार्कंडेय ने कहा 'वे 14 इंद्र भी मरेंगे, तो आप क्या करोगी?' अप्सरा उर्वशी ने उत्तर दिया 'मैं मृत्यु के बाद गधी बनूंगा और पृथ्वी पर जीवन बिताऊंगी, ऐसा ही उन सभी 14 इंद्रों के साथ होगा।  वे पृथ्वी पर गधे का जीवन प्राप्त करेंगे'।

मार्कंडेय ऋषि ने कहा 'तो फिर तुम मुझे ऐसे लोक में क्यों ले जा रही हो, जिसका राजा मृत्यु के बाद गधा बन जाता है और रानी गधी का जीवन प्राप्त करती है?'

उर्वशी ने जवाब दिया अपने सम्मान की रक्षा के लिए, नहीं तो सब लोग मुझे ताने देंगे'।  मार्कण्डेय ऋषि ने कहा कि गधियों की कैसी इज्जत ? तू वर्तमान में भी गधी है क्योंकि तू चौदह खसम (वर) करेगी और मृत्यु उपरांत तू स्वयं स्वीकार रही है कि मैं गधी बनूंगी । उर्वशी परेशान होकर वहां से लौट गई।

विधानानुसार अपना इन्द्र का राज्य, मार्कण्डेय ऋषि को देने के लिए वहीं पर इन्द्र आ गया और कहा कि ऋषि जी हम हारे और आप जीते । कृपया इंद्र की पदवी स्वीकार करें।  मार्कंडेय ऋषि ने कहा इंद्र!  मेरे लिए इंद्र की उपाधि किसी काम की नहीं है।  मेरे लिए, यह एक कौवे की बीट के समान है'।

ऋषि मार्कंडेय ने भगवान इंद्र से कहा कि 'जैसा  मैं तुमसे कहता हूं, तुम पूजा करो, मैं तुम्हें 'ब्रह्मलोक' (जिसे महास्वर्ग भी कहा जाता है) ले जाऊंगा।  वहाँ तुम्हारे जैसे करोड़ों इन्द्र हैं;  जिन्होंने मेरे पैर छुए हैं।  तुम ब्रह्मा, विष्णु और शिव की पूजा छोड़कर ब्रह्म-काल की पूजा करो।  ब्रह्मलोक में साधक को युगों (कल्प) से मुक्ति मिलती है।  स्वर्ग के राजा के इस सिंहासन को छोड़ दो'।

परंतु भगवान इंद्र ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि 'ऋषि जी मुझे अभी सुखों का आनंद लेने दो, मैं बाद में देखूंगा'।

ऋषि मार्कंडेय ब्रह्म की तपस्या में थे और उसे श्रेष्ठ मान रहे थे।  इसलिए उन्होंने इंद्र से कहा कि 'मैं तुम्हें ब्रह्म की पूजा बताऊंगा'।  ब्रह्मलोक की तुलना में स्वर्ग के सुख बहुत कम हैं, एक कौवे की बीट के समान।

नोट: गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में पवित्र गीता का ज्ञान दाता ब्रह्म-काल कहता है कि उसकी उपासना भी  अनुत्तम  है।  महर्षि मार्कंडेय जी उस स्तर की भक्ति को ही श्रेष्ठ समझकर कर रहे थे और इन्द्र को भी वह पूजा करने की सलाह दे रहे थे।

विचार करने योग्य 

  1. इन्द्र को पता है कि मत्यु के उपरांत उसे गधे का जीवन मिलेगा , फिर भी वह उस क्षणिक सुख को त्यागना नहीं चाहता । उसने कहा कि फिर कभी देखूंगा । फिर कब देखेगा ? गधा बनने के पश्चात तो कुम्हार देखेगा । कितना वज़न गधे की कमर पर रखना है ? कहाँ डण्डा मारना है ? 
  2. ठीक इसी प्रकार इस पृथ्वी पर कोई छोटे से टुकड़े का प्रधानमंत्री , मंत्री, मुख्यमंत्री या राज्य में मंत्री बना है या किसी पद पर सरकारी अधिकारी या कर्मचारी बना है या धनी है। उसको कहा जाता है कि आप भक्ति करो नहीं तो गधे बनोगे । वे या तो नाराज़ हो जाते हैं कि क्यों बनेंगे गधे ? फिर से मत कहना । कुछ सभ्य होते हैं , वे कहते हैं कि किसने देखा है , गधे बनते हैं ? फिर उनको बताया जाता है कि सब संत तथा ग्रन्थ बताते हैं कि भक्ति नहीं करोगे तो गधे बनागे। तो अधिकतर कहते हैं कि देखा जाएगा । उनसे निवेदन है कि मृत्यु के पश्चात् गधा बनने के बाद आप क्या देखोगे , फिर तो कुम्हार देखेगा कि आप जी के साथ कैसा बर्ताव करना है ? देखना है तो वर्तमान में देखो ।
  3. इसी तरह, जो शराब पीते हैं, वे छोड़ना नहीं चाहते क्योंकि वे उस गतिविधि में आनंद लेते हैं।

वास्तविकता यह है कि इसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद मरेंगे और 84 लाख योनियों में जाएंगे।  ब्रह्म-काल तथा प्रकृति देवी के संयोग से (अष्टंगी) नई योग्य महान आत्माओं का जन्म होगा।  तब उन्हें तीन लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल लोक) का दायित्व प्रदान किया जाएगा। रजगुण-ब्रह्मा सृष्टि रचना करते हैं, सतगुण-विष्णु पालत करते हैं और तमगुण-शिव संहार करते हैं

इसका प्रमाण गीता प्रेस गोरखपुर, गोविंद भवन कार्यालय, कोलकाता का संस्थान, द्वारा प्रकाशित और प्रिंटर संचित मार्कंडेय पुराण में पृष्ठ 123 प्रदान किया गया है।

 मार्कंडे जी ने कहा "रजोगुण प्रधान ब्रह्मा,  तमोगुण प्रधान रुद्र (शिव) और सतोगुण प्रधान विष्णु इस दुनिया के पालनकर्ता हैं।  ये तीन देवता और तीन गुण (गुण) हैं"।

चूँकि ब्रह्म-काल को प्रतिदिन एक लाख मानवधारी सूक्ष्म शरीरों का मैल खाने का श्राप लगा हुआ है; इसीलिए उसके तीन पुत्रों को उसके लिए भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती है और जन्म और पुनर्जन्म की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।

महान संत गरीबदास जी कहते हैं: 

गरीब, एति उमर बुलंद मरेगा अंत रे |सतगुरु लगे ना कान ना भेंटे संत रे ||

उपरोक्त वाणी सिद्ध करती है कि क्षर पुरुष और अक्षर पुरुष के क्षेत्र में सभी प्राणियों की आयु कितनी ही लंबी क्यों न हो लेकिन एक दिन अंत अवश्य होता है। उस लोक के भगवान सहित प्रत्येक प्राणी की मृत्यु निश्चित रूप से होगी।

आदरणीय संत गरीबदास जी कहते हैं: 

असंख जन्म तोहे मरतां होगे, जीवित क्यों न मरे रे। 
द्वादश मध्य महल मठ बोरे, बहुर न देह धरै रे।।

संत गरीबदास जी समझाते हैं कि आत्माओं, तुम सब काल के लोक में लाखों युगों से अत्याचार सह रहे हो। तुम जीवित क्यों नहीं मर  जाते। समस्त बुराइयों का परित्याग कर उस पूर्ण परमात्मा-सतपुरुष की शास्त्र आधारित पूजा करो, सतलोक (सचखंड) को प्राप्त करो और शाश्वत शांति का आनंद लो। 

सतलोक वह अमर धाम है जहां न तो मृत्यु है और ना ही बुढ़ापा। युगों से आत्माओं को ज्ञान नही था क्योंकि उन्हें एक तत्वदर्शी संत नहीं मिला था जो उन्हें सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते और सच्ची पूजा की विधि बताता जिससे जन्म और पुनर्जन्म की बीमारी हमेशा के लिए खत्म हो जाती है। 

तत्वदर्शी संत सतनाम और सारनाम दीक्षा में देते हैं जिससे आत्माएं अमर परमात्मा अर्थात परम अक्षर ब्रह्म को प्राप्त करती हैं जिसका अर्थ है उनका मोक्ष प्राप्त हो जाता है। सतलोक के सुखों की तुलना में स्वर्ग का सिंहासन कौवे की बीट की तरह बेकार है। 

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 25-29 में कहा गया है कि साधक जो भी पूजा करते हैं, उसे श्रेष्ठ और बुराइयों का नाश करने वाला मानकर करते हैं। 

गीता अध्याय 4 श्लोक 32 में कहा गया है की सच्चिदानंदघन ब्रह्म ने अपने अमृत भाषण (वाणी) में  'यज्ञों का ज्ञान अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तार से वर्णन किया है। वही सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान है। जिसे जानकर साधक को समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है।

सच्चिदानंदघन ब्रह्म वाणी अर्थात सूक्ष्म वेद (पांचवा वेद) में कहा गया है किः

औरों पंथ बतावहीं, आप न जाने राह

मोती मुक्ता दर्शत नाहीं, यह जग है सब अन्ध रे
दिखत के तो नैन चिसम हैं, फिरा मोतिया बिंद रे

वेद पढ़ें पर भेद ना जानें, बांचे पुराण अठारा
पत्थर की पूजा करें, भूले सिरजनहारा।

पहले समय में साधु, ऋषि, महर्षि, संत, आचार्य, शंकराचार्य पूजा की विधि बताते थे लेकिन वे स्वयं सतभक्ति मार्ग से अनभिज्ञ थे। वे बुद्धिमान प्रतीत होते थे क्योंकि वे संस्कृत भाषा के अच्छे जानकार थे लेकिन उनका आध्यात्मिक ज्ञान शून्य था। सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान (तत्वज्ञान) की कमी के कारण पूरी दुनिया पूजा के सतमार्ग से अनजान है। वे पवित्र ग्रंथ पढ़ते ज़रूर हैं, वेदों को कंठस्थ भी कर लेते हैं लेकिन उनमें छिपे हुए आध्यात्मिक तथ्यों से अनभिज्ञ रहते हैं। सभी शास्त्रों के विरुद्ध पूजा करते हैं। वेद में मूर्ति पूजा का कहीं उल्लेख नहीं है। सृष्टि के पालन-पोषण करने वाले असली परमपिता सृष्टि के रचयिता की उपासना को सब भूल गए हैं, जिसकी उपासना का प्रमाण वेद तथा सभी ग्रंथ देते हैं।   

गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में कहा गया है कि, 'उस तत्वदर्शी संत से उस सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान को समझ, उन्हें प्रणाम करने और विनम्रतापूर्वक प्रश्न करने से वह तत्वदर्शी संत तुम्हें संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करेंगे। उस आध्यात्मिक ज्ञान से वंचित सभी साधक जन्म और पुनर्जन्म के चक्र में फंसे रहते हैं।

यहां यह बताना अति महत्वपूर्ण है कि ऋषि मार्कंडेय ब्रह्म-काल के ध्यान में रहते थे। 

श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में कहा गया है कि 'ब्रह्मलोक को प्राप्त करने वाले साधकों की पुनरावृत्ति होती है'। भगवान इंद्र (स्वर्ग के राजा) या भगवान कुबेर (धन के देवता) की स्थिति प्राप्त करने के बाद या ब्रह्मा, विष्णु और शिव या भगवान वरुण (जल के देवता), धर्मराय, आदि का पद प्राप्त करने के बाद भी और यहां तक ​​​​कि स्वर्ग या ब्रह्मलोक में कोई देवता बनने के बाद भी सभी प्राणियों की पुनरावृत्ति होती है।

नोट: स्वर्ग लोक में 33 करोड़ देव पद हैं । जैसे भारत वर्ष की संसद में 540 सांसदों के पद हैं । व्यक्ति बदलते रहते हैं । उन्हीं सांसदों में से प्रधानमंत्री तथा अन्य केंद्रीय मंत्री आदि बनते हैं । इसी प्रकार उन 33 करोड़ देवताओं में से ही कुबेर का पद अर्थात् धन के देवता का पद प्राप्त होता है जैसे वित्त मंत्री होता है । ईश की पदवी का अर्थ है प्रभु पद जो कुल तीन माने गए हैं : - 1. श्री ब्रह्मा जी 2. श्री विष्णु जी तथा 3. श्री शिव जी । वरूणदेव जल का देवता है । धर्मराय मुख्य न्यायधीश है जो सब जीवों को कर्मों का फल देता है , उसे धर्मराज भी कहते हैं । ये सर्व काल ब्रह्म की साधना करके पद प्राप्त करते हैं । पुण्य क्षीण होने के पश्चात् पद से मुक्त होकर पशु - पक्षियों आदि की 84 लाख प्रकार की योनियों में चले जाते हैं । फिर नए ब्रह्मा जी , नए विष्णु जी तथा नए शिव जी इन पदों पर विराजमान होते हैं । उपरोक्त सर्व देवता जन्मते - मरते रहते हैं । ये अविनाशी नहीं हैं सतपुरुष की सच्ची उपासना से ही जन्म और पुनर्जन्म का रोग समाप्त होता है।

इसका प्रमाण पवित्र कबीर सागर- का सरलार्थ में कथा- मार्कंडेय ऋषि तथा अप्सरा संवाद पृष्ठ नं. 379-386 में वर्णित है और 

 श्री मद पुराण के सचित्र मोटा टाइप के हिन्दी ,गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित के तीसरे स्कंद के पृष्ठ 123 में भी बताया गया है तथा श्री मद् भगवत गीता अध्याय 10 श्लोक 2, अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 14 श्लोक 3, 4 और 5 में भी दिए  गए हैं।

आइए जानें श्राद्ध की अवधारणा कहाँ से ली गई है। संक्षिप्त मार्कंडेय पुराण पेज नं 81 से कुछ झलक देखेंः

श्राद्ध करने के लिए अपने पुत्र के साथ मंडलसा का संवाद

मंडलसा नाम की एक महिला थी और उसने अपने बेटे को श्राद्ध करने की शिक्षा दी। आइए पढ़ते हैं मां और बेटे के बीच हुई चर्चा। मंडलसा ने कहा महाराज! जो पितर देवलोक में हैं, जो तिर्यग्योनि में पड़े हैं, जो मनुष्य योनि में एवं भूतवर्ग में अर्थात् प्रेत बने हैं, वे पुण्यात्मा हों या पापात्मा जब भूख-प्यास विकल (तड़फते) होते हैं तो उन्हें पिण्डदान तथा जलदान द्वारा तृप्त किया जाता है। मनुष्य अपने कर्मों से उन्हें पिंड और जल चढ़ाकर तृप्त करता है।  इस प्रकार वह देवताओं और अतिथियों को तृप्त रखता है।  देवता, मनुष्य, पितृ, भूत, प्रेत, गुहाक, पक्षी, कीड़े-मकोड़े आदि भी मनुष्य से अपना भरण-पोषण करते हैं।

विचार करने योग्य: क्या वे देवलोक में होकर भूख या प्यास से मर सकते हैं?

इसके अतिरिक्त  मार्कंडेय पुराण के पृष्ठ नं. 92 पर उल्लेख किया गया है कि नरक में रहने वाले, पशु-पक्षियों के योनि में रहने वाले , भूत-प्रेत आदि जीवों में रहने वाले, उन सभी का विधिपूर्वक श्राद्ध करने से उनकी तृप्ति होती है। मनुष्य पृथ्वी पर जो अन्न बिखेरते हैं (श्राद्ध कर्म करते समय) उससे पिशाच योनि में पड़े पितरों की तृप्ति होती है। स्नान के वस्त्र से जो जल पृथ्वी पर टपकता है, उससे वृक्ष योनि में पड़े हुए पितर तृप्त होते हैं। नहाने पर अपने शरीर से जो जल के कण पृथ्वी पर गिरते हैं उनसे उन पितरों की तृप्ति होती है जो देव भाव को प्राप्त हुए हैं। पिण्डों के उठाने पर जो अन्न के कण पृथ्वी पर गिरते हैं, उनसे पशु-पक्षी की योनि में पड़े हुए पितरों की तृप्ति होती है। 

विचार करने योग्य : क्या वे सच में वहां देवता बने थे जिनकी तृप्ति इस जल से होगी?

आगे मंडलसा कहती हैं, 'एक परिवार में, जो बच्चा श्राद्ध के लिए योग्य होने के बाद भी रहित रह जाता है, अर्थात बचपन में मर जाता है और श्राद्ध नहीं कर पाता, तो उसे बिखरे हुए अनाज और बचा हुआ पानी मिलता है।  भोजन के बाद ब्राह्मण हाथ-मुंह धोते हैं और पैर धोते हैं, जिससे उस जल से भी कई पूर्वजों को सिद्धि मिलती है।  बेटा!  श्रेष्ठ विधि से श्राद्ध करने से उन पुरुषों और अन्य पूर्वजों, जिन्होंने अन्य योनियों को प्राप्त किया है, उन्हें भी श्राद्ध से बहुत संतुष्टि मिलती है।  अधर्म की कमाई से जो श्राद्ध किए जाते हैं;  इससे चांडाल के जीवन रूपों में पितरों की पूर्ति होती है।

महत्वपूर्ण- उपरोक्त तथ्य सिद्ध करता है कि ये लोककथाएँ हैं और किसी भी पवित्र शास्त्र में इसका कोई प्रमाण नहीं है।  श्राद्ध करना पूजा का एक मनमाना तरीका है, इसलिए यह क्रिया करना व्यर्थ है और इसे तुरंत छोड़ देना चाहिए।

आइए आगे बढ़ते हुए, श्राद्ध यानी मृत पूर्वजों की पूजा के संबंध में ऋषि रुचि की सच्ची कहानी का अध्य्यन करें जो हमारे विश्वास को और अधिक मज़बूत करेगी कि हमारे पूर्वज मनमाने ढंग से पूजा करने के कारण भूत और पितृ योनि में कष्ट उठा रहे हैं और जन्म मरण के चक्र में बने हुए हैं तथा ब्रह्म-काल के जाल में फंसे रहते हैं।

मृत पूर्वजों की पूजा के संबंध में ऋषि रुचि की सच्ची कहानी

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित मार्कंडेय पुराण के पृष्ठ नं. 242, जिसमें मार्कण्डेय पुराण और ब्रह्म पुराण को एक साथ बांधा गया है, रुचि ऋषि की अपने मृत पूर्वजों के साथ संस्कारों की चर्चा।

एक रूची नाम का साधक ब्रह्मचारी रह कर वेदों अनुसार साधना कर रहा था। जब वह 40 (चालीस) वर्ष का हुआ तब उस को अपने चार पूर्वज जो शास्त्रविरुद्ध साधना करके पितर बने हुए थे तथा कष्ट भोग रहे थे, दिखाई दिए। “पितरों ने कहा कि बेटा रूची शादी करवा कर हमारे श्राद्ध निकाल, हम तो दुःखी हो रहे हैं। रूची ऋषि ने कहा पित्रामहो वेद में कर्म काण्ड मार्ग (श्राद्ध, पिण्ड भरवाना आदि) को मूर्खों की साधना कहा है। फिर आप मुझे क्यों उस गलत (शास्त्र विधि रहित) साधना पर लगा रहे हो। पितर बोले बेटा यह बात तो तेरी सत्य है कि वेद में पितर पूजा, भूत पूजा, देवी-देवताओं की पूजा (कर्म काण्ड) को अविद्या ही कहा है इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है।” इसी उपरोक्त मार्कण्डेय पुराण में इसी लेख में पितरों ने कहा कि फिर पितर कुछ तो लाभ देते हैं।

विशेष:- यह अपनी अटकलें पितरों ने लगाई है, वह हमने नहीं पालन करना, क्योंकि पुराणों में आदेश किसी ऋषि विशेष का है जो पितर पूजने, भूत या अन्य देव पूजने को कहा है। परन्तु वेदों में प्रमाण न होने के कारण प्रभु का आदेश नहीं है। इसलिए किसी संत या ऋषि के कहने से प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन करने से सजा के भागी होंगे।

एक समय एक व्यक्ति की दोस्ती एक पुलिस थानेदार से हो गई। उस व्यक्ति ने अपने दोस्त थानेदार से कहा कि मेरा पड़ोसी मुझे बहुत परेशान करता है। थानेदार (S.H.O.) ने कहा कि मार लट्ठ, मैं आप निपट लूंगा। थानेदार दोस्त की आज्ञा का पालन करके उस व्यक्ति ने अपने पड़ोसी को लट्ठ मारा, सिर में चोट लगने के कारण पड़ोसी की मृत्यु हो गई। उसी क्षेत्र का अधिकारी होने के कारण वह थाना प्रभारी अपने दोस्त को पकड़ कर लाया, कैद में डाल दिया तथा उस व्यक्ति को मृत्यु दण्ड मिला। 

उसका दोस्त थानेदार कुछ मदद नहीं कर सका। क्योंकि राजा का संविधान है कि यदि कोई किसी की हत्या करेगा तो उसे मृत्यु दण्ड प्राप्त होगा। उस नादान व्यक्ति ने अपने दोस्त दरोगा की आज्ञा मान कर राजा का संविधान भंग कर दिया। जिससे जीवन से हाथ धो बैठा। ठीक इसी प्रकार पवित्र गीता जी व पवित्र वेद यह प्रभु का संविधान हैं। जिसमें केवल एक पूर्ण परमात्मा की पूजा का ही विधान है, अन्य देवताओं - पितरों - भूतों की पूजा करना मना है। पुराणों में ऋषियों (थानेदारों) का आदेश है। जिनकी आज्ञा पालन करने से प्रभु का संविधान भंग होने के कारण कष्ट पर कष्ट उठाना पड़ेगा। इसलिए आन उपासना पूर्ण मोक्ष में बाधक है।

संत गरीबदास जी कहते हैं की:

गरीब, भूत रमै सो भूत हैं , देव रमै सो देव ||
राम रमै सो राम है , सुनो सकल सुर भेव ||

श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 9 श्लोक 25, अध्याय 7 श्लोक 12-15 और 20-23, अध्याय 16 श्लोक 23-24 में भी इस बात का प्रमाण है कि जो लोग श्राद्ध (पित्रों/मृतक पूर्वजों की पूजा) करते हैं वे पितृ और भूत बन जाते हैं।  उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है।

भगवान कबीर जी निम्नलिखित भजन में ऋषि मार्कंडेय के बारे में बात करते हैं जो सच्ची भक्ति और सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान के महत्व की ओर इशारा करते हैं जो ध्यान करने से सिद्धियाँ प्राप्त करने के बजाय मुक्ति की प्राप्ति की ओर ले जाता है।

सत कबीर द्वारे तेरे पर एक दास भिखारी आया है, भक्ति की भिक्षा दे दीजो उम्मीद कटोरा लाया है||
मार्कण्डेय जैसा ऋषि नहीं, सुखदेव में जो इन्द्री कसी नहीं|
ये माया भी मन में बसी नहीं, जबसे ज्ञान तेरा समाया है||
भक्ति की भिक्षा दे दीजो उम्मीद कटोरा लाया है||

निष्कर्ष

ऋषि-महर्षियों (ऋषि-महान ऋषियों) ने वेदों में 'ओम' नाम को ईश्वर प्राप्त करने का मोक्षदायक मंत्र जान कर भगवान को प्राप्त करने के लिए 'ओम' नाम का जाप व तप जैसी धार्मिक साधना की, लेकिन 'ब्रह्म' को नहीं देख सके।  

इसी प्रकार, कुछ उपासक बलपूर्वक ध्यान (हठ योग) द्वारा शरीर के भीतर एकाग्र होकर, कुछ आतिशबाजी देखकर या कुछ धुनों को सुनकर इसे ईश्वर की प्राप्ति मानने लगे।  दरअसल, वह सब ब्रह्म-काल की चाल थी।  काल के जाल को आनंद मानकर वे अपने अनमोल जीवन को बर्बाद करते रहे।

विभिन्न प्रकार की भक्ति और सतभक्ति में बहुत अंतर है।  किसी भी देवी-देवता की उपासना से उसका फल अवश्य मिलता है, जो नाशवान होता है, लेकिन आत्मा को मुक्ति नहीं मिल सकती और पाप कर्मों का भी अंत नहीं होता, उसे भोगने  के लिए बार-बार जन्म लेना पड़ता है । जबकि सतभक्ति करने से पापों का नाश, जन्म मरण से सदा के लिए मुक्ति और अमरलोक की प्राप्ति होती है।

उपरोक्त तथ्य सिद्ध करते हैंः 

  • सभी देवता, भगवान इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, आदि जन्म लेते हैं और मर जाते हैं।  वे शाश्वत नहीं हैं।  अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद प्रत्येक जीवात्मा 84 लाख योनियों  में कष्ट उठाते हैं।
  • पहले के ऋषि और हमारे पूर्वज पूजा के सच्चे तरीके यानी सत भक्ति से अनभिज्ञ थे, इसलिए हठयोग किया और ब्रह्म-काल के जाल में फंसे रहे।
  • शास्त्र विरुद्ध पूजा करने के कारण हमारे पूर्वज भूत और प्रेत बने।
  • एक तत्वदर्शी संत द्वारा प्रदान की गई सच्ची पूजा से ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी ने सभी पवित्र शास्त्रों मे छिपे हुए जटिल आध्यात्मिक ज्ञान को सुलझाया है।  पूर्ण संत की शरण में जाने से ही आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होगी अर्थात उनसे नाम-उपदेश (नाम दीक्षा सतनाम और सारनाम) प्राप्त करके और सर्वोच्च भगवान की भक्ति करने से ही मोक्ष संभव है अन्यथा नहीं।

महान संत गरीबदास जी कहते हैं

यह संसार समझता नाहीं । कहंदा शाम दोपहरे नूं || गरीबदास , यह वक्त जात है । रोवोगे इस पहरे नूं ।|

इसलिए पाठकों से यही प्रार्थना है   कि अब और देर न करें और जल्द से जल्द जगतगुरू तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी की शरण में जाकर नामदीक्षा लें और अपने मानव जन्म का कल्याण कराएं।