sant-rampal-ji

सिकंदर लोदी , लोदी साम्राज्य का शासक बहुत ही सफल शासक था। वह केवल विजेता ही नहीं थे, बल्कि शिल्प कौशल के एक महान समर्थक और फारसी भाषा के एक महान लेखक और कवि भी थे। इतिहास उन्हें प्रशासन के मामले में और साथ ही उनके शासनकाल के दौरान व्यापार को बढ़ाने के लिए एक सक्षम शासक के रूप में चित्रित करता है। एक महान विजेता, सिकंदर लोदी ने दिल्ली सल्तनत के पतन को बचाने के लिए कई प्रयास किए। सिकंदर लोदी की वीरता के बारे में ऐसे कई ऐतिहासिक तथ्य लोगों को अच्छी तरह से ज्ञात हैं लेकिन आम जनता के लिए क्या अज्ञात है, यह इस लेख में समझाया जाएगा।

बहुत कम लोग इस तथ्य से अवगत हैं कि दयालु सर्वशक्तिमान कबीर, सिकंदर लोदी से 600 साल पहले मिले थे, जब भगवान कबीर वाराणसी के काशी में अवतरित हुए थे, और एक बुनकर के दिव्य लीला को निभा रहे थे; जिसे लोग मानते हैं कि वह सिर्फ एक कवि थे। भगवान कबीर ने सिकंदर लोदी को अपनी शरण में लिया और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति के योग्य बनाया

आइए और अधिक जानकारी प्राप्त करते हैं जब 600 साल पहले भगवान कबीर सिकंदर लोदी से मिले थे

  • भगवान कबीर ने एक मृत गाय को जीवित किया, जिसे सिकंदर लोदी ने मार डाला था
  • सर्वशक्तिमान कबीर ने सिकंदर लोदी के असाध्य जलन के रोग को ठीक किया
  • भगवान कबीर ने स्वामी रामानंद जी का जीवन बहाल किया
  • अभिमानी सिकंदर लोदी ने अपने उद्धारकर्ता भगवान कबीर का अनादर किया
  • सर्वशक्तिमान कबीर ने सिकंदर लोदी की उबलते तेल में जलकर अलग हुई उंगलियों को ठीक किया

 

भगवान कबीर ने सिकंदर लोदी द्वारा मारे गए एक मृत गाय को जीवन के लिए बहाल किया

भगवान कबीर अनंत ब्रह्मांडों के मालिक हैं। वह सर्वव्यापी है।विश्व के सब प्राणी परमात्मा कबीर जी की आत्मा है। उन्होंने अपनी वाणियो के माध्यम से बताया है- ईश्वर / अल्लाह / रब / खुदा कौन है? 600 साल पहले परमात्मा कबीर पृथ्वी पर अवतरित हुए और 120 वर्षों तक काशी में रहे। उस समय उनके 64 लाख शिष्य थे। कई हिंदू और मुस्लिम धार्मिक गुरुओं ने उनके उपदेशों का कड़ा विरोध किया एक बार, वे सभी बड़ी संख्या में एकत्रित हुए और सुल्तान सिकंदर लोदी को उनके बारे में एक झूठी शिकायत की। परमेश्वर कबीर जी के हितकारी वचनों को सुनकर सिर पीटकर यानी नाराज हो कर चले गए। और सिकंदर लोदी से जाकर शिकायत करने लगे कि कबीर जुलाहा अपने आदरणीय देवताओं की छवि को खराब कर रहे हैं और वह यह कहते हैं कि भगवान /अल्लाह, मंदिर/ मस्जिद और चर्च में नहीं मिलते हैं।

मुस्लिम धार्मिक गुरुओं ने सुल्तान को बताया कि कबीर कहते हैं कि आप गाय को मारकर पाप के भागी बन रहे हो आप बकरा , मुर्गा मारते हो, यह भी महापाप है गाय के मारने से (अल्लाह )परमात्मा खुश नहीं होता उल्टा नाराज होता हैं।फिर वाद-विवाद करने के लिए आए तो परमात्मा कबीर जी ने कहा कि हे काजी तथा मुल्ला! सुनो आप मुर्गे को मारते हो तो पाप है आगे किसी जन्म में मुर्गा तो काजी बनेगा , काजी मुर्गा बनेगा तब वह मुर्गे वाली आत्मा मारेगी,  स्वर्ग नहीं मिलेगा नरक में जाओगे

कबीर साहिब जी अपनी अमृतवाणी में कहते हैं

कबीर, मांस अहारी मानई, प्रत्यक्ष राक्षस जानि।   
ताकी संगति मति करै, होइ भक्ति में हानि।।1।।   

कबीर, मांस मछलिया खात हैं, सुरापान से हेत।   
ते नर नरकै जाहिंगे, माता पिता समेत।।2।।       

कबीर, मांस मांस सब एक है, मुरगी हिरनी गाय।
जो कोई यह खात है, ते नर नरकहिं जाय।।3।

मुसलमानों ने कबीर जी को काफिर ’(एक नास्तिक) कहना शुरू कर दिया, उस दिन दिल्ली का सम्राट सिकंदर लोदी काशी नगर में आया हुआ था पांच दस हजार मुसलमान मिलकर सिकंदर लोदी के पास विश्राम गृह में गए । काजियो ने कहा कि है जहांपनाह ! हमारे धर्म की तो बेज्जती कर दी हम तो कहीं के नहीं छोड़े एक कबीर नाम का जुलाहा हमारे धर्म के धार्मिक कर्मों को नीच कर्म बताता है अपने को सातवें आसमान वाला अदृश्य परमात्मा कहता है। सिकंदर लोदी ने अपने सैनिकों को कबीर जी को गिरफ्तार करने और उसे शाही अदालत में पेश करने का आदेश दिया। अज्ञानी सिकंदर लोधी ने अल्लाह कबीर से पूछा, “तुम कौन हो? आप क्यों नहीं बोलते? आप खुद को अल्लाह कहते हैं ”। कबीर जी ने उत्तर दिया कि मैं अदृश परमात्मा हूं। मैं ही संत तथा सतगुरु हूं । मेरा नाम कबीर (अल्लाह अकबर) है। मैं (खालिक) संसार का मालिक (धनी) हूं। मैं कबीर सर्वव्यापक हूं।

हम ही अलख अल्लाह हैं, कुतुब गौस और पीर।
गरीब दास खालिक धनी, हमारा नाम कबीर ।।

अहंकारी सिकंदर कबीर जी के इस कथन पर भड़क गए सिकंदर लोदी ने एक गर्भवती गाय को कई लोगों के सामने अपनी तलवार से दो हिस्सों में बाँट दिया और कबीर जी को चुनौती दी कि  है काफिर! तू अपने को (अल्लाह )परमात्मा कहता है यदि परमात्मा है तो इस दो टुकड़े हुई गाय को जीवित कर दें। हमारे नबी मोहम्मद ने मृत गाय को जीवित किया था। जीवित कर नहीं तो तेरे टुकड़े कर दिए जाएंगे

नोट: इसका उल्लेख सुक्ष्मवेद में किया गया है

मारी गऊ शब्द के तीरम, ऐसे थे मोहम्मद पीरं |
शब्दै फिर जिवाई , हंसा राख्या मांस नही भाख्या, ऐसे पीर मोहम्मद भाई ||

परमात्मा कबीर जी ने उस गाय व उसके गर्भ के बच्चे को जिनके टुकड़े हुए पड़े थे परमात्मा कबीर जी ने हाथ से थपकी मार कर दोनों मां बच्चे को जीवित कर दिया दूध की बाल्टी भर दी कबीर जी ने वह दूध पिया।।  एक बड़ी बाल्टी भरकर कहा

गऊ अपनी अम्मा है, इस पर छुरी न बाह।   
गरीबदास घी दूध को, सब ही आत्म खाय।।   

कबीर, दिनको रोजा रहत हैं, रात हनत हैं गाय।   
यह खून वह बंदगी, कहुं क्यों खुशी खुदाय।।।।   

कबीर, खूब खाना है खीचडी, मांहीं परी टुक लौन।   
मांस पराया खायकै, गला कटावै कौन।।।।   

मुसलमान गाय भखी, हिन्दु खाया सूअर। 
गरीबदास दोनों दीन से, राम रहिमा दूर।।   

गरीब, जीव हिंसा जो करत हैं, या आगै क्या पाप। 
कंटक जूनि जिहान में, सिंह भेढिया और सांप।।

सिकंदर राजा को कबीर परमात्मा जी ने यह प्रथम चमत्कार दिखाया था यानी अपनी शक्ति का परिचय दिया था हजारों दर्शक शहर निवासी यह खड़े देख रहे थे। दिव्य उज्ज्वल दृष्टि को देखकर उन्हें शीघ्र ही आभास हो गया कि कबीर जी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। सिकंदर लोदी ने अपनी अज्ञानता और गलती के लिए माफी मांगी और कबीर जी को प्रणाम किया और कहा

आप कबीर अल्लाह हैं, बख्शो इबकी बार। दासगरीब शाह कुं, अल्लाह रूप दीदार।।

फिर, सिकंदर लोदी ने कबीर जी को एक पालकी में पूरी गरिमा के साथ उनके निवास स्थान पर भेजा। शेख तकी सिकंदर लोदी के मुस्लिम धार्मिक गुरु थे और उनके समुदाय के बीच अत्यधिक प्रभावशाली थे। उन्होंने कबीर जी से ईर्ष्या की और यह कहकर सिकंदर को गुमराह किया कि “कबीर मंत्र और आकर्षण के विशेषज्ञ हैं। वह एक जादूगर है, अगर वह गाय के जीवन को बहाल करता है तो कोई बड़ी बात नहीं है। काला जादू करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसा कर सकता है ”। सिकंदर लोदी को शेख तकी के शब्दों से बहकाया गया था। हालाँकि सिकंदर लोदी ने दैवीय रूप कबीर को देखा था लेकिन फिर भी उन्हें गुमराह किया गया और इस दैवीय क्रिया को हल्के में लिया।

कबीर साहिब जी ने अपनी अमृतवाणी में कहा है

मन तू पावेगा अपना किया रे, भोगेगा अपना किया रे |

अर्थ: परमात्मा कबीर कहते हैं कि जैसा बोओगे वैसा काटोगे। व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए अच्छे और बुरे कर्मों का फल और दंड मिलता है।

सर्वशक्तिमान कबीर जी ने सिकंदर लोदी के असाध्य जलन के रोग के रोग को ठीक किया ।

एक बार दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी को जलन का रोग हो गया । जलन का रोग ऐसा होता है जैसे किसी का आग में हाथ जल जाए,  उसमें पीड़ा बहुत होती है जलन के रोग में कहीं से शरीर जला दिखाई नहीं देता है परंतु पीड़ा अत्यधिक होती है उसको जलन का रोग कहते हैं।  जब प्राणी के पाप बढ़ जाते हैं तो दवाई भी व्यर्थ हो जाती है। दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी के साथ भी वही हुआ। सभी प्रकार की औषधि सेवन की , बड़े-बड़े वैद्य बुला लिए और मुंह बोला इनाम रख दिया कि मुझे ठीक कर दो जो मांगोगे वहीं दूंगा।  दुख में व्यक्ति पता नहीं क्या संकल्प कर लेता है सर्व उपाय निष्फल हुए उसके बाद अपने धार्मिक काजी मुल्लाह,  संतो आदि तथा सबसे अपना आध्यात्मिक इलाज करवाया परंतु सब निष्फल रहा जब हम दुखी हो जाते हैं तो हिंदू और मुसलमान नहीं रहते फिर तो कहीं पर रोग कट जाए वहीं पर चले जाते हैं जब कष्ट आए तब तो कोई बुरा नहीं हिंदू वैद्य तथा आध्यात्मिक संत भी बुलाए स्वयं भी उनसे जाकर मिला और सब से आशीर्वाद व जंत्र मंत्र करवाए परंतु सर्व चेष्टा निष्फल रही ।

किसी ने बताया कि काशी शहर में एक कबीर नाम का महापुरुष है यदि वह कृपा कर दे तो आपका दुख निवारण अवश्य हो जाएगा। जब बादशाह सिकंदर ने सुना कि एक काशी के अंदर महापुरुष रहता है तो उसको कुछ कुछ याद आया कि वह तो नहीं है जिसने गाय को भी जीवित कर दिया था। हजारों अंग रक्षकों सहित दिल्ली से काशी के लिए चल पड़ा । वीर सिंह बघेल काशी नरेश पहले ही कबीर साहेब की महिमा और ज्ञान सुनकर कबीर साहेब के शिष्य हो चुके थे और पूर्ण रूप से अपने गुरुदेव में आस्था रखते थे उन्होंने कबीर साहेब की महिमा का ज्ञान था क्योंकि कबीर परमेश्वर वहां पर बहुत लीलाएं कर चुके थे। जब सिकंदर लोदी बनारस गया तथा कहा बीर सिंह मैं बहुत दुखी हो गया हूं अब तो आत्महत्या ही शेष रह गई है यहां पर कोई कबीर नाम का संत है आप तो जानते होंगे कि वह कैसा है इतनी बात सिकंदर बादशाह के मुख से सुनी थी काशी नरेश बीर सिंह की आंखों में पानी भर आया और कहा कि अब आप ठीक स्थान पर आ गए हो अब आपके दुख का अंत हो जाएगा। बादशाह सिकंदर ने पूछा कि ऐसी क्या बात है बीर सिंह ने कहा कि वह कबीर जी स्वयं भगवान आए हुए हैं परमेश्वर स्वरूप है यानी उनकी दया दृष्टि हो गई तो आप का रोग ठीक हो जाएगा । राजा सिकंदर ने कहा कि जल्दी बुला दो काशी नरेश देव सिंह बघेल ने विनम्रता से प्रार्थना की कि आपकी आज्ञा शिरोधार्य है आदेश भिजवा देता हूं लेकिन ऐसा सुना है कि संतों को बुलाया नहीं करते यदि आ भी गए और रजा नहीं बख्शी तो भी आने का कोई लाभ नहीं बाकी आपकी इच्छा सिकंदर ने कहा कि ठीक है मैं स्वयं ही चलता हूं इतनी दूर आ गया हूं वहां पर भी अवश्य चलूंगा। उस समय साहिब कबीर जी अपने औपचारिक गुरुदेव स्वामी रामानंद जी के आश्रम में ही रहते थे।

नोट: (स्वामी रामानंद जी को गुरु बनाना भगवान कबीर जी की लीला थी। वास्तव में, वे सर्वोच्च हैं और सभी के गुरु हैं)।

स्वामी रामानंद जी मुसलमानों से घृणा करते थे रामानंद जी ने कहा कि मैं इन म्लेच्छो  (मुसलमानों )की शक्ल भी नहीं देखता कह दो कि बाहर बैठ जाए । जब सिकंदर लोदी ने यह सुना तो क्रोध में भरकर कहा की यह दो कौड़ी का महात्मा दिल्ली के बादशाह का अनादर कर सकता है तो साधारण मुसलमान के साथ यह कैसा व्यवहार करता होगा। रामानंद जी अलग आसन पर बैठे थे सिकंदर लोदी ने जाकर रामानंद जी की गर्दन तलवार से काट दी । वापस चल पड़ा और फिर उसको याद आया कि मैं जिस कार्य के लिए आया था और वह काम पूरा नहीं होगा कहा कि वीर सिंह देख मैं क्या जुल्म कर बैठा मेरे बहुत बुरे दिन है । चाहता हूं अच्छा करना और होता है बुरा।  कबीर साहेब के गुरुदेव की हत्या कर दी अब वे कभी भी मेरे ऊपर दया दृष्टि नहीं करेंगे मुझे तो यह दुख भोग कर ही मरना पड़ेगा।  यह कहता हुआ आश्रम से बाहर की ओर चल पड़ा। ज्यों ही आश्रम से बाहर आए कबीर साहेब आते दिखाई दिए । कबीर साहेब जब  थोड़ी दूरी रह गए वीर सिंह ने जमीन पर लेट कर उनको दंडवत प्रणाम किया । सिकंदर बहुत घबराया हुआ था। वीर सिंह को देखकर तथा डरते हुए सिकंदर लोदी ने भी दंडवत प्रणाम किया। कबीर परमेश्वर जी ने दोनों के सिर पर हाथ रखा और कहा कि दोनों नरेश आज मुझ गरीब के पास कैसे आए हैं ? परमेश्वर कबीर जी ने अपना हाथ उठाया भी नहीं था कि सिकंदर का जलन का रोग समाप्त हो गया सिकंदर लोदी की आंखों में पानी आ गया।  

सुक्ष्मवेद में लिखा है

मासा घटे न तिल बढे, विधना लिखे जो लेख।
सच्चा सतगुरु मेटकर, ऊपर मारे मेख।।  
  

अर्थ: एक सतगुरु सच्चे साधक के गंभीर पापों को भी नष्ट कर देता है। सिकंदर लोदी के नियत पाप कर्मों को सर्वशक्तिमान कबीर जी ने निरस्त कर दिया था।

नोट: यह मन पापी है, यह शैतान-काल का एजेंट है। संत के सामने यह मन भाग जाता है और यह आत्मा ऊपर आ जाती है क्योंकि परमात्मा आत्मा का साथी है। कबीर साहिब जी कहते हैं

अंतर्यामी एक तू आत्म के आधार’.
सर्वशक्तिमान कबीर आत्मा के आधार हैं।

कबीर साहिब जी अपनी अमृतवाणी में कहते हैं

अति आधीन दीन हो प्राणी, ताते कहिये ये अकथ कहानी |
ऊँचे पात्र जल न जाई, ताते नीचा हूजै भाई |
आधिनी के पास है पूर्ण ब्रह्म दयाल | मान बढाई मारिये बे अदबी सिर काल।

कबीर परमेश्वर ने यहां पर एक तीर से दो शिकार किए । स्वामी रामानंद जी में धर्म भेदभाव की भावना शेष थी वह भी निकालनी थी रामानंद जी मुसलमानों को हिंदुओं से अभी भी भिन्न मानते थे। सिकंदर में अहंकार की भावना थी यदि वह विनम्र नहीं होता तो कबीर साहिब कृपा नहीं करते तथा सिकंदर स्वस्थ नहीं होता

सिकंदर लोदी द्वारा स्वामी रामानंद जी की हत्या उनके कर्मों का पूर्व-नियत आधार था। इस अधिनियम ने सिकंदर को दोषी बनाया। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ सिकंदर लोदी ने पैर पकड़कर छोड़े नहीं और रोता ही रहा परमेश्वर जानी जान होते हुए भी कबीर साहिब ने सिकंदर लोदी दिल्ली के बादशाह को माफ किया और स्वामी रामानंद जी को जीवित किया।

अभिमानी सिकंदर लोदी ने अपने उद्धारकर्ता भगवान कबीर का अनादर किया।

बंदी छोड़ कबीर परमेश्वर जी द्वारा अनेकों अनहोनी लीला करने से प्रभावित होकर 64 लाख शिष्य बने थे। परमेश्वर तो भूत भविष्य तथा वर्तमान की जानते हैं उनको पता था कि यह सब चमत्कार देखकर तथा इनको मेरे आशीर्वाद से हुए भौतिक लाभों के कारण मेरी जय जयकार कर रहे हैं इनको मुझ पर विश्वास नहीं है कि मैं परमात्मा हूं परंतु देखा देखी कहते अवश्य है कि कबीर जी हमारे सद्गुरु जी तो स्वयं परमात्मा आए हैं अपने लाभ भी बताते थे।

एक वैश्या थी जो काशी में बहुत बदनाम थी एक दिन उसे रात्रि के समय अपने घर की छत पर बैठी को कबीर परमेश्वर जी का सत्संग सुनने को मिला जो उसके मकान से कुछ ही दूरी पर किसी के घर पर किया गया था सत्संग वचनों से प्रभावित होकर वह कांपने लगी विचार किया कि मैंने तो अपना अनमोल जीवन व्यर्थ कर दिया बदनाम होकर जो धन संग्रह किया है वह यही रह जाएगा इस धन को संग्रह करने में जो पाप किए हैं यह मेरे साथ जाएंगे क्योंकि सत्संग में यही विचार बताए गए थे । वह बहन घर से निकलकर सत्संग स्थल पर गयी।  सदगुरुदेव कबीर जी से अपना परिचय बताया तथा कहा कि मैंने जीवन में प्रथम बार ऐसा ज्ञान सुना है मैं अपना कल्याण कराना चाहती हूं क्या मेरा कल्याण भी संभव है? गुरुदेव क्या मेरे जैसी पतित का भी उद्धार हो सकता है? इस जीवन से तो मैं मरना उचित समझती हूं मुझे ज्ञान नहीं था कि मैं मनुष्य जीवन के मूल उद्देश्य को छोड़कर नीच कर्म में लिप्त थी। उस लड़की की दास्तां सुनकर परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि बेटी! कपडा मैला है तो साबुन पानी से धोने से साफ हो जाता है जब तक साबुन पानी के संपर्क में नहीं आता तो उसके पाप कर्म रुपी मैल साफ नहीं होते । आप दीक्षा लो तथा पाप कर्म त्याग कर मर्यादा में रहकर साधना करो कल्याण अवश्य होगा।

परमेश्वर कबीर जी सत्संग में बताते थे कि

कुष्टी होवे संत बंदगी कीजिये |
 हो वैश्या के विश्वास चरण चित दीजिये ||

अर्थ: यदि सत्संग में कोढी भी आता है तो उसको भी करबद्ध प्रणाम करना चाहिए यदि वैश्या भी सत्संग में विश्वास के साथ आती है तो उसका सत्कार कीजिए।  उसके चेहरे पर निगाह ना करके अपनी माता बहन की तरह देखें सामने देखने की बजाय पैरों की ओर नीची नजर से देखें।

एक दिन परमेश्वर कबीर जी ने शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही की देखूं तो कितने ज्ञान को समझे हैं यदि इनको विश्वास ही नहीं है तो यह मोक्ष के अधिकारी नहीं है।  यह तो मेरे सिर पर व्यर्थ का भार है । यह विचार करके एक योजना बनाई अपने परम शिष्य रविदास से कहा कि एक हाथी किराए पर लाओ उस वैश्या लड़की जिसने परमेश्वर कबीर जी से नाम उपदेश ग्रहण कर लिया था से कहा कि बेटी आप मेरे साथ हाथी पर बैठकर चलोगी लड़की ने कहा जो आज्ञा गुरुदेव अगले दिन सुबह लगभग 10:00 बजे हाथी के ऊपर तीनों सवार होकर काशी नगर के मुख्य बाजार में से गुजरने लगे।  संत रविदास जी हाथी को चला रहे थे लड़की रविदास जी के पीछे कबीर जी के आगे यानी दोनों के बीच में बैठी थी कबीर जी ने एक बोतल में गंगा का पानी भर लिया उस बोतल को मुख से लगाकर घुट घुट पी  रहे थे लोगों को लगा कि कबीर जी शराब पी रहे हैं शराब के नशे में वैश्या को सरेआम बाजार में लिए घूम रहे हैं काशी के व्यक्ति एक दूसरे को बता रहे हैं कि देखो बड़े-बड़े उपदेश दिया करता कबीर जुलाहा आज इसकी पोल पट्टी खुल गई है यह लोग सत्संग के बहाने ऐसे कर्म करते हैं काशी के व्यक्ति कबीर जी के शिष्यो को पकड़ पकड़ कर दिखा रहे थे कि देख तुम्हारे परमात्मा की करतूत शराब पी रहे हैं वैश्या को लिए सरेआम घूम रहा है यह लीला देखकर वह चौसठ लाख नकली शिष्य कबीर जी को त्याग कर चले गए पहले वाली साधना करने लगे लोक लाज में फंसकर गुरु विमुख हो गए।

उनके अविश्वास ने उन्हें ईश्वर से दूर कर दिया, कोई भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सका लेकिन भक्ति का बीज बोया गया।

कबीर परमेश्वर जी की यह लीला देखकर काशी के लोग कहने लगे कि यह जुलाहा भ्रष्ट हो गया है हजारों की संख्या में जनता राज दरबार के सामने जाकर कबीर जी को सजा दो के नारे लगाने लगी उस दिन दिल्ली का सम्राट सिकंदर लोदी भी काशी में आया था उस दिन राज दरबार में ही उपस्थित था  जनता की शिकायत सुनी तो सिकंदर राजा क्रोधित होकर बोला कि कबीर को बुलाकर लाओ, परमात्मा को सिपाही पकड़ कर लाए। सिकंदर राजा ने कहा कि हे कबीर जी! यह क्या गलती कर दी आपकी भक्ति में विघ्न पड़ गया है आपने वैश्या को साथ लेकर महान गलती की है। कबीर जी ने कहा कि हे बादशाह! मेरी अर्ज सुनो मेरी तथा मेरे भक्ति की रक्षा भी वही करेगा जिसने यह कर्म मेरे से करवाया है जिसने सर्व सृष्टि की रचना की है।

कहो, कबीर यह क्या किया, गणिका लीन्ही संग | गरीबदास, शाह कह, पड़या भक्ति में भंग ||
कह कबीर शाह से सुनो अर्ज आवाज़ | गरीबदास, वह राखसी जिन्ह यो साज्या साज।।

सिकंदर लोदी ने जनता को शांत करने के लिए अपने प्राण दाता का भी अनादर किया। अपने हाथों से कबीर जी के हाथों में हथकड़ी लगाई पैरों में बेड़ी तथा गले में तौक( लोहे की भारी बेल )डाली और आदेश दिया कि जनता की इच्छा अनुसार नौका में बैठाकर गंगा दरिया के मध्य में डालकर डुबोकर मार दो। राजा की आज्ञा मिलते ही सिपाही तथा जनता के कुछ व्यक्ति कबीर जी को नौका में बैठाकर गंगा दरिया के मध्य ले जाकर  दरिया के जल में फेंक दिया। गंगा दरिया में अथाह जल था । कबीर परमेश्वर जी की हथकड़ी , बेड़ी तथा गले की तौक अपने आप टूट गई। कबीर परमेश्वर जी जल के ऊपर सुखासन लगाकर बैठे रहे। जल में डूबे नहीं ।यह अचरज देखकर भी उन मूर्खो ने परमेश्वर को नहीं समझा उनके साथ राजा सिकंदर का धार्मिक पीर शेख तकी भी था जिसने यह मोर्चा संभाल रखा था उसने कहा कि यह कबीर जंत्र मंत्र जानता है इसने जल को बांध दिया है इसलिए नहीं डूब रहा है। इसको नौका में बैठकर किनारे लाओ ऐसा ही किया गया शेख तकी ने कहा कि इसके शरीर के साथ भारी पत्थर बांधकर गंगा के मध्य ले जाकर जल में फेंक दो ऐसा ही किया गया । इस बार भी सब पत्थर बंधन मुक्त होकर जल में डूब गए परंतु परमेश्वर कबीर जी जल के ऊपर सुखासन लगाए बैठे रहे नीचे से गंगाजल की लहरें बह रही थी परमेश्वर आराम से जल के ऊपर बैठे थे।

शेख तकी ने वहाँ मौजूद सभी लोगों को कबीर जी पर पथराव करके मारने का आदेश दिया। वही किया गया लेकिन अल्लाह कबीर को कुछ नहीं हुआ।

तीरंदाजों को कबीर जी को मारने का आदेश दिया गया था, लेकिन कोई तीर उन्हें छू भी नहीं सकता था, बल्कि उनकी दिशा बदल गई।

लगातार 12 घंटे तक, सैनिकों ने मारने के लिए कबीर जी पर तोप के गोले दागे, लेकिन कोई भी उन्हें छू नहीं सका, बल्कि वे सभी अलग-अलग दिशाओं में गिर गए या सर्वशक्तिमान कबीर की शक्ति से घिर गए। लोगों के विवेक को धार्मिक नेताओं ने नष्ट कर दिया। फिर भी, कोई भी कबीर परमात्मा को पहचान नहीं सका। कबीर जी ने उन पर दया की और 12 घंटे के बाद उन्होंने खुद को पानी में डुबो दिया ताकि थके हुए सैनिकों को आराम करना चाहिए। शेख तकी खुश हो गए कि आखिरकार कबीर डूब गए और मारे गए।

"खूनी हाथी से मरवाने की व्यर्थ चेष्टा"

शेख तकी अपने प्रशंसकों के साथ संत रविदास जी की कुटिया पर पहुंचा तो देखा कबीर जी उपस्थित थे और एकतारे से शब्द गा रहे थे। शेख तकी की तो मा सी मर गई शर्म और क्रोध वश होकर सीधा सिकंदर लोदी राजा के पास विश्राम गृह में गया तथा बताया कि कबीर ना तो जल में डूबा ना तोप से मरा ।अबकी बार इसको जनता के सामने खूनी हाथी से मरवाते हैं नगर में मुनादी कर दी कि कल सुबह 10:00 बजे कबीर को खूनी हाथी से कुचलवाकर मारा जाएगा सब देखने आना।शेख तकी पीर ने महावत से कहा कि हाथी को एक दो शीशी शराब की पिला दो ताकि शीघ्र कबीर को मार डाले ऐसा ही किया गया तीनों ओर दर्शकों की भीड़ थी हाथी को लेकर महावत कबीर जी की ओर चला तो हाथी मस्ती में भरकर कबीर परमेश्वर को मारने चला कबीर जी के हाथ पैर बांधकर पृथ्वी पर डाल रखा था जब हाथी परमेश्वर कबीर जी से 10 कदम दूर रह गया तो परमेश्वर कबीर के पास बब्बर शेर खड़ा केवल हाथी को दिखाई दिया हाथी डर से चिल्लाकर दुम दबाकर मुंडी धुन कर वापस भागने लगा तो महावत ने उसको अंकुश मारा  परंतु हाथी परमेश्वर कबीर जी की और ना जाकर अन्य दिशा की भागने की कोशिश कर रहा था तो परमेश्वर कबीर जी ने महावत को भी सिंह के दर्शन करा दिए डर के मारे वह भी हाथी से गिर गया ।हाथी भाग गया । परमेश्वर कबीर जी के सब रस से टूट गए और परमात्मा खड़े हुए तथा इतने लंबे बढ़ गए कि आसमान को लगे दिखाई दे रहा था शरीर से अजब प्रकाश निकल रहा था उसे देखकर दिल्ली का सम्राट सिकंदर भयभीत होकर मचान से उतरकर परमेश्वर के चरणो में गिर गया और बोला कि सिर्फ अबकी बार मेरा गुनाह क्षमा कर दो यह दृश्य केवल सिकंदर राजा को ही नजर आ रहा था फिर कबीर जी ने अपना सामान्य स्वरूप बना लिया और राजा को समझा कर अपनी कुटिया पर चले गए।

सिकंदर राजा को तथा वीर सिंह बघेल राजा को कबीर जी के चरणों में गिरते देख शेख तकी ईर्ष्या से जल भुन गया तथा उपस्थित जनता से कहा कि कबीर जी ने जंत्र मंत्र करके हाथी को भगा दिया।

सूक्ष्म वेद में लिखा है

कबीर, राज तजना सहज है, सहज तरिया का नेह, मान बढाई ईर्ष्या, दुर्लभ तजना ये !

शेख तकी ने परमेश्वर कबीर जी के साथ 52 बदमाशी की लेकिन हर बार निष्फल रहा।

सर्वशक्तिमान कबीर जी ने सिकंदर लोदी की उबलते तेल में जलकर अलग हुई उंगली ठीक की।

ईर्ष्यालु शेख तकी ने कबीर जी को उबलते हुए तेल में जलाने की साजिश रची, लेकिन कबीर जी उस उबलते हुए तेल में ऐसे बैठ गए जैसे तेल बिल्कुल ठंडा हो । उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ। शेख तकी ने फिर कहा कि कबीर एक जादूगर हैं। उसने जादू से तेल ठंडा किया है। सिकंदर लोधी ने तेल के तापमान को जांचने के लिए सोचा कि अगर यह वास्तव में गर्म है, तो "कबीर गर्म तेल में कैसे बैठ सकते हैं"। सिकंदर लोधी ने तेल को ठंडा मानते हुए अपनी उंगली डुबो दी और तुरंत उसकी उंगली जल गई और अलग हो गई। अपार पीड़ा के कारण सिकंदर लोदी बेहोश हो गया। भगवान कबीर ने उसकी उंगली ठीक की। तब सुल्तान ने अल्लाह कबीर की शरण ली और मोक्ष की प्राप्ति के योग्य बन गए।

अल्लाह कबीर ने सिकंदर लोदी और हजारों लोगों के सामने एक मृत लड़के के जीवन को बहाल किया और उसका नाम 'कमाल' रखा। इसी तरह, शेख तकी की चुनौती पर, अल्लाह कबीर ने एक बेटी के जीवन को बहाल किया। उसे 'कमाली' नाम दिया गया । इसके बाद, अल्लाह कबीर ने 'कमाल' और 'कमाली' दोनों को अपने बेटे और बेटी के रूप में पाला।

निष्कर्ष

कोई आत्मा अपने जीवन में यदि एक बार भी अल्लाह कबीर की शरण में आती है, तो वह अपनी मुक्ति सुनिश्चित करता है, फिर मानव जन्म को प्राप्त नहीं करती है। वह 'बाखबर' के रूप में सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते है और साधक को सच्चे मंत्र प्रदान करके मोक्ष प्राप्ति के योग्य बनाते है। सच्ची उपासना के साथ, आत्मा आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करती है जो उसे जन्म और पुनर्जन्म के दुष्चक्र से छुटकारा दिलाने में मदद करती है और शाश्वत दुनिया 'सतलोक' का स्थायी निवासी बन जाती है । सिकंदर लोदी एक ऐसी पवित्र आत्मा थे जिन्होंने अल्लाह कबीर की शरण ली थी।

तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज वही अल्लाहु अकबर है परमेश्वर कबीर जी एक बाखबर के रूप में अपना तत्वज्ञान अपने मुख कमल से उच्चारण करते हैं। अतः आप सभी से अनुरोध है जल्द ही पूर्ण परमात्मा कबीर जी को पहचाने तथा तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी की शरण ग्रहण करें और अपना कल्याण कराए।