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भगवान राम , भगवान विष्णु जी के सातवें अवतार थे जिनका जन्म त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के घर हुआ था। श्री राम ‘इक्ष्वाकु वंश ’ से संबंधित हैं जिसे राजा ‘इक्ष्वाकु’ जो भगवान सूर्य के पुत्र थे, उनके द्वारा स्थापित किया गया था, इसी वजह से रामचंद्र जी को ‘सूर्यवंशी राजा’ कहा जाता है। श्री रामचंद्र जी हिंदू महाकाव्य रामायण के मुख्य पात्र हैं और हिंदू धर्म के एक प्रमुख देवता हैं; विशेष रूप से वैष्णव परंपरा के मानने वालों के लिए वह महत्वपूर्ण हैं। एक शाही परिवार में जन्मे भगवान राम के जीवन को अप्रत्याशित परिस्थितियों जैसे 14 साल के वनवास और कई नैतिक दुविधाओं और नैतिक सवालों से आजीवन चुनौती का सामना करना पड़ा।

श्री राम जी के रूप में विष्णु जी का मानव अवतार हुआ और उन्होंने जो कष्टों का सामना किया उससे साबित होता है कि सतोगुण विष्णु जन्म और मृत्यु के चक्र में हैं। वह शाश्वत नहीं है। एक समय में भगवान विष्णु अपने निवास स्थान 'वैकुंठ' में शेषनाग की शैय्या पर विश्राम करते हैं तो दूसरी ओर वे पृथ्वी पर अवतार लेते हैं और मानव जन्म में दुःख भोगते हैं। श्रीमद् देवी भागवत (दुर्गा) पुराण और शिव महापुराण इस बात का प्रमाण देते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव जन्म और पुनर्जन्म के चक्र में हैं। वे नश्वर हैं।

उपर्युक्त को ध्यान में रखते हुए पवित्र शास्त्रों का गहन अध्ययन किया गया है, जिससे यह साबित होता है कि अयोध्या के भगवान राम नहीं, बल्कि आदि राम जो अमरलोक 'सतलोक' में रहते हैं , की भक्ति की जानी चाहिए, जिनके बारे में भक्त आज तक अनभिज्ञ हैं।

इसका उल्लेख सूक्ष्म वेद में किया गया है,

राम राम सब जगत बखाने, आदि राम कोई बिरला जाने ||

हर कोई राम को याद करता है लेकिन यह कोई नहीं जानता कि असली राम कौन है? एक आदि राम है जो अमर है और केवल वो ही भक्ति के योग्य है जिनके बारे में भक्त समाज आज तक अनजान है।

सूक्ष्म वेद में वाणी है:

"एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में बैठा।
एक राम का सकल पसारा, एक राम दुनिया से न्यारा
।।

वह परम अक्षर पुरुष है जो पृथ्वी पर एक तत्वदर्शी संत के रूप में अवतार लेता है। वह अपनी प्यारी आत्माओं को सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैैं और उन्हें मुक्त करते हैं। सूक्ष्म वेद अर्थात सर्वशक्तिमान ईश्वर कबीर जी की अमृत वाणी में उल्लेख है:

राम  बुलावा  भेजिया , दिया  कबीरा  रोय  | जो  सुख  साधू  संग  में , सो  बैकुंठ में न  होय  ||

प्राणी को सुख और शांति केवल सच्चे आध्यात्मिक गुरु की शरण में जाने से ही मिलती है जो एक तत्वदर्शी संत की भूमिका निभाते हैं क्योंकि वह सच्चे मोक्ष मंत्रों को प्रदान करते हैं और कसाई ब्रह्म-काल की जेल से छुड़ाकर आत्माओं का मोक्ष करवाते हैं। यह सुख और शांति भगवान विष्णु के निवास स्थान वैकुंठ में भी नहीं पाई जा सकती है।

सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान न होने के कारण पूरी दुनिया भगवान राम उर्फ ​​भगवान विष्णु की ही पूजा करती है जो आत्माओं को जन्म और पुनर्जन्म के दुष्चक्र से मुक्त नहीं कर सकते क्योंकि वे स्वयं ब्रह्म-काल के जाल में फंसे हुए हैं।

यह लेखन पाठकों को 'मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी' के जीवन का अवलोकन कराएगा जिनकी पूजा मासूम भक्त युगों- युगों से बड़ी श्रद्धा के साथ करते आ रहे थे, यह मानते हुए कि वह एक दिव्य- पुरुष थे, जबकि महाकाव्य रामायण और अन्य पवित्र शास्त्रों के तथ्य यह स्पष्ट करते हैं कि आदि राम जो परम शाश्वत स्थान 'सतलोक' के शिखर यानि सातवें आसमान में रहते हैैं वे अमर सतपुरुष ही केवल पूजा करने के योग्य हैं। वह सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं।

इसका उल्लेख सूक्ष्म वेद में किया गया है:

एक राम दशरथ का बेटा, दूजा सकल पसारा |
तीजा घट घट का वासी, चौथा दुनिया से न्यारा ||

आइए तथ्यों के आधार से निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं और अध्ययन करते हैं कि आराध्य राम कौन है?

  •  नारद मुनि का भगवान विष्णु को श्राप देना।
  • भगवान राम का चौदह वर्ष का वनवास।
  • ब्रह्म काल का जाल - जब भगवान राम ने देवी पार्वती को पहचाना।
  • भगवान राम का राजा बाली को धोखे से मारना।
  • रामसेतु का निर्माण किसने किया था, भगवान राम या आदि राम ने?
  • गरुड़ ने श्री राम को ‘नाग-फाँस’ से मुक्त कराया
  • श्री राम जी ने आदि राम जी की कृपा से रावण का वध किया।
  • भगवान राम द्वारा सीता जी की अग्नि परीक्षा लेना।
  • श्री राम और सीता जी ने वफादार भक्त हनुमान जी का अपमान किया।
  • श्री राम और सीता जी की मृत्यु कैसे हुई?
  • राजा बाली ने द्वापर युग में श्री राम जी से बदला क्यों लिया?
  • क्या श्री राम जी की पूजा से मुक्ति संभव है?

पहले, आइए हम भगवान राम के जीवन पर प्रकाश डालते हैं और जानते हैं कि भगवान विष्णु को भगवान राम के रूप में पृथ्वी पर अवतार क्यों लेना पड़ा?

नारद मुनि का भगवान विष्णु को श्राप देना

एक बार ऋषि नारद जी ने घोर तपस्या की और उन्हें घमंड हो गया कि उन्होंने विषय विकारों पर विजय प्राप्त कर ली है। तपस्या पूरी करने के बाद वह अपने पिता भगवान ब्रह्मा से मिलने गए और उन्हें अपने उसी विश्वास से अवगत कराया। भगवान ब्रह्मा ने नारद जी से भगवान विष्णु जी से इस बारे में चर्चा नहीं करने के लिए आग्रह किया। चूँकि नारद मुनी अति आत्मविश्वास और उत्साह में थे इसलिए उन्होंने अपने पिता द्वारा दी गई चेतावनी के बावजूद विष्णु जी के साथ वह बात साझा करने की सोची अर्थात पिता की बात नहीं मानी । नारद मुनि अपने चाचा विष्णु जी से मिलने गए और शेखी बखारने लगे कि उन्होंने वासना पर विजय प्राप्त कर ली है और वे आजीवन तपस्वी का जीवन व्यतीत करेंगे। नारद मुनी के अभिमान और ग़लतफहमी को दूर करने के लिए विष्णु जी ने एक मायावी दुनिया रची जहाँ पर एक सुंदर राजकुमारी का 'स्वयंवर' आयोजित किया गया था और दूर-दूर के प्रसिद्ध शासक राजकुमारी से विवाह करने आए थे। ऐसा भव्य उत्सव और तैयारियों को देखकर नारद मुनी राजकुमारी से विवाह करने के लिए उत्साहित हो गए।

भगवान विष्णु का रूप मनमोहक है। नारद जी ने विष्णु जी को याद किया और उनसे उनका "हरि रूप" उन्हें प्रदान करने के लिए इच्छा ज़ाहिर की (संस्कृत में हरि का अर्थ बंदर होता है)। भगवान विष्णु ने चतुराई से 'तथास्तु’ कहकर सहमति दी और नारद जी का चेहरा वानर की तरह परिवर्तित हो गया, जिससे नारद जी अंजान थे। 'स्वयंवर' का समय आ गया और राजकुमारी ने शाही दरबार में प्रवेश किया। नारद जी कतार में खड़े थे और राजकुमारी की प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह उन्हें माला पहनाए, वह पास आई, ऋषि नारद को देख कर भी अनदेखा कर आगे की ओर चली गई। नारद मुनी चौंक गए कि ‘राजकुमारी ने उनकी उपेक्षा क्यों की' ? दूसरा मौका देते हुए, नारद मुनि एक और पंक्ति में आगे बढ़े, जहां राजकुमारी को अगले पल पहुँचना था। दूसरी बार भी राजकुमारी ने नारद जी को नज़रअंदाज़ कर दिया, तब उनके पास खड़े किसी व्यक्ति ने नारद जी के बंदर रूप का मज़ाक उड़ाया जिससे नारद मुनी नाराज़ हो गए ।

तब उग्र नारद मुनी ने भगवान विष्णु को श्राप दिया, “तुम अपनी पत्नी के वियोग में एक पूरा मानव जीवन व्यतीत करोगे और मेरी ही भांति वियोग का दर्द झेलोगे और बंदर जैसे मुख वाले प्राणी तुम्हारी मदद करेंगे।'

टिप्पणी: पुण्य आत्माओं! यहाँ साधकों को ब्रह्म-काल के भयंकर जाल को समझने की आवश्यकता है। वह धोखेबाज़ है। वह इस तरह की रणनीति निभाता है। सबसे पहले ब्रह्म-काल ने विष्णु जी को नारद जी के घमंड को कुचलने के लिए प्रेरित किया जिससे विष्णु जी ने एक मायावी दुनिया रची, फिर नारद जी ने विष्णु जी के समान सुन्दर दिखने की इच्छा से उनका आह्वान किया। विष्णु जी ने नारद जी के साथ छल किया जिसके परिणामस्वरूप नारद जी ने विष्णु जी को श्राप दिया। ब्रह्म-काल के इक्कीस ब्रह्माण्डों में विष्णु जी केवल सतोगुण विभाग के स्वामी हैं। उनके पास विभिन्न प्रकार की सीमित शक्तियां हैं। यहाँ तक कि ऋषि नारद भी कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन विडंबना यह है कि त्रिलोकीय विष्णु जी नारद मुनी द्वारा दिए गए श्राप के प्रभाव को निष्प्रभावी नहीं कर सके और श्री राम के रूप में मानव जन्म में पीड़ित हुए।

सर्वशक्तिमान कविर्देव अपनी अमृतवाणी में बताते हैं,

तुम कौन राम का जपते जापं, ताते कटें ना यह तीनों तापम ||

आप किस राम (भगवान) की पूजा करते हैं जो आपको तीन ताप यानी अभिशाप से राहत नहीं दिला सकते। यह दर्शाता है कि उनकी पूजा का तरीका सही नहीं है और वे सर्वोच्च नहीं हैं। हमारा रिमोट कंट्रोल कसाई काल के हाथ में है जो हमारे कर्मों को बिगाड़ता है और फिर 84 लाख जीवों की प्रजातियों में दर्द सहन कराके हमें अपने लोक में भी प्रताड़ित करता है। यहां तक ​​कि विष्णु भगवान भी इससे नहीं बचे हैं।

महत्वपूर्ण: तीन ताप यानी अभिशाप केवल सतगुरु की शरण लेने और सत्य भक्ति करने से ही निष्प्रभावी होते हैं। सतगुरु भक्ति मार्ग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां तक ​​कि भगवान राम और भगवान कृष्ण ने भी गुरु धारण किये थे।

सर्वशक्तिमान कविर्देव सूक्ष्म वेद में बताते हैं

राम कृष्ण से कौन बड़ो, तीनहुँ भी गुरु कीन्ह |
तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे अधीन ।।

श्री राम और श्री कृष्ण तीन लोक के स्वामी थे। उन्होंने भी गुरु धारण किया और अपने गुरु की अनुमति से अपने सभी कार्यों को पूरा किया भक्ति भी की और अपने मानव जन्म को अभिप्रायपूर्ण भी बनाया।

कबीर, राम कृष्ण बड़े, तिन्हूं पुर राजा।
तिन गुरू बन्द कीन्ह निज काजा।। 
  

रामचंद्र जी को गुणों के प्रतीक के रूप में चित्रित किया जाता है। इसके अलावा इस लेख के माध्यम से हम यह भी अध्ययन करेंगे कि भगवान विष्णु पर, नारद मुनी के श्राप का प्रभाव शैतान ब्रह्म-काल द्वारा कैसे उनके मानव जन्म रामचंद्र जी पर रचा गया था?

भगवान राम का चौदह वर्ष का वनवास

श्री रामचंद्र जी की सौतेली माँ 'कैकेयी' ने अपने पति राजा दशरथ को आदेश दिया कि वह रामचंद्र जी को 14 वर्ष के लिए राजगद्दी का अपना अधिकार त्यागने और वनवास जाने का फरमान सुनाये। एक आदर्श पुत्र के रूप में रामचंद्र जी ने पूर्ण समर्पण के साथ अपने पिता के अनिच्छुक निर्णय को स्वीकार कर लिया और अपनी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष के लिए अयोध्या छोड़ वन की ओर प्रस्थान किया।

नारद मुनी का श्राप सत्य प्रतीत होने लगा। यह सब शैतान ब्रह्म-काल का जाल था।

सर्वशक्तिमान कबीर जी की अमृत वाणी सूक्ष्म वेद में इसका उल्लेख किया गया है।

कबीर, वाशिष्ट मुनि से तत्वेता ज्ञानी, शोध कर लग्न धरै।
सीता हरण मरण दशरथ को, बन बन राम फिरै।।

ऋषि वाशिष्ठ जी विद्वान थे जिन्होंने पूर्ण आध्यात्मिक और ज्योतिषीय गणना की और राम और सीता के विवाह के लिए सबसे शुभ समय निर्धारित किया ताकि वे एक सुखद वैवाहिक जीवन जी सकें, लेकिन कौन जनता था कि अयोध्या के राजकुमार-राम और मिथिला की राजकुमारी -सीता जंगल में ऐसी दयनीय जिंदगी बिताएंगे। जैसा कि पूर्व निर्धारित था, जब राम, लक्ष्मण और सीता के साथ जंगलों में कठिन दिन बिता रहे थे, एक दिन लंका के राजा रावण ने सीता का अपहरण कर लिया और राम जी सीता की खोज में पृथ्वी के कोने-कोने में भटके।

हाथ सुमरणी बगल कतरणी पढ़े भागवत गीता।  
कहे कबीर काल जो मारे ज्यों हिरण कूं सीता।।

ऐसे ही ब्रह्म-काल धोखा देता है। रावण के मामा मारिची ने स्वर्ण मृग का रूप धारण कर लिया, सीता मोहित हो गई और वह उस मायावी मृग को पाना चाहती थी जो सीता के अपहरण का कारण बन गया। साधु, संत माला जपकर और गीता पढ़कर खुद को बुद्धिमान मानते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि वे सभी अज्ञानी हैं। सर्वशक्तिमान कबीर जी अपनी अमृत वाणी में बताते हैैं कि काल जीवों को गुमराह करता है। सीता का अपहरण ब्रह्म-काल का एक सुनियोजित षड्यंत्र था जिसमें श्री राम एक कमजोर और असहाय पति के रूप में उभर कर आते हैं और भाग्य के हाथों एक कठपुतली बन जाते हैं।

कृपया विचार करें- श्री रामचंद्र उर्फ ​​विष्णु जी यह नहीं पहचान सके कि सीता का अपहरण किसने किया? एक पक्षी जटायु ने श्री राम जी को बताया कि लंका के राजा रावण ने माता सीता का अपहरण किया है। जब मैंने बचाने की कोशिश की तो रावण ने मेरे पंख काट दिए।' त्रिलोकी विष्णु अर्थात श्री रामचंद्र जी को यह बात पता नहीं थी, इससे साबित होता है कि वह कितने असहाय थे।

ज़रूर विचार करें-

  • क्या श्री राम जी को दिव्य-मानव माना जाना चाहिए?
  • क्या श्री राम जी को भगवान की श्रेणी में गिना जाना चाहिए?

ब्रह्म काल का जाल- जब भगवान राम ने देवी पार्वती को पहचान लिया था

जब भगवान राम-सीता जी के खो जाने का शोक मना रहे थे तब शिव जी ’शिवलोक’ में देवी पार्वती के साथ अपने बड़े भाई विष्णु जी (राम ) को देख रहे थे। शिव जी ने उन्हें प्रणाम किया तब पार्वती जी ने शिव जी से पूछा ‘भगवन आपने किसको प्रणाम किया?’ शिव जी ने कहा, ‘पृथ्वी पर एक संत के रूप में प्रच्छन्न मनुष्य वास्तव में भगवान विष्णु हैं। उसकी पत्नी सीता खो गई है, इसलिए विष्णु जी उदास हैं।‘ देवी पार्वती को शंकर जी की यह बातें सुनकर आश्चर्य हुआ, भगवान कैसे रो सकते हैं और कैसे असहाय हो सकते हैं? देवी पार्वती ने कहा ‘मुझे विश्वास नहीं होता मैं विष्णु जी की परीक्षा लूंगी।‘ शिव जी ने पार्वती को ऐसा न करने की चेतावनी दी लेकिन शिव जी के जाने के बाद पार्वती ने सीता का रूप धारण कर लिया और पृथ्वी पर चली गईं जहां विष्णु अकेले विलाप कर रहे थे।

धोखेबाज काल छलिया है, वह बेईमानी करता है, उसके हाथ में सबका रिमोट है। जिस क्षण पार्वती जी श्री राम के सामने गईं, उन्होंने पार्वती जी को पहचान लिया कि वह सीता नहीं, बल्कि देवी पार्वती हैं और उन्होंने पूछा, “माता! आप अकेली कैसे आईं? शिव जी को कहाँ छोड़ आयीं? पहचान होने की वजह से देवी पार्वती बेहद शर्मिंदा हुईं। जब वह वापस गई तो भगवान शिव ने आसानी से पहचान लिया कि देवी पार्वती ने उन्हें धोखा दिया है और दी गई चेतावनी के बावजूद वे विष्णु जी की परीक्षा लेने गई थीं। शिव जी नाराज़ हो गए क्योंकि देवी पार्वती ने उनके बड़े भाई की पत्नी सीता जी का रूप धारण किया था इसलिए उन्होंने पार्वती जी को अपनी पत्नी स्वीकार करने से इंकार कर दिया क्योंकि अब वह माँ के रूप में सम्मानित हैं। इसके बाद हताश शिव तपस्या के लिए चले गए। माता पार्वती को अपने किये का पछतावा हुआ लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह भी ’शिव लोक’ छोड़कर अपने माता-पिता के घर पर रहने के लिए चली गयीं।

जब देवी पार्वती अपने माता-पिता के घर गईं तो उन्होंने देखा कि उनके पिता दक्ष ने एक भव्य धार्मिक यज्ञ का आयोजन किया है जिसमें उन्होंने सभी देवताओं, प्रसिद्ध राजाओं, संतों, आदि अनेक गढ़मान्य व्यक्तियों को आमंत्रित किया हुआ है, लेकिन भगवान शिव और उनकी उपेक्षा की। दक्ष ने शिव-पार्वती के विवाह से खुश नहीं होने के कारण पार्वती का अपमान भी किया। अपने पिता के व्यवहार से क्रोधित, पार्वती अग्नि कुंड में कूद गईं और खुद को जला दिया। जब शिव जी को इस बारे में पता चला तो उन्होंने दक्ष के सिर को काट दिया।

 विचार करें:-

  • वही भगवान राम जो यह नहीं जान सके कि सीता का अपहरण किसने किया? और जंगलों में भटकते हुए हर किसी से पूछते रहे हैं कि क्या कोई जानता है कि सीता कहाँ है? और वह देवी पार्वती की पहचान कर लेते हैं, जब वह सीता के रूप में उनके समक्ष आई थीं। कैसे?
  • ब्रह्म-काल का जाल खतरनाक है उन्होंने राम को उस क्षण दिव्य दृष्टि प्रदान कर दी जिससे उन्होंने देवी पार्वती को पहचाना लिया। बाद में देवी पार्वती शर्मिंदा हुई। उनके इस कृत्य से शिव जी नाराज़ हो गए जिन्होंने पार्वती जी को त्याग दिया और तपस्या करने लगे। पार्वती जी ने आत्मदाह किया, शिव ने दक्ष को मार दिया।

काल ने पूरे कृत्य की साज़िश रची जो घातक साबित हुई। इस तरह काल निर्दोष प्राणियों के जीवन को बर्बाद कर देता है और उनके खाते में पापों को शामिल करता है जिन्हें उन्हें वहन करना पड़ता है। भगवान राम, जो महाकाव्य रामायण के नायक हैं वह सभी आत्माओं की भाँति ब्रह्म-काल के हाथों की एक कठपुतली बनकर उभरे और भक्तों का मानना ​​है कि भगवान श्री राम सर्व-शक्तिमान थे।

सूक्ष्म वेद में उल्लेखित वाणी है,

जा पल दरसन साधू का, ता पल की बलिहारी  |
राम नाम रसना बसे, लीजै जनम सुधारी  ||

अर्थ: वह क्षण सराहनीय है जब कोई व्यक्ति तत्वदर्शी संत जो आदि राम का प्रतिनिधि होता है, की शरण ग्रहण करता है क्योंकि केवल सच्ची उपासना की शक्ति से ही काल के जाल से आत्माओं को राहत मिलती है, इस प्रकार मनुष्य का कल्याण होता है। इसलिए साधकों को आदि राम की पूजा करनी चाहिए।

भगवान राम का राजा बाली को धोखे से मारना

महाकाव्य रामायण की रचना मूल रूप से ऋषि वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में की गई थी और बाद में इसे विभिन्न भाषाओं में रूपांतरित किया गया, जिनमें तुलसीदास जी द्वारा रचित 'रामचरितमानस' सबसे प्रसिद्ध है। रामायण में एक प्रकरण आता है जब भगवान राम ने राजा बाली, जो इंद्र के पुत्र और अंगद के पिता थे उनको धोखा दिया था। एक पेड़ की ओट लेकर उन पर छिपकर वार किया और बाली को मार डाला क्योंकि बाली में अलौकिक शक्ति थी, अगर कोई एकल-युद्ध में उनके साथ युद्ध करता है तो सामने वाले व्यक्ति की शक्ति का आधा हिस्सा बाली में प्रवेश कर जाता था। जबकि बाली और भगवान राम दुश्मन नहीं थे। भगवान राम ने अपने स्वार्थ के कारण बाली को धोखा दिया क्योंकि बाली के भाई सुग्रीव ने अपनी पूरी वानर सेना के साथ सीता जी की खोज और वापसी में श्री राम की मदद करने का वचन दिया था। इससे त्रिलोकिय विष्णु जी कितने शक्तिवान हैं इसका सहज में ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है जो बाली को सामने से युद्ध में परास्त करने में सक्षम नहीं थे। भगवान राम द्वारा राजा बाली को धोखा देने का यह कृत्य एक कायरतापूर्ण कृत्य था जो बेहद शर्मनाक है।

कृपया विचार करें

  • भक्त, राम को दिव्य-पुरुष मानते हैं जो मानवीय और दैवीय दोनों की शक्तियों से सुसज्जित होने की मिसाल हैं। ऐसे दिव्य-मानव अर्थात श्री राम जी ने कायरतापूर्ण कार्य किया। यदि वह इतने शक्तिशाली थे तो उन्हें सामने से एक बहादुर योद्धा की तरह बाली से लड़ना चाहिए था। यह प्रकरण फिर से साबित करता है कि भगवान राम, बाली का सामना करने में असमर्थ थे। इसलिए छिपकर बाली की हत्या कर दी। इस प्रकरण में वह एक धोखेबाज़ के रूप में उभरे।

रामसेतु का निर्माण किसने किया था, भगवान राम या आदि राम ने?

हनुमान एक भक्त आत्मा थे। वह रामचंद्र जी द्वारा एक शांति दूत के रूप में लंका में अभिमानी शासक रावण को आत्मसमर्पण करने और सीता को राम जी को वापस लौटाने के लिए भेजे गए थे। लेकिन अहंकारी रावण ने उनकी बात को नहीं स्वीकारा और सीता को वापस करने से मना कर दिया। बाद में फिर युद्ध की यलगार हुई परन्तु अब विशाल महासागर लंका तक पहुंचने में बाधक बन गया। रामचंद्र जी लगातार तीन दिनों तक घुटनों पानी तक महासागर में खड़े रहे और समुद्र से रास्ता देने का अनुरोध किया, लेकिन सागर ने रास्ता नहीं दिया। इससे हताश होकर श्री राम ने अग्नि बाण को उठाकर पूरे समुद्र को जला देने का प्रण लिया। तब, सागर ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और हाथ जोड़कर श्री राम के समक्ष खड़े हो गए और क्षमा मांगी और श्री राम से कहा कि आपकी वानर सेना में जो दो भाई नल और नील हैं उनको अपने गुरु जी ऋषि मुनिंदर (सर्वशक्तिमान ईश्वर कबीर जी यानी आदि राम) की कृपा से शक्ति प्राप्त है। यदि उनके हाथों से कोई भी वस्तु जल में डाली जाएगी तो वह डूबेगी नहीं बल्कि तैर जाएगी लेकिन उन्होंने इस शक्ति को गर्व (अभिमान) हो जाने के कारण खो दिया है। अब ऋषि मुनिंदर जी ही श्री राम की मदद कर सकते हैं।

सर्वशक्तिमान कबीर जी सूक्ष्म वेद में बताते हैं,

साधु दर्शन राम का, मुख पर बसे सुहाग।
दर्शन उनही को होत हैं, जिनके पूर्ण भाग।।

श्री राम उर्फ ​​विष्णु भी आदी राम के बच्चे हैं। उन्हें इस विषम परिस्थिति में भगवान कबीर साहेब के आशीर्वाद की आवश्यकता थी, इसलिए उन्होंने आदि राम को याद किया। परम अक्षर पुरुष कविर्देव सेतुबंध पर ऋषि मुनिंदर के रूप में प्रकट हुए और ब्रह्म-काल को दिए गए अपने वचन के अनुसार भगवान कबीर साहेब ने श्री राम की सेना के लिए रामसेतु का निर्माण किया।

ऋषि मुनिन्दर उर्फ ​​आदि राम ने पर्वत के चारों ओर एक रेखा को चिन्हित किया और अपनी सर्वोच्च शक्ति से उस रेखा के अंदर के पत्थरों को लकड़ियों की भाँति हल्का कर दिया, जो पुल का निर्माण करते समय डूबे नहीं। इस प्रकार, रामसेतु का निर्माण आदि राम की कृपा से हुआ था। इससे पूर्व श्री राम पुल का निर्माण नहीं कर सके। यहां तक ​​कि नल और नील भी असफल हो गए थे। चूंकि नल और नील वास्तुकार थे, इसलिए उन्होंने उन हल्के पत्थरों को तराशा और उन्हें एक-दूसरे के अनुकूल बनाकर जोड़ा और पूरी वानर सेना ने सेतु निर्माण के कार्य में अपना भरपूर योगदान दिया। पहचान के लिए, हनुमान जी ने उन सभी हल्के पत्थरों पर राम-राम लिख दिया और अब तक भोले भक्त यह मानते रहे कि रामसेतु का निर्माण श्री राम की कृपा से हुआ था। इस प्रकार अज्ञानतावश श्रद्धालु श्री राम को एक सर्व-शक्तिशाली दिव्य पुरुष मानते रहे।

इसका उल्लेख सूक्ष्म वेद में किया गया है,

कबीर, समुद्र पाट लंका गए, सीता को भरतार | 
सात समुद्र अगस्त मुनि पी गए, इनमें कौन करतार।।

यदि यह मान लिया जाये कि रामसेतु का निर्माण श्री राम की कृपा से हुआ था और फिर पूरी सेना लंका पहुंच सकी थी और इस कारण से आप श्री राम को दिव्य पुरुषों की श्रेणी में गिनते हो तो इसी प्रकार एक बार ऋषि ‘अगस्त्य’ ने एक घूंट में सात महासागरों को पी लिया था। उनके पास अलौकिक शक्तियाँ थीं। फिर आप श्री राम और ऋषि अगस्त्य में से किसे भगवान के रूप में पूजोगे? यह भक्तों के बीच एक मिथक है, कि रामसेतु भगवान राम की कृपा से बनाया गया था। तथ्य, रामसेतु का निर्माण आदि राम (कबीर परमात्मा) की कृपा से हुआ था। जब भगवान कबीर साहेब ने पत्थरों को लकड़ी जैसे हल्का कर दिया था जो रामसेतु निर्माण में उपयोग किए गए थे।

टिप्पणी: जब सर्वप्रथम सर्वशक्तिमान कबीर साहेब जी, शैतान ब्रह्म-काल के क्षेत्र में आए थे तो उसने भगवान कबीर से दो वादे करने के लिए आग्रह किया था।

  • सबसे पहले, ब्रह्म-काल ने भगवान कबीर से त्रेता युग में अपने पुत्र विष्णु के अवतार श्री राम की मदद करने का अनुरोध किया, ताकि वह समुद्र पर पुल बनाकर अपनी पत्नी सीता को वापस ला सकें।
  • दूसरा, द्वापर युग में; श्री कृष्ण की मृत्यु के बाद, इंद्रदमन नाम के उड़ीसा के राजा श्री कृष्ण जी के मंदिर का निर्माण करवाना चाहेंगे लेकिन सागर ऐसा नहीं होने देगा इसलिए कृप्या उड़ीसा में जगन्नाथ मंदिर बनाने में मदद करना।

रामसेतु और उड़ीसा में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण उन्हीं आदि राम की प्रतिज्ञा का परिणाम है।

सर्वशक्तिमान कबीर साहेब अपनी अमृत वाणी में बताते हैं

मोमे तोमे सरब में, जहां देखु तहां राम | 
राम बिना छिन ऐक ही, सरै न ऐको काम। 
  

मैं जहां भी देखता हूं आदि राम को ही पाता हूं। आदि राम की कृपा के बिना इस दुनिया में कुछ भी नहीं हो सकता है।

गरुड़ ने श्री राम को ‘नाग-फाँस’ से मुक्त कराया

श्री राम और पूरी वानर सेना ने रामसेतु पुल पार किया और लंका पहुंचे। दोनों सेनाओं के बीच युद्ध शुरू हो गया और श्री राम की सेना पर 'नाग-फाँस' नामक एक हथियार से वार किया गया, जिसके परिणामस्वरूप श्री राम, लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, जामवंत, अंगद सहित सभी सैनिकों का पूरा शरीर नागों द्वारा बांध दिया गया और वे निष्क्रिय हो गए। गरुड़ जी को मदद के लिए याद किया गया जिसने सभी नागों को मार दिया। तब पूरी सेना और श्री राम बंधन से मुक्त हुए।

इसका उल्लेख सूक्ष्म वेद में किया गया है

काटै बंधन विपत्ति में, कठिन कियो संग्राम। 
चिन्हो रे नर प्राणियां, ये गरूड़ बड़ो कि राम।।

संकट के समय गरुड़ जी ने दिव्य पुरुष श्री राम और उनकी सेना की मदद की। तो, विचार कीजिए दोनों में से (श्री गरुड़ और श्री राम) में से कौन श्रेष्ठ कहलाए जाने योग्य हैं?

टिप्पणी: भगवान श्री राम फिर से एक असमर्थ योद्धा के रूप में सामने आए, क्योंकि इस बार वह खुद को और अपनी सेना को मुक्त करने के लिए श्री गरुड़ जी पर निर्भर नज़र आए।

श्री राम जी ने आदि राम जी की कृपा से रावण का वध किया

रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। रावण ने दस बार शिव जी को अपना सिर काट कर चढ़ाया और दस बार ही शिव जी ने रावण को उसका शीश लौटा दिया था और उसे आशीर्वाद दिया कि, ‘आप दस बार सिर कटने के उपरान्त ही मर सकेंगे।' रावण को मारना मुश्किल था क्योंकि रावण को नाभि में अमृत होने का वरदान मिला हुआ था। कहा जाता है कि रावण अत्यधिक शक्तिशाली था और उसने 33 करोड़ देवी-देवताओं को भी कैद कर लिया था। सीता को रावण की जेल से मुक्त कराने के लिए, श्री राम और रावण के बीच युद्ध हुआ लेकिन राम-रावण को नहीं मार सके। तब, विभीषण ने श्री राम जी से कहा कि रावण की नाभि में तीर लगने पर ही रावण का वध हो सकता है लेकिन रामचंद्र के सारे प्रयास व्यर्थ गए। फिर, रामचंद्र जी ने सर्वोच्च भगवान कबीर साहेब जी का आह्वान किया। आदि राम (कबीर साहेब जी) ने गुप्त रूप में रामचंद्र के हाथों पर हाथ रखा और रावण की नाभि में तीर मारा। इस तरह आदि राम की कृपा से रावण मारा गया।

इसका उल्लेख सूक्ष्म वेद में किया गया है,

कबीर, सर्व सोने की लंका थी, वो रावण से रणधीरं |  
एक पलक मे राज विराजै, जम के पड़ै जंजीरं ||

पूज्यनीय भगवान कबीर साहेब जी बताते हैं, रावण की पूरी लंका सोने से बनी थी। वह बहुत शक्तिशाली शासक था। परन्तु फिर भी लंकापति रावण जैसा महापुरुष एक ही क्षण में राख हो गया।

मर्द गर्द में मिल गए, रावण से रणधीर।
कंश, केशो, चाणूर से, हिरणाकुश बलबीर।।

कंस, केशो, चाणौर, और हिरणाकुश जैसे योद्धाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ, सभी मृत्यु उपरांत मिट्टी में मिल गए।

सर्वशक्तिमान कबीर साहेब जी अपनी अमृत वाणी में कहते हैं कि सतपुरुष की सत्य साधना के बिना पूरी दुनिया भ्रम में रहती है। रावण अरब-खरब पति था लेकिन मृत्यु उपरांत अपने साथ एक ग्राम सोना भी नहीं ले जा सका। ब्रह्म-काल के क्षेत्र में लोग सिर्फ धन संचय करने तक ही सीमित रह गए हैं, परन्तु सच्चाई यह है कि वह इस धन को मृत संसार को छोड़ने पर अपने साथ नहीं ले जा सकते। परम अक्षर पुरुष की सत्य साधना करने के बजाय अज्ञानता के कारण वे केवल धन अर्जित करने में ही अपने बहुमूल्य मानव जन्म को बर्बाद कर देते हैं जिससे वे मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाते।

भक्ति बिना क्या होत है, ये भरम रहा संसार।
रति कंचन पाया नहीं, रावण चलती बार।।

परमात्मा कबीर साहेब जी बताते हैं कि जीव अकेले ही इस दुनिया में आता है और अकेला ही चला जाता है। धन अर्जित करने और एक विशाल साम्राज्य बनाना यह मनुष्य का एक भ्रम है? रावण का बहुत बड़ा साम्राज्य और विशाल परिवार था। उनके एक लाख बेटे और 1.25 लाख पोते थे, लेकिन आज उनके परिवार में एक भी परिवार का सदस्य जीवित नहीं है, सभी मर चुके हैं।

आवत संग न जात संगाती, क्या हुआ दर बांधे हाथी।
इक लख पूत सवा लख नाती , उस रावण के आज दीया न बाती ।।

इसलिए, भगवान कबीर साहेब जी गुमराह और आध्यात्मिक रूप से मृत आत्माओं को जगाते हैं और उन्हें आदि राम की सत्य साधना करने के लिए प्रेरित करते हैं और कसाई ब्रह्म-काल के जाल से छुटकारा दिलवाते हैं।

राम नाम जप कर थिर होई। ओहम सोहम मंत्र दोई।।

ओम सोहं जपले भाई। राम नाम की यही कमाई।।

इससे पहले कि देर हो जाए आदि राम जो सर्वव्यापी है को पहचान कर मोक्ष मंत्रों का जाप करना चाहिए। वह आदि राम कविर्देव जी हैं।

रावण का भाई विभीषण आदि राम के शिष्य थे और उन्होंने उनकी शरण ग्रहण कर सत्य साधना की जिससे उन्हें रावण की मृत्यु के उपरांत आदि राम की कृपा से लंका का राज्य प्राप्त हुआ।

टिप्पणी: श्री राम उर्फ ​​श्री विष्णु ने 14 वर्ष के वनवास के दौरान अपने मानव जन्म में बहुत कष्ट झेले। नारद मुनि का श्राप सच हो गया।

भगवान राम द्वारा सीता जी की अग्नि परीक्षा लेना

युद्ध समाप्त हो गया, रावण मारा गया और सीता जी को रावण की कैद से छुड़ा लिया गया। जब सीता जी वापस लौटीं तो श्री रामचंद्र जी ने सीता जी की अग्नि परीक्षा ली, यह क्रिया कई लोगों की उपस्थिति में हुई। सीता जी अग्नि परीक्षा में सफल हुईं। तब, भगवान राम ने सीता जी को स्वीकार किया और रावण के विमान में लक्ष्मण और हनुमान के साथ अयोध्या वापस लौट आए।

एक दिन जब राम अयोध्या में विचरण कर रहे थे, तब उन्होंने एक धोबी को अपनी पत्नी के साथ झगड़ा करते सुना, क्योंकि वह अपने पति की सहमति के बिना घर छोड़कर चली गई थी। धोबी ने अपनी पत्नी को यह कहते हुए स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि ''वह श्री राम जैसा मूर्ख नहीं है जिसने सीता को बारह वर्ष तक लंका में अपने पति (राम) के बिना अन्य व्यक्ति (रावण) के साथ रहने के बावजूद भी स्वीकार किया।‘ ऐसे शब्द सुनकर राम शर्मिंदा हो गए और वापस महल में आकर राम जी ने लक्ष्मण जी को पूरी बात बताई कि नगरवासी सीता की पतिव्रता होने के बारे में कैसे गपशप कर रहे हैं। इस घटना ने श्री राम जी को व्याकुल कर दिया। उन्होंने तुरंत ही सीता जी को महल में बुलाया। सीता जी उस वक़्त गर्भवती थी लेकिन राम जी ने इस पर कोई भी विचार नहीं किया और सीता जी को महल से निष्कासित कर दिया। सीता जी द्वारा कई बार विनती करने के बाद भी राम जी ने कोई मानवीय व्यवहार (संवेदनशीलता) नहीं दिखाया। इस घटना के उपरान्त सीता जी ने अपना शेष जीवन वनवास में व्यतीत किया। भगवान राम ने यह कहते हुए सभा छोड़ दी कि ‘मैं आलोचना का विषय नहीं बनना चाहता। मेरा वंश कलंकित हो जाएगा।‘

कृपया विचार करें: श्री राम का 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में अभिवादन किया जाता है। श्री राम ने सीता जी की अग्नि परीक्षा ली थी बावजूद इसके की वो सफल हुईं, श्री राम जी ने उन्हें धोबी के व्यंग्य करने की वजह से जब वह गर्भवती थी तब महल से निष्कासित कर दिया।

टिप्पणी: श्री राम एक राजा कहलाने लायक भी नहीं थे और हम सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण युगों से उन्हें भगवान मान रहे हैं। जब वह अपने निर्णय पर अडिग नहीं रह सके तो उन्हें अग्नि परिक्षा के नाटक की क्या आवश्यकता थी? यह तथाकथित मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का बेहद शर्मनाक कृत्य था।

इसका उल्लेख सूक्ष्म वेद में किया गया है,

गोरख से ज्ञानी घने, सुखदेव जती जहान।
सीता सी बहु भारिया, सन्त दूर अस्थान।।

गोरखनाथ जैसे कई बुद्धिमान पुरुष आसानी से मिल सकते हैं, इसी प्रकार जति पुरुष और सीता जैसी ‘सती  महिलाएं भी बहुत आसानी से पाई जा सकती हैं लेकिन सच्चे संत का मिलना दुर्लभ है। यह ब्रह्म-काल का एक विशाल जाल है जिसे साधकों को समझने की आवश्यकता है। 

 सूक्ष्म वेद में बताया गया है,

लोक लाज मर्याद जगत की, तरण जो छोड़ बगावे, 
कामनी कनक जहर कर जाने, वो शहर अगमपुर जावे
जब कोई राम भगत गत पावे ||

साधकों को सलाह है कि उन्हें जगत की झूठी मर्यादाओं को त्यागकर अपने आत्म-कल्याण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और सच्चे संत के बताये अनुसार भक्ति करनी चाहिए, जिससे वह अमरलोक की प्राप्ति कर आदि राम को पा सकें।

 सूक्ष्म वेद में बताया गया है,

राम नाम जपते रहो जब तक घट में प्राण।
कभी तो दीनदयाल के भनक पड़ेगी कान।।

केवल सच्चे संत यानी सतगुरु ही आत्माओं को इस तरह के दुःख से उभारने में मदद करते हैं और मोक्ष प्राप्ति के लिए सही तरीका बताते हैं। इसलिए, विश्वास के साथ आदि राम की भक्ति अंतिम स्वाँस तक करें, एक दिन वह निश्चित रूप से आशीर्वाद देंगे और अपने प्रिय भक्त की आत्मा को राहत देंगे और 'सतलोक' ले जाएंगे।

श्री राम और सीता जी ने वफादार भक्त हनुमान जी का अपमान किया

हनुमान श्री राम के सच्चे भक्त थे। एक दिन सीता जी ने श्री राम जी से कहा कि वह युद्ध में लड़ने वालों को पुरस्कृत करना चाहती हैं। सीता जी ने हनुमान जी को अपना कीमती मोती का हार भेंट किया। हनुमान जी ने हार को तोड़ दिया और मोतियों को कुचल दिया और सीता जी से कहा कि यह हार उनके लिए बेकार है क्योंकि उनके भगवान श्री राम इन मोतियों में नहीं हैं।‘ सीता जी ने नाराज होकर हनुमान जी को डांटा, ‘हे मूर्ख! तुमने इतना कीमती हार नष्ट कर दिया तुमने केवल बंदर की तरह ही व्यवहार किया। मेरी आँखों से दूर चले जाओ।‘ हनुमान जी ने कहा, ‘जिस वस्तु में राम जी का नाम अंकित नहीं वह मेरे किसी काम की नहीं है। मैं जाँच कर रहा था कि क्या श्री राम नाम इन मोतियों में अंकित हैं।‘ तब, सीता जी ने कहा ‘क्या आपके शरीर में राम का नाम लिखा है? आप अपना शरीर क्यों नहीं त्याग देते।‘  यह सुनकर उसी क्षण हनुमान जी ने अपना सीना चीर दिया और दिखाया कि इसमें 'राम-राम' लिखा हुआ है। यह सब श्री राम जी की मौजूदगी में हुआ लेकिन वह शांत रहे और अपने सबसे वफादार भक्त का समर्थन भी नहीं किया जिसने संकट के समय श्री राम जी की मदद की और सीता जी को रावण की क़ैद से मुक्त कराया। हनुमान ने श्री राम और लक्ष्मण को अहिरावण की कारागार से भी बचाया था, जब अहिरावण ने महामाया देवी को बलिदान देने के लिए उनका अपहरण कर लिया था। हनुमान जी, श्री राम और सीता जी दोनों के व्यवहार से बहुत आहत हुए और उन्होंने इसके बाद अयोध्या को त्याग दिया।

महत्वपूर्ण: इसके बाद, आदि राम यानी कविर्देव जी ने हनुमान जी को अपनी शरण में लिया, उन्हें सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश दिया, उन्हें सचखंड / सतलोक ’दिखाया, और सच्चे मोक्ष मंत्र दिए जिससे हनुमान मोक्ष प्राप्त करने के योग्य हो गए।

इसका उल्लेख सूक्ष्म वेद में किया गया है,

तब हनुमान सत्य की मानि, सो मुनींद्र सत्य हो ग्यानी।
अब तुम पुरु मोहि दीखो, मेरा मन तुम टैब पटियाओ।
कैसि विद्या समरथ को जान, सो कुच मोहि सुनि गयाना।

तब हनुमान जी ने माना कि श्री राम नहीं बल्कि आदि राम ही भक्ति के योग्य हैं।

डेखत चंद्रा वरन उजियारा, अमृत फालका करे अहरा।
आकांक्षा भानु पुरुष उजियारा, कोटिन भानु पुरुष रोम छ विभावरा।
तब हनुमान ठाक ता मारी, तुम मुनींद्र ए सुखकारी।

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श्री राम और सीता जी की मृत्यु कैसे हुई?

सीता जी के अयोध्या छोड़ने के बाद उन्होंने ऋषि वाल्मीकि जी के आश्रम में शरण ली, जहाँ उन्होंने लव नामक एक पुत्र को जन्म दिया। एक बार सीता जी अपने पुत्र लव के साथ किसी काम के लिए आश्रम से बाहर गई थीं लेकिन ऋषि वाल्मीकि इस बात से अनभिज्ञ थे। ऋषि जी ने सोचा कि लव कहीं खो गया है और इस डर से कि वह सीता को क्या बताएँगे जब वह आश्रम लौटेगी और लव के बारे में पूछेगी; उन्होंने अपनी शक्ति से 'कुशा घास' से एक लड़का बना दिया। इस तरह, लव और कुश राम और सीता के दो पुत्र बन गए लेकिन श्री राम इस बात से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे।

एक बार श्री रामचंद्र जी ने अपने वर्चस्व को साबित करने के लिए 'अश्वमेघ यज्ञ' का आयोजन किया। उनके पुत्रों लव और कुश ने यज्ञ के उस घोड़े को बांध दिया और श्री राम को युद्ध के लिए ललकारा। श्री राम अनभिज्ञ थे कि लव और कुश उनके पुत्र हैं। श्री राम और लव-कुश का युद्ध हुआ और श्री राम को अपने ही बेटों के हाथों हार का सामना करना पड़ा। जब सीता को यह पता चला तो वह बहुत दुःखी हो गईं और उन्होंने श्री राम को देखने से भी इनकार कर दिया। दुःख में सीता जी ने पृथ्वी में प्रवेश किया और अपना जीवन समाप्त कर लिया। इस पश्चाताप में श्री राम ने अयोध्या के पास सरयू नदी में जल समाधि’ लेकर अपना जीवन समाप्त किया। श्री राम और सीता जी दोनों ने दयनीय जिंदगी बिताई और दोनों की मृत्यु भी बेहद दर्दनाक थी।

टिप्पणी: इस प्रकार ऋषि नारद का श्राप सत्य हुआ। विष्णु जी ने श्री राम रूप में अपने सातवें अवतार में अत्यंत दुखी जीवन व्यतीत किया।

राजा बाली ने द्वापर युग में श्री राम जी से बदला क्यों लिया?

नारद मुनि जी के श्राप के कारण विष्णु जी को श्री राम रूप में त्रेता युग में पूरा जीवन संघर्ष में बिताना पढ़ा। यह ब्रह्म काल का जाल है जिसे समझने की आवश्यकता है। भगवान विष्णु ने द्वापर युग में श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिया और बाली की आत्मा ने भी जन्म लिया। वह उस समय एक शिकारी था जिसने श्री कृष्ण के चरणों के ’पदम को गलती से एक हिरण की आंख मान लिया और श्री कृष्ण के पैर में विशाख्त तीर मार दिया जिससे कृष्ण जी की मृत्यु हो गई थी। इस तरह, ब्रह्म-काल द्वारा रचित प्रतिशोध पूरा हुआ। यह प्रक्रिया ब्रह्म-काल के क्षेत्र में प्रत्येक आत्मा की तब तक जारी रहती है जब तक कि आत्मा आदि राम की शरण में नहीं आती है और सत्य साधना करके पूर्ण मोक्ष प्राप्त नहीं होता है। इसलिए, मानव जीवन के लक्ष्य को अर्थात मोक्ष प्राप्त करने के लिए जीवन में गुरु धारण करना और सत्य साधना करना अति आवश्यक है।

सूक्ष्म वेद में कहा गया है,

लूट सको तो लूट लो राम नाम की लूट, पीछे फिर पछताओगे प्राण जाएंगे छूट ||

इससे पहले कि देर हो जाए सच्चे संत की शरण ग्रहण करनी चाहिए उनसे नाम-दीक्षा लेनी चाहिए, आदि राम के सच्चे मंत्रों का जाप करना चाहिए जिससे जीव को मोक्ष प्राप्त हो।

टिप्पणी: इससे यह भी साबित होता है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव तीनों शैतान ब्रह्म-काल के जाल से मुक्त नहीं हैं, जो उनके पिता हैं। सभी नश्वर हैं। केवल आदि राम ही अजर-अमर हैं। वह ज्योति निरंजन/ब्रह्म-काल और परब्रह्म से श्रेष्ठ हैं। उनका नाम कबीर देव है। सभी पवित्र ग्रंथ इसका पर्याप्त प्रमाण प्रदान करते हैं।

क्या श्री राम जी की पूजा से मुक्ति संभव है?

भक्त श्री रामचंद्र की याद में दशहरा, दिवाली और राम नवमी जैसे त्यौहार मनाते हैं और रामायण का पाठ भी करते हैं। वे मंत्रों का उच्चारण करते हैं और रामचंद्र जी की पूजा करते हैं जैसे

  • ओम रामभद्राय नमः
  • ओम रामचंद्राय नमः
  • ओम रघुपुंगव्यै नमः
  • ओम जानकी वल्लभाय नमः
  • हरे राम-हरे राम, राम राम हरे-हरे
  • श्री राम जय राम रघु राम -आदि

इन सभी मंत्रों और पूजा की विधि का किसी भी पवित्र ग्रंथ में कोई सबूत नहीं मिलता है। यह मनमानी पूजा है और इससे मुक्ति संभव नहीं है। श्रीमद भगवद् गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में पूजा की सही विधि बताई गयी है जिससे आदि राम को पाया जा सकता है। तीन-शब्द का मोक्ष मंत्र- ‘ओम-तत-सत’ (सांकेतिक शब्द) जो कि तत्त्वदर्शी संत द्वारा प्रदान किया जाता है जिसके जाप से आत्मा को मुक्ति मिलती है।

सर्वशक्तिमान कबीर साहेब अपनी अमृत वाणी में बताते हैं,

राम नाम तिहुं लोक में, सकल रहा भरपूर |
जो जाने तिही निकट है, अनजाने तिही दूर ||

ईश्वर अज्ञानियों से दूर होते है और उनके साथ होते है जो आदि राम की सच्चे मंत्रों के जाप से भक्ति करते हैं।

निष्कर्ष

उपरोक्त विश्लेषण से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं -

  • भगवान राम श्री विष्णु के सातवें अवतार थे जिन्होंने ऋषि नारद के श्राप के पश्चात निरानंद मानव जीवन व्यतीत किया।
  • त्रिलोकी विष्णु द्वारा 'तीन ताप' ( श्राप ) के दुष्प्रभाव को भी नष्ट नहीं किया जा सका।
  • मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम एक शक्तिशाली शासक नहीं थे जो सीता जी को रावण के अपहरण से बचाने और अपराधी राक्षस रावण की पहचान करने में असमर्थ होने में उनकी अक्षमता से साबित होता है।
  • श्री राम, देवी पार्वती की पहचान रामचंद्र रूप में कर लेते हैं जो यह दर्शाता है कि इनका रिमोट ब्रह्म-काल के हाथों में है जो स्वयं सभी कार्य करता है और आत्माएं केवल उसके हाथों की कठपुतलियों के रूप में ही कार्य करती हैं।
  • श्री रामचंद्र जी ने बाली को धोखे से मारा।
  • श्री राम ने रामसेतु बनवाया यह मिथ्या है, जो अब उजागर हो गया।
  • तथ्य यह है, कि रामसेतु का निर्माण आदि राम जी की कृपा से हुआ था।
  • दिव्य पुरुष श्री रामचंद्र जी और उनकी समस्त सेना 'नाग फांस' में कैद होने पर असहाय हो गयी थी तब गरुड़ जी ने श्री राम और उनकी सेना की मदद की अन्यथा वे निश्चित हार जाते।
  • रावण का वध श्री रामचंद्र द्वारा नहीं अपितु आदि राम कविर्देव जी की कृपा से हुआ था।
  • श्री राम जी की शर्मनाक हरकत बेहद बेहूदा थी जब उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी सीता को नगर वासियों के डर से महल से निष्कासित कर दिया। इससे साबित होता है कि श्री राम जी अनिर्णायात्मक और अमानवीय स्वभाव के थे।
  • श्री राम ने भक्त हनुमान का अनादर किया।
  • श्री राम ने अत्यंत दुःखद जीवन व्यतीत किया और किसी भी सामान्य इंसान की भांति उनकी दर्दनाक मृत्यु हुई। श्री राम भक्तों द्वारा राम को भगवान मानना इन तथ्यों के आधार से गलत साबित होता है।
  • ब्रह्म-काल का क्षेत्र प्रतिशोधिता पूर्ण है जैसा की बाली द्वारा श्री कृष्ण की मृत्यु के प्रकरण से स्पष्ट होता है।
  • श्री राम की उपासना से मोक्ष कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता। श्री राम जी को भगवान की श्रेणी में नहीं गिना जा सकता।
  • आदि राम की सच्ची आराधना ही आत्मा को पूर्ण मोक्ष प्रदान करती है।
  • मोक्ष मंत्र तत्त्वदर्शी संत द्वारा ही दिया जाता है।

पृथ्वी पर आज केवल जगतगुरू तत्त्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ही सतगुरु हैं जो आदि राम की भक्ति का सही तरीका प्रदान कर रहे हैं।

इसका उल्लेख सूक्ष्म वेद में किया गया है,

मेरे संगी दोई जरग, एक वैष्णो एक राम | 
वो है दाता मुक्ति का, वो सुमिरावै नाम || 

आदि राम यानी कविर्देव मुक्तिदाता हैं, इसलिए मनुष्य जन्म बर्बाद न करें, पाठकों को सलाह है कि भगवान को पहचानें और अपना कल्याण करवायें।

कबीर, साधू दर्शन राम का, परमात्मा आवै याद।
लेखै मे वाही घड़ी, बाकी का समय बर्बाद ।।    

एक संत के रूप में भगवान को याद किया जाता है, इसलिए प्रत्येक क्षण में आराध्या राम की पूजा करें। अयोध्या के श्री राम की पूजा करना केवल समय की बर्बादी है।