राबिया बसरी: जीवनी, निकाह / विवाह, चमत्कार एवम मोक्ष कथा


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राबिया बसरी जो हज़रत बीबी के रूप में जानी जाती है एक मुस्लिम संत थी, जो बसरा, इराक के एक कबीले से आयीं थी। वह एक पुण्य आत्मा थीं, जिन्हें सर्वशक्तिमान कविर्देव (अल्लाह कबीर) मिले थे और सतभक्ति प्रदान की, जिसे करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। हम इस लेख में रबिया बसरी (एक पवित्र मुस्लिम भक्त) की वास्तविक कथा साझा करेंगे और सतभक्ति के महत्व पर प्रकाश डालेंगे जिसके माध्यम से पूर्ण मोक्ष प्राप्त किया जाता है।

राबिया की वास्तविक कथा क्या है?

हर आत्मा सतलोक (अविनाशी स्थान) से काल (शैतान) लोक में अपनी गलती के कारण आयी है। सतलोक में बुढापा (जरा) और मृत्यु (मरण) नहीं है और इसलिए कोई पीड़ा नहीं होती। वहाँ पर सम्पूर्ण सुख है। जो सुविधाएं काल लोक के 'स्वर्ग' और 'महा स्वर्ग' में भी उपलब्ध नही है वो सभी सतलोक में हर 'हंस आत्मा' के लिए बिना कर्म किए बिल्कुल मुफ़्त उपलब्ध हैं। जबकि काल लोक के 'स्वर्ग' और 'महा स्वर्ग' (ब्रह्मलोक) में सभी सुख और सुविधाओं का भुगतान किया जाता है। वे (सुविधाएं) साधक की कमाई के बदले में प्रदान की जाती है। काल की अपनी इच्छा के अनुसार दर होता है। 25% कमीशन अलग से है। सबसे बड़ा अंतर यह है कि 'सतलोक' में मृत्यु नहीं होती। जबकि काल के लोक में मृत्यु सिर पर बनी रहती है, जो दुःखदाई है। मृत्यु से भी बदतर 'बुढ़ापा' है, जो 'सतलोक' में नहीं होता है। 

राबिया की वास्तविक कथा प्रारम्भ करने से पूर्व, आइए पहले हम आपको राबिया वाली आत्मा के पिछले कुछ जन्मों का विवरण दें। लेख का केंद्र निम्नलिखित पर होगा: 

  • राबिया बसरी के पिछले जन्म कौनसे थे? 
  • राबिया बसरी का विवाह
  • राबिया बसरी- एक प्रेरणादायक कथा
  • राबिया बसरी के साथ जो चमत्कार हुए
  • राबिया बसरी के पुनर्जन्म 
  • सर्वशक्तिमान कविर्देव ने रबिया उर्फ कमली के जीवन को पुनर्स्थापित किया

आइए हम आगे बढें और जाने कि राबिया बसरी के पिछले जन्म कौनसे थे?

रबिया बसरी के पिछले जन्म कौनसे थे? 

सन्दर्भ: महान संत गरीबदास जी महाराज की पवित्र वाणी का अंग। लेखक महान संत रामपाल जी महाराज है। पुस्तक का नाम 'मुक्तिबोध', पृष्ठ 205-209 पर अध्याय 'पारख के अंग का सरलार्थ'।

'कलयुग' में राबिया बसरी की आत्मा 'सतयुग' में 'दीपिका' वाली आत्मा थी, जो ऋषि 'गंगाधर' की पत्नी थी, जिन्होंने 'सत्ययुग' में सर्वशक्तिमान कविर्देव, जो सतयुग में लीला करने के लिए शिशु रूप में प्रकट हुए थे, का पालन पोषण करके अपने "कर्मों" को प्रफुल्लित करने में कामयाब रहे। ऋषि 'गंगाधर' वाली आत्मा ने त्रेता युग में ऋषि 'वेदविज्ञ' के नाम से जन्म लिया और 'दीपिका' वाली आत्मा ने 'सूर्या' नाम से जन्म लिया। वह ऋषि 'वेदविज्ञ' से विवाहित हुई। त्रेता युग में, सर्वशक्तिमान कविर्देव ऋषि 'मुनिंद्र' के रूप में विद्यमान रहे।

'त्रेता युग' में, सर्वशक्तिमान कविर्देव, लीला करते हुए, एक कमल के फूल पर शिशु रूप में प्रकट हुए जैसे वे 'सतयुग' में प्रकट हुए थे। ऋषि 'वेदविग्य' जो उस समय निःसन्तान थे शिशु रूप सर्वशक्तिमान कविर्देव को अपने घर में ले आये। फिर उनकी पत्नी 'सूर्या' शिशु रूप सर्वशक्तिमान कविर्देव का पालन-पोषण और सेवा करके अपने शुभ कर्मों को बढ़ाने में कामयाब रहे। यही 'दीपिका' वाली आत्मा ने कलियुग में मुस्लिम धर्म में 'राबिया' के नाम से एक लड़की के रूप में जन्म लिया। 

राबिया परमेश्वर कबीर जी की पूजा में दृढ़ थी। यहाँ तक कि उसने निकाह करने से भी इनकार कर दिया था क्योंकि सतगुरु कविर्देव जी 'जिंदा बाबा' के रूप में जंगल में उस पुण्य आत्मा को मिले थे जब वह अन्य महिला साथियों के साथ पशुओं का चारा लेने गयी हुई थी। सर्वशक्तिमान कविर्देव ने अपनी शक्ति से जंगल में एक छोटा तालाब (जोहड़) बनाया था। उन्होंने उसके चारों ओर एक छोटा सा बगीचा बनाया, एक झोपड़ी भी। वे वहां 'जिंदा बाबा' के रूप में बैठे थे। चारा काटते हुए लड़की अकेले उस तरफ चली गई। वह एक धर्मी व्यक्ति को देखकर प्रभावित हुई और उसने 'सलाम वालेकुम' कहकर उन्हें प्रणाम किया। फिर उसने उनके उपदेश/ज्ञान को सुनने का अनुरोध किया।

परमेश्वर कबीर जी ने एक घंटे तक उसे ज्ञान सुनाया। उन्होंने उसे सृष्टि रचना के बारे में बताया। लड़की प्रेरित हुई। उसने नाम दीक्षा लेने के लिए अनुरोध किया। सतगुरु ने कहा 'बेटी! दो और दिनों के लिए ज्ञान सुनो, फिर मैं आपको नाम (मंत्र) दूंगा। लेकिन मेरे बारे में किसी और को मत बताना कि कोई 'बाबा' यहां रहता है'। लड़की दो और दिनों तक अकेली गई और आध्यात्मिक ज्ञान सुना और दीक्षा ली। फिर वह घर चली गई। परमात्मा ने उसे बताया कि 'अब, मैं यहां से चला जाऊंगा, तुम भक्ति करना मत छोड़ना'। लड़की ने अल्लाह द्वारा बताई गयी भक्ति चार साल तक जारी रखी। बाद में, प्रवचनों की कमी के कारण, उसने सतभक्ति को त्याग दिया और अपने मुस्लिम धर्म के अनुसार इबादत करनई शुरू कर दी। तब तक वह 16 वर्ष की हो गई थी। 

राबिया बसरी का निकाह

राबिया खुदा से बहुत स्नेहमय थी, इस हद तक कि उसने निकाह करने से इनकार कर दिया था। उसके माता-पिता उसका निकाह करने के लिए दृढ़ थे। लड़की भी दृढ़ रही। माता-पिता ने कहा कि 'एक जवान लड़की को घर पर नहीं रखा जा सकता। यदि तुम हमसे सहमत नहीं होगी तो हम दोनों आत्महत्या करेंगे। हम तुम्हें चार दिनों का समय देते हैं। विचार करो और हमें बताना'। राबिया ने अपने माता-पिता की स्थिति को समझा और सहमति व्यक्त की। उसने विचार किया कि वह निकाह के लिए सहमत हो जाएगी, लेकिन अपने पति से अनुरोध करेगी कि वह प्रजनन के कार्य में भाग नहीं लेगी क्योंकि उसका उद्देश्य भक्ति करना और अपना कल्याण करवाना है। बेशक वह अपने पति को किसी और से विवाह करने के लिए कहेगी, लेकिन अगर वह असहमत हुआ तो वह अपना जीवन समाप्त कर देगी। यह सोचकर, लड़की ने अपनी मां और पिता को निकाह के लिए स्वीकृति देदी। वह एक अधिकारी से विवाहित हुई। 

वह मुस्लिम अधिकारी भगवान से डरने वाला था लेकिन वह कोई विशेष पूजा/भक्ति नहीं करता था। निकाह के बाद, रात के समय, पति ने राबिया से मिलन के लिए कहा, जिसे उसने दृढ़ता से मना कर दिया। उसने उसे बताया कि वह भक्ति करना चाहती है। उसने कहा, "यदि आप चाहते हैं, तो आप फिर से शादी कर सकते हैं। मुझे अपने आंगन में एक झोपड़ी बनवा दें, मैं रह लूँगी"। भगवान से डरते हुए, और शालीनता से, पति ने राबिया से कहा, "यदि आप आदमी के साथ मिलन का इरादा नहीं रखती हैं यानी आप सन्तान उतपत्ति नही करना चाहती थी, तो आप निकाह के लिए रजामंद क्यों हुए थे?" राबिया ने कहा, "मैं अपने माता-पिता के सम्मान को बचाने के लिए निकाह के लिए सहमत हुए थी। उन्होंने मरने का फैसला कर लिया था। समाज के डर के कारण वे अपने जीवन को अंत करने के लिए तैयार थे। इसलिए, मैं सहमत हो गयी। अगर आप मुझे मिलन के लिए मजबूर करेंगे, तो मैं आत्महत्या कर लूँगी। यह मेरा अंतिम निर्णय है "। 

पति ने कहा 'राबिया बसरी! यह अच्छा है, कि आप अल्लाह के लिए समर्पित हैं लेकिन मेरी मां और पिता की भी समाज में इज़्ज़त/सम्मान हैं। मेरा फैसले भी सुनो। आप बिना अनुमति के घर छोड़कर नहीं जाएंगी। अपनी भक्ति करो। समाज की दृष्टि में, आप मेरी पत्नी बनी रहोगी लेकिन मेरे लिए आप एक बहन की तरह होंगी। मैं आपको किसी भी चीज की कमी नहीं होने दूंगा, आप भक्ति करना जारी रखो। आपकी सेवा करके मुझे भी लाभ होगा। मैं किसी और से शादी कर लूँगा। फिर उसने किसी और से शादी कर ली और राबिया को अपनी बहन के रूप में रखा। उसने उसकी सभी सुविधाओं का अच्छे से ध्यान रखा।

राबिया बसरी - एक प्रेरणादायक कथा 

राबिया बसरी का इतिहास बताता है कि वह एक पुण्य आत्मा थी, परमात्मा से डरने वाली आत्मा। 

सन्दर्भ: गरीबदास जी की अमृत वाणी 'अचला के अंग' में पृष्ठ 363-368, पुस्तक 'मुक्तिबोध' में पृष्ठ 205 पर।

गरीब, राबी कु सतगुरु मिले, दीन्हा अपना तेज। 
ब्याही एक साहब से, बीबी चढ़ी न सेज।।
गरीब, राबी मक्के कु चली, धर अल-हक़ का ध्यान।
कुत्ती एक प्यासी खड़ी, छूटे जात है प्राण।।
गरीब केश उपारे शीश के, बाटी रस्सी बीन।
जाके वस्त्र बांध कर, जल काढया प्रबीन।।
गरीब, सुनही कु पानी पिया, उतरी अर्स आवाज।
तीन मंजिल मक्का गया, बीबी तुम्हरे काज।।
गरीब, बीबी मक्के पर चढ़ी, राबी रंग अपार।
एक लाख अस्सी जहां, देखे सब संसार।।
गरीब राबी पटरा घाल कर, किया जहाँ स्नान।
एक लाख अस्सी बहे, मंगल मल्या सुल्तान।।

जब राबिया बसरी करीब 55-60 वर्ष की थी उसने मुस्लिम धर्म की धार्मिक प्रथा के अनुसार 'हज' करने का फैसला किया। उसने अपने पति उर्फ अपने शपथबद्ध भाई के सामने इच्छा व्यक्त की, जिस पर उसने आसानी से स्वीकृति देदी। राबिया को गांव के अन्य लोगों के साथ भेजा गया था। जब सब चल रहे थे, उन्होंने रास्ते में एक कुआँ देखा। पानी बाहर लाने के लिए रस्सी और बाल्टी जैसे आवश्यक उपकरण नहीं थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि किसी राहगीर यात्री से गलती से बाल्टी कुँए में गिर गई थी। एक प्यासी कुतिया कुँए के बगल में खड़ी थी। 

विनम्र आत्मा राबिया समझ गई कि कुतिया प्यासी थी। ऐसा लगता है जैसे उसके पिल्ले भी आस पास थे जिन्होंने अभी तक चलना शुरू नहीं किया था। हज तीर्थयात्रा साथियों ने पानी पीने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन रस्सी और बाल्टी की उपलब्धता न होने के कारण, वे आगे बढ़ गए। वे जानते थे कि एक कुँआ 3 किमी आगे था। कुँए नियमित अंतराल पर हज तीर्थयात्रियों के लिए बनाया गया था। 

तीर्थयात्रा साथी आगे चले गए। उन्होंने राबिया पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह रस्सी और बाल्टी की तलाश में गई थी। हालांकि राबिया को कुँए से पानी निकालने के लिए कुछ भी नहीं मिला। वह दयालु और भगवान से डरने वाली थी। उसके पिछले जन्मों के शुभ कर्मों का प्रभाव अधिक प्रभावी था। उसने अपने बालों को अपने सिर से उखाड़ा और उन्हें एक लंबी रस्सी बनाने के लिए बांध दिया। उसने अपने कपड़े उतारे और उन्हें अपने बालों से बनी रस्सी से बांध दिया और उसे कुँए में डुबोया और जल्दी से बाहर खींच लिया। उसने कपड़ों से पानी को एक टूटे हुए मिट्टी के बर्तन के टुकड़े पर निचोड़ा जो कुएं के पास ही गिरा हुआ था। शायद जब रस्सी और बाल्टी उपलब्ध थी, तो यात्री उस मिट्टी के बर्तन के टुकड़े का इस्तेमाल कुत्ते/कुतिया और अन्य छोटे जानवरों के लिए पानी पीने के लिए उसको भरने के लिए किया जाता था। उसी इच्छा से, कुतिया कुएं के पास राबीया के चरणों को छू रही थी और कुएं की तरफ देख रही थी। राबिया ने प्यासी कुतिया को पानी दिया। कुतिया ने अपनी प्यास बुझाई। राबिया ने अपने कपड़े निचोड़े और सुखाए। पानी से उसने लहू को साफ किया जो उसके बालों को उखाड़ने के बाद उसके शरीर पर फैल गया था। उसने अपने कपड़े पहने और आगे बढ़ने की तैयारी की। 

यह गरीबदास जी महाराज जी की अमृत वाणी में कहा है:

राबिया रंगी हरि रंग में, कैसी जीव दया दरसाई।
केश उखाड़े, वस्त्र उतारे, एक सुनही की प्यास बुझाई।
मंजिल तीन मक्का ले आयी, वो भी रह गयी वार ही।।

आइए आगे बढ़ते हैं और पुण्य आत्मय राबिया के बारे में और जानते हैं।

राबिया बसरी के साथ जो चमत्कार हुआ 

जैसे ही राबिया ने मक्का जाने के लिए आगे बढ़ने की तैयारी की, मक्के की मस्जिद जो लगभग 60 मील दूर थी, अपने निज स्थान से उड़ी और कुँए के पास आयी और उसके बगल में स्थित हो गयी। मक्का को देखकर, राबिया आश्चर्यचकित हुई जैसे कि यह एक सपना हो। उसी समय एक आकाशवाणी हुई, "हे भक्त! मक्का आसमान से होते हुए 60 मील की यात्रा की है, केवल आपके लिए। कृपया अंदर प्रवेश करें"। राबिया ने मक्का की मस्जिद में प्रवेश किया। वह इसी मकसद से आई थी। 

महान संत गरीबदास जी अपनी अमृत वाणी में 56, 57 छंद में कहते हैं कि; 

गरीब, सुल्तानी मक्का गए, मक्का नही मुकाम |
गया रांड के लेन कु, कहे अधम सुल्तान ||

गरीब, राबिया परसी रबस्यों, मक्का की असवारि | 
तीन मंजिल मक्का गया, बीबी के दीदार ||

दूसरी तरफ, उस समय इब्राहिम अधम सुल्तान की आत्मा ने मुस्लिम धर्म में मनुष्य जन्म ले लिया था। वह भी मक्का गया हुआ था। सर्वशक्तिमान कविर्देव (अल्लाहु-अकबर) उन्हें मिले थे और उन्हें सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान बताया था। अल्लाहु-अकबर ने उन्हें दीक्षा भी दी थी। इब्राहिम अधम भोले-भाले गुमराह लोगों को सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान देने के लिए हर साल मक्के का दौरा करते था। जब मक्का की मस्जिद अपने मूल स्थान से उड़ी, तो अन्य लोगों ने कुछ असाधारण संदेह किया। उन्होंने मक्का के ठिकाने के बारे में एक-दूसरे के साथ चर्चा करना शुरू कर दिया और इसे अल्लाह के चमत्कार कहा। इब्राहम ने कहा कि 'मक्का एक रांड को लेने गया है'। यह मक्का एक घर है। अल्लाह इसमें नहीं है। अल्लाह आकाश में है। एक मुस्लिम होने के नाते किसी ने भी इब्राहाम का विरोध नहीं किया।

इसी बीच, मक्का उड़ा और वापस अपनी मूल जगह पर आया और स्थिर हो गया। यह बताया गया था कि यह एक पुण्य आत्मा राबिया को लेने के लिए गया था। सब उसे देखने लगे और उसकी भक्ति की सराहना की। इब्राहाम से पूछताछ की गई 'आपने इतनी पुण्य आत्मा के बारे में गलत क्यों कहा?'। आप पापी बनोंगे'। तब इब्राहाम ने बताया कि अल्लाहु-अकबर इस पुण्य आत्मा को 'जिंदा बाबा' के रूप में  मिले थे। इसने दीक्षा ली परन्तु केवल 4 वर्ष तक भक्ति की। फिर इसने मनमानी पूजा करनी शुरू कर दी। उस भक्ति की शक्ति से, उसे इस तरह के साहसिक कार्य करने का साहस मिला। एक कुतिया की प्यास बुझाने के लिए उसने अपने बालों को उखाड़ दिया, इससे रस्सी तैयार की, अपने कपड़ों की सहायता से उसने कुँए से उस रस्सी के सहारे पानी निकाला, प्यासी कुतिया को पानी दिया और उसकी जान बचाई। इसलिए, अल्लाहु-अकबर ने यह चमत्कार किया '। जब राबिया से पुष्टि करने के लिए पूछा गया, उसने वही बताया। जब राबिया ने स्नान किया तो इब्राहिम सुल्तान अधम ने उस पवित्र आत्मा की कमर से रक्त को साफ करने में उसकी मदद की। 

1,80,000 पैगम्बर हुए हैं। अल्लाह ने किसी के लिए चमत्कार नहीं किया। वे सभी राबिया के सामने छोटे लगते हैं। अल्लाह केवल सच्चे भक्तों पर ही कृपा करते हैं। 

नोट: एक सच्ची और दृढ़ भक्त होने के बावजूद, राबिया की आत्मा मुक्त नहीं हो सकी। वह जन्म और पुनर्जन्म के दुष्चक्र में ही फंसी रही। यह साबित करता है कि मनमानी पूजा से पूर्ण मोक्ष कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। आइए हम पुण्य आत्मा राबिया के कुछ और जन्मों पर प्रकाश डालते हैं।

राबिया बसरी के पुनर्जन्म

महान संत गरीबदास जी ने आगे 58, 59 छंद में अपनी अमृत वाणी में बताया:

गरीब, फ़िर राबिया बंसुरी बनी, मक्का चढाया शीश |
पुर्बले संस्कार कुछ, धनि सतगुरु जगदीश ||
गरीब, बंसुरी से वैश्या बनी, शब्द सुनाया राग | 
बहुरि कमाली पुत्री, जुग जुग त्याग बैराग ||

राबीया वाले उस मनुष्य जन्म को पूरा करने के बाद, दूसरे जन्म में वही आत्मा मुस्लिम धर्म में फिर से एक लड़की के रूप में पैदा हुई और 'बंसुरी' नाम रखा। वह बहुत धार्मिक थी और हमेशा अल्लाह का गुणगान करती रहती थी। वह एक गायिका थी जो धार्मिक गीत गाती थी। वह मुस्लिम धर्म की पारंपरिक पूजा करती थी। मुस्लिम धर्म में एक धारणा है कि यदि कोई मक्का में मरता है तो वह सीधे स्वर्ग में जाता है। बंसुरी ने सोचा कि व्यक्ति मक्का में अपना शरीर छोड़ने और स्वर्ग प्राप्त करने से बेहतर और क्या कर सकता है। वह 'हज' के दौरान मक्का में गई। उसने अपना सिर कलम कर दिया और वहां अर्पण कर दिया और अपना जीवन अंत कर दिया। पूरा मुस्लिम समाज इस पर चर्चा करने लगा और कहा कि यह असली बलिदान है।

राबिया वाली आत्मा ने बंसुरी के जन्म में मक्के में अपना मानव शरीर त्याग दिया और अपने तीसरे मनुष्य जन्म में उसने एक वेश्या के पापी जीवन का नेतृत्व किया। 

राबिया से भई बंसुरी, फ़िर वैश्या ख्याल बनाया
वैश्या से फिर भई कमाली, तब तेरा ही शारना चाह्या
शरण तेरी में आनंद आया, थी प्यासी दीदार की! 

'बंसुरी' का मानव जीवन पूरा होने के बाद 'दीपिका / सूर्या / राबिया' वाली आत्मा ने चौथा मनुष्य जन्म लिया। वह शेखतकी नामक एक मुस्लिम पीर जो दिल्ली के राजा सिकंदर लोधी का आध्यात्मिक गुरु था, की बेटी के रूप में पैदा हुई। जब शेखतकी की बेटी 13 वर्ष की आयु की थी वह मर गई। एक और मनुष्य जन्म देने के लिए उसके पुण्य कर्म नहीं थे। उसे पक्षी या पशु का जीवन मिलना पूर्व निर्धारित था। 

सर्वशक्तिमान कविर्देव जी ने उसके शरीर/शव को कब्र से खोदकर निकलने के बाद उसे जीवन दान दिया। उन्होंने उसकी आयु बढ़ा दी और उसे अपनी बेटी के रूप में ले आये। परमात्मा ने उसे सतभक्ति और दीक्षा दी और उसकी मुक्ति की। आइए जानें कि क्या हुआ और कैसे सर्वशक्तिमान कविर्देव ने 'कमाली' को जीवन दान दिया

सर्व शक्तिमान कविर्देव ने राबिया उर्फ 'कामाली' को जीवन दान दिया

सन्दर्भ: पवित्र कबीर सागर

600 वर्ष पूर्व सर्वशक्तिमान कविर्देव ने काशी, उत्तरप्रदेश में एक धानक की दिव्य लीला की थी। उन्होंने बहुत से चमत्कार किये और लोगों पर मेहर की। शेखतकी नाम का एक मुस्लिम धार्मिक गुरु था।

शेखतकी भगवान कबीर से बेहद ईर्ष्या करता था क्योंकि राजा सिकंदर लोधी सहित बहुत से लोग उनके शिष्य बन गए थे। उसने जनता को यह कहते हुए गुमराह किया, "कबीर एक जादूगर है। इन जादुई तरकीबों को दिखाकर उसने राजा सिकंदर को मूर्ख बनाया"। उसने सभी मुस्लिमों को अपने समर्थन के लिए मनाया और भोले-भाले मुसलमानों उससे सहमत हो गए। शेखतकी ने कहा कि हम 'कबीर भगवान है' तभी स्वीकार करेंगे अगर वह मेरी मृत बेटी जो एक कब्र में दफन है, को जीवित कर देगा। उसने कहा, 'मैं मान लूंगा कि 'कबीर अल्लाह है'। कबीर साहेब जी सहमत हो गए। यह जानकारी हर जगह प्रसारित कर दी गई। एक दिन निर्धारित किया गया और हजारों लोग पुण्य आत्मा की झलक देखने के लिए एकत्रित हो गए। 

जिस कब्र में शेखतकी की बेटी को दफनाया गया था, उसे खोदा गया। कबीर साहेब ने शेखतकी से कहा कि पहले आप अपनी बेटी के शव को जीवित करने की कोशिश करें। वहां मौजूद सभी लोगों ने कहा 'यदि शेखतकी के पास शक्ति होती तो वह अपनी बेटी को मरने नहीं देता। अपने बच्चे के जीवन को बचाने के लिए हर व्यक्ति सभी प्रयास करता है। 'हे रहमान! आप कृपया अपनी कृपा करें'। सर्वशक्तिमान कविर्देव जी ने कहा 'हे शेखतकी की बेटी! जीवित हो जा'। उन्होंने यह तीन बार कहा लेकिन लड़की जीवित नही हुई। यह देखकर, शेखतकी नाचने लगा कि एक पाखंड का पाखंड पकड़ा गया है। यह कबीर साहिब की लीला थी। वे चाहते थे कि शेखतकी लोगों के सामने तमाशा करे। 

परमेश्वर कबीर जी कहते हैं;

कबीर, राज तजना सहज है, सहज तरिया का नेह,
मान बढाई ईर्ष्या, दुर्लभ तजना ये!

मान बढाई और ईर्ष्या के विनाशकारी परिणाम होते हैं। शेखतकी को अपनी बेटी के जीवित न होने का दुःख/गम नही था, बल्कि कबीर साहेब जी के हारने की खुशी मना रहा था। इन दो लक्षणों के कारण वह नीच सिद्ध हुआ।

कबीर साहेब जी ने शेखतकी से कहा, 'मौलवी जी आप बैठ जाओ, शांति बनाए रखें'। फिर भगवान कबीर ने कहा, 'हे पुण्य आत्मा! जहाँ भी है, कबीर हुकुम/आदेश से, इस शरीर में प्रवेश करो और इस कब्र से बाहर आ जाओ'। जैसे ही कबीर साहेब ने ये शब्द कहे, मृत शरीर में कंपकंपी होने लगी और लड़की जीवित हो गयी। वह कब्र से बाहर आई और कबीर साहेब जी को दण्डवत प्रणाम किया। कबीर साहेब की कृपा से, लड़की ने कबीर साहेब की मेहर के बारे में डेढ़ घंटे का प्रवचन किया। 

उसने कहा 'हे भोले-भाले लोगों! अल्लाह आ गये हैं। वह पूर्ण ब्रह्म, असंख्य ब्रह्मांडों के मालिक हैं। जिसे आप एक साधारण से जुलाहे के रूप में देखते हैं, वह वास्तव में भगवान है। 'हे भटके और गुमराह मनुष्यों! यह आपके सामने भगवान खड़ा है, इन्हें प्रणाम करो, अपने घुटनों पर हो जाओ, दण्डवत करो और खुद को जन्म और मृत्यु के दीर्घ रोग से मुक्त हो जाओ और हम सभी सतलोक में जाएंगे, जहां जाने के बाद आत्मा इस संसार में वापस नहीं आती'।

कमाली ने बताया कि 'बन्दीछोड कबीर साहेब' के अलावा कोई भी आपको काल के जाल से छुटकारा नही दिला सकता। किसी भी धर्म की कोई भी धार्मिक क्रिया काल के जाल से आत्मा को मुक्त नहीं करवा सकती, चाहे वह हिन्दू धर्म की भक्ति विधि हो जैसे व्रत रखना, तीर्थयात्रा, भगवत गीता, रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद, वेदों का पाठ करना, भगवान राम, श्री कृष्णा, ब्रम्हा, विष्णु, शिव, दुर्गा-शेरांवाली (भवानी, प्रकृति देवी) या ज्योति निरंजन की पूजा हो, कोई भी आत्मा को 84 लाख जूनो में होने वाली पीड़ा से नही बचा सकता और न ही ये मुस्लिम धर्म की धार्मिक क्रियायों से होगा जैसे रोजा रखना, ईद या बकरीद मनाना, दिन में पांच बार नमाज करना, मक्का-मदीना जाना, मस्जिद में बंग देना; यह सब व्यर्थ है। वहां मौजूद सभी लोगों को संबोधित करते हुए, कमाली ने अपने पिछले मनुष्य जन्मों का लेखा-जोखा भी सुनाया। 

फिर कबीर साहेब ने कमली से कहा 'बेटी! आप अपने पिता के साथ जाओ। कमाली ने कहा, ' कबीर साहेब आप मेरे असली पिता हो वह मेरे नकली पिता हैं। उन्होंने मुझे कब्र में दफना दिया था, हमारा हिसाब बराबर हुआ'। वहां मौजूद सभी लोग सर्वशक्तिमान कबीर साहेब का यह कहते हुए गुणगान कर रहे थे 'उन्होंने कामल कर दिया' इसी कारण लड़की का नाम 'कमली' रखा था। 

कबीर साहेब लड़की को अपनी बेटी के रूप में ले आये। उन्होंने उसे दीक्षा दी। उसने परमेश्वर कबीर जी द्वारा दी गई भक्ति की सही विधि का पालन किया और पूर्ण मोक्ष प्राप्त किया। वह जन्म और पुनर्जन्म के दुष्चक्र से मुक्त हो गयी और अविनाशी स्थान 'सतलोक' पहुंच गयी जहां परम शांति है। 

शेख ताकी अत्यधिक शर्मिंदा हुआ कि उसकी प्रभुता खत्म हो गयी। 

कबीर साहेब जी कहते हैं; 

जो जन मेरी शरण है, ताका हूँ मैं दास।
गेल गेल लागया फिरूँ, जबलग धरती आकाश।।

नोट: यदि एक बार, कोई भी आत्मा किसी भी युग में कबीर साहेब जी की शरण में आती है तो परमात्मा हमेशा उस पुण्य आत्मा के साथ रहता है और सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान देकर, वे उस आत्मा की मुक्ति करवाकर ही रहते हैं। दीपिका की आत्मा कलियुग के प्रारम्भ में (राबिया रूप में) सर्वशक्तिमान कबीर जी की शरण में आयी थी, लेकिन उसकी भक्ति अधूरी रही। इसलिए, भगवान ने उस आत्मा का हर जन्म में तब तक पीछा किया जब तक अगले कलियुग में भक्ति युग आया और अपनी प्यारी आत्मा को कमाली वाले मनुष्य जन्म में मुक्त किया।

कबीर साहेब जी कहते हैं; 

ज्यों बच्छा गऊ की नजर में, न्यू साईं को सन्त।
भक्तों के पीछे फिरे, वो भगत वत्सल भगवंत।।

भगवान कहते हैं: जैसे गाय हमेशा अपने बछड़े पर नजर रखती है कि उसका बछड़ा सुरक्षित है, संत को भी ऐसे ही मानें। एक सच्चे संत के कारण यानी परमात्मा अपने प्रिय भक्त की आत्मा का निरन्तर पीछा करते हैं। राबिया की वास्तविक कथा एक उदाहरण है कि भगवान अपने भक्तों पर नजर रखता है और सतभक्ति प्रदान करता है जिससे वे पूर्ण मोक्ष प्राप्त करते हैं। 

विचारणीय बिंदु

ब्रह्म - काल के 21 ब्रह्मांडों में जन्म और पुनर्जन्म होता है। राबिया वाली आत्मा ने कई जन्म लिए। 
आत्माएं काल के जाल में फंसी हुई हैं, इसलिए वे अपने कर्मों के आधार पर बहुत पीड़ा उठाते हैं।
सभी धर्मों में की जाने वाली धार्मिक क्रियाएं सही नही है इसलिए मोक्ष प्राप्त नही होता और प्राणी पुनरावृत्ति में रहते हैं।
केवल सर्वशक्तिमान कविर्देव की सतभक्ति आत्माओं को शाश्वत अविनाशी स्थान यानी 'सतलोक' प्राप्त करवाने में सहायक हो सकती हैं। 

निष्कर्ष:

600 साल पहले सर्वशक्तिमान कबीर जी स्वयं आये थे और काशी, यूपी(उत्तर प्रदेश) में एक जुलाहे/धानक की दिव्य लीला की और 64 लाख भोली आत्माओं को सतभक्ति से धन्य किया। राबिया बसरी एक ऐसी ही पुण्य आत्मा थी जिसे कई जन्मों के बाद कमाली वाले मनुष्य जन्म में पूर्ण मोक्ष प्राप्त हुआ। परमात्मा ने उसे सतभक्ति दी। 

आज सर्वशक्तिमान कविर्देव फिर से पृथ्वी पर आए हैं और महान सन्त जगतगुरु तत्वदर्शी रामपाल जी महाराज के रूप में आत्माओं पर कृपा कर रहे हैं।

जीव जो न सत्संग में आया,
भेद न उसे भजन का पाया।
गरीबदास जी को भी बावला बताया,
बन्दीछोड कोभी बावला बताया,
के करले इस दुनिया सयानी का।

कृपया सन्त रामपाल जी महाराज जी के आध्यात्मिक प्रवचनों/सत्संगों को सुनिए और समझिए

  • हम क्यों जन्मते हैं?
  • हम मनुष्य जन्मों में दुखी क्यों होते हैं?
  • हम जन्म मृत्यु के चक्र से छुटकारा/राहत कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
  • भक्ति की सही विधि क्या है?
  • हम मोक्ष कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
  • वह कौनसा अविनाशी लोक है जहाँ जाने के बाद साधक फिर लौटकर वापिस संसार मे नही आता?

ऊपर दिए सभी प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए ज्ञान गंगा पुस्तक पढ़े। सभी से प्राथना है कि परमात्मा को पहचानों और अपना और अपने परिवार का कल्याण करवाओ।