भगवान गणेश की जन्म कथा, परिवार, आदि गणेश व सत्य मंत्र की जानकारी

भगवान गणेश एक हिंदू देवता हैं, जिन्हें सभी हिंदू धार्मिक समारोहों की शुरुआत में पूजा जाता है इसलिए उनको आरंभ के देवता की श्रेणी में गिना जाता है। वह अक्षरों के देवता हैं और बौद्धिकता से सम्बन्धित हैं। इसलिए, वह लेखकों, बैंककर्मियों, विद्वानों आदि के संरक्षक माने जाते हैं। उन्हें 'विघ्नहर्ता' यानी बाधाओं को नाश करने वाला भी कहा जाता है।

जबकि, पवित्र वेद, भगवद गीता और अन्य धर्मग्रंथों के गहन शोध से इस बात का प्रमाण मिलता है कि पूरा ब्रह्मांड आदि गणेश द्वारा रचित है, जो अमर है? वह पापों का नाश करने वाला है। (प्रमाण- यजुर्वेद अध्याय 8 मन्त्र 13) वह विघ्नों का निवारण करने वाला है। वह सर्वोच्च भगवान है जो पूजा करने के योग्य है। (प्रमाण-यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्र 32)

इससे भक्तों के मन में एक सवाल उठता है कि जब आदि गणेश सर्वशक्तिमान हैं तो लोग देवी-देवताओं की पूजा क्यों करते हैं? क्या आदि गणेश, भगवान गणेश से भिन्न हैं? आइए हम यह समझने की कोशिश करें कि आदि गणेश तथा पूजनीय भगवान कौन है?

आइए, निम्नलिखित प्रश्नों के आधार पर हम उत्तर पाने का प्रयत्न करते हैं।

  • भगवान गणेश जी कौन हैं?
  • भगवान गणेश जी की उत्त्पत्ति कैसे हुई?
  • भगवान गणेश जी की पत्नी कौन है?
  • भगवान गणेश जी के पुत्रों का नाम क्या है?
  • भगवान गणेश जी की पूजा का सही तरीका क्या है?
  • त्योहारों पर जश्न मनाना- गणेश चतुर्थी और गणेश जयंती
  • गणेश जी से लाभ प्राप्त करने का मंत्र क्या है?
  • हमारे शरीर में बने चक्रों में भगवान गणेश जी का स्थान कहाँ होता है?
  • क्या भगवान गणेश जी पूर्ण भगवान हैं?
  • कौन हैं आदि गणेश?
  • भगवान गणेश जी के गुरु कौन हैं?
  • आदि गणेश और भगवान गणेश में क्या भिन्नता है?
  • पूजनीय भगवान आदि गणेश हैं या भगवान गणेश?

आइए, हम एक विश्लेषण करते हैं। सर्वप्रथम यह जानते हैं कि भगवान गणेश कौन हैं?

भगवान गणेश जी कौन हैं?

भगवान गणेश भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र हैं। वह ’गणेश लोक’ में कैलाश पर्वत पर उनके साथ रहते हैं। निम्नलिखित जानकारी के आधार पर भगवान गणेश पर अधिक प्रकाश डालते हैं।

  • गणेश का अर्थ क्या है?
  • भगवान गणेश जी के कितने नाम हैं?
  • भगवान गणेश जी अपने हाथों में क्या धारण करते हैं?
  • गणेश जी की प्रतीकात्मकता
  • भगवान गणेश जी का वाहन क्या है?
  • भगवान गणेश जी का परिवार
  • क्या भगवान गणेश जी का विवाह हुआ है?

गणेश का अर्थ क्या है? - गणेश का अर्थ है 'गणों का प्रमुख' (दिव्य प्राणियों की एक सेना) या 'प्रजा के भगवान'।

भगवान गणेश जी के कितने नाम हैं? - भगवान गणेश के 108 नाम हैं। आमतौर पर गणेश को 'गणपति, गजवक्त्र (जिनका मुख हाथी के समान है), हरिद्रा (सुनहरी त्वचा वाला), गजानन, द्विमुख, विघ्नहर्ता, विघ्नकर्त्ता, विनायक, महागणपति, हेरंबा, सिद्धय, वाक्पति, शिवप्रिये, सिद्धिविनायक, अग्रगण्य, अग्रपूज्य, सर्वैया, गंगा सुत्तया, श्री विघ्नेश्वरय जैसे नामों से अभिवादन किया जाता है।

उन्हें ‘लम्बोदर ’और’ महोदर’ भी कहा जाता है, जो उनके उदर का विवरणात्मक है। उनका एक पूरा हाथीदांत है और दूसरा टूटा हुआ है जिसकी वजह से उन्हें 'एकदंत' भी कहा जाता है।

भगवान गणेश जी अपने हाथों में क्या धारण करते हैं? - भगवान गणेश को चित्र और मूर्तियों में कुछ गोल आकार की मिठाइयाँ पकड़े हुए दिखाया जाता है जिन्हें 'लड्डू’ / 'मोदक' कहा जाता है। शंख, कमल भी गणेश जी हाथों में धारण करते हैं। कुल्हाड़ी गणेश जी का अस्त्र है।

गणेश जी की प्रतीकात्मकता - भगवान गणेश के शरीर के विभिन्न अंग प्रतीकात्मक हैं।

  • विशाल सिर - बड़ी सोच का प्रतीक है। यह ज्ञान से संबंधित है।
  • विशाल कान- अधिक सुनने का प्रतीक हैं।
  • छोटी आँखें -एकाग्रता का प्रतीक हैं।
  • अंकुश -प्रतीक है किसी को उच्च लक्ष्य तक पहुँचाने का।
  • हाथीदांत -प्रतीक है बुराई को दूर कर अच्छा बने रहने का।
  • भगवान गणेश को अपने दाहिने हाथ से आशीर्वाद देने के रूप में दर्शाया जाता है जो आध्यात्मिक पथ पर सर्वोच्च शक्ति द्वारा संरक्षण का प्रतीक है।
  • कुल्हाड़ी हथियार -भौतिकवादी दुनिया के सभी बंधनों को काटने का प्रतिनिधित्व करता है।
  • सूँढ- अनुकूलन क्षमता और दक्षता का प्रतीक है।
  • विशाल उदर- जीवन में अच्छाई और बुराई को शांतिपूर्ण तरह से स्वीकृत कर लेने का प्रतीक है।

भगवान गणेश जी का वाहन क्या है? - भगवान गणेश का वाहन मूषक है जो प्रतीकात्मक है- आंतरिक अंधकार को समाप्त करने यानी इच्छाओं पर अंकुश लगाने का।

भगवान गणेश जी का परिवार - गणेश जी के पिता भगवान शिव हैं (जो त्रिदेवों में से एक हैं), और 'तमोगुण युक्त' हैं, अर्थात क्रोध और विनाश के प्रतीक हैं और देवी पार्वती उनकी माता हैं। गणेश जी के बड़े भाई का नाम 'कार्तिकेय' है जिन्हें युद्ध का देवता' माना जाता है और बहन का नाम ‘अशोकसुंदरी' है।

क्या भगवान गणेश जी का विवाह हुआ है? - हां, भगवान गणेश विवाहित हैं। उनकी दो पत्नियाँ हैं जिनका नाम ऋद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (आध्यात्मिक शक्ति) हैं और ‘शुभ’ और ‘लाभ’ नाम के दो बेटे हैं, यही कारण है कि ये शब्द अक्सर उनकी मूर्ति के साथ लिखे होते हैं।

टिप्पणी: अन्य दो त्रिदेव राजगुण- ब्रह्मा और सतगुण-विष्णु हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव तीनों भाई हैं।

कृपया ज़रूर पढ़ें- तीन गुण - सत्व, रजस और तमस

भगवान गणेश कौन हैं इसके बारे में जान लेने के पश्चात आइए, अब जानते हैं कि भगवान गणेश की उत्त्पत्ति कैसे हुई?

भगवान गणेश जी की उत्त्पत्ति कैसे हुई?

भगवान गणेश का सिर एक हाथी का है। भगवान गणेश जी की उत्त्पत्ति कैसे हुई इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है। हम निम्नलिखित विवरण के माध्यम से समझेंगे।

  • गणेश जी को किसने मारा?
  • भगवान गणेश जी को हाथी का सिर कैसे प्राप्त हुआ?
  • भगवान शिव, भगवान गणेश के मूल मस्तक को फिर से क्यों नहीं लगा सके?

‘शिव पुराण' के अनुसार भगवान शिव के पास बहुत से' गण 'थे जो उनके सभी आदेशों का सम्मान करते थे लेकिन देवी पार्वती के पास कोई' गण 'नहीं था। इस बात से परेशान होकर, एक बार जब देवी पार्वती जी स्नान कर रही थीं, तब उन्होंने स्नान के दौरान अपने शरीर पर लगे उबटन से एक पुतला बनाया और अपनी शक्ति से, उन्होंने उस मानव आकार वाले पुतले में प्राणों का संचार किया, जिससे एक बालक उत्त्पन्न हुआ। माता पार्वती ने उसे 'गणेश' नाम दिया और सख्त आदेश दिया की उनकी मर्ज़ी के बगैर किसी को भी महल में प्रवेश नहीं होने दें।

गणेश जी को किसने मारा?

इस बीच शिव जी हिमालय से तपस्या पूरी करके लौटे और पार्वती जी के महल के अंदर प्रवेश करने का प्रयास किया लेकिन गणेश जी ने अपनी माता की आज्ञा का पालन करते हुए शिव जी को महल में प्रवेश करने से मना कर दिया जिससे गणेश जी को शिव जी के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। अज्ञानता और क्रोधवश शिव जी ने अपने त्रिशूल से गणेश का वध कर दिया और पार्वती जी के महल में प्रवेश कर गए।

भगवान गणेश जी को हाथी का सिर कैसे प्राप्त हुआ?

जब पार्वती जी ने देखा कि उनका पुत्र गणेश मर गया है तो उन्होंने इस तथ्य को शिव जी के समक्ष प्रकट किया कि भगवान गणेश की उत्त्पत्ति कैसे हुई? पार्वती जी उग्र हो गईं और उन्होंने काली का रूप धारण कर लिया और घोषणा कर दी कि अगर गणेश का जीवन पुनः बहाल नहीं किया गया तो वह समस्त सृष्टि को नष्ट कर देंगी। भयभीत भगवान शिव ने गणेश के सिर को वापस न जोड़ पाने की अपनी अक्षमता को स्वीकार किया और बताया कि उनके त्रिशूल का प्रभाव उल्टा नहीं हो सकता। तब, भगवान शिव ने भगवान विष्णु से अनुरोध किया कि वह उस पहले प्राणी का सिर लेकर आएं जो मार्ग में सबसे पहले अकेला मिले यानी जो अपनी माँ के साथ न हो। ऐसा ही किया गया।

विष्णु जी एक हथिनी के बच्चे का सिर लेकर आए। शिव जी ने वह सिर गणेश के शरीर के ऊपर रख दिया और अपनी शक्ति से गणेश जी को जीवनदान दिया इस प्रकार गणेश ज़िंदा हो गए। तब गणेश को वहां मौजूद देवताओं द्वारा कई शक्तियों के साथ आशीर्वाद दिया गया था और यह भी कि उन्हें प्रथम पूजा जाएगा। तब से उन्हें 'गजानन' और प्रथम पू्ज्यनीय भगवान कहा जाता है। इस प्रकार भगवान गणेश जी को हाथी का सिर प्राप्त हुआ।

भगवान शिव, भगवान गणेश के मूल मस्तक को फिर से क्यों नहीं लगा सके?

पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि भगवान शिव, भगवान गणेश के मूल मस्तक को पुन:स्थापित नहीं कर सके क्योंकि उनकी आध्यात्मिक शक्तियां सीमित हैं। गणेश का सिर कट जाने के बाद उसे राख में दबा दिया गया। भगवान शिव के त्रिशूल का प्रभाव पलट नहीं सकता। वह स्वयं के द्वारा किया गया विनाश वापस नहीं कर सकते। यह प्रकृति का नियम है। ये त्रिमूर्ति ईश्वर, सर्वोच्च भगवान (आदि गणेश) के कानून से बंधे हैं। वे केवल निर्धारित कार्य ही पूर्ण कर सकते हैं। वे कुछ भी बदलाव नहीं कर सकते। श्रीमद् देवी भागवत दुर्गा पुराण इसका साक्ष्य प्रदान करती है।

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कृपया विचार करें

  • दोनों भगवान हैं लेकिन न तो भगवान शिव और न ही भगवान गणेश यह पहचान सके कि गणेश और भगवान शिव का आपस में क्या संबंध है?
  • भगवान शिव को मृत्युंजय, कालिंजय, त्रिकालदर्शी, सर्वोच्च भगवान कहा जाता है। वह क्यों नहीं पहचान सके कि गणेश को देवी पार्वती ने बनाया है और वह उनका पुत्र है?
  • भगवान होने के बावजूद शिव ने अपने पुत्र गणेश को मार डाला?
  • भगवान शिव और भगवान विष्णु की शक्तियाँ सीमित हैं? तमोगुण-शिव जी, सतोगुण-विष्णु जी और यहाँ तक कि देवी पार्वती-शक्ति का प्रतीक है जो सृष्टि को नष्ट भी कर सकती है मगर इनमें से कोई भी गणेश के मूल मस्तक को पुन:स्थापित नहीं कर सके और उन्हें एक हाथी का सिर लगाना पड़ा।
  • यह स्पष्ट है कि भगवान शिव, भगवान विष्णु, देवी पार्वती और वहां मौजूद अन्य सभी देवता अक्षम थे। उनके पास सीमित शक्तियां हैं। वे अपने साधकों को क्या राहत दे सकते हैं यह अच्छी तरह समझा जा सकता है।
  • गणेश की मृत्यु हो गई और फिर उनका जीवन बहाल कर दिया गया - जिसका अर्थ है कि वह फिर से पैदा हुए यानी वह जन्म और मृत्यु के चक्र में है। वह अमर नहीं हैं तो उनके शिष्यों को जन्म और पुनर्जन्म से कैसे छुटकारा दिला सकते हैं। यह बात सभी भक्तों को अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए।
  • इसके अलावा, विडंबना यह है कि गणेश को 'विघ्नहर्ता' मानने वाले भोले भक्त सदियों से उनकी पूजा करते आ रहे हैैं। भक्त ईमानदारी से स्वयं निर्णेय करें कि उनके कितने ’विघ्न’ गणेश द्वारा हल हुए हैं? करोड़ों भक्तों की मनमानी भक्ति प्रथा यहां संदेह पैदा करती है और यह साबित करती है कि उनकी भक्ति-विधि सही नहीं है।

भगवान गणेश जी की पत्नी कौन है?

भगवान गणेश की दो पत्नियां हैं रिद्धि और सिद्धि। ये प्रजापति विश्वरूप की दो सुंदर पुत्रियाँ हैं।

भगवान गणेश जी के पुत्रों का नाम क्या है?

‘शुभ’ और ‘लाभ ’भगवान गणेश के दोनो बेटों के नाम हैं, यही वजह है कि ये शब्द अक्सर उनकी मूर्ति के साथ लिखे होते हैं।

आइए हम यह जानने के लिए आगे पढ़ें कि भगवान गणेश की पूजा का सही तरीका क्या है?

भगवान गणेश जी की पूजा का सही तरीका क्या है?

इससे पहले कि हम यह वर्णन करें कि भगवान गणेश की पूजा का सही तरीका क्या है? आइए सबसे पहले इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि हिंदू भक्तों द्वारा वर्तमान में प्रचलित प्रथाएं क्या हैं?

त्योहारों पर जश्न मनाना- गणेश चतुर्थी और गणेश जयंती

भाद्रपद (अगस्त / सितंबर) के महीने में, गणेश चतुर्थी मनाई जाती है जिसमें गणेश जी की मूर्ति की पूजा दस दिनों तक की जाती है और अंतिम दिन उस मूर्ति को जल में विसर्जित कर दिया जाता है।

गणेश जयंती

गणेश जी का जन्मदिन पूर्णमाशी से चौथे दिन माघ (जनवरी / फरवरी) के महीने में मनाया जाता है।

टिप्पणी: यह प्रथा शास्त्र आधारित नहीं है। यह बस किसी की इच्छा के अनुसार पूजा करना है। श्रीमद् भागवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में, गीता ज्ञान दाता कहता है कि 'हे अर्जुन, जो कोई भी शास्त्रों में वर्णित पूजा के तरीके का खंडन करता है और अपनी इच्छाओं के अनुसार पूजा करता है, उसे कोई लाभ नहीं होता चाहे वो सांसारिक इच्छाओं की प्राप्ति हो या मोक्ष पाना।

गीता अध्याय 9 श्लोक 23-24 देवी-देवताओं की पूजा का समर्थन नहीं करता क्योंकि यह शास्त्रों के विपरीत है जो उनके पतन का कारण है। गीता अध्याय 7 श्लोक 15 में गीता ज्ञान दाता कहता है ‘राक्षस स्वभाव को धारण किये हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूर्ख प्राणी मुझे भी नहीं भजते ’।

हालाँकि, ‘गणपति बप्पा मोरया’, ‘ओम गम गणपतये नमः’ और ‘जय गणेश देवा’ जैसे भजनों को आमतौर पर गाया जाता है, लेकिन किसी भी धर्म ग्रन्थ में कहीं भी ऐसा करने का कोई सुझाव नहीं दिया गया है। मोर्या एक समर्पित गणेश भक्त का नाम था और भगवान गणेश के प्रति उनकी भक्ति के स्मरण में उनका नाम 'मोरया' इस वाक्यांश ‘गणपति बप्पा मोरया’ में लिया जाने लगा।

इस तरह की प्रथाएं व्यर्थ हैं जो आत्माओं को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं कर सकती। गीता अध्याय 9 श्लोक 25-26 और अध्याय 8 श्लोक 8,9,10 में कहा गया है कि ‘साधक जिस भी भगवान की पूजा करते हैं वह उन्हीं के लोक को प्राप्त करते हैं। जैसे भगवान विष्णु के उपासक ‘विष्णुलोक ’को प्राप्त करते हैं, शिव के उपासक ‘शिवलोक’ को प्राप्त करते हैं, ब्रह्म-काल के उपासकों को ‘ब्रह्मलोक’ की प्राप्ति होती है।

गीता जी अध्याय 4 श्लोक 16 में यह स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्मलोक की प्राप्ति के बाद भी सभी प्राणी जन्म और मृत्यु में ही रहते हैं, वे सभी प्राणी पुनरावृत्ति में होते हैं। इसलिए, इन मनमानी प्रथाओं को तुरंत त्याग देना चाहिए। भक्तों को गणेश जी की सही भक्ति विधि अपनानी चाहिए जिसके करने से गणेश जी भक्तों को लाभ प्रदान करते हैं।

तो प्रश्न यह उठता है कि, भगवान गणेश की पूजा का सही तरीका क्या है?

पवित्र सद्ग्रन्थ कबीर सागर में उल्लेखित छंद “कर नैनो दीदार महल में प्यारा है” में गणेश जी से लाभ प्राप्त करने का सही मंत्र का वर्णन किया गया है, जो केवल तत्त्वदर्शी संत द्वारा दिए जाने पर ही लाभ प्रदान करता है। पवित्र गीता जी अध्याय 18 श्लोक 46 में गीताज्ञान दाता अर्जुन को तत्त्वदर्शी संत ’की शरण में जाने को कहता है। वह सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान के सम्पूर्ण ज्ञाता होते हैं और परम अक्षर ब्रह्म अर्थात आदि गणेश की जानकारी प्रदान करते हैं जिनकी भक्ति करने से जीव पूर्ण सुख और मोक्ष प्राप्त करता है।

आइए, हम आपको बताते हैं कि गणेश जी से लाभ पाने के लिए कौन-सा मंत्र जाप करना चाहिए ?

गणेश जी से लाभ प्राप्त करने का कौन सा मंत्र है?

संदर्भ: कबीर सागर अध्याय ‘कबीर वाणी’ पृष्ठ 111

दुनिया के समन्वय में शामिल प्रमुख देवता प्रत्येक मानव शरीर में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं जहां वे ‘चक्रों ’में निवास करते हैं। हमारे शरीर में रीढ़ की हड्डी में सात 'चक्र' होते हैं। ‘मूलाधार’ या मूल चक्र से लेकर मस्तिष्क तक जिसको ‘त्रिकुटी’ कहा जाता है। प्रत्येक चक्र एक विशेष देवता के साथ जुड़ा हुआ है। ये चक्र केवल सच्चे मंत्रों का जाप करके ही खिलते हैं जो केवल तत्त्वदर्शी संत द्वारा प्रदान किए जाते हैं।

हमारे शरीर में बने चक्रों में भगवान गणेश जी का स्थान कहाँ होता है?

आइए, हम अपने शरीर में भगवान गणेश के निवास स्थान को साझा करें। गणेश जी का निवास स्थान मूल चक्र’ है जो कि पहला चक्र है। यह रीढ़ की हड्डी के आधार पर स्थित है।

1) गणेश, मूल चक्र को नियंत्रित करते हैं। यह चार पंखुड़ियों से युक्त होता है और लाल रंग का होता है। इसका 600 बार जाप किया जाता है।

सर्वशक्तिमान कविर्देव इसका वर्णन करते हैं:

मूल चक्र गणेश वासा, रक्त वर्ण जहाँ जानिए।
किलियँ जाप कुलीन तज सब, शब्द हमारा मानिये ।।

2) मूल कमल’ के ऊपर ‘स्वाद कमल या अनाहद कमल’ होता है, जो भगवान ब्रह्मा और देवी सावित्री’ द्वारा शासित होता है। इसकी छह पंखुड़ियाँ हैं। इसका 6000 बार जाप किया जाता है।

3) इसके ऊपर नाभि में, ‘नाभिकमल’ स्थित है, जिसके प्रमुख देवता भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी हैं। इसकी 8 पंखुड़ियाँ हैं। इसका 6000 बार जाप किया जाता है।

4) इसके ऊपर, भगवान शिव (रुद्र) देवी पार्वती के साथ ‘ हृदय कमल’ में निवास करते हैं, जिसकी 12 पंखुड़ियाँ हैं। इसका 6000 बार जाप किया जाता है।

5) 'हृदय कमल' के ऊपर, देवी दुर्गा 'कंठ कमल' में रहती हैं। इसकी 16 पंखुड़ियाँ हैं। इसका 1000 बार जाप किया जाता है।

6) सर्वोच्च भगवान कविर्देव 'संगम कमल' में निवास करते हैं। इसकी 3 पंखुड़ियाँ हैं। यह मन द्वारा शासित है। ‘भवतारन बोध’ पृष्ठ 111 (957) में यह उल्लेख किया गया है कि एक पंखुड़ी में सर्वोच्च ईश्वर कविर्देव निवास करते हैं। पृष्ठ 57 (903) पर उल्लेख किया गया है की देवी दुर्गा जी अन्य रूप में यहाँ दूसरी पंखुड़ी में 72 करोड़ सुंदर देवियों के साथ निवास करती हैं और तीसरी पंखुड़ी में ब्रह्म-काल करोड़ अन्य युवा देवताओं के साथ मन रूप में निवास करता हैं। इसका 1000 बार जाप किया जाता है।

7) सातवें कमल यानी 'सुरति कमल' में सतगुरु का निवास है। पृष्ठ 57 (903) पर इसका उल्लेख 'त्रिकुटी कमल' के रूप में किया गया है। पृष्ठ 111 (957) ‘भवतारन बोध’ में उल्लेख है कि इसकी दो पंखुड़ियाँ’ हैं। इसका 1000 बार जाप किया जाता है।

भगवान गणेश का शरीर में निवास स्थान और पूजा करने के सही तरीके को समझने के पश्चात् अब हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या भगवान गणेश पूर्ण भगवान हैं?

क्या भगवान गणेश जी पूर्ण भगवान हैं?

गणेश भगवान शिवलोक में निवास करने वाले गणों के देवता हैं और दैवीय शक्ति के मामले में भगवान शिव के अधीनस्थ हैं। भगवान शिव स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे जन्म और मृत्यु के चक्र में फंसे हैं, जैसा कि देवी भागवत महापुराण पृष्ठ 123 में उल्लेख किया गया है। इससे साबित होता है कि गणेश भी जन्म लेते हैं और मरते हैं क्योंकि वह शक्ति की दृष्टि से भगवान शिव के अधीन हैं।

गणेश जी को स्वयं मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ है। वह जीवन और मृत्यु के अभिशाप से मुक्त नहीं है। इसलिए, वह अपने किसी भी भक्त को मोक्ष प्रदान नहीं कर सकते। इसलिए, भगवान गणेश को पूर्ण भगवान के रूप में नहीं गिना जा सकता।

पवित्र शास्त्र इस बात का प्रमाण देते हैं कि सर्वोच्च भगवान -आदि गणेश जन्म और पुनर्जन्म के दुष्चक्र से आत्माओं को मुक्ति दिलाते हैं। वह मोक्षदाता हैं। पवित्र वेद पूर्ण भगवान के गुणों के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं (प्रमाण-यजुर्वेद अधाय 19 मंत्र 25,26) ।

विस्तृत विवरण के लिए अवश्य पढ़ें हिंदू धर्म के पूर्ण परमात्मा की जानकारी 

आगे पढ़ते हुए, आइए हम सबसे स्थायी प्रश्न का उत्तर खोजते हैं। यदि भगवान गणेश नहीं तो कौन है पूर्ण भगवान जो मोक्षदाता है? पवित्र ग्रंथों के अनुसार उनका नाम ‘आदि गणेश’ है। अनादि पुरुष, अमर भगवान जिन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना की है। आइये जानते हैं, कौन हैं आदि गणेश और उन्हें कैसे प्राप्त किया जा सकता है?

कौन हैं आदि गणेश?

इन देवताओं से पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए, सभी साधकों को पवित्र वेद और पवित्र श्रीमद भगवद गीता को अपनी पूजा का आधार बनाना चाहिए। पुराण, भगवान के शब्द नहीं हैं। वे कुछ देवता / संत / ऋषि के व्यक्तिगत अनुभव हैं। पुराणों को पढ़ने से हम जन्म और मृत्यु के चक्र को तो समझ सकते हैं लेकिन भगवान से सच्चे आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने से वंचित रहेंगे। पवित्र वेद और गीता जी भगवान के शब्द हैं।

तत्वदर्शी संत से दीक्षा लेकर पवित्र ग्रंथों के अनुसार परम अक्षर ब्रह्म की जो सत्यभक्ति की जाती है उससे आत्माओं को मोक्ष प्राप्त होता है।

पवित्र वेद, पवित्र गीता जी, पवित्र बाइबिल, पवित्र गुरुग्रंथ साहिब, पवित्र कुरान शरीफ में उल्लेख है कि परम अक्षर पुरुष यानी आदि गणेश विधाता हैं। वे सच्चे आध्यात्मिक गुरु हैं। उनका नाम सर्वशक्तिमान कविर्देव है।

कृपया ज़रूर पढ़ें पवित्र वेदों में पूर्ण परमात्मा की अवधारणा 

सर्वशक्तिमान कविर्देव एक तत्वदर्शी संत की भूमिका निभाते हुए दिव्य लीला करते हैं और भक्तों को सच्चा ज्ञान, सच्चा मंत्र प्रदान करते हैं जिससे मोक्ष प्राप्त होता है और साधक उस अमरलोक यानी सतलोक में चले जाते हैं जहाँ जाने के बाद वे ब्रह्म-काल के इस मृत संसार में कभी वापस नहीं आते। अतः केवल आदि गणेश ही पूजे जाने योग्य हैं।

आगे पढ़ते हुए, हम जानेंगे कि भगवान गणेश के गुरु कौन हैं?

भगवान गणेश जी के गुरु कौन हैं?

सर्वशक्तिमान कबीर जी /आदि गणेश इस मृत दुनिया में सभी युगों में अपनी सबसे प्यारी आत्माओं को सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने और उन्हें काल के जाल से मुक्त करने के लिए आते हैं।

ज़रूर पढ़ें आत्माऐं काल के जाल में कैसे फंसी

आदि गणेश - भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शिव, भगवान गणेश, देवी दुर्गा और ब्रह्म-काल (ज्योति निरंजन) से सतयुग में मिले और उन्हें मंत्र दिए। वह इन सबके गुरु हैं। वह भगवान गणेश जी के गुरु हैं। गणेश जी के विशिष्ट मंत्र का जाप करने से साधकों को लाभ मिलता है, बाकी सभी धार्मिक साधना व्यर्थ है।

आइए अब जानते हैं कि आदि गणेश और भगवान गणेश में क्या भिन्नता है?

आदी गणेश और भगवान गणेश में क्या भिन्नता है?

भगवान गणेश स्वयं जन्म और पुनर्जन्म के चक्र में हैं और भक्तों को मोक्ष प्रदान करने में असमर्थ हैं। आदि गणेश / सर्वोच्च परमपिता परमेश्वर भगवान कबीर जी ही पूजा करने के योग्य हैं अन्य कोई नहीं। मृत्यु के उपरांत आत्मा को देवताओं के लोक से गुजरना पड़ता है अपना आध्यात्मिक ऋण चुकाने के लिए जो सुख सुविधाएं वे हमें प्रदान करते हैं। उस आध्यात्मिक ऋण को केवल एक सच्चे संत द्वारा दिए गए इन देवताओं के नामों का जाप करके ही चुकाया जा सकता है, वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज ही वह सच्चे संत हैं।

गीता अध्याय 7 श्लोक 20 में गीता ज्ञानदाता कहता है कि जो अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी अंधकार में हैं। गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में गीता ज्ञानदाता स्वयं की और उसके अधीन सभी 33 करोड़ देवताओं की पूजा ना करने को कह रहा है और केवल उस पूर्णब्रह्म की शरण में जाकर उनकी उपासना करने की सलाह दे रहा है। गीता अध्याय 18 श्लोक 46 में गीता ज्ञानदाता अर्जुन को एक तत्त्वदर्शी संत की शरण में जाने के लिए कह रहा है जो प्रामाणिक आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं। वही आदि गणेश हैं।

पूजनीय भगवान कौन हैं?- आदि गणेश या भगवान गणेश

सभी देवता आदरणीय हैं, लेकिन केवल सर्वशक्तिमान कबीर जी की ही पूजा की जानी चाहिए। उपरोक्त से यह स्पष्ट है कि भगवान गणेश स्वयं मुक्त नहीं हैं। इसलिए, वह मोक्ष प्रदान नहीं कर सकते और अपने भक्तों के पापों को नष्ट नहीं कर सकते हैं। जबकि, आदि गणेश पापों का नाश करते हैं और सच्चे उपासक को मोक्ष प्रदान करते हैं। अंतर स्पष्ट है। केवल आदि गणेश ही मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। वह बाधाओं का निवारण करने वाले हैं। अतः पूजनीय केवल परमात्मा आदि गणेश हैं।