हनुमान जी की सम्पूर्ण मोक्ष कथा

हनुमान को 'बजरंगबली' यानी ‘शक्ति के देवता’ कहा जाता है। उनको ‘संकटमोचन भी’ कहा जाता है यानी बुराइयों / खतरों का नाश करने वाला। हिंदू भक्तों का मानना ​​है कि हनुमान एक ऐसे भगवान हैं जो अपने भक्तों के रक्षक हैं। महान महाकाव्य रामायण, हनुमान को त्रेता युग में भगवान राम उर्फ ​​भगवान विष्णु के एक महान भक्त (राम दूत) के रूप में गौरवान्वित करती है । हनुमान एक दिव्य वानर थे जिन्होंने विष्णु अवतार राम की मदद की, उनकी पत्नी सीता की खोज करने और रावण की कैद से उसे छुड़वाने में।

हनुमान ब्रह्मचारी थे और वे 'चिरंजीवी' भी माने जाते थे। माता अंजनी और पिता केसरी से जन्मे हनुमान को 'केसरीनंदन' भी कहा जाता है, उन्हें 'वायु पुत्र' यानी पवन देवता का बेटा भी कहा जाता है। रामायण के साक्ष्य और इसी तरह के पौराणिक तथ्यों के आधार पर हनुमान जी को जाना जाता है। यहाँ हम पवित्र शास्त्रों से कुछ छिपे हुए तथ्यों को उजागर करेंगे जो अनभिज्ञ भक्त समाज के सामने कभी प्रकट नहीं हुए हैं।

आइए हम पवित्र शास्त्रों से तथ्यों का अध्ययन करें

  • हनुमान का जन्म
  • हनुमान भगवान शिव के अवतार हैं
  • हनुमान का मुख वानर जैसा क्यों है?
  • हनुमान का हथियार क्या है?
  • हनुमान को 'महाबली' क्यों कहा जाता है?
  • क्या हनुमान की पूजा से मोक्ष संभव है?
  • हनुमान के गुरु कौन थे?
  • रामायण में हनुमान की क्या भूमिका थी?
  • सर्वशक्तिमान कविर्देव / ऋषि मुनिन्द्र की हनुमान जी से भेंट / वार्ता
  • हिंद महासागर पर पुल का निर्माण किसने किया था?
  • हनुमान ने सर्वशक्तिमान कविर्देव की शरण ली

हनुमान का जन्म

हनुमान का जन्म किष्किंधा में अंजनी और केसरी के यहां हुआ था इसलिए उन्हें  'अंजनेय', 'अंजनिपुत्र', 'अंजनी सुता' कहा जाता है। चूँकि वे वायु देव के आशीर्वाद से पैदा हुए थे इसलिए उन्हें 'पवनपुत्र' भी कहा जाता है। आइए हम पवित्र ग्रंथों से तथ्यों का अध्ययन करते हैं जो बताते हैं कि हनुमान को पवनपुत्र क्यों कहा गया?

हनुमान भगवान शिव के अवतार हैं

सन्दर्भ: कबीर सागर में अध्याय  'हनुमान बोध'

हनुमान कोई साधारण बालक नहीं थे। कबीर सागर में वर्णित पूजनीय सर्वशक्तिमान कबीर जी की वाणी के कुछ अंशः बताते हैैं कि हनुमान भगवान शिव के 11 वें रुद्र अवतार थे।

गौतम ऋषि की पतनी नारी, नाम अहिल्या राम उबारी
नाम अंजनी पुत्री ताकी, जनम ल्यो कोख मैं जाकी
साधु रूप धरि शिव बन आये, जहँ अंजनी को मंडप छाये।
प्यास-प्यास कहे बोले बानी, शिव की गती मतन ही जानी
सिंग नाद रहे शिव पासा, फुक्यो कान रहित बासा
छलकर बीज सीख तब डारी, ऐसे उपजे देह हमारी।

भगवान राम ने ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या का उद्धार किया। उनकी अंजनी नाम की एक बेटी थी। अंजनी भगवान शिव की उपासक थी। एक बार, जब अंजनी पूजा में मग्न थी तब भगवान शिव अंजनी के समक्ष ऋषि के रूप में प्रकट हुए और शब्द गाया और 'वायु देव' की सहायता से उस 'नाद' को अंजनी के कान में फूँक दिया। उस 'नाद' की शक्ति से अंजनी के गर्भ से हनुमान का जन्म हुआ। इसलिए, हनुमान को 'पवनपुत्र' कहा जाता है और इस प्रकार वे भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार हैं।

हनुमान का मुख वानर जैसा क्यों है?

दिव्य बालक हनुमान ने एक बार सूर्य को गलती से पका हुआ फल समझ लिया तथा उसको खाना चाहा जिसके फलस्वरूप आकाश में उड़ान भरी। भगवान इंद्र ने हस्तक्षेप किया और अपने वज्र से हनुमान को मारा। उस प्रबल प्रहार से हनुमान पृथ्वी पर गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गई। इससे उनके पिता 'वायु देव' नाराज हो गए और उन्होंने पृथ्वी की सम्पूर्ण वायु वापस खींच ली, जिसके कारण जीवित प्राणियों को भारी पीड़ा होने लगी। तब भगवान शिव ने हस्तक्षेप किया और अपने 11वें अवतार को पुर्नजीवित किया, जिसने वायु देव को जीवन को पुर्नस्थापित करने के लिए प्रेरित किया। ऐसी धारणा है कि इसके बाद से हनुमान का चेहरा बंदर जैसा हो गया।

हनुमान का हथियार क्या है?

हनुमान का हथियार गदा है जो उन्हें भगवान विष्णु द्वारा प्रदान किया गया है।

हनुमान को 'महाबली' क्यों कहा जाता है?

भगवान इंद्र ने हनुमान को 'वज्र' की तरह मज़बूत शरीर का आशीर्वाद दिया है। भगवान अग्नि ने हनुमान को आशीर्वाद दिया है कि 'अग्नि' उन्हें कभी नुकसान नहीं पहुंचाएगी। भगवान वरुण ने आशीर्वाद दिया है कि 'जल' हनुमान को कभी नुकसान नहीं पहुंचाएगा। पवन देवता ने हनुमान को 'वायु' से भी तेज़ होने का आशीर्वाद दिया जिससे उन्हें कभी नुकसान नहीं होगा। भगवान ब्रह्मा ने हनुमान को आशीर्वाद दिया कि वे 'कहीं भी' विचरण कर सकते हैं और कोई भी उन्हें नहीं रोकेगा। ऐसी दिव्य शक्तियां हनुमान को 'महाबली' बनाती हैं।

क्या हनुमान की आराधना से मुक्ति संभव है?

हालाँकि, हनुमान को 'संकटमोचन', 'महाबली', 'चिरंजीवी' माना जाता है, जो कई दैवीय शक्तियों से लैस हैं, फिर भी उनकी पूजा के तरीके जैसे 'हनुमान चालीसा' या 'सुंदरकांड का पाठ ' या 'जय बजरंग बली' जैसे मंत्रों का जाप या ‘ॐ श्री हनुमते नमः’ या यह गुप्त मंत्र ‘काल तंतु कारे चरन्तिए नरमरिष्णु ,निर्मुक्तेर कालेत्वम अमरिष्णु' जिसके बारे में यह माना जाता है कि इस मंत्र के जपने से हनुमान अपने साधकों को दर्शन देते हैं तथा हनुमान जयंती 'जैसे त्यौहार मनाते हैं। मंगलवार' और 'शनिवार 'हनुमान की पूजा के सबसे शुभ दिनों के रूप में मानते हैं। हनुमान की पूजा करने के बारे में किसी भी पवित्र शास्त्र में कोई सबूत नहीं मिलता है।

यह मनमानी पूजा है जो पवित्र श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 9 श्लोक 23, अध्याय 16 श्लोक 23, 24, अध्याय 17 श्लोक 6 के अनुसार व्यर्थ है। ऐसी पूजा जो शास्त्रों में निषेध हो, वह आत्माओं को काल के जाल से मुक्त नहीं कर सकती। ऐसी भक्ति करने से साधक स्वर्ग- नरक और 84 लाख प्रजातियों के जीवन को ही प्राप्त करते हैं। वे मोक्ष प्राप्त नहीं करते तथा जन्म और मृत्यु के दुष्चक्र में ही फंसे रहते हैं।

श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 14 श्लोक 3 और 4, श्रीमद्भगवद देवी पुराण और शिव महापुराण इस बात का प्रमाण देते हैं कि भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शिव जन्म लेते और मरते हैं। वे अमर नहीं हैं इससे सिद्ध होता है कि उनके अवतार और भक्त कैसे मुक्त हो सकते हैं? पवित्र शास्त्रों के प्रमाणों की अनदेखी किए बिना, हनुमान के भक्तों को इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि हनुमान की पूजा से मुक्ति संभव नहीं है।

अब, सवाल यह उठता है कि मोक्ष कैसे प्राप्त करें? पूजा के मार्ग में और मोक्ष पाने के लिए सर्वप्रथम गुरु धारण करना आवश्यक है। आइए, हम पवित्र धर्मग्रंथ के माध्यम से यह जानते हैं कि हनुमान जी के गुरु कौन थे?

हनुमान जी के गुरु कौन थे?

संदर्भ: पवित्र कबीर सागर, पृष्ठ 113, बारहवां अध्याय "हनुमान बोध"

एक गुरु अपने भक्तों का सच्चा उपदेशक होता है जो पूजा करने का सही तरीका प्रदान करता है जिससे साधक मोक्ष प्राप्त करने के योग्य हो जाते हैं। लोग जानते हैं कि ऋषि मतंग हनुमान के गुरु थे और सूर्य भी, जिन्होंने उनके जन्म में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन पवित्र कबीर सागर के साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि त्रेता युग में ऋषि मुनिन्द्र के रूप में दिव्य लीला करने वाले सर्वोच्च परमात्मा कबीर जी हनुमान के गुरु थे। सर्वशक्तिमान कविर्देव ने हनुमान को सच्चा ज्ञान प्रदान किया, उन्हें शाश्वत स्थान ‘सतलोक’ दिखाया और सच्चे मोक्ष मंत्र प्रदान किये जिनको जपने से हनुमान मोक्ष प्राप्त करने के योग्य बन गए।

ज़रूर पढ़ें  Summary of Chapter Hanuman Bodh in Kabir Sagar.

रामायण में हनुमान की भूमिका क्या थी?

पवित्र कबीर सागर से प्रमाण लेते हुए आगे बढ़ते हैं।

भक्त धर्मदास ने सर्वशक्तिमान कबीर जी से सवाल किया कि हनुमान तो भगवान राम उर्फ ​​भगवान विष्णु के उपासक थे फिर उन्होंने आपके सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान को कैसे स्वीकार किया और आपकी शरण में कैसे आए? यह तो ऐसा था मानो पश्चिम से सूर्योदय हो गया। सर्वोच्च परमात्मा कबीर जी ने भक्त धर्मदास को पवनपुत्र हनुमान जी को अपनी शरण में लेने का सम्पूर्ण विवरण सुनाया। जैसा कि महान महाकाव्य रामायण के माध्यम से जाना जाता है। परमात्मा कबीर जी ने सुनाया :

  • सुग्रीव और हनुमान कैसे मित्र बन गए?
  • भगवान राम द्वारा कैसे सुग्रीव का भाई बाली मारा गया था?
  • शेषनाग के अवतार यानी लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक क्यों काट दी?
  • लंका के राजा- रावण ने सीता का अपहरण कैसे किया था?
  • सीता को लौटाने के लिए रावण को राज़ी करने के लिए हनुमान ने भगवान राम के दूत की भूमिका कैसे निभाई?
  • हनुमान ने लंका के लिए उड़ान भरी और सीता जी से मिले और उन्हें भगवान राम की अंगूठी दिखाई, जिसमें उनका नाम अंकित था।
  • सीता जी ने बदले में हनुमान को सबूत के तौर पर अपनी शादी का कंगन दिया जिससे भगवान राम को साबित किया जा सके कि हनुमान उनसे मिले थे।
  • हनुमान ने रावण के नौ लखा उद्यान को कैसे नष्ट किया जहां रावण ने सीता जी को बंदी बनाया था।
  • हनुमान ने अपनी पूंछ से कैसे रावण की लंका में आग लगा दी?
  • वापस जाते समय समुद्र पार करने के बाद हनुमान ने एक पहाड़ी पर विश्राम किया जहां उन्होंने स्नान भी किया, इसलिए उन्होंने सीता जी द्वारा दिए गए कंगन को एक चट्टान पर रखा। एक लंगूर ने उस कंगन को उठा लिया और ऋषि मुनिन्द्र की झोपड़ी के बाहर रखे मटके में डाल दिया।

उपर्युक्त लेख, भगवान राम और हनुमान जी के बारे में सभी भक्त जानते हैं। हम आपको इसके बारे में विस्तार से बताएंगे, वह छिपे हुए तथ्य जो भक्तों को अभी तक ज्ञात नहीं थे।

सर्वशक्तिमान कविर्देव / ऋषि मुनिन्द्र की हनुमान जी से भेंट

वास्तव में, यह सर्वशक्तिमान कविर्देव की दिव्य लीला थी जो उस समय ऋषि मुनिन्द्र की भूमिका निभा रहे थे। हनुमान सीता जी का कंगन वापस चाहते थे। उन्होंने मुनिन्द्र जी को सीता के अपहरण के बारे में और कैसे सीता ने अपनी निशानी भगवान राम को देने के लिए दी, यह बताया। तब ऋषि मुनिन्द्र ने पूछा “आप किस संख्या के रामचंद्र के बारे में बात कर रहे हैं?" हनुमान यह सुनकर चकित हो गए और उन्होंने सोचा कि ऋषि शायद अपने होश में नहीं हैं या भांग के प्रभाव में हैं।

ऋषि मुनिन्द्र ने उन्हें बताया कि पहले भी कई राम पैदा हो चुके हैं और भविष्य में भी वे जन्म लेते और मरते रहेंगे। हनुमान जी को ऋषि मुनिन्द्र के यह शब्द पसंद नहीं आए लेकिन उन्होंने वाद-विवाद नहीं किया और चुप रहे। हनुमान ने कहा कि एक बंदर ने सीता जी के कंगन को इस मटके में डाल दिया है क्योंकि मटके में उसी प्रकार के कई कंगन हैं इसलिए मैं यह पहचानने में असमर्थ हूं कि कौन सा कंगन निकालूँ।

परमात्मा कबीर जी ने कहा, “हे पवनपुत्र ! आप किसी भी एक कंगन को उठा सकते हैं इनमें कोई फर्क नहीं है। इस मटके में जितने भी कंगन हैं, उतनी बार दशरथ के पुत्र श्री राम को वनवास हुआ है और सीता का अपहरण हुआ और हनुमान द्वारा उनकी खोज की गई है। हनुमान जी को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि कई भगवान राम, सीता और हनुमान पहले भी हो चुके हैं और आगे भी बहुत से होंगे। ऋषि मुनिन्द्र जी ने कहा, "इस मटके की एक खूबी है की इसमें जो भी सामान डाला जाता है इसमें उसका बिलकुल वैसा ही एक और प्रतिरूप बन जाता है।" ऐसा कहने के बाद ऋषि जी ने बर्तन में मिट्टी का एक कटोरा डाला, उसी समय एक और 'समान मिट्टी' का कटोरा उसमें बन गया। ऋषि मुनिन्द्र ने कहा, “हे हनुमान! एक कंगन ले लो। आपको कोई समस्या नहीं होगी।” हनुमान जी के पास कोई विकल्प नहीं बचा था। बर्तन में से एक कंगन निकालकर वह उड़ चले।

हिंद महासागर पर राम सेतु पुल का निर्माण किसने किया था?

भगवान राम ने रावण की कैद से सीता को वापस लाने के लिए वानर सेना और अन्य सभी की मदद से एक पुल बनाने का फैसला किया। सेना में दो भाई थे 'नल-नील' जो ऋषि मुनिन्द्र जी के शिष्य थे। ऋषि मुनिन्द्र जी ने उनकी बीमारी को ठीक किया था और उन्हें आशीर्वाद दिया था कि अगर वे पानी में अपने हाथों से कोई वस्तु डालते हैं, तो वह डूबेगी नहीं बल्कि वह पानी पर तैरने लगेगी जैसे पत्थर, कांस्य के बर्तन, आदि लेकिन 'नल-नील' को अभिमान हो गया और वे अपने गुरु को भूल गए जिसके कारण उनकी शक्ति चली गयी।

भगवान राम ने तीन दिनों तक सागर में खड़े होकर समुद्र देवता की आराधना की ताकि महासागर सेना को जाने के लिए रास्ता दे लेकिन समुद्र देवता ने ऐसा नहीं किया। इससे क्षुब्ध होकर राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को आदेश दिया, “मेरा अग्नि बाण निकालो, यह प्रार्थना की नहीं अपितु कठोरता की भाषा समझेंगे।” उसी समय समुद्र देवता ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और हाथ जोड़कर श्री राम के सामने खड़े हो गये और कहा, “भगवान! एक पूरी दुनिया मेरे अंदर बसी हुई है। कृप्या! आप पाप के भागी ना बनें। कुछ ऐसा करें जिससे आपका काम भी हो जाए और किसी को कोई नुकसान भी न हो।”

ब्राह्मण रूप में समुद्र ने रामचंद्र को 'नल-नील' की शक्ति के बारे में बताया। लेकिन 'नल-नील' पत्थरों को पानी पर तैराने वाली अपनी शक्ति खो चुके थे। तब ऋषि मुनिन्द्र ( कविर्देव ) को रामचंद्र ने याद किया जो 'सेतुबंध' में प्रकट हुए और उन्होंने रास्ते के पहाड़ के चारों ओर अपनी छड़ी से एक रेखा को चिह्नित किया और बताया, “मैंने पहाड़ के चारों ओर रेखा के अंदर के पत्थरों को लकड़ी से हल्का बना दिया है। वे डूबेंगे नहीं। उन हलके पत्थरों से आप पुल का निर्माण करें।” हनुमान राम के भक्त थे। पहचान के लिए हनुमान ने उन पत्थरों पर 'राम-राम' लिख दिया। वे पत्थर नहीं डूबे। नल और नील वास्तुकार थे उन्होंने पत्थरों को तराशा और अपने गुरु मुनिन्द्र जी के आशीर्वाद से सेतु का निर्माण किया। भगवान राम ने अपनी सेना के साथ लंका की ओर कूच किया और राम- रावण का युद्ध हुआ जिसमें रावण मारा गया। इस तरह से पुल का निर्माण परमात्मा कविर्देव जी के आशीर्वाद से हिंद महासागर पर किया गया था जो अब भी मौजूद है और इसे 'राम सेतु' कहा जाता है जो भारत और श्रीलंका को जोड़ता है।

इस ऐतिहासिक सच्ची घटना से निम्न निष्कर्ष निकलते हैं:

  • भगवान राम उर्फ ​​भगवान विष्णु जी ने रास्ता प्रदान करने के लिए तीन दिनों तक समुद्र देवता से प्रार्थना की लेकिन उनकी पूजा व्यर्थ गई क्योंकि सागर ने रास्ता नहीं दिया।
  • सच्ची उपासना की राह में घमंड शक्तियों को नष्ट कर देता है जैसा नल-नील के साथ हुआ।
  • सर्वशक्तिमान कबीर / ऋषि मुनिन्द्र जी की शक्ति से पत्थर पानी पर तैरने लगे क्योंकि उन्होंने पत्थरों को हल्का कर दिया था। भगवान राम, हनुमान और 'नल-नील' ऐसा नहीं कर सके।
  • श्री रामचंद्र से मिलने से पहले भी हनुमान हर समय राम-राम जपा करते थे और हर जगह राम लिखते थे जैसे पौधों, वृक्षों, पत्तियों आदि पर। तब उन्हें नहीं पता था कि श्री रामचंद्र कौन हैं?
  • इसी तरह हनुमान ने उन हल्के पत्थरों पर ’राम’ लिखा। हनुमान द्वारा पत्थरों पर राम लिखे जाने के संबंध में किंवदंतियों और लोककथाओं ने भक्तों को आज तक गुमराह किया कि भगवान राम ने अपनी शक्ति से पुल का निर्माण किया, नल-नील ने वह महान काम किया और हनुमान ने राम-राम पत्थरों पर लिखा। यह सब झूठ था। अबोध साधक आज तक भ्रमित हैं।
  • वास्तविकता यह है कि सर्वशक्तिमान कविर्देव ने भगवान राम की पुल बनाने में मदद की अन्यथा राम कभी भी लंका नहीं पहुंच सकते थे और सीता को वापिस नहीं ला सकते थे। ये तथ्य हालांकि हमारे पवित्र शास्त्रों में उल्लेखित है लेकिन भक्त इससे आज तक अनभिज्ञ रहे। पवित्र कबीर सागर 5500 साल पहले लिखा गया था और आज तक यह तथाकथित ऋषि, संत, महंत स्वयं वास्तविकता से अनभिज्ञ रहे और गलत ज्ञान का प्रचार करते रहे। वे बस जनता को बेवकूफ बनाकर अपना कारोबार चलाते हैं।

टिप्पणी: भगवान राम की मदद करने के लिए त्रेतायुग में पुल का निर्माण ब्रह्म-काल से सर्वशक्तिमान कबीर साहेब की प्रतिबद्धता थी जो कबीर सागर में “ब्रह्मांड के निर्माण” अध्याय में उल्लिखित है। कृपया ज़रूर पढ़ें।

सर्वशक्तिमान कबीर / ऋषि मुनिन्द्र ने अपने प्रिय भक्त धर्मदास को आगे बताया:-

  • भगवान राम और उनकी सेना कैसे 'नाग-फांस’ से कैद हो गई और गरुड़ ने कैसे नागों को मारकर असहाय महापुरुषों जैसे हनुमान, भगवान राम, जामवंत, सुग्रीव, अंगद की मदद की।
  • 'संजीवनी जड़ी बूटी' लाने और लक्ष्मण के जीवन को बचाने में हनुमान की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
  • विभीषण ने भगवान राम को रावण की नाभि में बाण मारने के लिए कहा क्योंकि रावण की नाभि में अमृत होने का आशीर्वाद था। रावण को किसी अन्य माध्यम से नहीं मारा जा सकता था। भगवान राम ने सभी प्रयास किए, अपनी सभी शक्तियों को आज़माया लेकिन व्यर्थ। तब रामचंद्र जी ने सर्वोच्च परमात्मा कबीर साहेब जी से मदद के लिए आह्वान किया, “हे महानतम देव! मेरी मदद करो। आपकी बेटी (सीता) बड़े दुख में है। आपके बच्चे, तैंतीस करोड़ देवताओं को भी इसी दानव द्वारा जेल में डाल दिया गया है।” उसी क्षण, सर्वोच्च कबीर जी ने गुप्त रूप से रामचंद्र के हाथों पर हाथ रखा और रावण की नाभि में तीर मार दिया। तब रावण की मृत्यु हो गई।
  • इसके बाद विभीषण ने लंका पर शासन किया।
  • अग्नि परीक्षा - भगवान राम द्वारा सीता जी की पतिव्रता होने की पवित्रता की परीक्षा ली गई जिसमें वे सफल हुईं। सीता जी को 'सती' का दर्जा हासिल हुआ।
  • पूर्णमाशी के 10वें दिन रावण की हत्या कर दी गई थी।
  • 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद पुष्पक विमान में बैठकर हनुमान के साथ श्री राम, लक्ष्मण और सीता अयोध्या नगरी पहुँचे।
  • अमावस्या की रात को जब वे सभी अयोध्या पहुँचे तो उन्हें सम्मानित करने के लिए पूरे शहर में गाय के घी के दीये जलाए गए और जश्न मनाया गया।

हनुमान ने सर्वशक्तिमान कविर्देव की शरण ग्रहण की

अयोध्या लौटने के बाद भगवान राम, सीता और अपने परिवार के साथ खुशी से रहने लगे। एक दिन सीता ने युद्ध में लड़ने वाले योद्धाओं को पुरस्कृत करने का फैसला किया। सीता ने हनुमान को सच्चे मोती का हार भेंट किया। हनुमान ने एक मोती तोड़ा, उसे कुचल दिया, इसी तरह अन्य सभी मोतियों को भी तोड़ा और फेंक दिए। सीता ने नाराज़ होकर हनुमान को डांटा, उनका अपमान करते हुए कहा, “हे मूर्ख! यह क्या किया? तुमने इतना कीमती हार नष्ट कर दिया। तुमने केवल बंदर की तरह ही व्यवहार किया। मेरी आँखों से दूर चले जाओ।” भगवान राम भी वहीं उपस्थित थे, सब देख रहे थे लेकिन शांत रहे। हनुमान जी ने कहा, “माँ! जिस वस्तु में राम का नाम अंकित नहीं, वह मेरे किसी काम की नहीं है। इन मोतियों को तोड़कर मैंने देखा इनमें राम नाम अंकित नहीं है, इसलिए यह मेरे किसी काम के नहीं हैं। सीता जी ने कहा, "क्या तुम्हारे शरीर में राम का नाम लिखा है? फिर तुमने यह शरीर अब तक क्यों रखा है? इसे भी नष्ट कर दो।" उसी क्षण हनुमान जी ने अपना सीना चीर कर दिखाया, वहां 'राम-राम' लिखा था। इसके बाद हताश हनुमान ने तुरंत अयोध्या को त्याग दिया और वहां से कहीं दूर चले गए।

कुछ वर्ष पश्चात, भगवान राम ने अपनी गर्भवती पत्नी सीता को एक धोबी के व्यंग्य से अपमानित महसूस करते हुए अपने महल से निष्कासित कर दिया। पूरे राज्य ने उनके इस अलगाव पर शोक व्यक्त किया। उसके बाद दोनों का एकाकी और दयनीय जीवन रहा और उनकी मृत्यु भी दर्दनाक हुई।

टिप्पणी: हनुमान हमेशा भगवान राम और सीता के प्रति वफादार रहे लेकिन समय बदल जाता है। दोनों ने अपने सबसे ईमानदार भक्त का अनादर किया। क्या यह महापुरुषों की निशानी है? क्या वफादारी के लिए यही इनाम हनुमान को मिलना चाहिए था?

राम-सीता द्वारा इस अनादर ने हनुमान का दिल तोड़ दिया। सर्वोच्च परमात्मा कबीर जी त्रेता युग में ऋषि मुनिन्द्र जी के रूप में धरती पर आए हुए थे। जब उनकी भेंट हनुमान जी से एक बार फिर से हुई तब उन्होंने 'सत साहिब' कहकर उनका अभिवादन किया। हनुमान जी ने भी 'राम-राम' कहा और ऋषि जी का अभिवादन करने के लिए उठ खड़े हुए। हनुमान ऋषि मुनिन्द्र को पहचान गए क्योंकि लंका से लौटते समय वह उनसे मिल चुके थे। तब सर्वशक्तिमान कबीर / ऋषि मुनिन्द्र ने हनुमान को सांत्वना दी। भगवान कबीर साहेब ने हनुमान जी को ब्रह्म-काल के 21 ब्रह्मांडों की स्थिति और हर आत्मा के दर्द के बारे में अवगत कराया की किस प्रकार सभी भोली आत्माएं काल के जाल में फंसी हैं और अपने कर्मों के दंड को भोग रही हैं।

चौंसठ योगिनी बावन बीरा, काल पुरुष के बसे शरीरा
सत्य समरथ (भगवान कबीर) है परले पारा, काल कला उपज्यो संसारा
सोइ समरथ है सरजनहारा, तीनों देव न पावे पारा

परमात्मा कबीर जी ने उन्हें भगवान राम का सच बताया कि वे भगवान विष्णु के अवतार हैं और काल के क्षेत्र में केवल एक विभाग (सतोगुण) के स्वामी हैं। नारद जी के श्राप के फलस्वरूप उन्हें मानव जीवन में कष्ट भी उठाना पड़ रहा है। कबीर जी ने हनुमान को सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश भी दिया।

तब हनुमान सत्य कह मानी, सई मुनींद्र सत्य हो ग्यानी
अब तुम पुरष मोहि दिखाओ, मेरा मन तुम तब पतियाओ
कैसि विधि समरथ को जाना, सो कुछ मोहि सुनाओ ज्ञाना

हनुमान जी को दिव्य दृष्टि देकर, सर्वोच्च भगवान कविर्देव ने हनुमान को सतलोक दिखाया।

देखत चंद्र वरन उजियारा, अमृत फल का करे अहारा।
असंख्य भानु पुरुष उजियारा, कोटिन भानु पुरुष रोम छ विभारा।
तब हनुमान ठाक ता मारी, तुम मुनींद्र अहो सुखकारी।

तब कबीर जी ने हनुमान को सच्चा मोक्ष मंत्र दिया और उनमें भक्ति बीज बोकर मोक्ष प्राप्त करने के योग्य बनाया। इस तरह, परम देव कबीर जी ने एक पवित्र आत्मा, हनुमान जी को अपनी शरण में लिया। परोपकारी हनुमान जी को निस्वार्थ भाव से प्रभु की सेवा करने का फल प्राप्त हुआ। परमात्मा कविर्देव स्वयं आए, हनुमान को मोक्ष मार्ग बताया और उनका कल्याण किया। हनुमान जी फिर से एक मानव जीवन प्राप्त करेंगे फिर सर्वोच्च परमात्मा कबीर जी उनको शरण में लेने के बाद मोक्ष प्रदान करेंगे।

उपरोक्त, आध्यात्मिक रहस्य आज तक छिपे हुए थे, जिसे महान संत रामपाल जी महाराज ने भक्तों के समक्ष प्रकट किया है। कोई भी ऋषि, संत या कोई भी धार्मिक गुरु इन तथ्यों को भक्त समाज के समक्ष आज तक नहीं ला सके और लोग आज तक अनभिज्ञ बने हुए थे।

निष्कर्ष

उपरोक्त से, हम निम्नलिखित निष्कर्ष निकालते हैं:

  • हनुमान, तमोगुण भगवान शंकर का 11वां रुद्र अवतार थे।
  • हनुमान की पूजा से मोक्ष असंभव है। यह पूजा मनमानी है।
  • जब हनुमान और भगवान राम भी ब्रह्म-काल के अन्य जीवों के समान जन्म और मृत्यु के चक्र में हैं तो इससे यह अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि उनके भक्तों को मोक्ष कैसे मिल सकता है?
  • प्रसिद्ध 'राम सेतु' को सर्वशक्तिमान कविर्देव की कृपा से बनाया गया था, न कि भगवान राम या हनुमान की शक्तियों द्वारा और न ही नल-नील द्वारा।
  • भगवान राम और सीता ने सच्चे भक्त हनुमान का अपमान किया था जिसके लिए उन्हें भुगतान करना पड़ा।
  • हनुमान, एक महान भक्त थे। सर्वशक्तिमान कबीर जी ने उन्हें मोक्षदायक सच्ची भक्ति प्रदान की थी।
  • सर्वशक्तिमान कबीर जी हनुमान के गुरु थे।
  • महान संत रामपाल जी ने पवित्र धर्मग्रंथों से छिपे आध्यात्मिक तथ्यों को उजागर किया है।
  • सच्ची उपासना और मोक्ष मंत्र केवल तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के पास उपलब्ध हैं। सभी को उन्हें गुरु बनाना चाहिए और अपना उद्धार करवाना चाहिए।