तम्बाकू यानि हुक्का पीने वालों की स्थिति बताई है:-

(संत गरीबदास जी के ग्रन्थ में ‘अथ तमाखू की बैंत’ नामक अध्याय में)

पित बाई खांसी निबासी निबास। कफ दल कलेजा लिया है गिरास।।
काला तमाखू अरू गोरा पिवाक। दस बीस लंगर जहाँ बैठे गुटाक।।
बाजे नै गुड़ गुड़ अरू हुक्के हजूम। कोरे कुबुद्धि बीसा हैं न सूम।।
बांकी पगड़ी अरू बांकी ही नै खुद डूबै अरू डुबोए है कै।
गुटाकड़ अटाकड़ मटाकड़ लहूर। एक बेठैगा अड़कर एक बेठैगा दूर।।
पीवै तमाखू पड़ै कर्म मार। अमली के मुख में मुत्रा की धार।।
कड़वा ही कड़वा तू करता हमेश। कड़वा ही ले प्यारे कड़वा ही पेश।।
कामी क्रोधी तूं लोभी लबूट। बचन मान मेरा धूंमा न घूंट।।
हुक्का हरामी गुलामी गुलाम। धनी के सरे में न पहुँचे अलाम।।
पामर परम धाम जाते न कोई। झूठे अमल पर दई जान खोई।।
मुरदा मजावर हरामी हराम। पीवैं तमाखू सो इन्द्री के गुलाम।।
अज्ञान नींद न सो उठ जाग, पीवैं तमाखू गए फुटि भाग।।
भांग तमाखू पीवैं ही, सुरापान से हेत। गोसत मिट्टी खायकर जंगली बनैं प्रेत।।
गरीब, पान तमाखू चाबहीं, सांस नाक में देत। सो तो अकार्थ गए, ज्यों भड़भूजे का रेत।।
भांग तमाखू पीवहीं, गोसत गला कबाब। मोर मृग कूं भखत हैं, देंगे कहां जवाब।।
भांग तमाखू पीवते, चिसम्यों नालि तमाम। साहिब तेरी साहिबी, जानें कहाँ गुलाम।।
गऊ आपनी अम्मा है, इस पर छुरी ना बाहय। गरीबदास घी दूध को, सब ही आत्म खाय।।

भावार्थ:- उपरोक्त वाणियों का भावार्थ है कि मानव शरीर को आॅक्सीजन की आवश्यकता है। उसके स्थान पर तम्बाकू का धुँआ (कार्बनडाईआॅक्साइड) प्रवेश करता है तो उनको खाँसी रोग हो जाता है। पित्त तथा बाई (बाय) का रोग हो जाता है। हुक्का पीने वाले का बैठने का स्टाईल बताया है कि हुक्का पीने वाले एक-दो तो हुक्के के निकट बैठेंगे। एक कुछ दूरी पर बैठेगा और कहेगा कि सरकाइये थोड़ा-सा। दूसरे उसकी ओर हुक्का देंगे। फिर नै (नली जिससे धँुआ खींचते हैं) गुरड़-गुरड़ बाजैगी। आप तो हुक्का पीकर डूबे हैं और छोटे बच्चे भी उनको देखकर वही पाप करके नरक की काली धार में डूबेंगे, जो तम्बाकू पीते हैं, उनके तो भाग फूटे ही हैं। अन्य को तम्बाकू पीने के लिए उत्प्रेरक बनकर डुबोते हैं। उपरोक्त बुराई करने वाले तो अपना जीवन ऐसे व्यर्थ कर जाते हैं जैसे भड़भूजा बालु रेत को आग से खूब गर्म करके चने भूनता है। फिर सारा कार्य करके रेत को गली में फैंक देता है। इसी प्रकार जो मानव उपरोक्त बुराई करता है, वह भी अपने मानव जीवन को इसी प्रकार व्यर्थ करके चला जाता है। उस जीव को नरक तथा अन्य प्राणियों के जीवन रूपी गली में फैंक दिया जाता है। जो व्यक्ति उपरोक्त पाप करते हैं, वे भगवान के दरबार में क्या जवाब देंगे यानि बोलने योग्य नहीं रहेंगे।

फिर कहा है कि गाय अपनी माता के तुल्य है जिसका सब धर्म-जाति वाले दूध-घी पीते-खाते हैं। इसलिए गाय को मत मारो। विषय तम्बाकू का चल रहा हैः-

भक्ति मार्ग में तम्बाकू सबसे अधिक बाधा करता है। जैसे अपने दोनों नाकों के मध्य में एक तीसरा रास्ता है जो छोटी सूई के नाके जितना है। जो तम्बाकू का धुँआ नाकों से छोड़ते हैं, वह उस रास्ते को बंद कर देता है। वही रास्ता ऊपर को त्रिकुटी की ओर जाता है जहाँ परमात्मा का निवास है। जिस रास्ते से हमने परमात्मा से मिलना है, उसी को तम्बाकू का धुँआ बंद कर देता है। हुक्का पीने वालों को देखा है, प्रतिदिन हुक्के की नै (नली) में लोहे की गज (एक पतला-सा सरिया) घुमाते हैं जिनमें से धुँए का जमा हुआ मैल निकलता है। वह नै रूक जाती है। मानव जीवन परमात्मा प्राप्ति के लिए ही मिला है। परमात्मा को प्राप्त करने वाले मार्ग को तम्बाकू का धुँआ बंद कर देता है। इसलिए भी तम्बाकू भक्त के लिए महान शत्राु है। वैसे भी हुक्का पीने वाले भी मानते हैं कि तम्बाकू अच्छी चीज नहीं है। जब कोई छोटा बच्चा अपने दादा-ताऊ, पिता-चाचा को हुक्का पीते देखता है तो वह भी नकल करता है। हुक्के को पीने लगता है तो बड़े व्यक्ति जो स्वयं हुक्का पीते हैं, उस बच्चे को धमकाते हैं कि खबरदार! अगर हुक्का पीया तो। यह अच्छा नहीं है। यदि आप जी इसे अच्छा पदार्थ मानते हैं तो बच्चों को भी पीने दो। आप मना करते हैं तो मानते हो कि यह अच्छा नहीं है, हानिकारक है। सर्दियों में एक मकान में छोटे बच्चे भी सो रहे होते हैं। उसी में हुक्का पीने वाला हुक्का पी रहा होता है। वह स्वयं तो पाप कर ही रहा है, अपने परिवार को धुँआ पिलाकर पाप का भागी बना रहा है। छोटे बेटा-बेटी को दादा-पिताजी अपने हिस्से के दूध से पिलाने की कोशिश करता है कि ले, थोड़ा ओर पी ले, देख तेरी चोटी बढ़ रही है, और पी जा। इस प्रकार उसे दूध का गिलास पिलाकर दम लेता है क्योंकि दूध बच्चे के लिए लाभदायक है। हुक्का-बीड़ी पीने से मना करता है तो दिल तो कहता है कि तम्बाकू पीना बुरा है, परंतु समाज में यह बुराई आम हो चुकी है। इसलिए पाप नहीं लगता। जैसे कई कबीले माँस खाते हैं, उनके बच्चों के लिए वह पाप आम बात है।

इसी प्रकार तम्बाकू पीना भी महापाप है, परंतु परम्परा पड़ गई है, पाप नहीं लगता। इसे त्याग देना चाहिए। भक्त हरलाल जी ने उसी दिन हुक्का तोड़ दिया। चिलम फोड़ दी। सर्व परिवार को वे सब बातें सुनाई। नाम-दीक्षा दिलाई। कई पीढ़ी तक बेरी के उन परिवारों में हुक्का नहीं था। बाद में सत्संग के अभाव में फिर से कुछ-कुछ पीने लगे हैं।