(विस्तृत व सम्पूर्ण वर्णन)

प्रश्न:- कबीर जी के नाम से चले 12 पंथों के वास्तविक मुखिया कौन हैं और तेरहवां पंथ कौन चलाएगा?

उत्तर:- जैसा कि कबीर सागर के संशोधनकर्ता स्वामी युगलानन्द (बिहारी) जी ने दुख व्यक्त किया है कि समय-समय पर कबीर जी के ग्रन्थों से छेड़छाड़ करके उनकी बुरी दशा कर रखी है।

उदाहरण:- परमेश्वर कबीर जी का जोगजीत के रूप में काल ब्रह्म के साथ विवाद हुआ था। वह ‘‘स्वसमवेद बोध‘‘ पृष्ठ 117 से 122 तक तथा ‘‘अनुराग सागर‘‘ 60 से 67 तक है।

परमेश्वर कबीर जी अपने पुत्रा जोगजीत के रूप में काल के प्रथम ब्रह्माण्ड में प्रकट हुए जो इक्कीसवां ब्रह्माण्ड है जहाँ पर तप्त शिला बनी है। काल ब्रह्म ने जोगजीत के साथ झगड़ा किया। फिर विवश होकर चरण पकड़कर क्षमा याचना की तथा प्रतिज्ञा करवाकर कुछ सुविधा माँगी।

1. तीनों युगों (सत्ययुग, त्रोतायुग, द्वापरयुग) में थोड़े जीव पार करना।

2. जोर-जबरदस्ती करके जीव मेरे लोक से न ले जाना। 3ण् आप अपना ज्ञान समझाना। जो आपके ज्ञान को माने, वह आपका और जो मेरे ज्ञान को माने, वह मेरा।

4. कलयुग में पहले मेरे दूत प्रकट होने चाहिऐं, पीछे आपका दूत जाए। 5ण् त्रोतायुग में समुद्र पर पुल बनवाना। उस समय मेरा पुत्रा विष्णु रामचंद्र रूप में लंका के राजा रावण से युद्ध करेगा, समुद्र रास्ता नहीं देगा।

6. द्वापर युग में बौद्ध शरीर त्यागकर जाऊँगा। राजा इन्द्रदमन मेरे नाम से (जगन्नाथ नाम से) समुद्र के किनारे मेरी आज्ञा से मंदिर बनवाना चाहेगा। उसको समुद्र बाधा करेगा। आप उस मंदिर की सुरक्षा करना। परमेश्वर ने सर्व माँगें स्वीकार कर ली और वचनबद्ध हो गए। तब काल ब्रह्म हँसा और कहा कि हे जोगजीत! आप जाओ संसार में। जिस समय कलयुग आएगा। उस समय मैं अपने 12 दूत (नकली सतगुरू) संसार में भेजूँगा। जब कलयुग 5505 वर्ष पूरा होगा, तब तक मेरे दूत तेरे नाम से (कबीर जी के नाम से) 12 कबीर पंथ चला दूँगा। कबीर जी ने जोगजीत रूप में काल ब्रह्म से कहा था कि कलयुग में मेरा नाम कबीर होगा और मैं कबीर नाम से पंथ चलाऊँगा। इसलिए काल ज्योति निरंजन ने कहा था कि आप कबीर नाम से एक पंथ चलाओगे तो मैं (काल) कबीर नाम से 12 पंथ चलाऊँगा। सर्व मानव को भ्रमित करके अपने जाल में फाँसकर रखूँगा। इनके अतिरिक्त और भी कई पंथ चलाऊँगा जो सतलोक, सच्चखण्ड की बातें किया करेंगे तथा सत्य साधना उनके पास नहीं होगी। जिस कारण से वे सत्यलोक की आश में गलत नामों को जाप करके मेरे जाल में ही रह जाऐंगे।

काल ब्रह्म ने पूछा था कि आप किस समय कलयुग में अपना सत्य कबीर पंथ चलाओगे? कबीर जी ने कहा था कि जिस समय कलयुग 5505 (पाँच हजार पाँच सौ पाँच) वर्ष बीत जाएगा, तब मैं अपना यथार्थ तेरहवां कबीर पंथ चलाऊँगा।

काल ने कहा कि उस समय से पहले मैं पूरी पृथ्वी के ऊपर शास्त्राविधि त्यागकर मनमाना आचरण करवाकर शास्त्राविरूद्ध ज्ञान बताकर झूठे नाम तथा गलत साधना के अभ्यस्त कर दूँगा। जब तेरा तेरहवां अंश आकर सत्य कबीर पंथ चलाएगा, उसकी बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा, उल्टे उसके साथ झगड़ा करेंगे। कबीर जी को पता था कि जब कलयुग के 5505 वर्ष पूरे होंगे (सन् 1997 में) तब शिक्षा की क्रांति लाई जाएगी। सर्व मानव अक्षर ज्ञानयुक्त किया जाएगा। उस समय मेरा दास सर्व धार्मिक ग्रन्थों को ठीक से समझकर मानव समाज के रूबरू करेगा। सर्व प्रमाणों को आँखों देखकर शिक्षित मानव सत्य से परिचित होकर तुरंत मेरे तेरहवें पंथ में दीक्षा लेगा और पूरा विश्व मेरे द्वारा बताई भक्ति विधि तथा तत्त्वज्ञान को हृदय से स्वीकार करके भक्ति करेगा। उस समय पुनः सत्ययुग जैसा वातावरण होगा। आपसी रागद्वेष, चोरी-जारी, लूट-ठगी कोई नहीं करेगा। कोई धन संग्रह नहीं करेगा। भक्ति को अधिक महत्त्व दिया जाएगा। जैसे उस समय उस व्यक्ति को महान माना जा रहा होगा जिसके पास अधिक धन होगा, बड़ा व्यवसाय होगा, बड़ी-बड़ी कोठियाँ बना रखी होंगी, परंतु 13वें पंथ के प्रारम्भ होने के पश्चात् उन व्यक्तियों को मूर्ख माना जाएगा और जो भक्ति करेंगे, सामान्य मकान बनाकर रहेंगे, उनको महान, बड़े और सम्मानित व्यक्ति माना जाएगा।

‘‘प्रमाण के लिए पवित्र कबीर सागर से भिन्न-भिन्न अध्यायों से अमृत बानी’’

‘‘कबीर जी तथा ज्योति निरंजन की वार्ता‘‘

अनुराग सागर के पृष्ठ 62 से:-

‘‘धर्मराय (ज्योति निरंजन) वचन‘‘

धर्मराय अस विनती ठानी। मैं सेवक द्वितीया न जानी।।1
ज्ञानी बिनती एक हमारा। सो न करहू जिह से हो मोर बिगारा।।2
पुरूष दीन्ह जस मोकहं राजु। तुम भी देहहु तो होवे मम काजु।।3
अब मैं वचन तुम्हरो मानी। लीजो हंसा हम सो ज्ञानी।।4

पृष्ठ 63 से अनुराग सागर की वाणी:-

दयावन्त तुम साहेब दाता। ऐतिक कृपा करो हो ताता।।5
पुरूष शाॅप मोकहं दीन्हा। लख जीव नित ग्रासन कीन्हा।।6

पृष्ठ 64 से अनुराग सागर की वाणी:-

जो जीव सकल लोक तव आवै। कैसे क्षुधा मोर मिटावै।।7
जैसे पुरूष कृपा मोपे कीन्हा। भौसागर का राज मोहे दीन्हा।।8
तुम भी कृपा मोपर करहु। जो माँगे सो मोहे देहो बरहु।।9
सतयुग, त्रोता, द्वापर मांहीं। तीनों युग जीव थोड़े जाहीं।।10
चैथा युग जब कलयुग आवै। तब तव शण जीव बहु जावै।।11

पृष्ठ 65 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 3 से:-

प्रथम दूत मम प्रकटै जाई। पीछे अंश तुम्हारा आई।।12

पृष्ठ 64 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 6:-

ऐसा वचन हरि मोहे दीजै। तब संसार गवन तव कीजै।।13

‘‘जोगजीत वचन=ज्ञानी बचन‘‘

पृष्ठ 64 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 7:-

अरे काल तुम परपंच पसारा। तीनों युग जीवन दुख डारा।।14
बीनती तोरी लीन्ह मैं जानि। मोकहं ठगा काल अभिमानी।।15
जस बीनती तू मोसन कीन्ही। सो अब बख्स तोहे दीन्ही।।16
चैथा युग जब कलयुग आवै। तब हम अपना अंश पठावैं।।17

‘‘धर्मराय (काल) वचन‘‘

पृष्ठ 64 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 17:-

हे साहिब तुम पंथ चलाऊ। जीव उबार लोक लै जाऊ।।18

पृष्ठ 66 से अनुराग सागर की वाणी, ऊपर से वाणी पंक्ति नं. 8ए 9ए 16 से 21ः-

सन्धि छाप (सार शब्द) मोहे दिजे ज्ञानी। जैसे देवोंगे हंस सहदानी।।19
जो जन मोकूं संधि (सार शब्द) बतावै। ताके निकट काल नहीं आवै।।20
कहै धर्मराय जाओ संसारा। आनहु जीव नाम आधारा।।21
जो हंसा तुम्हरे गुण गावै। ताहि निकट हम नहीं जावैं।।22
जो कोई लेहै शरण तुम्हारी। मम सिर पग दै होवै पारी।।23
हम तो तुम संग कीन्ह ढ़िठाई। तात जान किन्ही लड़काइ।।24
कोटिन अवगुन बालक करही। पिता एक चित नहीं धरही।।25
जो पिता बालक कूं देहै निकारी। तब को रक्षा करै हमारी।।26
सारनाम देखो जेहि साथा। ताहि हंस मैं नीवाऊँ माथा।।27

ज्ञानी (कबीर) वचन

अनुराग सागर पृष्ठ 66:-

जो तोहि देहुं संधि बताई। तो तूं जीवन को हइहो दुखदाई।।28
तुम परपंच जान हम पावा। काल चलै नहीं तुम्हरा दावा।।29
धर्मराय तोहि प्रकट भाखा। गुप्त अंक बीरा हम राखा।।30
जो कोई लेई नाम हमारा। ताहि छोड़ तुम हो जाना नियारा।।31
जो तुम मोर हंस को रोको भाई। तो तुम काल रहन नहीं पाई।।32

‘‘धर्मराय (काल निरंजन) बचन‘‘

पृष्ठ 62 तथा 63 से अनुराग सागर की वाणी:-

बेसक जाओ ज्ञानी संसारा। जीव न मानै कहा तुम्हारा।।33
कहा तुम्हारा जीव ना मानै। हमरी और होय बाद बखानै।।34
दृढ़ फंदा मैं रचा बनाई। जामें सकल जीव उरझाई।।35
वेद-शास्त्रा समर्ति गुणगाना। पुत्रा मेरे तीन प्रधाना।।36
तीनहू बहु बाजी रचि राखा। हमरी महिमा ज्ञान मुख भाखा।।37
देवल देव पाषाण पुजाई। तीर्थ व्रत जप तप मन लाई।।38
पूजा विश्व देव अराधी। यह मति जीवों को राखा बाँधि।।39
जग (यज्ञ) होम और नेम आचारा। और अनेक फंद मैं डारा।।40

‘‘ज्ञानी (कबीर) वचन‘‘

हमने कहा सुनो अन्याई। काटों फंद जीव ले जांई।।41
जेते फंद तुम रचे विचारी। सत्य शब्द ते सबै विडारी।।42
जौन जीव हम शब्द दृढ़ावैं। फंद तुम्हारा सकल मुक्तावैं।।43
जबही जीव चिन्ही ज्ञान हमारा। तजही भ्रम सब तोर पसारा।।44
सत्यनाम जीवन समझावैं। हंस उभार लोक लै जावै।।45
पुरूष सुमिरन सार बीरा, नाम अविचल जनावहूँ।
शीश तुम्हारे पाँव देके, हंस लोक पठावहूँ।।46
ताके निकट काल नहीं आवै। संधि देख ताको सिर नावै।।48

(संधि = सत्यनाम+सारनाम)

‘‘धर्मराय (काल) वचन‘‘

पंथ एक तुम आप चलऊ। जीवन को सतलोक लै जाऊ।।49
द्वादश पंथ करूँ मैं साजा। नाम तुम्हारा ले करों आवाजा।।50
द्वादश यम संसार पठाऊँ। नाम कबीर ले पंथ चलाऊँ।।51
प्रथम दूत मेरे प्रगटै जाई। पीछे अंश तुम्हारा आई।।52
यहि विधि जीवन को भ्रमाऊँ। आपन नाम पुरूष का बताऊँ।।53
द्वादश पंथ नाम जो लैहि। हमरे मुख में आन समैहि।।54

‘‘ज्ञानी (कबीर) वचन‘‘ चैपाई

अध्याय ‘‘स्वसमवेद बोध‘‘ पृष्ठ 121:-

अरे काल परपंच पसारा। तीनों युग जीवन दुख आधारा।।55
बीनती तोरी लीन मैं मानी। मोकहं ठगे काल अभिमानी।।56
चैथा युग जब कलयुग आई। तब हम अपना अंश पठाई।।57
काल फंद छूटै नर लोई। सकल सृष्टि परवानिक (दीक्षित) होई।।58
घर-घर देखो बोध (ज्ञान) बिचारा (चर्चा)। सत्यनाम सब ठोर उचारा।।59
पाँच हजार पाँच सौ पाँचा। तब यह वचन होयगा साचा।।60
कलयुग बीत जाए जब ऐता। सब जीव परम पुरूष पद चेता।।61

भावार्थ:- (वाणी सँख्या 55 से 61 तक) परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे काल! तूने विशाल प्रपंच रच रखा है। तीनों युगों (सतयुग, त्रोता, द्वापर) में जीवों को बहुत कष्ट देगा। जैसा तू कह रहा है। तूने मेरे से प्रार्थना की थी, वह मान ली। तूने मेरे साथ धोखा किया है, परतुं चैथा युग जब कलयुग आएगा, तब मैं अपना अंश यानि कृपा पात्रा आत्मा भेजूँगा। हे काल! तेरे द्वारा बनाए सर्व फंद यानि अज्ञान आधार से गलत ज्ञान व साधना को सत्य शब्द तथा सत्य ज्ञान से समाप्त करेगा। उस समय पूरा विश्व प्रवानिक यानि उस मेरे संत से दीक्षा लेकर दीक्षित होगा। उस समय तक यानि जब तक कलयुग पाँच हजार पाँच सौ पाँच नहीं बीत जाता, सत्यनाम, मूल नाम (सार शब्द) तथा मूल ज्ञान (तत्त्वज्ञान) प्रकट नहीं करना है। परंतु जब कलयुग पाँच हजार पाँच सौ पाँच वर्ष पूरा हो जाएगा, तब घर-घर में मेरे अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा हुआ करेगी और सत्यनाम, सार शब्द को सब उपदेशियों को प्रदान किया जाएगा। यह जो बात मैं कह रहा हूँ, ये मेरे वचन उस समय सिद्ध होंगे, जब कलयुग के 5505 (पाँच हजार पाँच सौ पाँच) वर्ष पूरे हो जाऐंगे। जब कलयुग इतने वर्ष बीत जाएगा। तब सर्व मानव प्राणी परम पुरूष यानि सत्य पुरूष के पद अर्थात् उस परम पद के जानकार हो जाऐंगे जिसके विषय में गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा है कि तत्त्वदर्शी संत के प्राप्त होने के पश्चात् साधक लौटकर संसार में कभी नहीं आते। जिस परमेश्वर ने संसार रूपी वृक्ष का विस्तार किया है अर्थात् जिस परमेश्वर ने सृष्टि की रचना की है, उस परमेश्वर की भक्ति करो।

उपरोक्त वाणी का भावार्थ है कि उस समय उस परमेश्वर के पद (सत्यलोक) के विषय में सबको पूर्ण ज्ञान होगा।

स्वसमवेद बोध पृष्ठ 170:-

अथ स्वसम वेद की स्फुटवार्ता-चैपाई

क लाख और असि हजारा। पीर पैगंबर और अवतारा।।62
सो सब आही निरंजन वंशा। तन धरी-धरी करैं निज पिता प्रशंसा।।63
दश अवतार निरंजन के रे। राम कृष्ण सब आहीं बडेरे।।64
इनसे बड़ा ज्योति निरंजन सोई। यामें फेर बदल नहीं कोई।।65

भावार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने बताया है कि बाबा आदम से लेकर हजरत मुहम्मद तक कुल एक लाख अस्सी हजार (1.80.000) पैगंबर तथा दस अवतार जो हिन्दु मानते हैं, ये सब काल के भेजे आए हैं। इन दस अवतारों में राम तथा कृष्ण प्रमुख हैं। ये सब काल की महिमा बनाकर सर्व जीवों को भ्रमित करके काल साधना दृढ़ कर गए हैं। इस सबका मुखिया ज्योति निरंजन काल (ब्रह्म) है।

स्वसमवेद बोध पृष्ठ 171(1515):-

सत्य कबीर वचन

दोहे:- पाँच हजार अरू पाँच सौ पाँच जब कलयुग बीत जाय।
महापुरूष फरमान तब, जग तारन कूं आय।।66
हिन्दु तुर्क आदि सबै, जेते जीव जहान।
सत्य नाम की साख गही, पावैं पद निर्वान।।67
यथा सरितगण आप ही, मिलैं सिन्धु मैं धाय।
सत्य सुकृत के मध्य तिमि, सब ही पंथ समाय।।68
जब लग पूर्ण होय नहीं, ठीक का तिथि बार।
कपट-चातुरी तबहि लौं, स्वसम बेद निरधार।।69
सबही नारी-नर शुद्ध तब, जब ठीक का दिन आवंत।
कपट चातुरी छोड़ि के, शरण कबीर गहंत।।70
एक अनेक ह्नै गए, पुनः अनेक हों एक।
हंस चलै सतलोक सब, सत्यनाम की टेक।।71
घर घर बोध विचार हो, दुर्मति दूर बहाय।
कलयुग में सब एक होई, बरतें सहज सुभाय।।72
कहाँ उग्र कहाँ शुद्र हो, हरै सबकी भव पीर(पीड़)।।73
सो समान समदृष्टि है, समर्थ सत्य कबीर।।74

भावार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने बताया है कि हे धर्मदास! मैंने ज्योति निरंजन यानि काल ब्रह्म से भी कहा था, अब आपको भी बता रहा हूँ। स्वसमबेद बोध की वाणी सँख्या 66 से 74 का सरलार्थ:- जिस समय कलयुग पाँच हजार पाँच सौ पाँच वर्ष बीत जाएगा, तब एक महापुरूष विश्व को पार करने के लिए आएगा। हिन्दु, मुसलमान आदि-आदि जितने भी पंथ तब तक बनेंगे और जितने जीव संसार में हैं, वे मानव शरीर प्राप्त करके उस महापुरूष से सत्यनाम लेकर सत्यनाम की शक्ति से मोक्ष प्राप्त करेंगे। वह महापुरूष जो सत्य कबीर पंथ चलाएगा, उस (तेरहवें) पंथ में सब पंथ स्वतः ऐसे तीव्र गति से समा जाएंगे जैसे भिन्न-भिन्न नदियाँ अपने आप निर्बाध दौड़कर समुद्र में गिर जाती है। उनको कोई रोक नहीं पाता। ऐसे उस तेरहवें पंथ में सब पंथ शीघ्रता से मिलकर एक पंथ बन जाएगा। परंतु जब तक ठीक का समय नहीं आएगा यानि कलयुग पाँच हजार पाँच सौ पाँच वर्ष पूरे नहीं करता, तब तक मैं जो यह ज्ञान स्वसमवेद में बोल रहा हूँ, आप लिख रहे हो, निराधार लगेगा।

जिस समय वह निर्धारित समय आएगा। उस समय स्त्राी-पुरूष उच्च विचारों तथा शुद्ध आचरण के होकर कपट, व्यर्थ की चतुराई त्यागकर मेरी (कबीर जी की) शरण ग्रहण करेंगे। परमात्मा से लाभ लेने के लिए एक ‘‘मानव‘‘ धर्म से अनेक पंथ (धार्मिक समुदाय) बन गए हैं, वे सब पुनः एक हो जाएंगे। सब हंस (निर्विकार भक्त) आत्माऐं सत्य नाम की शक्ति से सतलोक चले जाएंगे। मेरे अध्यात्म ज्ञान की चर्चा घर-घर में होगी। जिस कारण से सबकी दुर्मति समाप्त हो जाएगी। कलयुग में फिर एक होकर सहज बर्ताव करेंगे यानि शांतिपूर्वक जीवन जीएंगे। कहाँ उग्र अर्थात् चाहे डाकू, लुटेरा, कसाई हो, चाहे शुद्र, अन्य बुराई करने वाला नीच होगा। परमात्मा सत्य भक्ति करने वालों की भवपीर यानि सांसारिक कष्ट हरेगा यानि दूर करेगा। सत्य साधना से सबकी भवपीर यानि संसारिक कष्ट समाप्त हो जाएंगे और उस 13वें (तेरहवें) पंथ का प्रवर्तक सबको समान दृष्टि से देखेगा अर्थात् ऊँच-नीच में भेदभाव नहीं करेगा। वह समर्थ सत्य कबीर ही होगा। (मम् सन्त मुझे जान मेरा ही स्वरूपम्)

प्रश्न:- वह तेरहवां पंथ कौन-सा है, उसका प्रवर्तक कौन है?

उत्तर:- वह तेरहवां पंथ ‘‘यथार्थ सत कबीर‘‘ पंथ है। उसके प्रवर्तक स्वयं कबीर परमेश्वर जी हैं। वर्तमान में उसका संचालक उनका गुलाम रामपाल दास पुत्र स्वामी रामदेवानंद जी महाराज है। (अध्यात्मिक दृष्टि से गुरू जी पिता माने जाते हैं जो आत्मा का पोषण करते हैं।)

प्रमाण:- वैसे तो संत धर्मदास जी की वंश परंपरा वाले महंतो से जुड़े श्रद्धालुओं ने अज्ञानतावश तेरहवां पंथ और संचालक धर्मदास की बिन्द (परिवार) की धारा वालों को सिद्ध करने की कुचेष्टा की है। परंतु हाथी के वस्त्रा को भैंसे पर डालकर कोई कहे कि देखो यह वस्त्रा भैंसे का है। बुद्धिमान तो तुरंत समझ जाते हैं कि यह भैंसा का वस्त्रा नहीं है। यह तो भैंसे से कई गुणा लंबे-चैड़े पशु का है। भले ही वे ये न बता सकें कि यह हाथी का है।

उदाहरण:- पवित्र कबीर सागर के अध्याय ‘‘कबीर चरित्रा बोध‘‘ के पृष्ठ 1834.1835 पर लिखा है।