अनुराग सागर के पृष्ठ 6 से वाणी नं. 7 से 17

धर्मदास वचन

मृतक भाव प्रभु कहो बुझाई। जाते मनकी तपनि नसाई।।
केहि विधि मृतक हो यह जीवन। कहो विलोय नाथ अमृतधन।।
कबीर वचन-मृतक के दृष्टांत (उदाहरण)
धर्मदास यह कठिन कहानी। गुरूगम ते कोई विरले जानी।।

भृंगी का दृष्टांत (उदाहरण)

मृतक होय के खोजहिं संता। शब्द विचारि गहैं मगु अन्ता।।
जैसे भृंग कीट के पासा। कीट गहो भृंग शब्द की आशा।।
शब्द घातकर तेही महैं डारे। भृंगी शब्द कीट जो धारे।।
तब लैगौ भृंगी निज गेहा। स्वाती देह कीन्हो समदेहा।।
भृंगी शब्द कीट जो माना। वरण फेर आपन करजाना।।
बिरला कीट जो होय सुखदाई। प्रथम अवाज गहे चितलाई।।
कोइ दूजे कोइ तीजे मानै। तन मन रहित शब्द हित जानै।।
भृंगी शब्द कीट ना गहई। तौ पुनि कीट आसरे रहई।।
एक दिन कीट गहेसी भृंग भाषा। वरण बदलै पूरवै आशा।।

‘मृतक के और दृष्टांत‘‘

(अनुराग सागर के पृष्ठ 7 से वाणी नं. 7 से 20)

सुनहु संत यह मृतक सुभाऊ। बिरला जीव पीव मग धाऊ।।
औरै सुनहु मृतक का भेवा। मृतक होय सतगुरू पद सेवा।।
मृतक छोह तजै शब्द उरधारे। छोह तजै तो जीव उबारे।।

पृथ्वी का दृष्टांत

जस पृथ्वी के गंजन होई। चित अनुमान गहे गुण सोई।।
कोई चन्दन कोई विष्टा डारे। कोई कोई कृषि अनुसारे।।
गुण औगुण तिन समकर जाना। तज विरोध अधिक सुखमाना।।

ऊख का दृष्टांत

औरो मृतक भाव सुनि लेहू। निरखि परखि गुरू मगु पगु देहू।।
जैसे ईख किसान उगावै। रती रती कर देह कटावे।।
कोल्हू महँ पुनि ताही पिरावै। पुनि कड़ाह में खूब उँटावे।।
निज तनु दाहे गुड़ तब होई। बहुरि ताव दे खांड विलोई।।
ताहू मांहि ताव पुनि दीन्हा। चीनी तबै कहावन लीन्हा।।
चीनी होय बहुरित तन जारा। ताते मिसरी ह्नै अनुसारा।।
मिसरीते जब कंद कहावा। कहे कबीर सबके मन भावा।।
यही विधिते जो शिष करही। गुरू कृपा सहजे भव तरई।।

भावार्थ:- अनुराग सागर पृष्ठ 6 पर लिखी पंक्ति नं. 7 से 17 तक का भावार्थ है कि धनी धर्मदास जी ने परमेश्वर कबीर जी से विनयपूर्वक प्रश्न किया कि हे प्रभु! मुझे मृतक का स्वभाव समझाओ कैसा होता है? किस प्रकार जीवित मरना होता है। हे अमर परमात्मा! हे स्वामी! कृप्या बिलोय अर्थात् निष्कर्ष निकालकर वह अमृत धन अर्थात् अमर होने का मार्ग बताऐं।

परमेश्वर कबीर वचन = मृतक के दृष्टान्त

परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे धर्मदास! यह जो प्रश्न आपने किया है, यह जटिल कथा प्रसंग है। सतगुरू शरण में रहकर ज्ञान का इच्छुक ही इसको समझकर खरा उतरता है।

भृंगी का दृष्टांत

संत-साधकजन जीवित मृतक होकर परमात्मा को खोजते हैं। शब्द विचार यानि यथार्थ नाम मंत्रों को समझ विचार करके उस मार्ग के अंत यानि अंतिम छोर तक पहुँचते हैं अर्थात् पूर्ण मोक्ष प्राप्त करते हैं।

जैसे एक भृंग (पंखों वाला नीले रंग का कीड़ा) होता है जिसे भंभीरी कहते हैं जिसको इन्जनहारी आदि-आदि नामों से जाना जाता है जो भीं-भीं की आवाज करती रहती है। वह अपना परिवार नर-मादा के मिलन वाली विधि से उत्पन्न नहीं करती। वह एक कीट (कीड़े) विशेष के पास जाती है। उसके पास अपनी भीं-भीं की आवाज करती है। जो कीड़ा उसकी आवाज से प्रभावित हो जाता है। उसको उठाकर पहले से तैयार किया मिट्टी के घर में ले जाती है। वह गोल आकार का दो इंच परिधि का एक-दो मुख वाला गारा का बना होता है। फिर दूसरा-तीसरा ले जाती है। फिर उनके ऊपर अपनी भीं-भीं की आवाज करती रहती है। फिर औस के जल को अपने मुख से लाकर उन कीटों के मुख में डालती है। उस भंभीरी यानि भंृग की बार-बार आवाज को सुनकर वह कीट उसी रंग का हो जाता है तथा उसी तरह पंख निकल आते हैं। वह आवाज भी उसी की तरह भीं-भीं करने लगता है। भंभीरी ही बन जाती है। इसी प्रकार पूर्ण संत अपने ज्ञान को भंभीरी की तरह बार-बार बोलकर सामान्य व्यक्ति को भी भक्त बना लेता है। फिर वह भक्त भी सतगुरू से सुने ज्ञान को अन्य व्यक्तियों को सुनाने लगता है। संसार की रीति-रिवाजों को त्याग देने से अन्य व्यक्ति कहते हैं कि इसका रंग-ढ़ंग बदल गया है। यह तो भक्त बन गया है। जैसे भृंग (भंभीरी) कीटों को अपनी आवाज सुनाती है तो कोई शीघ्र सक्रिय हो जाता है, कोई दूसरी, कोई तीसरी बार कोशिश करने से मानता है। इसी प्रकार जब सतगुरू कुछ व्यक्तियों को अपना सत्संग रह-रहकर सुनाते हैं तो कोई अच्छे संस्कार वाला तो शीघ्र मान जाता है, कोई एक-दो बार फिर सत्संग सुनकर मार्ग ग्रहण कर लेता है, दीक्षा ले लेता है। कुछ कीट ऐसे होते हैं, कई दिनों के पश्चात् अपना स्वभाव बदलते हैं। यदि वह कीट भृंगी नहीं बना है और उस भृंग कीट की शरण में रह रहा है तो अवश्य एक दिन परिवर्तन होगा। परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे धर्मदास! यदि शिष्य इसी प्रकार गुरू जी के विचारों को सुनता रहेगा तो उस भृंग कीट की तरह प्रभावित होकर संसारिक भाव बदलकर भक्त बनकर हंस दशा को प्राप्त होगा।

पृष्ठ 7 से पंक्ति 7 से 20 तक का भावार्थ:-

कबीर जी ने कहा कि हे संतो! सुनो यह मृतक का स्वभाव। इस प्रकार कोई बिरला जीव ही अनुसरण करता है। वह पीव यानि परमात्मा को प्राप्त करने का मग यानि मार्ग प्राप्त करता है। उपरोक्त यानि भृंग वाले उदाहरण के अतिरिक्त और सुनो मृतक का भाव जिससे मृतक यानि जीवित मृतक होकर सतगुरू के पद (पद्यति) के अनुसार साधना करता है।

पृथ्वी का उदाहरण

जैसे पृथ्वी में सहनशीलता होती है। इसी प्रकार पृथ्वी वाले गुण को जो ग्रहण करेगा, वह जीवित मृतक है और वही सफल होता है। पृथ्वी के ऊपर कोई बिष्टा (टट्टी) करता है। डालता है, कोई खेती करता है तो चीरफाड़ करता है। कोई-कोई धरती पूजन करता है। पृथ्वी गुण-अवगुण नहीं देखती। जिसकी जैसी भावना है, वह वैसा ही करता है। यह विचार करके धरती विरोध न करके सुखी रहती है।

भावार्थ है कि जैसे जमीन सहनशील है, वैसे ही भक्त-संत का स्वभाव होना चाहिए। चाहे कोई गलत कहे कि यह क्या कर रहे हो यानि अपमान करे, चाहे कोई सम्मान करे, अपने उद्देश्य पर दृढ़ रहकर भक्त सफलता प्राप्त करता है।

उख (ईख यानि गन्ने) का दृष्टांत

जैसे किसान ईख बीजता है। उस समय गन्ने के एक-एक फुट के टुकड़े करके धरती में दबा देता है। ईख गन्ना बनने के पश्चात् कोल्हु में पीड़ा जाता है। फिर रस को कड़ाहे में अग्नि की आँच में उबाला जाता है। तब गुड़ बनता है। यदि अधिक ताव गन्ने के रस को दिया जाता है तो वह खांड बन जाता है जो गुड़ से भी स्वादिष्ट होती है। और अधिक ताव देने से चीनी बन जाती है। और भी अधिक गर्म किया जाता है तो मिश्री बन जाता है। फिर मिसरी से कंद बन जाता है। परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि हे धर्मदास! इस प्रकार यदि शिष्य भक्ति मार्ग में कठिनाईयां सहन करता है तो उतना ही परमात्मा का प्रिय बहुमुल्य होता चला जाता है।

अनुराग सागर के पृष्ठ 8 तथा 9 का सारांश है कि साधक वही है जो अपनी सर्व इन्द्रियों को संयम में रखता है। जैसा मिल जाए, उसी में संतोष करे। रूप को देखकर उस पर आकर्षित नहीं होवे। कुरूप को देखकर घृणा न करे। दोनों को दिव्य ज्ञान की नजरों से देखे कि ऊपर का चाम गोरा-काला है, शरीर में हाड-माँस सब एक जैसा है तथा जरा-सा रोग होने पर गल जाता है, सडांद (बदबू) मारने लगती है। इस प्रकार विवेक से भक्ति करे। यदि कोई सम्मान करता है, प्यार से बोलता है तो खुशी महसूस न करें। यदि कोई कुबोल (कुवचन) कहता है तो दुःख न मानें। उनकी बुद्धि के स्तर को जानकर शांत रहें। यदि कोई अच्छा भोजन खीर-खाण्ड, हलवा-पूरी खिलाता है तो उसी कारण उससे प्रभावित न हों। उसको उसका कर्म का फल मिलेगा। यदि कोई रूखा-सूखा भोजन खिलाए तो उसको अधिक भाव से प्रेम से खाना चाहिए। काम वासना (ैमग) को महत्त्व न दें, वही भक्त वास्तव में परमेश्वर प्राप्ति कर सकता है। यदि काम वासना परेशान करे तो उसको भक्ति नाम स्मरण में लगाकर आनंद प्राप्त करें। उसी समय काम वासना मुरझा जाती है। काम वासना का नाश करने का तरीका:-

कबीर, परनारी को देखिये, बहन बेटी का भाव।
कह कबीर काम नाश का, यही सहज उपाय।।

मोक्ष प्राप्ति का अन्य भाव ‘‘अनल (अलल) पक्षी जैसा भाव‘‘

जैसे एक अनल पक्षी (अलल पंख) आकाश में रहता था। यह पक्षी अब लुप्त हो चुका है। इसके चार पैर होते थे। आगे वाले छोटे और पीछे वाले बड़े। इसका आकार बहुत बड़ा होता था। लम्बे-लम्बे पंख होते थे। पूरा पक्षी यानि युवा पक्षी चार हाथियों को एक साथ उठाकर आकाश में अपने परिवार के पास ले जाता था। अनल पक्षी (अलल पक्षी) ऊपर वायु में रहता था। वहीं से मादा अनल अण्डे उत्पन्न कर देती थी। वह अण्डे उस स्थान पर छोड़ती थी जहाँ केले का वन होता था। केले एक-दूसरे में फँसकर गहरा वन बना लेते थे। हाथियों का झुण्ड (समूह) यानि सैंकड़ों हाथी भी केले के वन में रहते थे क्योंकि हाथी केले के पेड़ खा जाता है तथा केले के पेड़ों पर ही लेट जाता है। मस्ती करता रहता है। अलल पक्षी का अण्डा वायुमंडल से गुजरकर नीचे पृथ्वी तक आने में हवा के घर्षण से पककर बच्चा तैयार हो जाता था। वह अण्डा केले के पेड़ों के ऊपर गिरता था। केले के पेड़ों की सघनता के कारण वह अण्डा क्षतिग्रस्त नहीं होता था। केवल इतनी गति से केले के पेड़ों को तोड़कर पृथ्वी पर गिरता था कि अण्डा फूट जाए। अण्डे का आकार बहुत बड़ा होता था। उसका कवर भी सख्त मजबूत होता था। बच्चे के बचाव के लिए अण्डे के कवर तथा बच्चे के बीच में गद्देदार पदार्थ होता था जो पृथ्वी के ऊपर गिरते समय बच्चे को चोट लगने से बचाता था। अनल पक्षी का बच्चा पृथ्वी पर अन्य पक्षियों के बच्चों के साथ रहता था। उनसे मिलकर उड़ता था, परंतु उसकी अंतरआत्मा यह मानती थी कि यह मेरा घर-परिवार नहीं है, मेरा परिवार तो ऊपर है। मैंने ऊपर अपने परिवार में जाना है। यह मेरा संसार नहीं है। वह जब युवा हो जाता है तो हाथियों के झुण्ड पर झपट्टा मारता था। चार हाथियों को चारों पंजों से उठाता था तथा एक हाथी को चैंच से पकड़कर उड़ जाता था। अपने परिवार के पास चला जाता था। साथ में उनके लिए आहार भी ले जाता था। 

कबीर परमेश्वर जी ने सटीक उदाहरण बताकर भक्त को मार्गदर्शन किया है कि आप इस संसार के स्थाई वासी नहीं हैं। आपको यह छोड़कर जाना है। आपका परिवार ऊपर सत्यलोक में है। आप इस पृथ्वी के ऊपर गिरे हो। तत्त्वज्ञान प्राप्त भक्त के मन की दशा उस अनल (अलल) पक्षी के बच्चे जैसी होनी चाहिए। जब तक सतलोक जाने का समय नहीं आता तो सांसारिक व्यक्तियों के साथ मिलकर शिष्टाचार से रहो। चलते समय इनमें कोई लगाव नहीं रहना चाहिए। अपनी नाम-स्मरण की कमाई तथा पुण्य धर्म की कमाई साथ लेकर उड़ जाना है। अपने परिवार के पास अपने निज घर सतलोक में जाना है।

अनुराग सागर के पृष्ठ 152 का सारांश:-

इस पृष्ठ पर परमेश्वर ने शरीर के अंदर का गुप्त भेद बताया है। इस मानव शरीर में 72 नाड़ियां हैं। उनमें तीन (ईड़ा, पिंगला, सुष्मणा) मुख्य हैं। फिर एक विशेष नाड़ी है ‘‘ब्रह्म रन्द्र‘‘

परमेश्वर कबीर जी ने बताया है कि धर्मदास! मन ही ज्योति निरंजन है।

इसने जीव को ऐसे नचा रखा है जैसे बाजीगर मर्कट (बंदर) को नचाता है। इस शरीर में 5 तत्त्व 25 प्रकृति तथा तीन गुण काल के तीन एजेंट हैं। जीव को धोखे में रखते हैं। इस शरीर में काल निरंजन तथा जीव दोनों की मुख्य भूमिका है। काल निरंजन मन रूप में सब पाप करवाता है। पाप जीव के सिर रख देता है।

अनुराग सागर के पृष्ठ 153 का सारांश:-

काल ने ऐसा धोखा कर रखा है कि जीव परमेश्वर को भूल गया है।