श्रीमद्देवी भागवत (दुर्गा) पुराण के बारे में पूरी जानकारी

दुर्गा पुराण में दिव्य स्त्री देवी दुर्गा को सर्वोच्च शक्ति माना गया है। वह हिंदुओं में धार्मिक आराधना की एक आकृति है और इन्हें ब्रह्मांड का मूल निर्माता माना जाता है। देवी भागवत पुराण में 12 स्कंध (खंड) शामिल हैं और इसमें 318 अध्याय हैं, प्रत्येक अध्याय देवी दुर्गा को शक्ति (नारी शक्ति) के प्रतीक के रूप में स्तुति करते हैं। हिंदु देवी दुर्गा की पूजा देवी के रूप में करते हैं, जो सभी की उत्पत्तिकर्ता मानी जाती है क्योंकि आरम्भ में, परम शक्ति 'निर्गुण' (बिना आकार के) थी, जिसने बाद में स्वयं को तीन शक्तियों (सत्त्विक, राजसी और तामसी) के रूप में प्रकट किया। 

  • सत्त्विक शक्ति- रचनात्मक क्रिया और सत्य का प्रतीक है। 
  • राजसी शक्ति- लक्ष्यहीन कर्म और जुनून पर केंद्रित है। 
  • तामासी शक्ति- विनाशकारी क्रिया और भ्रम का प्रतिनिधित्व करता है। 

दुर्गा पुराण ने देवी दुर्गा को परम सत्य के रूप में वर्णित किया है और वह 'निर्गुण' (बिना आकार के) के रूप में ब्रह्मांड का परम स्रोत है और साथ ही सभी का शाश्वत अंत है। उन्हें शक्तिशाली रचियता और दयालु सर्वव्यापी के रूप में पूजा जाता है। इस दिव्य देवी को प्रबुद्ध ज्ञान है जिसके पास समस्याओं से परेशान सभी साहसी देवता मदद के लिए आते हैं और उनकी कृपा पर निर्भर होते हैं क्योंकि उन्हें ब्रह्मांड का संरक्षक माना जाता है। वह अष्टंगी हैं (आठ भुजाएं हैं, प्रत्येक में विभिन्न हथियार पकड़े रखती हैं)।

विद्वानों ने हिंदू पुराण, शिव महापुराण, विष्णु पुराण, मार्कंडेय पुराण आदि जैसे विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करके देवी भागवत महापुराण की संरचना के संबंध में विभिन्न समय अवधि का उल्लेख किया है। आइए हम उन्हें विस्तार से विश्लेषण करें। 

  • हिंदुओं का मानना है कि देवी दुर्गा इस ब्रह्मांड की निर्माता है और उन्हें 'जगतजन-नी' कहते हैं। 
  • देवी दुर्गा को शक्ति/प्रकृति देवी/ अष्टंगी/भवानी/भगवती/ माया भी कहा जाता है। 
  • देवी दुर्गा परम शक्ति होने के नाते बुराई/राक्षसों का नाश करती है, मानव जाति की रक्षा करती है और अच्छाई को विकसित करती है। 
  • दुर्गा पुरान दिव्य देवी को 'ब्रह्मांड के गर्भ' के रूप में प्रस्तुत करती है क्योंकि वह अपने बच्चों का पोषण करती है, उन्हें धमकाती है, उनकी गलतियों को भी क्षमा करती है। वह रक्षात्मक देवी मां है। 

इसके साथ ही, दुर्गा पुराण में देवी दुर्गा के बारे में कुछ तथ्य उल्लिखित हैं जो विद्वानों/नकली गुरुओं/ पंडितों द्वारा कभी नहीं बताये गए और भक्त समाज पूरी तरह से अज्ञान में रहा।

निम्नलिखित प्रश्नों को हल करने की आवश्यकता है: - 

  • क्या देवी दुर्गा ब्रह्मांड की निर्माता है?
  • मां दुर्गा की रचना किसने की?
  • दुर्गा जी ने सिंदूर लगाती हैं, उनके पति कौन हैं? 
  • मा दुर्गा के पिता कौन है?
  • दुर्गा को 'मा' के रूप में संबोधित किया जाता है, क्या उनके बच्चे हैं? यदि हाँ, तो उनके नाम क्या हैं?
  • दुर्गा को त्रिदेवजन-नी के रूप में क्यों संबोधित किया जाता है? दुर्गा पुराण में देवी दुर्गा ने अपनी पूजा के लिए मना क्यों किया? 
  • क्या वेदों में कहीं भी दुर्गा की पूजा करने के बारे में उल्लिखित है? 
  • क्या देवी दुर्गा अमर है? 
  • क्या दुर्गा जी पापों को क्षमा कर सकती हैं?
  • क्या देवी दुर्गा आध्यात्मिक मुक्ति/मोक्ष प्रदान करती है? 
  • दुर्गा का असली मंत्र क्या है?

आइए हम श्रीमद देवी भागवत पुराण, गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित, श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार और चिमन लाल गोस्वामी द्वारा संपादित से तथ्यों का पता लगाएं।

देवी दुर्गा का पति कौन है

दुर्गा जी सिंदूर लगाती हैं; हिंदू परंपरा के अनुसार सिंदूर एक विवाहित महिला द्वारा लगाया जाता है; यह 'सुहागन' महिला की निशानी है। हिंदू भक्तों में पूजा के दौरान देवी दुर्गा को 'सुहाग' की पेशकश करने की यह धार्मिक क्रिया है लेकिन वास्तविकता यह है कि बहु संख्या में भक्तों को नहीं पता कि दुर्गा का पति कौन है? 

श्रीमद देवी भागवत पुराण, तीसरा स्कंध, पृष्ठ 114-118 

यह उल्लेख किया गया है 'बहुत से लोग आचार्य भवानी को सर्व मनोरथ पूर्ण करने वाली मानते हैं। वह प्रकृति रूप में जानी जाती हैं और ब्रह्म के साथ उनका अभेद संबंध है। 

दुर्गा को भवानी संबोधित करते हुए उपरोक्त श्लोक उल्लेख करता है कि काल उसका (दुर्गा का) पति है जिसे परम पुरुष के रूप में संबोधित किया गया है। वे दोनों एक साथ रहते हैं और अभेद संबंध रखते हैं। 

श्रीमद देवी भागवत पुराण, तीसरा स्कंध, पृष्ठ 11-12, अध्याय 5, श्लोक 12 

रमयसे स्वपतिं पुरुषं सदा तव गतिं न हि विह विदम् शिवे (12) 

'आप (दुर्गा) अपने पति पुरुष अर्थात काल भगवान के साथ सदा भोग-विलास (संभोग से उतपत्ति) करती रहती हो। आपकी गति कोई नहीं जानता। 

श्रीमद देवी भागवत पुराण, तीसरा स्कंध, पृष्ठ संख्या 14, अध्याय 5 श्लोक 43 

भगवान ब्रह्मा मां दुर्गा से पूछते हैं-

एकमेव द्वितीयम् यत् ब्रह्म वेद वदंती वैए सा किम् त्वम्  वाप्यसाउ वा किम् संदेहम विनिवर्तेय 

'वह जिसे वेदों में 'एकमेवाद्वितीयं ब्रम्ह' केवल एक पूर्ण ब्रम्ह कहा गया है, क्या वह तुम्हीं ही हो अथवा वह कोई और ही है? मेरे इस सन्देह का समाधान करें।

इस पर दुर्गा जी भगवान ब्रह्मा जी को उत्तर देती हैं- 

देवयूवाच सदाएकत्वम ना भेदोसती सर्वदेव ममस्या च || योसाऊ साहमहम् योसाउ भेदोस्ती मतिविभ्रमात् || 2 ||

'वह जो है, वो मैं हूँ; जो मैं हूं, वह वो है। मानसिक भ्रम के कारण, अंतर कथित है'

आगे, दुर्गा पुराण में देवी दुर्गा इस ब्रह्म-काल की भक्ति करने के लिए स्वयं कहती है क्योंकि वह ब्रह्मा, विष्णु और शिव से ऊपर हैं और जो इन वेदों और पुराणों को समझ नहीं पाए हैं वे भगवान ब्रम्हा, भगवान विष्णु, भगवान शिव और दुर्गा की भक्ति करना जारी रखते हैं जबकि परम ईश्वर कोई अन्य ही है।

मम् चैव शरीरम् वै सूत्रअमित्यभीधीयते स्थूलम् शरीरम् वक्ष्यामि ब्राह्मणः परमात्मनः || 83 || 

दुर्गा कहती है - मेरे शरीर को सुंदर वस्त्र की तरह माना जाता है; भगवान ब्रह्म का भौतिक शरीर माना जाता है।

कबीर सागर में सृष्टि रचना में भी संदर्भ है जो स्पष्ट करता है कि काल/ब्रह्म दुर्गा से विवाहित है, वे पति-पत्नी की तरह रहते हैं और इस क्षर पुरुष/ब्रह्म के इक्कीस ब्रम्हांडो में सभी रचनाएं करते हैं।

सभी प्रमाण सिद्ध करते हैं कि काल (ब्रह्म/क्षर पुरुष) दुर्गा का पति है। दोनों भौतिक शरीरों में साकार हैं। 

देवी दुर्गा के पिता कौन हैं?

अब प्रश्न उठता है जब क्षर पुरुष/काल और दुर्गा दोनों साकार हैं और भौतिक शरीर होते हुए पति-पत्नी रूप में एक साथ रहते हैं तो: - 

  • दोनों की उतपत्ति कैसे हुई? 
  • उनके पिता कौन हैं?
  • क्या उनके बच्चे हैं?

कबीर सागर में, सृष्टि रचना, क्षर पुरुष/काल और दुर्गा की उत्पत्ति बताई गई है। सर्वशक्तिमान परमात्मा कविर्देव/कबीर (जो पूरी सृष्टि का रचनहार है) अपनी वचन शक्ति से एक अंडे से इस क्षर पुरुष की उतपत्ति की और बाद में दुर्गा का जन्म परमेश्वर कबीर/कविर्देव की वचन शक्ति से हुआ। तो दुर्गा के पिता सर्वशक्तिमान कविर्देव के अतिरिक्त कोई नहीं है। 

दुर्गा माँ की सन्तान कौन हैं?

देवी दुर्गा को 'मा' के रूप में संबोधित किया जाता है। उन्हें 'जगतजन-नी/त्रिदेवजन-नी' कहा जाता है। यहां हम समझेंगे: -

  • त्रिदेव कौन हैं?
  • देवी ने स्वयं में से 'महा-सरस्वती, महा-लक्ष्मी और महा-काली को क्यों बनाया?

संदर्भ: कबीर सागर

ब्रह्म (काल) ने दुर्गा से विवाह किया और उनकी पति-पत्नी की जोड़ी ने तीन पुत्रों को जन्म दिया ब्रह्मा जी- रजोगुण युक्त, विष्णु जी- सतोगुण युक्त और शिव शंकर जी- तमोगुण युक्त। वे 'त्रिदेव' कहलाते हैं और एक ब्रह्मांड में तीन लोकों यानी स्वर्ग-स्वर्गलोक, पृथ्वी-पृथ्वीलोक और पाताल-पाताल लोक में एक-एक विभाग के मंत्री के रूप में ज़िम्मेदारी रखते है। प्रकृति (दुर्गा) ने अपने तीन अन्य रूप (सावित्री, लक्ष्मी, और पार्वती) धारण किये और उनका अपने तीन पुत्रों से विवाह कर दिया। 'सावित्री के रूप में, भगवान ब्रम्हा जी को पत्नी दी गयी, भगवान विष्णु को लक्ष्मी रूप में और भगवान शंकर को पार्वती रूप में।

संदर्भ: - श्रीमद देवी भागवत महापुराण 

अथ देवीभागवतं सभाषाटीकं समाहात्म्यम्, खेमराज श्री कृष्ण दास प्रकाशन मुंबई; संस्कृत लेखन, हिंदी में अनुवादित 

देवी दुर्गा ने ब्रह्मा जी से कहा- 'इस शक्ति को तुम अपनी पत्नी बनाओ। 'महासरस्वती' नाम से विख्यात यह सुंदरी अब सदा तुम्हारी पत्नी होकर रहेगी'। 

भगवती जगदम्बा ने भगवान विष्णु से कहा - 'विष्णु! मन को मुग्ध करने वाली इस 'महालक्ष्मी' को लेकर अब तुम भी पधारो। यह सदा तुम्हारे वक्षःस्थल में विराजमान रहेगी'। 

देवी ने कहा 'शंकर! मन को मुग्ध करने वाली यह 'महाकाली' गौरी- नाम से विख्यात है। तुम इसे पत्नी रूप में स्वीकार करो।

श्रीमद देवी भागवत पुराण तीसरा स्कंध 3, अध्याय 4, पृष्ठ संख्या 10, श्लोक 42

ब्रह्मा- अहम् ईश्वरः फिल ते प्रभावात्सर्वे व्यं जनि युता न यदा तू नित्याः, के अन्ये सुराः शतमख प्रमुखाः च नित्या नित्या तव्मेव जननी प्रकृतिः पुराणा (42)

'हे माता, ब्रह्मा, मैं (विष्णु), तथा शिव तुम्हारे ही प्रभाव से जन्मवान हैं, हम नित्य/अविनाशी नहीं हैं, फिर अन्य इंद्रादि दूसरे देवता किस प्रकार नित्य हो सकते हैं। तुम्हीं अविनाशी हो, प्रकृति तथा सनातनी देवी हो। 

श्रीमद देवी भागवत पुराण, पृष्ठ 11-12, अध्याय 5, श्लोक 8

यदि दयाद्रमना न सदाम्बिके कथमहं विहितश्च तमोगुणः कमलजश्च रजोगुणसम्भवः सुविहितः किमु सत्वगुणो हरिः (8) 

भगवान शंकर बोले:- हे माता, यदि आप हमारे ऊपर सदा दयायुक्त हो तो आपने मुझे तमोगुण में किस प्रकार प्रधान किया, कमल से उतपन्न होने वाले ब्रह्मा को रजोगुण किस लिये बनाया तथा आपने विष्णु को सतगुण क्यों बनाया?" अर्थात आपने हमें जीवों/प्राणियों के जन्म और मृत्यु रूपी दुष्कर्म में क्यों संलग्न किया? 

श्रीमद देवी भागवत पुराण तीसरा स्कंध, अध्याय 1-3, पृष्ठ संख्या 119 -120

भगवान विष्णु जी ने श्री ब्रह्मा जी और श्री शिव जी से कहा कि 'दुर्गा हम, तीनों की माता है। यही सर्व-जन की माता/जगतजन-नी, देवी जगदम्बिका/ प्रकृति देवी है। यह भगवती हम सभी की आदि कारण है।'

'यह वही दिव्यांगना है जिनके प्रलयर्नव में मुझे दर्शन हुए थे। उस समय मैं बालकरूप में था। वह मुझे पालने में झूला रही थी। वटवृक्ष पत्र/पत्ते पर एक सुदृढ़ शैय्या बिछी थी। उस पर लेटकर, मैं पैर के अंगूठे को अपने कमल जैसे मुख में चूस रहा था और खेल रहा था। यह देवी गाते हुए मुझे झूला रही थी। यह वही देवी है। इसमें कोई संदेह नहीं है। उन्हें देखकर, मुझे बीते हुए पल याद आ गए। यह हमारी माँ है।' 

तीसरा स्कंध, अध्याय 5, पृष्ठ संख्या 123 

श्री विष्णु जी ने श्री दुर्गा जी की स्तुति करते हुए कहा - 'तुम शुद्ध स्वरूपा हो, यह सारा संसार तुम्हीं से उद्भासित हो रहा है। मैं (विष्णु), ब्रह्मा और शंकर, हम सभी तुम्हारी कृपा से ही विद्यमान हैं। हमारा जन्म (आविर्भाव) और मृत्यु (तिरोभाव) हुआ करता है; अर्थात, हम तीनो देवता नाशवान हैं। केवल तुम ही नित्य हो। तुम सनातनी देवी/जगतजन-नी/ प्रकृति देवी हो (प्राचीन काल से विद्यमान हो)। 

भगवान शंकर बोले - 'देवी, यदि महाभाग विष्णु तुम्हीं से प्रकट (उतपन्न) हुए हैं, तो उनके बाद उतपन्न होने वाले ब्रह्मा भी तुम्हारे  ही बालक हुए, और फिर मैं, तमोगुणी लीला करने वाला शंकर,  क्या तुम्हारी सन्तान नही हुआ अर्थात मुझे भी उत्तपन्न करने वाली तुम ही हो। इस संसार की सृष्टि, स्थिति और संहार में तुम्हारे गुण सदा समर्थ हैं। उन्ही तीनों गुणों से उतपन्न हम, ब्रह्मा, विष्णु और शंकर, नियमानुसार कार्य मे तत्पर रहते हैं।

तीसरा स्कंध, अध्याय 6 पृष्ठ संख्या 129

दुर्गा ने ब्रह्मा से कहा, अब मेरा कार्य सिद्ध करने के लिए, विमान पर बैठकर तुम लोग शीघ्र पधारों। कोई कठिन कार्य उपस्थित होने पर जब तुम मुझे याद करोगे, मैं तुम, देवताओं के सामने आ जाऊंगी। मेरा(दुर्गा का) तथा ब्रम्ह का ध्यान तुम्हें सदा करते रहना चाहिए। हम दोनों का स्मरण करते रहोगे तो तुम्हारे कार्य सिद्ध होने में तनिक भी संदेह नही है।

संदर्भ श्री शिव पुराण- गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित, अनुवादक हैं श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार। 

पृष्ठ संख्या 100 -103- सदाशिव अर्थात काल-रूपी ब्रह्म और प्रकृति (दुर्गा) के मिलन(पति-पत्नी व्ययवहार) से सतगुण श्री विष्णु जी, रजगुण श्री ब्रह्मा जी, तथा तमगुण श्री शिव जी की उतपत्ति हुई। यह प्रकृति (दुर्गा), जिन्हें अष्टंगी कहा जाता है, को 'त्रिदेवजन-नी' तीन देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी) की माता कहते हैं।

पृष्ठ संख्या 110, अध्याय 9, रुद्र संहिता 

"इस प्रकार, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव, इन तीनों देवताओं में गुण हैं, परन्तु शिव (ब्रह्म-काल) गुणातीत माने गए हैं।"

गीता अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 में भी प्रमाण है। जहां गीता ज्ञानदाता यानी काल-ब्रह्म बताता है कि दुर्गा (प्रकृति देवी) मेरी पत्नी है। 'मैं उसके (दुर्गा) गर्भ में बीज स्थापना करता हूं, जिससे सभी प्राणियों की उतपत्ति होती है। मैं (ब्रह्म-काल) सभी का (इक्कीस ब्रह्मांड के जीवों/प्राणियों) पिता हूँ और प्रकृति (दुर्गा/अष्टंगी) सभी की माता कहलाती है। 

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि दुर्गा (प्रकृति) और ब्रह्म (काल-सदाशिव) तीनो देवताओं के माता और पिता हैं। राजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी, और तमगुण शिव जी तीन गुण हैं। वे ब्रह्म (काल) और प्रकृति (दुर्गा) से उतपन्न हुए हैं और तीनों नाशवान हैं। वे मृत्युंजय (अजर-अमर/अविनाशी) या महादेव नहीं हैं। वे पूर्ण शक्तियुक्त नहीं हैं। 

दुर्गा पुराण में ब्रह्मांड की रचना का प्रमाण 

श्री देवीमाहापुराण से कुछ अंश

संक्षिप्त श्रीमद देवी भागवत पुराण, सचित्र, मोटा टाइप, केवल हिंदी, संपादक - हनुमान प्रसाद पोद्दार, चिम्मनलाल गोस्वामी, प्रकाशक- गबिन्द भवन- कार्यालय, गीता प्रेस, गोरखपुर, तीसरा स्कंध, पृष्ठ संख्या 115 से 120 और 123, 125, 128, 129 

एक बार राजा परीक्षित ने श्री व्यास जी से ब्रह्मांड की रचना के विषय में पूछा। श्री व्यास जी ने कहा कि उन्होंने ऋषिवर नरद जी से यही प्रश्न पूछा था क्योंकि विभिन्न मान्यताओं के अनुसार अस्पष्टता थी कि  'एक ब्रम्हांड के रचियता कौन है?' कोई शंकर जी, विष्णु जी, ब्रम्हा जी को इसका रचियता मानते हैं अथवा देवी भवानी जो परम पुरुष के साथ रहती हैं और कार्य सम्पादन करती हैं।

नरद जी ने कहा कि उन्होंने इस संदेह के बारे में अपने पिता अमित तेजस्वी ब्रह्मा जी से पूछा था, जिनके पास स्वयं यथार्थ उत्तर नहीं था और इसका वर्णन किया कि जब वह कमल से उत्पन्न हुए तो वहां हर जगह जल ही जल था और वह अपनी उतपत्ति के विषय में आश्चर्यचकित थे। श्री ब्रह्मा जी स्वयं अनजान थे कि वह कहां से उत्पन्न हुए? लगभग एक हजार वर्ष तक, ब्रह्मा जी ने जल में पृथ्वी की खोज करता रहा लेकिन पृथ्वी नहीं मिली। वह आश्चर्यचकित थे, 'मैं इस अप्रत्याशित जल में कैसे उतपन्न हुआ? मेरा संरक्षक कौन है? '। फिर, आकाशवाणी के आधार पर, उन्होंने एक हजार वर्ष तक तप किया। 

तब वह कमल के तने/डंठल को पकड़कर जल में उतरे जहां उन्होंने भगवान विष्णु जी को शेष शैय्या पर लेटे हुए देखा, जो योग निद्रा के वशीभूत होकर अचेत थे। जब उन्होंने (ब्रह्मा जी) ने भगवती योग निद्रा को याद किया, तो वह विष्णु जी के शरीर से अचिंत्य रूप धारण करके निकली और आकाश में विराजमान हो गईं। वह सुंदर आभूषण पहने हुए थीं।

तब श्री विष्णु जी जागरूक हो गए थे, बाद में रुद्र भी प्रकट हो गए। तब उस देवी ने उन्हें उनके प्रत्येक के उनसे संबंधित कार्यों को बताया यानी सृष्टि, स्तिथि, और संहार और तीनों को एक विमान में अद्भुत दृश्य दिखाने के लिए ले गयीं। वे ब्रह्मलोक गए और एक और ब्रह्मा- चार मुखों सहित (चतुरानन) को देखा और तीनों आश्चर्यचकित हो गए कि 'यह अविनाशी ब्रह्मा कौन है?' 

इस प्रकार मन के समान तीव्रगामी वह विमान उन्हें सुंदर कैलाश के शिखर पर ले गया जहां उन्होंने त्रिनेत्रधारी भगवान शंकर को नन्दी बैल पर बैठे देखा। आगे बढ़ते हुए विमान उन्हें वैकुंठ लोक में ले गया, जहां भगवती लक्ष्मी का विलास-भवन था और कमल-लोचन श्री हरि बैठे थे, जिनके चार भुझाए थी।

आगे बढ़ते हुए, विमान उन्हें उस स्थान पर ले गया जहां उन्होंने अमृत के समान मीठे जल वाला समुद्र देखा और उस मनोहर द्वीप में एक मंगलमय पलँग पर एक दिव्य, सुंदर देवी बैठी थी। भगवान विष्णु ने इस दिव्य देवी को पहचान लिया कि 'यह देवी जगदाम्बिका ही है। यह पूर्ण प्रकृति है, जिसे 'विश्वेश्वरी', वेदगर्भा 'और' शिवा' भी कहते हैं, जिसे उन्होंने प्रलयर्नव में (विश्व के विनाश के बाद) देखा था जब वे बालकरूप में थे, वह उसे एक पालने में झूला रही थी। वह तीनों की माता है।

श्री विष्णु जी और श्री शिव जी ने उस भगवती भुवनेश्वरी की उदार स्तुति आरम्भ करदी।

भगवान विष्णु ने कहा - प्रकृति देवी को नमस्कार है। भगवती विधात्री को निरन्तर नमस्कार है। तुम शुद्ध स्वरूपा हो; यह सारा संसार तुम्हीं से उद्भासित हो रहा है। मैं, ब्रह्मा और शंकर - हम सभी तुम्हारी कृपा से विद्यमान हैं। हमारा (आविर्भाव) जन्म और (तिरोभाव) मृत्यु हुआ करता है। केवल तुम ही नित्य हो, जगातजन-नी हो (ब्रह्मांड की माता), प्रकृति और सनातानी देवी हो।

भगवान शंकर बोले - "देवी! यदि महाभाग विष्णु तुम्हीं उतपन्न हुए हैं, तो उनके बाद उतपन्न होने वाले ब्रह्मा भी तुम्हारे ही बालक हुए। फिर मैं, तमोगुणी लीला करने वाला शंकर क्या तुम्हारी सन्तान नहीं हुआ अर्थात मुझे भी उतपन्न करने वाली तुम्हीं हो। इस संसार की सृष्टि, स्थिति और संहार में तुम्हारे गुण सदा समर्थ हैं। उन्हीं तीनो गुणों से उतपन्न हम ब्रम्हा, विष्णु, और शंकर, नियमानुसार कार्य मे तत्पर रहते हैं। मैं, ब्रम्हा और विष्णु विमान पर चढ़कर जा रहे थे। हमें नए-नए जगत दिखाई दिए। भवानी! भला, कहिए तो उन्हें किसने बनाया है?"

संदर्भ श्रीमद देवी भागवत महापुराण सभाषटीकम् समहात्यम्, खेमराज श्री कृष्ण दास प्रकाशन मुंबई; संस्कृत लेखन, हिंदी में अनुवादित।

तीसरा स्कंध, अध्याय 4, पृष्ठ 10, श्लोक 42 और पृष्ठ संख्या 11-12 अध्याय 5, श्लोक 8 और 12 

तब दुर्गा ने इन तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, और शिव) का विवाह कर दिया। प्रकृति देवी (दुर्गा) ने वचन शक्ति से अपने तीन अन्य रूप धारण किये। श्री ब्रह्मा जी को सावित्री से, श्री विष्णु जी को लक्ष्मी सी और श्री शिव जी को उमा यानी काली से विवाहित कर दिया, उन्हें विमान में बैठाकर उन्हें उनके अलग-अलग द्वीपों पर (लोको में) भेज दिया गया।

ब्रह्मा जी बोले- 'इस प्रकार कहकर भगवती जगदामिका ने हमें विदा कर दिया। उन्होंने शुद्ध आचरण वाली शक्तियों में से, भगवान विष्णु के लिए महालक्ष्मी को, शंकर के लिए महाकाली को और मेरे लिए महासरसवती को पत्नी बनने की आज्ञा दी।

इस विवरण से, यह स्पष्ट है कि महर्षि व्यास जी, महर्षि नारद जी, तथा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी और श्री शंकर जी भी एक ब्रह्मांड की वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ हैं। इसलिए, सिद्ध होता है कि तीनों देवताओं को बेहोश/अचेत रखा गया था। फिर उन्हें सचेत किया गया। 

ब्रह्मलोक में, दूसरे ब्रह्मा, विष्णु, और शिव जो उन्होंने देखे थे, ये ज्योति निरंजन (काल) की ही चाल है। वही अन्य तीन रूप धारण करके, ब्रम्हलोक में तीन गुप्त स्थान (एक रजोगुन-प्रधान क्षेत्र, एक सतोगुण-प्रधान क्षेत्र, और एक तमोगुण-प्रधान क्षेत्र) बनाकर रहता है और प्रकृति (दुर्गा/अष्टंगी) को अपनी पत्नी रूप में रखता है। दुर्गा का अपना अलग लोक भी है, जिसमें वह अपने वास्तविक रूप में दर्शन देती है।

महत्वपूर्ण: - ब्रह्म-काल को प्रतिदिन मनुष्यों के एक लाख सूक्ष्म शरीरों से निकले गन्द को खाने और प्रतिदिन सवा लाख की उतपत्ति करने का शाप लगा हुआ है। वह तीनों गुणों के प्रभाव से ब्रह्मा, विष्णु और शिव के माध्यम से अपना भोजन प्राप्त करवाता है, इसलिए उन्हें धोखे में रखता है। काल द्वारा निर्देशित दुर्गा इसे रहस्ययुक्त रखती है इसलिए वह पूरे ब्रह्मांड को इस वास्तविकता से अनजान रखती है। 

परम ईश्वर कौन है? - दुर्गा पुराण में प्रमाण?

आइए प्रमाण के आधार पर विश्लेषण करें कि सत्ययुग के महान सन्तों के अनुसार, ब्रह्मा जी, विष्णु जी, शंकर जी, दुर्गा जी और ब्रह्म (काल) में से कौन सर्वोत्तम परमात्मा है जिसकी भक्ति करनी चाहिए।

परम ईश्वर के विषय मे महान सन्तों का ज्ञान
श्रीमद देवी भगवत पुराण, स्कंध 6, अध्याय 10, पृष्ठ 414

श्री व्यास जी जनमेजय द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हैं कि सत्ययुग में, ब्राह्मण वेदों के पूर्ण विद्वान थे और भगवती जगदम्बा(दुर्गा) की निरन्तर आराधना करते थे। भगवती का दर्शन करने के लिए उनका मन सदा लालायित रहता था। उनका सारा समय गायत्री के जाप और ध्यान में व्यतीत होता था। मायाबीज का जप करना उनका मुख्य कार्य था। 

यद्यपि, सत्ययुग के महान संतों को "वेदों के ज्ञाता" कहा जाता था, वे दुर्गा जी को सर्वोच्च भगवान मानते थे, यह सिद्ध करता है कि उन्हें सर्वोत्तम परमेश्वर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी क्योंकि दुर्गा जी किसी अन्य भगवान की पूजा करने के लिए कहती है। 

परम ब्रम्ह के विषय मे विष्णु जी का ज्ञान

श्रीमद देवी भागवत पुराण, स्कंध 1, पृष्ठ 28-29 

नरदजी व्यास जी द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं और कहते हैं कि यही प्रश्न मेरे पिता ब्रह्मा जी ने विष्णु जी से पूछा था।

विष्णु जी को समाधि लगाए देख ब्रह्मा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ और इसलिए ब्रह्मा जी ने विष्णु जी से पूछा कि आप देवताओं के अध्यक्ष हैं, तो आप क्यों ध्यान/समाधि लगा रहे हैं। ब्रह्मा जी कहते हैं कि मैं आपको "संसार के शासक को" समाधि लगाए देख आश्र्चर्यचकित हूँ। 

विष्णु जी- 'मुझे सब प्रकार से शक्ति के अधीन होकर रहना पड़ता है। उन्हीं भगवती शक्ति का मैं निरन्तर ध्यान किया करता हूँ। ब्रह्मा जी, मेरी जानकारी में, इन भगवती शक्ति से बढ़कर दूसरे कोई देवता नहीं है। 

यह सिद्ध करता है कि ब्रह्मा जी विष्णु जी को परम ब्रह्म मानते हैं, विष्णु जी दुर्गा को सर्वोच्च भगवान मानते हैं।

परम अक्षर ब्रम्ह के विषय मे दुर्गा जी का ज्ञान

श्रीमद देवी भागवत पुराण, स्कंध 7, अध्याय 36, पृष्ठ 562 - 563

श्री देवी जी कहने लगी - पार्वतराज! इस प्रकार योग युक्त होकर मुझ ब्रह्मस्वरूप देवी का ध्यान करें।

दुर्गा जी हिमालयराज को बता रही हैं कि, इस तरह, पुरी दृढ़ता से मेरी पूजा/ध्यान करो।

दुर्गा जी यहां "उस ब्रह्म" अर्थात किसी अन्य भगवान के बारे में संकेत करती है।

उस ब्रम्ह का क्या स्वरूप है यह बतलाया जाता है। जो प्रकाश स्वरूप सबके अत्यंत समीप में स्थित, हृदयरूप गुहा में स्थित होने के कारण 'गुहाचर' नाम से प्रसिद्ध है और महान पद अर्थात परम प्राप्य है।

दुर्गा जी "उस ब्रह्म (काल)" का भावपूर्ण विवरण देती है! 

सोम्य! उस वेदेने योग्य लक्षय का तुम वेदेन करो - मन लगाकर उसमें तन्मय हो जाओ।

सोम्य! उपनिषद में ..उस बाण को  खींच कर उस अक्षर रूप ब्रह्म को ही लक्ष्य बना कर वेधन करो। प्रणव (ॐ) धनुष है, जीवात्मा बाण है और ब्रह्म को उसका लक्ष्य कहा जाता है।

दुर्गा जी ने "उस ब्रह्म" की भक्ति करने के लिए कहती है और खुद की नहीं, मतलब दुर्गा पुराण में देवी दुर्गा अपनी पूजा का खण्डन करती है।

उस एकमात्र परमात्मा को ही जानो, दूसरी सब बातें छोड़ दे।यही अमृतस्वरुप परमत्मा के पास पाहंचने वाला पुल है। संसार समुद्र से पार होकर अमृतस्वरूप परमात्मा को प्राप्त करने का सुलभ साधन है..... 
इस आत्मा का 'ओम' के जप के साथ ध्यान करो। इससे अज्ञानमय  अंधकार से सर्वथा परे और संसार-समुद्र से उस पार जो ब्रह्म है, उसको पा जाओगे। तुम्हारा कल्याण हो।

देवी जी हिमालयराज को कहती है कि केवल 'एक परमात्मा' की पूजा करें और बाकी सब छोड़ दें और किसी अन्य भगवान की भक्ति करने के लिए कह रही हैं।

देवी जी ने निम्नलिखित पंक्तियों में कहती हैं कि ब्रह्म 'ब्रह्मलोक' में रहता है।

वह यह सबका आत्मा ब्रह्म, ब्रह्मलोक रूप दिव्य अकाश में स्थित है।

गीता अध्याय 8, श्लोक 16 यह लिखा है कि यहां तक कि 'ब्रह्मलोक भी नाशवान है जिसका अर्थ है कि ब्रह्म भी परम ईश्वर नहीं है। यह सिद्ध करता है कि दुर्गा जी को भी परम अक्षर ब्रम्ह के विषय में पूर्ण ज्ञान नहीं है।

परम पुरुष के विषय में ब्रह्म-काल का ज्ञान

गीता जी अध्याय 7 श्लोक 18 में ब्रह्म-काल अपनी भक्ति को 'अनुत्तम' (हीन/घटिया) बताता है।

अध्याय 15 श्लोक 4 और अध्याय 18, श्लोक 62, यह ब्रह्म अर्जुन को परम शांति और शाश्वत स्थान (सतलोक) को प्राप्त करने के लिए परम पुरुष/परमात्मा की शरण में जाने के लिए कह रहा है।

यह प्रमाण संकेत करते हैं कि न तो सतयुग के सन्त, ब्रम्हा जी, विष्णु जी, शिव जी, दुर्गा और न ही ब्रम्ह-काल को पता कि परम पुरुष परमेश्वर कौन है?

कल्युग के ब्राह्मण राक्षसों के समान हैं - दुर्गा पुराण 

श्रीमद देवी भागवत पुराण, स्कंध 6, पृष्ठ 414

प्राचीन युगों में जो राक्षस समझे जाते थे वे कल्युग में ब्राह्मण माने जाते हैं क्योंकि अबके ब्राह्मण दूसरों को ठगने, झूठी और पाखण्ड पूजा करने और अपने अनुयायियों से करवाने में तत्पर रहते हैं जो बिल्कुल भी वेदोनुसार नही है।

दुर्गा जी का वास्तविक मंत्र क्या है?

देवी दुर्गा को विभिन्न नामों जैसे गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वरही, वैष्णवी, शिवा, वरुनी, कावेरी, नरसिंही, वास्बी, विश्वेश्वरी, वेदगर्भा, महा विद्या, महामाया, जगदम्बिका, सनातनी देवी, आदि माया, महा शक्ति, अष्टांगी, जगतजन-नी, प्रकृति, त्रिदेवजन-नी से संबोधित किया जाता है।

साधक विभिन्न मंत्रों का जाप करके उसकी पूजा करते हैं, जो कहीं भी वेद, पुराण या गीता जी जैसे किसी भी हिंदू धार्मिक ग्रंथों में प्रमाणित नहीं होते हैं। दुर्गा चालिसा या दुर्गा सप्ताष्टि का पाठ करने से देवी दुर्गा कृपा नहीं करती है। यह पूजा का मनमाना आचरण है जो व्यर्थ है। 

तत्वदर्शी (प्रबुद्ध) संत द्वारा दी गई परम पुरुष परमेश्वर की सही भक्ति विधि ही करनी चाहिए। प्रमाणित सच्चे मंत्रों का जाप करने से भक्तों को परम शांति व सुख प्राप्त करने में सहायक होती है। तत्वदर्शी संत यानी संत रामपाल जी महाराज की शरण ग्रहण करें और अपना कल्याण करवाएं।

तो दुर्गा पुराण से पांच अवधारणाएं स्पष्ट होती हैं:

  1. ब्रह्मा जी, विष्णु जी, और शिव जन्म और मृत्यु में हैं, वे अविनाशी नहीं हैं।
  2. देवी दुर्गा उनकी माता है।
  3. दुर्गा प्रकृति देवी है।
  4. ब्रह्मा रजोगुण है, विष्णु सतोगुण हैं और शिव शंकर तमोगुण हैं।
  5. ब्रह्मा, विष्णु, और शिव केवल कर्म फल ही दे सकते हैं, वे कोई बदलाव नही कर सकते हैं।

यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13- केवल परम पुरुष परमात्मा/सतपुरुष/सर्वशक्तिमान परमेश्वर कबीर साहेब जी (कर्म) बदल सकते हैं। वे हमारे पापों को क्षमा कर सकते हैं।

साधकों/श्रद्धालुओं की यह मिथक कि दुर्गा रचियता है, वह पापों को क्षमा कर सकती है और मोक्ष दे सकती है, सभी गलत साबित हुए। देवी दुर्गा इस ब्रह्मांड का रचियता नहीं है। वह पापों को क्षमा नहीं कर सकती और न ही वह मोक्ष प्रदान कर सकती। दुर्गा अविनाशी नहीं है। वह अपने पति ब्रह्म (काल) के साथ-साथ अपने तीन पुत्रों ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित जन्म और मृत्यु में हैं। क्षर पुरुष के सभी (21) इक्कीस ब्रह्मांड नाशवान हैं।

परम पुरुष परमेश्वर कविर्देव रचियता हैं जो पूरे ब्रह्मांड का धारन-पोषण करते हैं। वह  अविनाशी हैं और शाश्वत स्थान अर्थात परम निवास स्थान 'सतलोक' में रहते हैं। अतः परम शांति और मोक्ष प्राप्त करने के लिए पूर्ण परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए जैसा कि गीता जी में ब्रह्म द्वारा बताया गया है जिसे ब्रह्म ने वेदों में विस्तार से बताया है। वह सर्वोत्तम परमात्मा 'कवीर देव' है या उसे 'कबीर साहिब या 'अल्लाह हु अकबर' कहते हैं।