उत्तर:- जो चरित्राहीन लड़के-लड़की होते हैं, वे चलते समय अजीबो-गरीब ऐक्टिंग करते हैं। उन लजमारों की दृष्टि भी टेढ़ी-मेढ़ी चलती है। कभी बनावटी मुस्कराना। मुड़-मुड़कर आगे-पीछे देखना। चटक-मटककर चलना उन पापात्माओं का शौक होता है जो अंत में प्रेम विवाह का रूप बन जाता है। बाद में उनको पता चलता है कि दोनों के अन्य भी प्रेमी-प्रमिकाऐं थी। फिर उनकी दशा भगवान शिवजी-पार्वती वाली होती है। न घर के रहते हैं, न घाट के। विवाह करने का उद्देश्य ऊपर बता दिया है। इससे हटकर जो भी कदम युवा उठाते हैं, वह जीवन सफर को नरक बनाने वाला होता है। यदि किसी का प्रेम सम्बन्ध भी बन जाए तो इस बात का ध्यान अवश्य रखे कि अपने समाज की मर्यादा (जैसे गोत्रा, गाँव तथा विवाह क्षेत्रा) भंग न होती हो जिससे कुल व माता-पिता की इज्जत को ठेस पहुँचे। गलती से ऐसा हो भी जाए और बाद में पता चले तो लड़के-लड़की को चाहिए कि तुरंत उस प्रेम को तोड़ दें। अंतरजातिय विवाह वर्तमान में करने में कोई हानि नहीं है, परंतु उपरोक्त मर्यादा का ध्यान अवश्य रखें। भगवान शिव जी ने भी देवी पार्वती को इसी कारण से त्यागा था। कथा इस प्रकार है:-