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सत साहिब! परमात्मा कबीर जी की प्यारी संगत और विश्व की सारी संगत को दास का आशीर्वाद है। परमात्मा आपको अपनी शरण में रखे, काल के कष्ट से आपकी रक्षा करे। मनुष्य जीवन का जो मेन (मुख्य) उद्देश्य होता है, वह आत्म कल्याण का ही होता है। इंसान आत्म कल्याण की परिभाषा ही भूल चुका है। आत्मा को काल के इस लोक से छुड़ाकर अपने निज घर सतलोक में ले जाना, यही आत्म कल्याण है।

काल ने हमारी बुद्धि के ऊपर इतना प्रेशर (दबाव) दे रखा है कि हमें अपनी संतान, संपत्ति और दो रोटी के साधन के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता। यह दबाव तब तक रहेगा, जब तक हम समर्थ की शरण में नहीं आते। समर्थ कौन है? उस समर्थ का अभी तक ज्ञान नहीं था। काल ने अपनी तरफ से इतना अंधेरा कर रखा है कि न तो भक्ति मार्ग छोड़ रखा है और न ही धर्म-कर्म की सही विधि बता रखी है।

सबसे बड़ा अभाव सतगुरु का होता है। वर्तमान में यह स्थिति बहुत ही खतरनाक है। सतगुरु वह होता है जो अध्यात्म का संपूर्ण नॉलेज (ज्ञान) रखता हो। काल ने सबसे पहले यही किया कि इस मानव को इतना भ्रमित कर दूं कि इसे न तो भगवान का ज्ञान रहे और न ही अपनी सुध रहे; यह बकवासों में लगा रहे, नाचे-कूदे, गाए, बकवास करे और कष्ट आ जाए तो रोने बैठ जाए। वहीं, परमेश्वर, जो हमारे पिता हैं, जनक हैं और जो हमारे अपने हैं, उनका एक ही उद्देश्य है कि इन नालायकों को अपनी शरण में लूं।

शरण में आते ही काल का कष्ट हट जाता है, क्योंकि समर्थ के सामने इस काल की कोई पेश नहीं चलती (पार नहीं बसाती)। तो प्रसंग यह था कि सबसे पहले हमें यही नहीं पता कि समर्थ कौन है। वैसे तो विश्व में यदि कहीं पर थोड़ी बहुत भक्ति और अध्यात्म का नॉलेज है, तो वह भारतवर्ष में ही है। हमारे ग्रंथ, वेद और गीता एक अनमोल जड़ी हैं। यह अध्यात्म का अनमोल खजाना हैं। रामायण, महाभारत और पुराण सहयोगी ग्रंथ हैं, गीता तथा वेद जो हैं, ये अध्यात्म का गॉड गिवन (प्रभुदत्त) नॉलेज (ज्ञान) हैं। गॉड गिवन कैसे हैं? वक्ता तो कोई भी हो सकता है, लेकिन जो ज्ञान का दाता है, वह कबीर परमेश्वर है। वह पूर्ण ब्रह्म परमात्मा, परम अक्षर ब्रह्म है।

उसने सबसे पहले इस काल भगवान को सूक्ष्म वेद दिया था और इस नालायक आत्मा ने...। यह तो जालिम है। यह विले़न है, जिसको ब्रह्म कहते हैं। ब्रह्म से ऊपर परब्रह्म और परब्रह्म से ऊपर परम अक्षर ब्रह्म है। जो परम अक्षर ब्रह्म है, जिसका प्रमाण गीता के अध्याय आठ, श्लोक तीन में है, वही समर्थ और सक्षम है। गीता के अध्याय आठ, श्लोक पांच, छह और सात में ब्रह्म ने अपनी जानकारी दी है कि मेरी शरण में रहोगे तो मुझे प्राप्त होगे। अध्याय आठ के श्लोक आठ, नौ और दस में उस सच्चिदानंद घन ब्रह्म (परम अक्षर ब्रह्म) की जानकारी दी गई है। उसकी शरण में जाओगे, तो उसी को प्राप्त होगे।

उसे प्राप्त होने के विषय में गीता के अध्याय 15, श्लोक चार में कहा गया है कि तत्व ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जहां जाने के बाद साधक फिर लौटकर संसार में नहीं आते। तो जब हम वहां सतलोक में चले जाएंगे, तब हमारा जन्म-मरण और कष्ट मिटेगा। अब प्रश्न यह चल रहा है कि हमें सक्षम का ही नहीं पता था कि समर्थ और सक्षम है कौन?

अध्यात्म केवल भारत में है। बाकी किसी भी कंट्री (देश) में अध्यात्म नहीं है। वह तो अपने-अपने स्तर का अध्यात्म ज्ञान है। यह गॉड गिवन (ईश्वरीय) ज्ञान जो गीता और वेद का ज्ञान है, यह क्यों है?
 

परम अक्षर ब्रह्म, जो सतयुग में सत सुकृत नाम से प्रकट होते हैं, त्रेता में मुनिंदर नाम से, द्वापर में करुणामय नाम से और कलयुग में कबीर नाम से आते हैं; उनका असली नाम कबीर है। सतलोक में भी कबीर हैं। जैसे वेदों में 'कवि'+उपसर्ग लगा दिया। 'क' और 'वि' (छोटे इ की मात्रा), और उपसर्ग को हम 'र्' लिख सकते हैं (र और नीचे हलंत लगा दें), तो 'कविर्' (कबीर) हो गया। हम अपनी भाषा में उसको कबीर कहने लगे। तो सबसे पहले उस कबीर देव (कबीर साहेब) ने, जो काशी में 120 वर्ष जुलाहे की भूमिका करके अपना संपूर्ण अध्यात्म ज्ञान (Complete Spiritual Knowledge) देकर गए थे, उन्होंने यह संपूर्ण अध्यात्म ज्ञान इस काल ब्रह्म (क्षर पुरुष) को दिया था और इसके अंतःकरण में फीड कर (डाल) दिया था।

और बच्चों, आजकल तो अध्यात्म को समझना बहुत आसान है, क्योंकि साइंस (विज्ञान) से हम समझ जाएंगे। एक इतनी बड़ी वीडियो होती है, वहाँ से शेयर कर देते हैं, एक सेकंड में दूसरे के कंप्यूटर या मोबाइल में आ जाती है। ऐसे ही पीडीएफ भी कितनी भेज दो, आराम से देखो। इसी प्रकार, परमात्मा ने यह संपूर्ण अध्यात्म ज्ञान इस काल ब्रह्म के अंतःकरण में डाल दिया। इसने सांसों के द्वारा इसे बाहर निकाला। और यह निकलना ऑटोमेटिक (स्वचालित) होता है; जैसे पेट में बच्चा होता है, समय आने पर अपने आप बाहर आ जाता है, रोके नहीं रुकता। इसी प्रकार, परमात्मा ने जो अपने सूक्ष्म तरीके से यह ज्ञान काल ब्रह्म को दिया, तो अपने आप समय आने पर वह बाहर आ गया।

अब बहुत सी समस्याएं हैं, क्योंकि जिनमें नॉलेज (ज्ञान) ही लिटिल (थोड़ा) है, वे ऑब्जेक्शन (आपत्ति) ही करते हैं। कोई कहता है कि उस समय किस चीज पर लिखा, कैसे लिखा, कोई कागज नहीं थे। कमाल की बात है! उस समय पृथ्वी भी न थी, पेड़-पौधे भी न थे। तो भगवान को बनाते क्या देर लगती है? वह कुछ भी कर सकता है। तो पूरा का पूरा जो अध्यात्म नॉलेज था, वह एक ही था।

एक वेद कहो या ज्ञान कहो (वेद का अर्थ ही ज्ञान होता है)। यह एक ही ज्ञान था। काल ने ऐसा जुल्म किया। इस ब्रह्म ने, जो गीता अध्याय आठ श्लोक 13 में कहता है:

"ओम् इति एकाक्षरम् ब्रह्म व्याहरन् माम् अनुस्मरन्।

यः प्रयाति त्यजन् देहम् स याति परमां गतिम्।।"

 

अर्थात मुझ ब्रह्म का केवल 'ओम' नाम है, इसकी जो साधना करेगा, अंतिम सांस तक, वह ओम से होने वाली परम गति प्राप्त करेगा। ओम से क्या गति होती है? देवी भागवत में लिखा है, हिमालय को ज्ञान देते हुए देवी जी ने बताया कि, "और सब बातें छोड़ दे राजा, केवल ओम का जाप कर, ओम ब्रह्म का जाप है।"

वह ब्रह्म ऊपर ब्रह्मलोक में रहता है। और गीता अध्याय आठ, श्लोक 16 में कहा है कि ब्रह्मलोक में गए हुए भी वापस आते हैं, उनकी जन्म और मृत्यु होती है। गीता अध्याय 15, श्लोक 4 में कहा है कि तत्व ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद साधक फिर लौटकर वापस संसार में नहीं आता।

तो वह जो ज्ञान था, इस काल (जालिम) ने उसमें से मेन-मेन (मुख्य) निकाल दिया और अपने स्तर का छोड़ दिया। परमात्मा की नॉलेज भी छोड़ दी। अब देखो, नॉलेज छोड़ दी; नॉलेज तो इतना होता है कि भाई कोई आम आदमी या डॉक्टर ही बता दे कि आपको यह तकलीफ है (उस दर्द का स्वयं को पता होता है कि मुझे क्या कष्ट है)। बता दिया कि आपको शरीर में यह समस्या है, और दवाई (मेडिसिन) है नहीं। तो उस नॉलेज का क्या करें?

वेद के अंदर, पहले काल ब्रह्म ने भी ऋषियों को एक ही वेद दिया था। उन्होंने शुरू से ही इसको कंठस्थ याद किया। उसके बाद द्वापर में आकर वेदव्यास जी ने इसके चार विभाग किए और उसको ताड़ पत्रों पर लिखा। तो काल ब्रह्म ने क्या किया, उसमें से वह जड़ी निकाल दी, भगवान को पाने की विधि खत्म कर दी। अपने स्तर की भक्ति विधि दे दी 'ओम'।

यजुर्वेद अध्याय 40, मंत्र 15 में है-

"ओम् क्रतो स्मर, क्लिबे स्मर, कृतम् स्मर।"

तो केवल ओम नाम का जाप दे दिया। ओम नाम से आपको बता दिया कि ब्रह्मलोक मिलता है, और ब्रह्मलोक से वापस फिर आना पड़ता है। जन्म-मृत्यु से कभी छुटकारा नहीं मिलता।

अब जो गीता अध्याय 17, श्लोक 23 में कहा है कि-

 

"ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत: ।

ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा ॥"

 

उस सच्चिदानंद घन ब्रह्म (परम अक्षर ब्रह्म) को पाने का तीन मंत्र का जाप है। तीन नाम का जाप। ब्राह्मणा (ब्राह्मण) का अर्थ यह नहीं होता कि यह कोई जाति विशेष है। जो परमात्मा पाने का प्रयत्न कर रहा है, वह भगत कहलाता है; भगत का अर्थ ही ब्राह्मण है। "ब्राह्मण सो जो ब्रह्म पहचाने", जिसने भगवान को पहचान लिया, जान लिया, वह ब्राह्मण है। पंडित है जो पिंड (शरीर) की जाने। पंडित एक शास्त्री के इक्विवेलेंट (समतुल्य) होता है। जो कोई विद्यापीठ में पढ़कर शास्त्री बन गया, वह पंडित होता है।

तो ऐसे अध्यात्म का काम खराब हुआ। इसने जो 'ॐ तत् सत्' बताया, ये तीनों के तीनों कोड वर्ड (सांकेतिक शब्द) हैं। 'ॐ' (उ अ ऊ घुमा के ऊपर चाँद सा लगा दिया, बिंदी लगा दी), बिना किसी के बताए कि यह ओम है, इसे समझ नहीं सकते। इसका तो हमें पता लग गया कि यह ओम बन गया है, इसलिए हम इस गोल-गोल आकृति को भी ओम कह देते हैं। लेकिन यह ओम नहीं है, यह बोला नहीं जा सकता, हमें पता है कि यह ओम का कोड वर्ड है। इसी प्रकार 'तत्' भी सांकेतिक है, कोड वर्ड है, और 'सत्' भी कोड वर्ड है। 'तत्' जो है, वह 'सोहं' शब्द है। और जो 'सत्' है, वह सत्य होता ही है, उस अविनाशी का नाम/मंत्र है। यह यहाँ नहीं बताएँगे।

और ऐसे ही पाक कुरान के अंदर सूरह 42 की आयत में (आयत माने श्लोक, सूरह माने चैप्टर), 42वें चैप्टर की आयत नंबर एक में है 'हा-मीम'। 'हा' अरबी भाषा का अक्षर है (जैसे हमारे क, ख, ग होते हैं, ऐसे हा है), फिर 'ऐन-सीन-काफ'। अरबी का 'ऐन' हिंदी का 'अ' है। जैसे पंजाबी बोलते हैं ना (ऊड़ा, ऐड़ा, ईड़ी, सस्सा, हाहा), कक्का 'क' है, गग्गा 'ग' है।

इसी प्रकार यह जो 'ऐन' है, यह हिंदी का 'अ' है, 'सीन' जो है वह 'स' है, और 'काफ' जो है वह 'क' है। तो ये हमारे इन तीनों मंत्रों के प्रथम अक्षर हैं। 'ओम' का 'अ' (ऐन) हो गया। 'सोहं' का 'स' (सीन) हो गया। और 'काफ' (माने क), यह सार नाम का प्रथम अक्षर है।

दर्शकों, यह है पवित्र कुरान शरीफ की सूरह अश-शूरा 42 की आयत नंबर एक और दो, जिसमें आप देख सकते हैं कि 'हा-मीम' और 'ऐन-सीन-काफ' अक्षरों का अर्थ नहीं किया गया है। आइए, इसे विस्तार से समझाते हैं। सबसे पहले पहली आयत को समझते हैं। 'हा' अरबी वर्णमाला का अक्षर है, जो देवनागरी यानी हिंदी वर्णमाला का 'ह' अक्षर है। 'मीम' अरबी वर्णमाला का अक्षर है, जो देवनागरी यानी हिंदी वर्णमाला का 'म' अक्षर है। यानी सीधा संकेत किया गया है कि 'हा' को डिकोड करने के बाद जो निकल कर सामने आएगा, वो 'ह' अक्षर से शुरू होगा। और 'मीम' को डिकोड करने के बाद जो निकल कर सामने आएगा, वो 'म' अक्षर से शुरू होगा।

दर्शकों, अब आपको बता दें कि 'हा' अक्षर 'हक' शब्द का कोड वर्ड है और 'मीम' अक्षर 'माबूद' शब्द का कोड वर्ड है। यानी 'हा-मीम' को डिकोड करने के बाद निकला 'हक माबूद', जिसका अर्थ है यथार्थ पूजा। अगर हम इसके साथ आयत दो भी जोड़कर देखते हैं, तो और साफ तस्वीर निकल कर सामने आती है। इन दोनों आयतों को मिलाकर बना,  'हक माबूद के ऐन-सीन-काफ' मंत्र; मतलब, यथार्थ पूजा के 'ऐन-सीन-काफ' मंत्र हैं।

आइए, अब दूसरी आयत के रहस्य से भी पर्दा उठाते हैं। 'ऐन' अरबी भाषा की वर्णमाला का अक्षर है, जो देवनागरी (हिंदी) वर्णमाला का 'अ' अक्षर है। 'सीन' अरबी भाषा की वर्णमाला का अक्षर है, जो देवनागरी (हिंदी) भाषा का 'स' अक्षर है। इसी तरह 'काफ' भी अरबी वर्णमाला का अक्षर है, जो देवनागरी (हिंदी) वर्णमाला का 'क' अक्षर है। दर्शकों, यहाँ रहस्य की बात यह है कि गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में परम अक्षर ब्रह्म (यानी पूर्ण परमात्मा) को पाने के जो 'ॐ तत् सत्' मंत्र बताए गए हैं, यह उनके वास्तविक मंत्रों के प्रथम-प्रथम अक्षरों का संकेत है। जैसे 'ओम' का पहला अक्षर 'अ' है, कुरान शरीफ में इसी 'ओम' को 'ऐन' कहा गया है। यानी यह 'ऐन' अक्षर 'ओम' का कोड वर्ड है। इसी प्रकार जो 'तत्' नाम है, उसका वास्तविक मंत्र 'सोहं' है, जिसको कुरान शरीफ में 'सीन' कहा गया है। यानी 'स' अक्षर 'सोहं' शब्द का प्रथम अक्षर है, जो कुरान शरीफ में लिखे 'सीन' अक्षर का कोड वर्ड है। इसी प्रकार कुरान शरीफ में बताया गया 'काफ' अक्षर, गीता में बताए गए तीसरे 'सत्' मंत्र के वास्तविक मंत्र का पहला अक्षर है, जो कि कोड वर्ड है। इसका खुलासा यहाँ नहीं किया जा सकता।

इन दोनों आयतों को डिकोड करने के बाद जो निकल कर सामने आया है, वो है, 'यथार्थ पूजा के ऐन-सीन-काफ मंत्र हैं'। और यह मंत्र व इनका जाप करने की विधि केवल संत रामपाल जी महाराज ही बता सकते हैं। दर्शकों, यदि आपको मोक्ष पाना है, तो धर्म व पंथ की सीमाओं से ऊपर उठकर एक होना पड़ेगा और इन तीन नाम के मंत्रों का जाप करना होगा।

सूरह फुरकान 25, आयत 59 में कहा है कि जिस परमात्मा ने छह दिन में सृष्टि की रचना की और सातवें दिन तख्त पर जा विराजा, वह स्वयं कबीर परमात्मा है। उसकी खबर किसी बाखबर (यानी कि तत्वदर्शी संत) से पूछो।

दर्शकों, मजे की बात यह है कि गीता जी में भी अध्याय चार, श्लोक 34 में तत्वदर्शी संत के पास जाने को कहा गया है। ये है वह मेन जड़ी (दवाई), इसके बिना रोग नहीं कटता, केवल नॉलेज देना सेपरेट इशू (अलग बात) है, और रोग काटने की दवाई देना मेन इशू (मुख्य बात) है। तो यह मेन इशू जो था, उसे इस पापात्मा (काल) ने खत्म कर दिया। इसके लिए समर्थ को आना पड़ता है।

"सतगुरु आए दया करी, ऐसे दीन दयाल।

बंदी छोड़ बिरद तास का, जठराग्नि प्रतिपाल।।"

 

सतगुरु आए, दया करी, हम पापियों के ऊपर रहम किया। वह परमपिता इतने गंदे लोक में आए, अपनी सतलोक राजधानी को छोड़कर आपके लिए; क्योंकि आप उसके बच्चे हो, और अपनों का दुख अपनों को ही होता है।

यह काल तो तुम्हें मजदूर बना रहा है। सबसे ज्यादा मूर्ख बना रखा है आपको। ठाट दे दिए कि बेटा-बेटी हो गए, कार-कोठी हो गई, अच्छा कोई व्यवसाय (बिजनेस) हो गया, कोई नौकरी मिल गई, तो इंसान माचा-माचा (अहंकार में) फिरता है। एक मिनट में मृत्यु हो जाए, तो कहाँ गया सब?

 

"दृष्टि पड़े सो धोखा रे, खंड पिंड ब्रह्मण्ड चलैंगे, थिर ना रहसी लोका रे।।"

 

यह खंड-पिंड, ये ब्रह्मांड, काल के सारे नष्ट होंगे, और तुम इस थोड़े से जीवन में इतना उधम मचाते हो! इस सारे का एक ही निष्कर्ष निकलता है,  सतगुरु पूरा हो और भगत कुर्बान (समर्पित) हो, फिर मोक्ष में कोई दिक्कत नहीं।

अब "सतगुरु आए दया करी, ऐसे दीनदयाल।" और 'बंदी छोड़' का अर्थ है, काल के जाल से छुड़वाना, जो उनका स्वभाव है। और 'जठर अग्नि प्रतिपाल', माँ के पेट में जहाँ जठराग्नि जलती है, इतना भारी टेंपरेचर (तापमान) होता है, वहाँ एक मासूम शिशु को परिपूर्ण करते हैं और वहाँ पालन-पोषण करते हैं। माँ के पेट में पालन-पोषण करना, कितनी जबरदस्त टेक्निक (तकनीक) है उस परमपिता की!

परमात्मा यह बताना चाहते हैं कि तू मेरी शरण में आकर समर्पित रह। जैसे गर्भ में बालक को भगवान के अतिरिक्त किसी का सहारा नहीं होता; न माँ का कोई सहारा है, न पिता का, न परिवार का। वहाँ केवल भगवान और आत्मा, बस ये दो ही होते हैं। इसी प्रकार जब तू भक्ति मार्ग में यह समझ लेगा कि मेरा तो भगवान के अतिरिक्त कोई नहीं है (भले ही परिवार है, सब कुछ है, संसार है, व्यवसाय है, लेकिन भगवान के बिना कोई नहीं है)। यह बात जब तू मन में, दिल में गाँठ बाँध लेगा, तब वह साथ देगा। जब तक हम सोचते हैं कि यह कर देगा, वह कर देगा... ठीक है, किसी न किसी के माध्यम से करवाना तो होता है, पर करने वाला भगवान ही होता है।

तो इस प्रकार बच्चों, जब वह इतना सक्षम है, इतना समर्थ है कि उसने माँ के पेट में पाला, तो क्या अब नहीं पालेगा? क्या अब वह भगवान नहीं रहा? आज भी वही है। बाहर आते ही, जब तक दांत खाने योग्य नहीं हुए, तब तक माँ के स्तनों में दूध दे दिया कि पियो और जूठा छोड़ो। जब थोड़ा सा बड़ा हुआ, दांत आ गए, तो रोटी खाओ। तो वह देने वाला वही है।

जब हम उसकी शरण में आ जाएंगे, तो फिर घर बैठे ठाठ-बाठ कर देगा। हम उसकी शरण में नहीं हैं, तो भी सबका भरण-पोषण वही करता है, क्योंकि व्यवस्थापक वही है। जैसे पौधे की जड़ से ही खुराक (आहार) चलती है और ऊपर टहनियों तक जाती है, इसी प्रकार यह गीता

अध्याय 15 श्लोक 17 में बताया है-

"उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।

यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।"

 

अर्थात उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जिसे परमात्मा कहा जाता है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है और जो अविनाशी भगवान है। गीता बोलने वाला ही कह रहा है कि वह परमात्मा कोई और है, जो सबका धारण-पोषण करता है। गीता अध्याय आठ, श्लोक नौ में भी यही प्रमाण है कि वह परमात्मा सबका धारण-पोषण करने वाला सच्चिदानंद ब्रह्म है। उसकी भक्ति करने वाला उसी को प्राप्त होता है।

अब हमारी बुद्धि/अकल इतनी मोटी हो गई है! कहते हैं कि गीता श्री कृष्ण ने बोली, और श्री कृष्ण कह रहा है कि भगवान कोई और है। ये अनाड़ी धर्मगुरु कहते हैं कि कृष्ण ही अपने बारे में कह रहा है। हद हो गई भाई! 

जैसे एक मंत्री कहता है कि "यह मेरे बस का काम नहीं है, यह मुख्यमंत्री जी हैं, उनके पास जा।" लेकिन जो बिचौलिये होते हैं, वे नाश करने वाले होते हैं। उन्हें तो अपना स्वार्थ होता है कि यह मेरे चुंगल में फंसा रहे। वह यह नहीं कहेगा कि यह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री है। मंत्री अपने पास बुलाता है, जबकि गीता बोलने वाला कहता है कि "उसकी शरण में जा, उसके पास जा, वह काम करेगा।" तो इन धर्मगुरुओं की बुद्धि इस टाइप (प्रकार) की है। शंकराचार्य से लेकर जितने आज कथावाचक बने बैठे हैं, इन्हें कखग (कुछ भी) पता नहीं अध्यात्म का! और जब हम सच्चाई कहते हैं, तो इन्हें मिर्ची लगती है। पर लगती रहे! यह सच्चाई तो सामने आएगी ही। 

इन अज्ञानियों को लास्ट (अंत) में नतमस्तक होना पड़ेगा, जितने ये धर्मगुरु बने फिरते हैं, जिन्होंने दुनिया का नाश कर दिया। 

जरा सा दिमाग लगाओ, एक श्वास की कीमत देखो! कबीर साहेब कहते हैं:

 

"श्वास-श्वास में नाम जपो, व्यर्थ श्वास ना खोए।

ना जाने या श्वास का, आवन हो कि ना होए।।"

 

कबीर जी कहते हैं,

"कहता हूँ, कहि जात हूँ, कहूँ बजा कर ढोल।

श्वास जो खाली जात है, तीन लोक का मोल।।"

 

मनुष्य जीवन का एक श्वास स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक और पाताल लोक के बराबर है! एक श्वास मनुष्य जीवन का! और कितने श्वास लेते हैं हम जीवन में? तो इस मनुष्य जीवन की कीमत देख लो कितनी है, चाहे बेटा हो या बेटी।

इतने अनमोल जीवन को ये दुष्ट लोग, जितने भी संत और गुरु बने बैठे हैं, बर्बाद कर रहे हैं। अपने स्वार्थवश और अपनी महिमावश... क्या कीमत है इस जीवन की! आज के दिन यदि मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा कोई दुश्मन है, तो ये धर्मगुरु हैं। चाहे ये किसी के भी हों, इनको ज्ञान तो 'क, ख, ग' भी नहीं और महिमा बनाए बैठे हैं, दुनिया को बहकाए बैठे हैं। इनको शर्म नहीं आती, इनमें दया नहीं है। ये कितने कठोर हैं इंसान! इन्हें चौधर (सत्ता/अधिकार) चाहिए, ऊपर छत्र चाहिए। लाखों लोगों को मूर्ख बना दें, ऊटपटांग कथा सुना दें; और जनता का बकवास सुनकर ही मन राजी है।

तो आज के दिन सबसे बड़े दुश्मन ये संत हैं, जिनको अध्यात्म का ज्ञान नहीं है और जो इतने अनमोल जीवन को नष्ट करने लग रहे हैं। ये पहले भूत बनवाते हैं, भूत पुजवाते हैं, फिर कहते हैं कि श्राद्ध निकालो, गंगा में अस्थियां डालो। गति कराते-कराते ये उसकी दुर्गति करके छोड़ देते हैं।

तो अब जनता को समझना पड़ेगा। आप पढ़े-लिखे हो। सद्ग्रंथों, गीता, वेद, पुराण को दास ने पहली कक्षा का कायदा (Primer) बना रखा है। पर इन दुष्ट लोगों ने क्या कर रखा है कि "रामपाल की किताब नहीं पढ़नी, रामपाल का सत्संग नहीं सुनना।" उनको पता है कि अगर उसका सत्संग सुन लिया, तो तुम्हारे अज्ञान की जड़ कट जाएगी।

और ये जितने पंथ हैं, जैसे राधास्वामी, जो सबसे बड़ी बीमारी है, एक विचार करो बच्चों, मैं अपनी तरफ से कुछ नहीं कहता, इनकी पुस्तकों से ही निष्कर्ष निकाला है। इनका समझ लो, मैंने नहीं निकाला है। जहाँ से राधास्वामी पंथ शुरू होता है, श्री शिवदयाल जी (आगरा वाले), उनकी जीवनी में उनके ही लेखक ने (जो किताब आज तक बिक रही है) उसमें लिखा है कि मरने के बाद शिवदयाल सिंह जी (राधास्वामी पंथ के संस्थापक) भूत बनकर अपनी शिष्या 'बुक्की' में बोला करते थे। और उसके आगे हाथ जोड़कर सेठ प्रताप सिंह (जो शिवदयाल जी के छोटे भाई थे) और सालिगराम (जो उनका चेला था), वे प्रार्थना किया करते थे कि, "महाराज! यह समस्या आ गई, कैसे करें?" वह भूत बुक्की में से बोला करता था कि, "ऐसे कर लो, वैसे कर लो।" बुक्की पहले हुक्का नहीं पिया करती थी, फिर हुक्का पीने लगी। उसी तख्त पर बैठकर रोटी खाया करती थी, जिस पर वे (शिवदयाल जी) जीते जी खाते थे। वह बुक्की वहाँ बैठा करती थी, और वे कहते थे, "लाओ, हलवा-चूरमा बना करके लाओ!" इनके तो माथे में ही फूट रही है (इनकी तो मति ही मारी गई है)। इतना बड़ा ग्रुप वहाँ फंसा पड़ा है। जब सबसे पहला सीनियर, हेड ऑफ द डिपार्टमेंट, उस साधना से भूत बना, तो तुम्हें क्या मिलेगा? उसी से और पंथ निकले, सच्चा सौदा (सिरसा वाला)।

ये मुझे अपना दुश्मन समझते हैं, और मैं इनका सबसे बड़ा मित्र हूँ! अगर/जब इनकी आँख खुल जाएगी  , तो समझ आएगा। और यह सौभाग्य है आप लोगों का, धन्य हैं आपके माता-पिता जिनसे आपको जन्म मिला, कि आपको शुरू से ही राह ठीक मिल गई।

आप एक ध्यान रखना, एक फॉर्मूला बना लो:

 

"द्वार धनी के पड़ा रहे, धक्के धनी के खावे।

सौ काल झकझोरे, पर द्वार छोड़ नहीं जावे।।"

 

दूसरा फॉर्मूला है:

"भाई, जो गुरु वचन पर डट गए, कट गए फंद चौरासी के।"

"वस्तु मिली ठौर की ठौर, मिट गई मन पापी की दौड़।”

भरम मिटे मथुरा-काशी के।।"

 

तो भाई! इसमें दूसरा फॉर्मूला है गुरु वचन पर टेक (विश्वास)। और फिर:

"गुरु मानुष कर जानते, ते नर कहिए अंध।

महा दुखी संसार में, आगे यम के फंद।।"

 

अब जैसे कई अज्ञानी (जिन्हें अध्यात्म का ज्ञान नहीं है), ऑब्जेक्शन (आपत्ति) करते हैं। वे तो यही भाषा बोलेंगे कि, "तुम अपने गुरु को भगवान क्यों कहते हो? यह भगवान कैसे हो गया?" देखो, हम अपने गुरु को भगवान कहते हैं; आपसे नहीं कहते कि आप हमारे गुरु को भगवान कहो। आप जैसे चाहो, कह लो।

अध्यात्म का एक नियम है। जैसे गणित के अंदर एक सवाल आता है, प्रॉब्लम होती है, उसमें मूलधन निकालना होता है। उसके लिए हमें मानना पड़ता है कि 'मान लो मूलधन ₹100 है'। ₹100 मूलधन मानकर हम उससे दर निकाल लेते हैं, फिर मल्टीप्लाई (गुणा) करके असली मूलधन प्राप्त कर लेते हैं। तो हमारा उद्देश्य यह है, अध्यात्म का एक नियम है, गुरु को एज़ अ गॉड ट्रीट (भगवान की तरह व्यवहार) करना पड़ेगा, गुरु को भगवान मानना पड़ेगा। हमें रिहर्सल (पूर्वाभ्यास) करनी है। जैसे हमारे सामने गुरु जी भगवान ही हैं, और हम उस भगवान के घर सतलोक में जाना चाहते हैं। अगर हम भगवान के सामने झूठ बोलेंगे, ऊटपटांग करेंगे, तो वह कैसे स्वीकार करेगा? तो यहाँ हमें पाक-साफ (पवित्र) होने के लिए गुरु जी को भगवान रूप में मानना पड़ता है। हमें श्वास में भगवान मानना पड़ेगा, विचार से भगवान मानना पड़ेगा, वाणी से भी भगवान कहना पड़ेगा कि, "हमारे भगवान हैं गुरु जी।" जैसे ₹100 असली मूलधन नहीं होता, मूलधन तो करोड़ों में होता है; इसी प्रकार गुरु वह (पूर्ण) भगवान नहीं होता (मान लें), लेकिन वह भगवान, जिसकी हम तलाश कर रहे हैं, उसी से मिलेगा।

इसी प्रकार अब जैसे भगवान खुद आ रहे थे। कबीर साहेब सतयुग में सत सुकृत नाम से, त्रेता में मुनिंदर नाम से, द्वापर में करुणामय नाम से और कलयुग में कबीर नाम से आए। तो वह भगवान जब यहाँ आते हैं, वे वहाँ (सतलोक में) भी साकार हैं। ऊपर तख्त पर बैठे हैं अपने सतलोक में। अर्श-कुर्श पर श्वेत गुमज, जहाँ सतगुरु का डेरा है, परमात्मा का डेरा है। “श्वेत छत्र सिर मुकुट विराजे, देखत ना उस चेहरे नू” - उस परमपिता के सिर पर श्वेत छत्र और मुकुट है। तो वह यहाँ आकर अपने शरीर के उस तेज को सरल करता है। और यहाँ आकर, परमात्मा को पाने की जो हमारी रहनी-करनी होती है और जो व्यवस्था होती है, वह सारी क्रिया खुद हमारे बीच करके, हमें दिखा कर जाता है कि भगवान ऐसे मिलेगा।

जब परमात्मा कबीर साहेब आए, एक जुलाहे के घर उनकी परवरिश की लीला हुई (वे संसार के नियम से नहीं पले थे, सतलोक से आए, लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर प्रकट हुए)। वहाँ से नीरू-नीमा निःसंतान दंपति उनको अपने घर ले गए, वहाँ परवरिश की लीला हुई। तो वे वही काम करते थे जो व्यवसाय/काम उनके मुँहबोले माता-पिता का था। वे काम भी करते थे, 'राम' भी रट के दिखाते थे और ज्ञान भी सुनाते थे।

जब रामानंद जी (ब्राह्मण) को परमात्मा सतलोक ले गए, तो श्री रामानंद जी ने परमात्मा को ऊपर सतलोक में देखा, और फिर वापस आकर सामने अपने आगे बैठा पाया। जब वे समाधि से वापस आए, तब उन्होंने कहा था:

"तुम साहिब, तुम संत हो, तुम सतगुरु, तुम हंस।

गरीब दास तेरे रूप बिना, और न दूजा अंश।।"

 

हे परमात्मा! तुम साहिब (वास्तव में भगवान) हो, सतलोक में देख लिया। तुम संत हो (असली संत धरती पर आप ही हो), और तुम सतगुरु भी हो (यानी यथार्थ ज्ञान भी आपके पास है), और हंस (एक सच्चे भगत) की भूमिका भी आप ही कर रहे हो।

तो वह परमात्मा जब यहाँ आता है, तो वह ऐसे इसलिए करता है ताकि हम उसका अनुसरण करें। सारी सृष्टि के कर्ता, सारी सृष्टि के पालनकर्ता ने 120 साल एक झोपड़ी में काटे। क्या वे महल नहीं बना सकते थे? औरों के उन्होंने ठाठ कर दिए, पर अपने लिए वही झोपड़ी रखी। यह बताना चाहते हैं कि बकवासों से भगवान नहीं मिलता। कोई यह न सोचे कि सेठ-साहूकार होकर, गुणा-भाग करके, दान-भंडारे करके भगवान मिलता है, नहीं! लोएस्ट कैटेगरी (सबसे निचली श्रेणी) दिखा दी भगवान ने कि मैं 'हैंड टू माउथ' (मुश्किल से गुजारा करने वाला) रहा, और भगवान पाने के लिए इतना (सादा जीवन) ही पर्याप्त है। बस भक्ति सच्चे दिल से करें, और पूरा गुरु हो।

तो इसी प्रकार परमात्मा ने आपके ऊपर मेहर (कृपा) करी है कि दास ने जो ये फॉर्मूले बताए हैं, इन्हें अप्लाई कर लो (लागू कर लो)। तो इस प्रकार, जब भगवान आए थे, तो वे खुद भगवान थे। भगवान होते हुए वे गुरु भी थे, सतगुरु थे, तो उनको हमने भगवान ट्रीट करना था। पर हमने उस समय उन्हें भगवान ट्रीट नहीं किया, हमने उन्हें बस एक धानक (जुलाहा) माना। और हमारे काम सारे बन रहे थे, इसलिए उनमें थोड़ा प्यार बना रहा। पर एज़ अ गॉड ट्रीट नहीं किया। हमने 600 साल पहले जब भगवान आए थे (64 लाख शिष्य थे उस जुलाहे के, न कोई मीडिया था, न कोई इंटरनेट था, फिर भी इतने समर्थ थे, इतने सुख दे दिए उनको), तो उस समय ज्ञान नहीं था। ज्ञान के बिना यह बात बिगड़ गई।

अब पहले भगवान ने आपको शिक्षित किया है, और ऐसा गजब का वही ज्ञान इस दास द्वारा दे रहे हैं। अब आपको इस दास को अपने लिए एज़ अ गॉड ट्रीट करना पड़ेगा। मैं गॉड नहीं हूँ, पर आपके लिए गॉड हूँ। आपके मन, कर्म, वचन से यह होना चाहिए, तब यह सफलता मिलती है।

वे परमात्मा आए थे। जब कितनों को पता था कि ये भगवान हैं? वे तो धानक-जुलाहे बनकर अपने बीच में रले पड़े (मिले-जुले) रहा करते थे। कोई गाली दे, कोई गुंडा बोले, वे सब सहते थे। तो यह सोचकर कि आपने अपना कल्याण कराना है... और आज जो महान समागम प्रारंभ हुआ है, यह दास के इस पृथ्वी पर अवतरण (जन्म) होने के उपलक्ष्य में है, जो 8 सितंबर को है। देखो, यह जन्मदिन मेरे लिए कोई मनाने का दिन नहीं है। (मैं तो कहता हूँ) हे भगवान! कहीं फिर जन्म न लेना पड़े। पर आपके लिए यह वरदान है। यह जन्मदिन... अगर दास को भगवान यहाँ न पटकते (भेजते), तो तुम्हारा कल्याण कैसे होता? सत साहिब! बंदी छोड़ सतगुरु रामपाल जी महाराज की जय!

 

कलयुग में सतयुग की शुरुआत और मोक्ष का मार्ग | 4 May 2026 →