सतगुरु देव की जय! बंदी छोड़ कबीर साहिब जी की जय! बंदी छोड़ गरीब दास जी महाराज जी की जय! स्वामी रामदेवानंद जी गुरु महाराज जी की जय! बंदी छोड़ भगवान की जय!
सत साहिब। परमेश्वर कबीर जी की प्यारी संगत और विश्व की समस्त संगत को इस दास का आशीर्वाद है। परमात्मा आपको मोक्ष प्रदान करें, सुखी रखें और काल के कष्टों से आपकी रक्षा करें। बच्चों, सत्संग के माध्यम से आपको तत्वज्ञान के रंग में रंग दिया गया है और आपको पूर्णता से परिपूर्ण कर दिया है।
आज का मानव ‘एजुकेटेड’ है, जो आसानी से अच्छे और बुरे के भेद को समझ जाता है। यह परमात्मा की ही विशेष रजा है कि उन्होंने मानव को इस ‘साइंस’ का उपहार दिया है। इसी के कारण आज यह सोशल मीडिया सुलभ हो सका है, जो वास्तव में परमात्मा कबीर जी की ही देन है; और वर्तमान समय में धर्म प्रचार का सबसे प्रमुख साधन यही है.
हमारा भगवान पूर्ण है, हमारा ज्ञान पूर्ण है और समाज की समस्त बुराइयों से मुक्त मेरे भक्त भी आज किसी देवी-देवता से कम नहीं हैं। आज के समय में यदि इस पृथ्वी पर कहीं देवी-देवता साक्षात् हैं, तो वे आप कबीर जी के बच्चे ही हो। अब यह बात समाज की समझ में भी आ चुकी है कि यदि सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना है, तो वैसा ही बनना पड़ेगा जैसे संत रामपाल जी के बेटा-बेटी (शिष्य) हैं।
बच्चों, पहली मुख्य बात यह है कि भक्ति का मार्ग ‘खंडे की धार’ पर चलने के समान है, अर्थात तलवार की धार पर। यह मार्ग केवल तब तक कठिन प्रतीत होता है, जब तक हमें ज्ञान और समाधान पूर्ण रूप से समझ में नहीं आता। एक बार जब यह ज्ञान हृदयंगम हो जाता है, तो जीवन में आने वाले कष्ट भी हमारे लिए वरदान बन जाते हैं। यह तथ्य अब आप सरलता से समझ पाएंगे।
अध्यात्म की सफलता का मूल आधार यही है कि जीव सदैव परमात्मा की रजा में रहे। जैसा कि वाणी में भी कहा गया है:
राजिक रमता राम की, रजा धरे जो शीश।
दास गरीब दरस परस, तिस भेटे जगदीश।।
एक भक्त का भाव कुछ इस प्रकार होना चाहिए -
“ज्यों राखो त्यों ही रहूँ, मेरा क्या चारा,
खानेजाद खरीद हूँ, गुलाम तुम्हारा।।”
अर्थात, हे परमात्मा! आप मुझे जिस हाल में रखेंगे, मैं उसी में सुखी हूँ; क्योंकि मैं आपका खरीदा हुआ गुलाम (पूर्ण समर्पित भक्त) हूँ।
हम सत्संग के माध्यम से आपको प्रायः सुनाया करते हैं और इसके कई उदाहरण भी दिए जाते हैं। एक राजा था, जो नास्तिक था। उसका वजीर आस्तिक था और भगवान पर अटूट विश्वास रखता था कि परमात्मा जो भी करता है, वह अच्छा ही करता है।
एक बार राजा खड़ा-खड़ा अपनी तलवार की धार जाँच रहा था। वहाँ आसपास अन्य मंत्री भी उपस्थित थे और वह आस्तिक मंत्री भी वहीं खड़ा था। बात करते-करते अचानक तलवार की धार लग गई और राजा की उंगली कट गई। दूसरे मंत्री कहने लगे, “हे भगवान! यह तो बड़ा बुरा हुआ, हे भगवान! बहुत बुरा हुआ।” लेकिन वह जो भगवान पर विश्वास करने वाला मंत्री था, उसने कहा, “बहुत अच्छा हुआ, जो हुआ बहुत अच्छा हुआ।”
वह विश्वासी मंत्री अत्यंत समर्पित था और राजा उस पर बहुत भरोसा करता था। किंतु दूसरे मंत्री निरंतर उसकी निंदा करते रहते थे कि “यह आदमी ठीक नहीं है, यह आपको कभी मरवा देगा।” वे चाहते थे कि किसी तरह उसका सम्मान कम हो और उनकी पूछ बढ़े। जब वजीर ने उंगली कटने पर कहा कि “बहुत अच्छा हुआ”, तो राजा चिढ़कर बोला, “भाई, मेरी तो उंगली कट गई और तू कह रहा है ‘अच्छा हुआ’, नालायक आदमी!”
अब दूसरे मंत्रियों को अवसर मिल गया। वे बोले, “महाराज, हम भी तो आपसे यही कहते थे, यह तो आपका शत्रु है।” राजा ने क्रोध में आकर उस आस्तिक मंत्री को जेल में डलवा दिया। वह कारागार में डाल दिया गया, पर वह तो प्रभु प्रेमी और विश्वासी था। राजा की उस उंगली पर पट्टी आदि बँधवाई गई। उंगली तो बिल्कुल कट गई थी, लेकिन अब घाव भर गया और दर्द भी नहीं रहा।
अब राजा के हाथ में एक उंगली कम रह गई थी। जब राजा पूर्ण स्वस्थ हुआ तो बोला, “चलो, फिर शिकार पर चलते हैं।” अब उस चापलूस मंत्री को, जो वजीर का विरोधी था, राजा ने महामंत्री बना दिया था और अपने साथ घोड़े पर ले गया। शिकार के पीछे दौड़ते हुए वे दोनों मार्ग भटक गए और जंगल के अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में चले गए। वहाँ जंगली कबीले वालों का ‘बलि पर्व’ था। उन्हें अपनी देवी को प्रसन्न करने के लिए ‘नर-बलि’ (मनुष्य की बलि) चढ़ानी थी।
जंगली लोगों ने राजा और उस मंत्री को घेर लिया और पकड़कर अपने पुरोहित के पास ले गए। पुरोहित बोला, “दो मिल गए, बहुत बढ़िया! दोनों की बलि चढ़ा दो।” लेकिन पहले इनके अंगों की जाँच करो कि कोई ‘अंग-भंग’ तो नहीं है; कोई काना न हो या किसी की उंगली-हाथ कटा हुआ न हो। जब जाँच हुई तो देखा गया कि राजा की उंगली कटी हुई है। पुरोहित को बताया गया कि “महाराज, एक तो पूर्णतः स्वस्थ है, पर दूसरे की उंगली कटी हुई है।” पुरोहित बोला, “भाई, यह खंडित (डिफेक्टिव) है, इसकी बलि नहीं चढ़ेगी, इसे छोड़ दो। और यह दूसरा बिल्कुल ठीक है, फिट है, इसकी बलि चढ़ा दो।”
वह दूसरा चापलूस मंत्री, जो उस भक्त वजीर की नित्य निंदा करता था, वह फंस गया और उसकी बलि चढ़ा दी गई। राजा को मुक्त कर दिया गया। राजा वहाँ से सीधे उस जेल की कोठरी के पास पहुँचा जहाँ मंत्री को बंद किया गया था। उसे तुरंत रिहा करवाया और गले मिलकर बोला, “भाई, उस दिन आप सत्य ही कहते थे कि ‘बहुत अच्छा हुआ’। यदि मेरी उंगली न कटी होती तो आज मेरी जान चली जाती। भाई, मैंने आपको व्यर्थ ही कष्ट दिया, मुझे क्षमा कर दो।”
वजीर बोला, “महाराज, आप राजा हैं और मैं मंत्री, मैं क्या क्षमा करूँ। राजा ने पूछा एक बात बताइए, मेरी उंगली कटी तो मेरे लिए तो अच्छा हुआ (मेरी जान बच गई), पर आपको छह महीने की जेल हुई, इसमें आपके लिए क्या अच्छा हुआ?” वजीर ने उत्तर दिया, “महाराज, मेरे लिए मेरी जान बच गई! क्योंकि यदि मैं जेल में न होता, तो आज उस महामंत्री के स्थान पर आपकी गैल (साथ) में मैं होता और मेरी बलि चढ़ जाती। इस छह महीने की जेल ने मेरी मृत्यु टाल दी।”
तो बच्चों! परमात्मा जो भी करता है, सदा अच्छा ही करता है। इस 11 साल की तपस्या के दौरान न जाने कौन सी बड़ी ‘कर’ (कष्ट या टलने वाली बला) टल गई हो। परमात्मा जो करता है, वह मंगलकारी ही होता है। हमारे मन में कभी कोई दोष नहीं आया और न ही कभी यह विचार आया कि कुछ गलत हो सकता है; क्योंकि बिना अटूट विश्वास के भगवान की प्राप्ति संभव नहीं है। इसी प्रकार, हमें भी परमात्मा के प्रति सदैव समर्पित रहना होगा।
प्रायः क्या होता है? जैसे कहीं नौ नकली दुकानें हों और केवल एक ही असली हो, तो इंसान उन नकली दुकानों पर भटककर और ठगा जाकर सबको एक ही दृष्टि से देखने लगता है कि “सारे एक जैसे ही हैं।” इसी प्रकार, आज संत मार्ग के भीतर संतों की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है। यही कारण है कि आज समाज - यदि पूरी तरह नहीं तो - कम से कम 50% समाज साधु-संतों को पूरी तरह रिजेक्ट (अस्वीकार) कर चुका है।
लोग अब अपने-अपने हिसाब से चल रहे हैं; कोई पत्थर पूज रहा है, तो कोई तीर्थ यात्रा कर रहा है। इसका मूल कारण क्या है? इसका कारण यह है कि हमें परमात्मा का वास्तविक तत्वज्ञान नहीं हुआ और परमात्मा से मिलने वाला यथार्थ लाभ हमें प्राप्त नहीं हो सका। परमात्मा को पाने के लिए हमने जो भी साधनाएं कीं - चाहे राज-पाट त्याग दिए, घर छोड़ दिए या कठिन तपस्याएं कीं - किंतु जो सुख और शांति परमात्मा से अपेक्षित होती है, वह हमें मिल नहीं पाई।
अंततः परिणाम यह हुआ कि इंसान नास्तिक हो गया। वह गलत कर्मों और चोरी के माध्यम से अपनी कमियों को पूरा करने की चेष्टा करने लगा। उसने सोचा कि रिश्वत लेकर वह “सेठ बन जाएगा”, पर याद रखना, वह कभी सुखी या संपन्न नहीं बन सकता; ऐसा सपने में भी न सोचना।
ये कथाएं इस दास ने आपको बहुत सुना रखी हैं। जब दास इस मार्ग पर निकला, तब भी मेरे घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। यही मेरा गांव है और यही हमारे खेत थे; सारा गांव इस बात का गवाह है। हम भले ही कोई बहुत बड़े सेठ नहीं थे, पर घर में सम्मान की रोटी थी। मेरे माता-पिता भी सुखपूर्वक जीवन जी रहे थे और दास को भी नौकरी बहुत अच्छी मिल गई थी।
लेकिन जब यह बोध हुआ कि इस तत्वज्ञान की पूरे विश्व को आवश्यकता है, तब दास इस मार्ग पर निकला। संत गरीब दास जी की वाणी है:
“अगम निगम को खोज ले, बुद्धि विवेक विचार,”
“उदय-अस्त का राज मिले, तो बिन नाम बेगार।”
बताओ, यह कोई छोटी बात नहीं है। भक्ति न करने वाला व्यक्ति यदि संपूर्ण पृथ्वी का राजा भी बन जाए, तो भी उसका भविष्य ‘जीरो’ (शून्य) ही होता है। आज जो भी व्यक्ति किसी ऊंचे पद पर आसीन है - कोई राजा है, मंत्री है, मुख्यमंत्री है, किसी बड़ी पोस्ट पर है या कोई बड़ा सेठ है - वह केवल अपने पिछले जन्म के संस्कारों के कारण ही है। पिछले किसी जन्म में उसने जो तप, धर्म और दान किए थे, आज उसी का फल उसे प्राप्त हो रहा है।
किंतु अब वह केवल ‘टीटी पाक रहा’ है (मौज कर रहा है) और लाट साहब बना घूम रहा है; क्योंकि इस समय उसे प्रारब्ध से ‘टूक’ (रोटी और सुविधाएं) मिल रहा है। समय पर सारी सुख-सुविधाएं सुलभ हैं, इसलिए वह सोचता है कि बस जीवन का इतना ही उद्देश्य है। वास्तव में यह अध्यात्म ज्ञान का ‘टोटा’ (अभाव) है। अध्यात्म ज्ञान की इसी कमी को इस दास ने पूरा किया है और सभी ग्रंथों तथा महापुरुषों की वाणियों को एक सूत्र में पिरोकर प्रमाणित कर दिया है।
अब विचार कीजिए, हम देखते हैं कि एक व्यक्ति सेठ है, कोई आईएएस, आईपीएस, एमएलए, एमपी या मुख्यमंत्री बना बैठा है, पर वे राम-नाम को ‘कतई’ (बिल्कुल) नहीं जानते। सारा दिन मदिरापान, परिहास और व्यर्थ की बातें करना ही उनका स्वभाव है। दूसरी ओर, कुछ ऐसे नेक व्यक्ति हैं जो मेहनत की रोटी खा रहे हैं और भक्ति भी कर रहे हैं, फिर भी उन भक्ति करने वालों के जीवन में कभी-कभी थोड़े-बहुत कष्ट आ ही जाते हैं।
तब हमारे मन में यह संशय आता है कि मेरे साथ वाला व्यक्ति तो राम-नाम का क ख ग भी नहीं जानता, सारा दिन ताश खेलता है या शराब पीता है, फिर भी वह बड़ा अफसर बना हुआ है और उसे कोई समस्या नहीं होती।
इस स्थिति को आपको इन्वर्टर की बैटरी के उदाहरण से समझना होगा। जैसे एक बैटरी चार्ज कर दी गई और इन्वर्टर हटा दिया गया; अब जब तक उस बैटरी में चार्ज (कैपेसिटी) है, तब तक पंखे भी चलेंगे, कूलर भी चलेगा और लाइट भी जलती रहेगी। किंतु जिस क्षण वह बैटरी डिस्चार्ज हो जाएगी, सारी सुविधाएं अचानक समाप्त हो जाएंगी। उसके बाद क्या होगा? उसके ऊपर दुखों का कहर टूटेगा और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। आज कोई भले ही राजा-महाराजा बना रहे, पर मृत्यु के पश्चात वह कुत्ता या गधा ही बनेगा। यह संतों की अमर वाणी है, कोई साधारण गीत नहीं; यह यथार्थ अध्यात्म ज्ञान है:
नर सेती तू पशुवा कीजै, गधा, बैल बनाई।
छप्पन भोग कहाँ मन बौरे, कहीं कुरड़ी चरने जाई।।
यदि इंसान थोड़ा सा भी विवेक से काम ले, तो यह सोचकर कलेजा फट जाए। आज सारी सुविधाएं हैं, समय पर सब उपलब्ध है, पर मृत्यु के उपरांत क्या होगा? कुत्ता बनकर गलियों में धक्के खाने पड़ेंगे। जब यह भय शरीर (गात) में उत्पन्न होगा, तभी बात बनेगी। बिना इस डर के ही आपको यह ज्ञान दिया गया है। फिर बताया गया कि:
कोटि जन्म तोहे भ्रमत होगे, कुछ नहीं हाथ लगा रे।
कुकर शुकर खर भया बौरे, कौआ हँस बुगा रे।।
तो भाई, ये बातें हृदय में उतारने योग्य हैं। भक्ति के बिना तो बहुत बड़ा जुल्म हो जाएगा। आज तो एक छोटी सी जेई (JE) की पोस्ट पाकर ही इंसान स्वयं को बहुत बड़ा समझने लगता है, जबकि अध्यात्म ज्ञान हमें बताता है कि मोक्ष के बिना राजा और देवता बने रहने का भी कोई लाभ नहीं है।
अब प्रश्न उठता है कि मोक्ष कैसे होगा? गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में स्पष्ट कहा गया है कि हे अर्जुन, उस तत्वज्ञान को - जो भगवान स्वयं अपने मुखकमल से उच्चरित करते हैं (जैसा गीता अध्याय 4 श्लोक 32 में वर्णित है) - तू तत्वदर्शी संतों के पास जाकर समझ। उन्हें दंडवत प्रणाम कर और निष्कपट भाव से प्रश्न कर, तब वे तत्वदर्शी संत तुझे उस परम ज्ञान का उपदेश करेंगे। यह ज्ञान इतना बहुमूल्य है कि यह केवल उसे ही प्रदान किया जाता है जो ‘कति’ (पूर्ण रूप से) समर्पित होता है।
अंततः, गीता का ज्ञान देने वाला स्वयं 18वें अध्याय के 62वें श्लोक में निर्देश देता है कि अर्जुन, तू सर्वभाव से उस ‘अन्य’ परमेश्वर की शरण में जा। उसी की परम कृपा से ही तू पूर्ण शांति और सनातन परमधाम प्राप्त होगा। इससे यह तथ्य पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि गीता ज्ञानदाता के अतिरिक्त भी कोई परम शक्ति है, जिसकी भक्ति से ‘सतलोक’ (सनातन परमधाम) की प्राप्ति होती है, जो कि हमारा वास्तविक और स्थाई निवास है।
गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में भी कहा गया है कि तत्वज्ञान की प्राप्ति के उपरांत परमेश्वर के उस ‘परम पद’ की खोज करनी चाहिए, जहाँ जाने के बाद साधक पुनः इस नश्वर संसार में लौटकर नहीं आते। हमें उसी परम पद को पाना है जहाँ शाश्वत शांति है। वह पद कैसे प्राप्त होगा? वह केवल तत्वदर्शी संत ही बता सकता है, क्योंकि गीता में वह संपूर्ण ज्ञान समाहित नहीं है। यदि गीता में वह पूर्ण ज्ञान होता, तो वहाँ एक पृथक अध्याय जोड़ दिया जाता कि “उस अध्याय में पढ़ ले, जिसमें परम अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति का विधान है।”
वह तत्वदर्शी संत आज यह दास है और समस्त पृथ्वी के मानव समाज से मेरा विनम्र निवेदन है - दास ने कुछ विशेष पुस्तकें लिखी हैं। हमारी मुख्य रूप से दो-तीन पुस्तकें हैं, जिनमें से एक ‘ज्ञान गंगा’ है। जो भी व्यक्ति इस ‘ज्ञान गंगा’ को एकाग्रचित्त होकर पढ़ लेगा, उसकी 101 पीढ़ियों का कल्याण सुनिश्चित है। यह ज्ञान मेरी आत्मा का सार है। इसे इतने अद्भुत ढंग से तैयार किया गया है कि जो भी इसे निष्पक्ष भाव से पढ़ेगा, वह स्वयं दूसरों को इसके बारे में बताने लगेगा।
लोग बिना इसे पूर्णतः देखे ही हाहाकार मचाने लगते हैं कि इसमें यह या वह लिख दिया गया है। परंतु ध्यान रहे, उस पुस्तक का एक-एक शब्द शास्त्र-प्रमाणों पर आधारित है। यदि उसमें लिखी बातें गीता, वेद, पुराण, कुरान या बाइबल के प्रतिकूल लगती हैं, तो विचार कीजिए कि क्या आपकी वे प्राचीन पुस्तकें त्रुटिपूर्ण हैं? नहीं, पुस्तकें गलत नहीं हैं, अपितु हमारी बुद्धि की सीमा है कि हम उन्हें यथार्थ रूप में समझ नहीं पाए।
दूसरी पुस्तक है ‘जीने की राह’। इस पुस्तक को पढ़कर करोड़ों भक्तों के जीवन में सुधार आया है; यहाँ तक कि छोटे-छोटे बच्चे भी सन्मार्ग पर आ गए हैं। यह समाज सुधार की एक अद्वितीय कृति है। आज के युग में ‘लिव-इन-रिलेशन’ और ‘लव मैरिज’ जैसी जो विसंगतियां समाज को जला रही हैं - इस पुस्तक के स्वाध्याय के बाद कोई भी व्यक्ति न तो लव मैरिज करेगा और न ही अनैतिक संबंधों में रहेगा। वह बुराइयों का परित्याग कर समाज के सम्मुख एक देवता के समान मर्यादित जीवन जिएगा। ऐसी कल्याणकारी पुस्तक हम पूर्णतः निःशुल्क (फ्री) उपलब्ध कराते हैं।
इसमें हमारा कोई निजी स्वार्थ या लालच नहीं है। यदि कोई यह सोचे कि रामपाल अपने किसी स्वार्थ के लिए यह कर रहा है, तो अब समाज को भली-भांति ज्ञात हो चुका है कि मैं लालची हूँ या नहीं। मैं केवल परमार्थी हूँ और यही परमार्थ की शिक्षा मैंने अपने बच्चों (शिष्यों) को दी है। मेरे ये भक्त सेवा के लिए सदैव तत्पर हैं; यदि इन्हें कोई दुखी दिखाई दे, तो ये स्वयं भूखे रहकर उसे भोजन कराएंगे। आज इन्हें ऐसे तत्वज्ञान से सींचकर इतना निर्मल बना दिया गया है।
और हमने भी अब यह ठान ली है - सबसे पहले हम भारत को फिर से विश्व की ‘सोने की चिड़िया’ बनाएंगे। अब प्रश्न उठता है कि वह बनेगी कैसे? जीने के लिए अन्न अनिवार्य है, जिसका अन्नदाता किसान है; और आज किसान की स्थिति अत्यंत दयनीय है। इसलिए, अब हम सबसे पहले मजदूर और किसान का डटकर साथ देंगे। जब भी कोई आपत्ति आएगी या किसी को कोई समस्या होगी, तो हम उनके साथ खड़े होंगे; क्योंकि आज ये दोनों वर्ग ही सबसे अधिक दुखी हैं।
तीसरी मुख्य बात यह है कि यदि ये लोग ‘नाम दीक्षा’ से जुड़ जाएंगे, तो हमारा कार्य और भी सरल हो जाएगा। फिर भगवान स्वयं उनसे सीधा जुड़ाव (कनेक्शन) करेंगे और उन्हें सीधा लाभ प्रदान करेंगे।
अब विचार करें कि यह ‘नाम’ क्या करता है और भगवान कैसे कार्य करते हैं? इसे एक उदाहरण से समझिए। प्रारंभ में हमारे गाँवों में बिजली नहीं होती थी। जब बिजली आने की शुरुआत हुई, तो कहीं कोई दुर्घटना (एक्सीडेंट) हो गई और सबको पता चल गया कि भाई, बिजली की चपेट में आने से व्यक्ति की मृत्यु हो गई। इससे लोगों के मन में बिजली के प्रति और भी भय बैठ गया।
जब हमारे गाँव में बिजली की शुरुआत हुई, तब मैं नया-नया जेई (JE) लगा ही था, किंतु उस समय तक हमारे स्वयं के घर में बिजली नहीं थी। सन् 1977 तक न तो घर में बिजली थी और न ही परिजनों की इसे लगवाने की कोई मंशा थी। तब मैंने अपने एक मित्र से, जो बिजली का कार्य करता था, कहा कि “भाई, तू घर वालों से बात कर और सारा सामान ले आ, पैसे मैं दे दूँगा। तू बता कि फिटिंग और सामान का कुल कितना खर्च होगा?” उसने बताया कि ₹1200 लगेंगे। मैंने उसे पैसे दे दिए। वह सामान लेकर घर पहुँचा और मैं अपनी ड्यूटी पर चला गया।
उसने मेरे चाचा से कहा कि “भाई, तुम्हारे घर में बिजली लगानी है।” चाचा बोले, “तू अपने माँ-बाप के घर लगा ले बिजली! भाग जा यहाँ से, क्या बकवास कर रहा है? हमारे यहाँ क्यों लगानी है? तू अपने लगा ले।” अर्थात, उस समय बिजली को लेकर इतनी भ्रांतियां थीं। जब मैं घर आया तो मित्र ने बताया कि “तुम्हारे घर वाले तो कह रहे हैं कि तुम अपने घर बिजली लगा लो।” मैंने कहा - कोई बात नहीं, इन्हें अभी इसका ‘बेरा’ (पता) नहीं है, तू फिटिंग कर दे।
फिटिंग हो गई, कनेक्शन ले लिया और मोटर लगवा दी। पहले हाथ से ‘सानी’ (चारा) काटा करते थे और मेरी माता जी घंटों चक्की से आटा पीसा करती थीं; मैंने वहाँ चक्की भी लगवा दी। जब उनके सामने वह लाइट जली और मोटर ने ‘कट्टा-कट’ सानी काट दी, तब वे दंग रहकर बोले - भाई, यह तो बहुत भली (अच्छी) चीज है, यह तो हमें पहले ही लगवा लेनी थी।
तो बच्चों! इसी प्रकार यह परमात्मा की पावर का कनेक्शन है, जो आज यह दास एक लाइन के माध्यम से आपको दे रहा है। जिसका यह आध्यात्मिक कनेक्शन जुड़ जाएगा, उसके सारे कार्य ‘कट्टा-कट’ सफल होंगे। बोलो बंदी छोड़ महाराज की जय! आज करोड़ों भक्तों ने यह नाम-कनेक्शन ले रखा है और परमात्मा ने सबके ठाठ कर रखे हैं। सबके चेहरे पर रौनक है और कोई चिंता उनके पास फटक नहीं सकती।
पहले भक्ति के अभाव में न जाने कैसी-कैसी समस्याएं आती रहती थीं और सदैव धन का ‘टोटा’ (कमी) बना रहता था। अब आपने सेवा और दान का ऐसा मार्ग चुना है कि आपके सहयोग से लाखों दुखियों के कष्ट दूर हो रहे हैं। और जब वे दुखी आत्माएं भगवान से जुड़ती हैं, तो उनका भी सीधा कनेक्शन प्रभु से हो जाता है। भगवान किसी के सगे संबंधी नहीं हैं; वे तो सबके लिए समान हैं और सबको फल देंगे। बिजली का कनेक्शन कोई भी ले ले, वह अपनी पूरी शक्ति दिखाएगी ही।
परंतु ध्यान रहे, उस बिजली की ‘मेंटेनेंस’ (रखरखाव) और उसकी मर्यादाओं का पालन करना अनिवार्य होता है। यदि सावधानी न बरती जाए, तो वही बिजली विनाशकारी भी हो सकती है। इसलिए, पूर्ण सावधानी बरतें और भक्ति की मर्यादा का पालन करें। फिर देखिए आपके जीवन में कैसे ठाठ हो जाएंगे और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होगी। यहाँ के सांसारिक सुख तो आपको ‘रूंगे’ (अतिरिक्त लाभ) के रूप में स्वयं ही मिल जाएंगे, किंतु हमारा असली लक्ष्य तो मोक्ष है। हम उस अविनाशी लोक में चले जाएंगे, जहाँ जाने के बाद फिर कभी इस दुखों भरे संसार में लौटकर नहीं आना पड़ता।
सत साहिब! बंदी छोड़ कबीर साहिब की जय!