सत साहेब
सतगुरु देव की जय!
बंदी छोड़ कबीर साहेब जी की जय।
बंदी छोड़ गरीबदास जी महाराज जी की जय।
स्वामी राम देवानंद जी गुरु महाराज जी की जय।
बंदी छोड़ सतगुरु रामपाल जी महाराज जी की जय।
सर्व संतों की जय।
सर्व भक्तों की जय।
धर्मी पुरुषों की जय।
श्री काशी धाम की जय।
श्री छुड़ानी धाम की जय।
श्री करौंथा धाम की जय।
श्री बरवाला धाम की जय।
सत साहेब
परमपिता, पूर्ण परमात्मा कबीर जी की असीम कृपा से, बच्चों! आज आप इस अमर कथा का अमृत पी रहे हैं। दुनिया को देखो, चाहे कोई बड़ा अधिकारी हो और बड़ा व्यापारी हो, पूरा दिन उसके पास उसी बात की चर्चा रहती है, पूरा दिन। घर आने के बाद भी, पूरी रात उसकी उलझन में बीतती है। उसे सपने भी उसी के आएंगे और केवल रोज़गार, रोटी। यदि वह रोटी से बच जाए तो कोठियां और कारें। जब वे अपने सभी कर्मों को नष्ट कर लेते हैं तब भी 90℅ को यह कार, कोठी भी नहीं मिलती। बच्चों! इस मालिक की शरण में आने से, सच्ची लगन रखने से और मर्यादा में रहने से वह तुम्हें सब कुछ देगा। यह ज़रूर मांगो,
कबीर, सांई इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय॥
तुमने सब कुछ मांग लिया। सर्वशक्तिमान कबीर साहेब एक निर्धन की कितनी अद्भुत भूमिका निभा रहे थे? पूरी सृष्टि का सेठ, सभी का पालनहार, सबका पोषण करने वाला और अंतिम सांस तक ऐसा अभिनय करते चले गए। वही जुलाहे का काम, वही चार बर्तन घर पर रखे हुए थे।
वह यह दिखाना चाहते थे कि आने वाले समय में कोई यह न सोचे कि बड़े-बड़े अमीर लोग मोक्ष प्राप्त करते हैं। वे बड़े-बड़े धर्म करते हैं, साधुओं, संतों को दान देते हैं। कबीर साहेब ने कहा है कि,
टोटे में भक्ति करे, सोई सही सपूत। ये मायाधारी मसखरे, कितने जा लिये ऊत॥
तो बच्चों! मुझे उन लोगों की दिनचर्या पर दया आती है। जैसे ही वे उठते हैं वही चर्चा। उनके दैनिक काम-काज में वही बकवास चर्चा चाय पीते समय या चाहे खाना खाते समय।
तो, काल ने तेली की तरह जोत रखा है। जैसे पहले कोल्हू हुआ करते थे जो बैलों द्वारा चलाए जाते थे। तेल निकालने के लिए, तेली कोल्हू और बैलों का उपयोग करता था। इसे बैलों द्वारा चलाया जाता था। वे बैल को कोल्हू में जोतकर उसकी आंखें बांध देते थे और पीछे से उसे दो डंडों से मारते थे। जब भी वह रुकता था तो वे कमर पर दो और डंडे मारते थे। इसलिए, वह इस डर से पूरा दिन चलता रहता था कि डंडे वाला तुम्हारे पीछे चल रहा है और शाम को उसे खोलते थे।
उसी प्रकार, इस काल ने हमारी आंखें बंद कर दी हैं और हमें काल के कोल्हू से बांध दिया है। उसने हमें इसमें जोत दिया है। केवल कबीर साहेब ही आपको इस बंधन से छुड़ा सकते हैं। वह आपको भोजन भी देंगे, सुथरा रोज़गार देंगे, बेटा-बेटी देंगे, और कार-कोठी देंगे। यह उसके लिए संभव होगा जो निष्ठावान होगा, और मालिक को याद रखेगा। जो वफादारी के पद पर आएंगे। सपने में भी अन्य देवी-देवता मन में नहीं आने चाहिए। फिर भगवान की लीला देखो। यह ज्ञान और संगति। संगति बहुत ज़रूरी है। जो दृढ़ भक्त हैं, वह संगति केवल आश्रम में ही करें। किसी के घर मत जाओ क्योंकि काल बहुत सारे अन्य विकार उत्पन्न करता है। बहुत सी समस्याएं आती हैं। काल दांव लगाकर बैठा है, इनके बीच कैसे मनमुटाव पैदा करें? इनमें खोट डाल देगा।
फिर भगवान तुम्हें पूरा सहारा देंगे और संगति की चर्चा से, एक-दूसरे को देखने से, भक्त भक्ति में दृढ़ हो जाता है।
जैसे बच्चा पहली बार स्कूल जाता है तो उसे पता नहीं होता कि कैसे बैठना है? कैसे बात करनी है? वह अपने घर की तरह वहां भी घूमना-फिरना चाहता है। कभी वह इधर जाता है कभी उधर जाता है। फिर दूसरे साथी के बच्चे उसे बताते हैं कि यहां बैठो नहीं तो मास्टर पीटेगा। यदि उसका मन करे तो वह जाकर शिक्षक की कुर्सी पर बैठ सकता है। फिर दूसरे बच्चे समझाते हैं, 'नहीं, शिक्षक यहां बैठेंगे। यदि तुम यहां बैठोगे तो तुम्हें मार पड़ेगी'।
फिर वह देखेगा कि एक-दो को मार पड़ी है तो वह डरने लगेगा। फिर वह इतना सभ्य और शिष्ट हो जाएगा। वह एक पंक्ति में बैठेगा और सभ्यता तथा शिष्टाचार का पालन करेगा।
उसी प्रकार, सत्संग में आने से आपको सारी मर्यादा पता चलेगी, मर्यादा को जानोगे। आप एक-दूसरे को देखोगे। देखो, छोटे-छोटे बच्चे भी आरती करते हैं। आपका उत्साह बढ़ेगा। इच्छा जागेगी और, और भी अधिक भक्ति करने की इच्छा होगी। सेवा की इच्छा होगी।
अब, बच्चों! मैं आपको उस परमपिता की कुछ अमर वाणियां बताऊंगा जो एक महापुरुष, संत गरीब दास जी के मुख से 'चेतावनी के अंग' से उच्चारित हैं।
गरीब, काया माया काल की, बिन साहिब के नाम। चेत सके तो चेति ले, बिन सतगुरु नहीं ठाम॥
यह शरीर और यह संपत्ति आपके जीवन का विनाशक है, बिना भक्ति के।
बिन साहिब के नाम।
यह उसका है जिसकी अभी चर्चा हुई थी। राम का नाम तो सपने में भी नहीं है। धन के कारण, बकवास के कारण कोई दूसरी बात मन में नहीं आती। हमारा पेशा, रोज़गार, रोटी, रोटी के कारण यह चर्चा पूरे जीवन बनी रहती है। तो, यह शरीर, जो पाप इस शरीर से किया जाता है, जो अपराध वे करते हैं, दूसरों को चोट पहुंचाते हैं, धन लूटते हैं, परेशान करते हैं, व्यर्थ बोलते हैं, अपनी आत्मा को कष्ट देते हैं, तो यह शरीर उनका शत्रु बन गया, यह काल बन गया। उस जीव के कर्म नष्ट हो गए हैं जिसे यह प्राप्त हुआ है। अब, यह स्पष्ट किया गया है,
गरीब, काया माया काल की, बिन साहिब के नाम।
और भाई!
चेत सके तो चेति ले।।
सावधान हो सको तो सावधान हो जाओ,
बिन सतगुरु नहीं ठाम।।
बिना सतगुरु के कहीं भी कोई स्थाई स्थान नहीं है।
सतगुरु मिले तो इच्छा मेटै, पद मिल पदै समाना। चल हंसा उस लोक पठाऊँ, जो आदि अमर अस्थाना॥
यदि सतगुरु मिलेंगे तो वह सही मार्ग दिखाएंगे और जिसके लिए तुम पूरा दिन कर्मों को फोड़ रहे हो, वह अपने आप इस जीव से दूर जाने लगेगा।
अब, पूर्ण सतगुरु से लेकर ऐसी भक्ति करने को कहा गया है।
गरीब, ऐसा अंजन आंजिये, सूझै त्रिभुवन राय। कामधेनु और कल्पवृक्ष, घट ही मांझ लखाय॥
ऐसे कर्म करो, ऐसा अभ्यास करो जिससे सर्वशक्तिमान का स्मरण सदा के लिए बना रहे और कामधेनु और कल्पवृक्ष।।
कामधेनु स्वर्ग में एक गाय है। उससे जो कुछ भी मांगा जाता है वह देती है। खाने और पीने की सामग्री। समझो, जैसे किसी होटल में। होटल के कमरे में जिसमें कोई जाता है और ठहरता है, किराया देता है और उसे वहां सारी सुविधाएं मिलती हैं। वह एक घंटी बजाता है और उस होटल का कोई सेवक वहां आता है और उसे जो भी आदेश दिया जाता है वह उसे लाकर रख देता है।
तो, उसी तरह, सारा पैसा उसकी जेब से कटता है, और सारी सुविधाएं हैं नौकर सामने खड़ा है, लेकिन उसकी जेब कटती है। उसी तरह, कामधेनु है, इस होटल में कल्पवृक्ष है। जो कोई भी अपनी जो भी इच्छा पूरी करवाना चाहता है तो उसके नीचे जाओ और बोलो। वह पूरी हो जाती है। लेकिन कमाई उसी की है, भक्ति की, धर्म की और इस सच्ची भक्ति से क्या होगा?
वह कामधेनु और कल्पवृक्ष आपके साथ 24 घंटे रहेंगे। यह पहला मंत्र जो आपको दिया जाता है, यह आपके लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष है और दूसरा मंत्र, दो-अक्षर का सतनाम जो आपको प्रदान किया जाता है, यह काल के इस जाल से आपको छुड़ाने के लिए आपकी वह संपत्ति है। हमें उनका कर्ज चुकाना है और वह सारनाम, सारशब्द, उससे आप सतलोक में स्थाई स्थान प्राप्त करेंगे। यह पूजा का सही तरीका है। हमें इसे क्रमवार करना है।
जैसे बच्चा पहली कक्षा में पढ़ता है फिर धीरे-धीरे 5वीं और 8वीं फिर 10वीं, बीए, एमए, एमएससी, डॉक्टर जो कुछ भी वह करता है। तो यह ऐसे चलता है। यह सब एक बार में नहीं होता। अब क्या कहा गया है?
गरीब, ऐसा अंजन आंजिये।।
ऐसी व्यवस्था करो। पूर्ण सतगुरु से मंत्र लो। दृढ़ता से भक्ति करो। मर्यादा का पालन करो। फिर सब कुछ आपको स्पष्ट दिखाई देगा। धर्म अद्वितीय दिखेगा। कौन सा कर्म सही है? वह भी स्पष्ट हो जाएगा।
और कामधेनु और कल्पवृक्ष घट ही में फल खाय। वे आपके पास ही रहेंगे।
गरीब, जूनी संकट मेटिहूँ, जौ बिसरै नहिं मोहि। कह कबीर जे संसारी चित्त धरी, तो न छुड़ाऊँ तोहि॥
आपकी योनियों का संकट, मैं आपके जन्म-मरण के झंझट को बिल्कुल समाप्त कर दूंगा यदि आप मुझे नहीं भूलेंगे।
कहै कबीर जे संसारी चित्त धरी।
यदि आपका लगाव संसार के लोगों में बना रहा
फिर नहीं छुड़ाऊँ तोहि।
एक बार कबीर साहेब अपने कंधों पर एक चादर डालकर कहीं जा रहे थे। पुराने दिनों में, जो कोई भी दूसरे गांव जाता था तो वह कंधों पर चादर लेकर जाता था। भाई, यदि उसे कहीं रुकना पड़े तो वह ओढ़कर सो सके। यदि उसे देर हो जाए तो वह इसे कहीं भी बिछा सके।
एक भक्त ने कहा 'गुरुदेव! आप कहां जा रहे हैं? कबीर साहेब ने कहा 'भाई! मैं नर्क जा रहा हूँ। क्या तुम चलोगे?'। 'हाँ, मैं अवश्य जाऊंगा। जहाँ आप जाएंगे वह नर्क भी स्वर्ग बन जाएगा'। उसे अपने समर्थ-सक्षम गुरुदेव पर इतना विश्वास था, उस भक्त को?
बच्चों! यह इस दास के साथ बिल्कुल प्रत्यक्ष हो चुका था। कभी कोयल बोलती है कभी अन्य पक्षी, आपने भी थोड़ा-बहुत सुना होगा।
गरीब दास जी कहते हैं,
कच्चा हीरा क्रुच होवे नहीं सहे घन मार।। ऐसा यूँ मन हो रहा तब लेखा ले करतार।
हीरे की परीक्षा पहले ऐसे की जाती थी? लोहे पर, 6/6 इंच का और इतना मोटा लोहे का एक चौकोर मूसल, उसे 3 फीट नीचे गाड़ा जाता था। केवल 3 इंच ऊपर दिखाई देता था और लौहार अपनी लोहे की वस्तुओं को उस पर गर्म करते थे और उन्हें कूटते थे। हथौड़ा 5-6 किलो का होता है, लोहे का हथौड़ा और वे हीरे को धरती पर उस लोहे पर रखते थे और 5-6 किलो के हथौड़े से ज़ोर से मारते थे। यदि उस पर एक निशान भी आ जाए तो वह एक पैसे का नहीं है। यदि उस पर बिल्कुल कोई निशान न आए, यह भी पता न चले कि यह हथौड़ा उस पर लगा या नहीं तो उसका मूल्य करोड़ों में है।
उसी प्रकार, इस मार्ग पर हथौड़ा मारा जाएगा। ये समस्याएं आएंगी। यदि हम दृढ़ रहेंगे तब भगवान लेखा लेगा।
बच्चों! जब हम सर्वशक्तिमान की परीक्षा इस प्रकार उत्तीर्ण करते हैं तब मूल्य बढ़ेगा।
गरीब, कच्चा हीरा क्रुच होवे।।
अर्थात उसमें खरोंच आ जाएगी, वह टूट जाएगा।
नहीं सहे घन मार।।
वह हथौड़े की मार को सहन नहीं कर सकता।
ऐसा यूँ मन हो रहा।।
अर्थात बिल्कुल दृढ़ हो जाओ, टूटो मत। यदि घोर विनाश दिखाई दे, तो भगवान से दूर मत होओ। विनाश और विकास प्रभु के बाएं हाथ का खेल है। पलों में, क्षणों में, न जाने वह क्या नहीं कर सकता? 'हे भगवान, आपका तमाशा अनोखा है'। एक क्षण में, पलक झपकते ही।
तो, इस ज्ञान से आपको यह विश्वास होगा। फिर दृढ़ता आएगी। तो, उसे यह सुविधा मिलेगी कि कल्पवृक्ष और कामधेनु हमारे साथ रहेंगे और कहा गया है,
गरीब, जूनी संकट मेटिहूँ, जौ बिसरै नहिं मोहि। कह कबीर जे संसारी चित्त धरी..
मुझे छोड़कर यदि तुम संसार को अधिक महत्व देते हो
तो न छुड़ाऊँ तोहि॥ —ओए होए—
बच्चों! जब हम संसार में नहीं आए थे, अपनी माँ के गर्भ में थे वहाँ भी आपका यह पिता आपके साथ था। वह आपको हिम्मत दे रहा था। लेकिन हमने कर्म इतने बिगाड़ रखे थे। तो, उस समय वह वहाँ आपके शरीर को व्यवस्थित रखता है। वह आपको वहाँ भी सुविधाएं प्रदान करता है। आपके बाहर आने के बाद काल आपको अचेत कर देता है। वह पिछली बुद्धि को समाप्त कर देता है। तो, बच्चों! सर्वशक्तिमान कबीर जी आपकी बुद्धि को फिर से तैयार करते हैं। वह आपसे प्रेम करते हैं, आपके पीछे-पीछे घूमते हैं। जब तक आप संसार में रहते हैं यह सब आपको दिखाई देता है। एक पल का भी भरोसा नहीं है।
बच्चों! सत्संग में सभी पहलुओं पर हर तरह से प्रकाश डाला जाता है। संसार, संपत्ति जिसे आप अपना मानते हैं, आप बिल्कुल अंधे हो रहे हैं, बिल्कुल अंधे। यह आपके नियंत्रण में नहीं है। जब आप इसे छोड़ते हैं तब भी काम नहीं चलेगा। आपको घर छोड़ने वालों का इतिहास बताया जा चुका है। भक्ति यहाँ करो या वहाँ करो। भक्ति करनी ही पड़ेगी। वही समस्या बाहर आएगी। गर्मी, सर्दी, ओले आपको परेशान करेंगे, आंधी, और तूफान। झोपड़ी बनानी पड़ेगी। खाने-पीने की पूरी व्यवस्था करनी पड़ेगी। वहाँ यह पहले से ही बनी हुई है। इसमें, आपको केवल अपनी दिनचर्या बदलनी है। यहीं रहो।
डेरे डांडे खुश रहौ, खुसरै होइ न मोक्ष। ध्रुव प्रहलाद उधरि गये, फिरि डेरे मैं क्या दोष॥
लेकिन इतना ज़रूर याद रखना कि यह सब आपके साथ धोखा है। बिल्कुल कपट, ठगी। सबसे पहले, यह शरीर धोखेबाज़ है। यदि आपने मृत्यु के बाद नहीं देखा है तो कभी श्मशान में देखो, किसी का अंतिम संस्कार किया हुआ और उसे करने के बाद, पड़ी हुई राख को देखो। आपकी बुद्धि ठीक हो जाएगी क्योंकि अब आपको आध्यात्मिक ज्ञान मिल गया है। आपका निश्चय, आपका भगवान पर विश्वास, भगवान में और अधिक होता रहेगा। जिसे आप अपना मान रहे थे वह यहीं रह गया और वहाँ बिना भक्ति वाला व्यक्ति अकेला, धर्मराय की कचहरी में जूतों से पीटा जाता है। यम के दूत नीचे पटक कर पीटते हैं और जिसने भक्ति की है। यह संसार यहीं रहेगा, परिवार यहीं रहेगा। कोई साथ नहीं होगा। लेकिन वह आपका साथी है, आपका सच्चा मित्र, आपका सच्चा भाई, आपकी सच्ची माता और पिता। वह वहाँ भी खड़े दिखाई देंगे। ऐसे समर्थ, ऐसे साथी, ऐसे शुभचिंतक को भूलकर आप दूसरों पर आश्रित हो जाते हैं। यह अज्ञानता है।
गरीब, जूनी संकट मेटिहूँ, जौ बिसरै नहिं मोहि। कह कबीर जे संसारी चित्त धरी, तो न छुड़ाऊँ तोहि॥
ऐसा नहीं है, हम संसार में रहते हैं और किसी से बात नहीं करते, बिल्कुल प्रेम से रहो, सभी को सम्मान दो। ऐसा लगना चाहिए जैसे हम उनके हैं। लेकिन विश्वास हमारे मालिक में होना चाहिए। 'अलल' पक्षी का बच्चा, अंडा पृथ्वी पर आता है और फूट जाता है। वह उसमें से बाहर निकलता है और उन पक्षियों के साथ रहता है, खाता है, पीता है, सामंजस्य के साथ रहता है और बहुत प्रेम से रहता है लेकिन अपने माता-पिता से उसका विरह नहीं मिटता। जब वह उड़ने में समर्थ हो जाता है तो उन साथियों से उसका कोई लेना-देना नहीं रहता। उसकी लगन यही होती है कि कब मैं उड़ने के काबिल बनूं और यहाँ से भाग जाऊं।
तो बच्चों! इस विश्वास को बनाए रखना है। इसमें रहो। सारा संसार आपका है और अब पूरे परिवार ने मंत्र ले लिया है। तो, यह यहाँ आपका हो गया है। उन्हें इतना प्यार दो, उनके साथ इतना अच्छा व्यवहार करो कि आप में विश्वास बना रहे और वे यहाँ प्रेम से रहें, दृढ़ता से भक्ति करें। उन्हें मिलकर ऐसा घूंट पिलाओ कि जब आप इस संसार को छोड़कर यहाँ से जाओगे तो उस समय, यह ज्ञान आपके सामने दृढ़ता से खड़ा रहेगा। यदि उनमें विश्वास रखा गया तो आप यहीं जन्म लेंगे। आप उनके बेटा-बेटी, पोता-पोती के रूप में कष्ट भोगेंगे या पशु, पक्षी बनेंगे इसलिए, सतलोक में विश्वास जमाओ। यह इस ज्ञान से जमेगा। जैसे, पहले हम अकेले थे, शादी हुई। शादी के बाद बच्चे पैदा हुए। तो, पहले हमने यहाँ जन्म लिया। तो इन लोगों का और दूसरों का परिवार हमारे साथ बन गया।
उसी प्रकार, यह विश्वास रखो कि हमें इस काल के लोक में यहाँ परिवार की आवश्यकता नहीं है। न ही हम चाहते हैं जो वर्तमान में है क्योंकि जैसे-जैसे उम्र आएगी वे अपना कर्म करने, काम करने और खाने में सक्षम होंगे। सतलोक जाएंगे। फिर वे भी वहाँ आने लगेंगे। फिर वहीं परिवार बन जाएगा। यह परिवार मर जाएगा। यह साथ नहीं रहेगा चाहे आपकी आँखों पर पट्टी कितने भी दिन बंधी रहे। हम ठीक हैं, ठीक हैं, वे भी ठीक थे, पूरा परिवार जो एक दुर्घटना में मर गया। हम रोज़ाना अख़बार में पढ़ते हैं। दो सगे भाई, वे केवल दो ही थे और एक 15 साल का था, एक 16 साल का। दोनों की दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
अब, वे माता-पिता कैसे जिएंगे? जिन पर वे आश्रित थे, बेचारे लोग। अपनी आँखें खोलो। इन बातों पर ध्यान दो, यह ठीक है। यहाँ कुछ भी ठीक नहीं है। जब तक हमें चोट नहीं लगती हम सब ठीक मान रहे हैं। इसलिए, जब वहाँ से जाने की तैयारी हो, तो पूरी तरह एकाग्र हो जाओ।
जहाँ आसा तहाँ वासा होई।।
ऐसे नहीं। बिल्कुल उत्साह, विरह होना चाहिए। जैसे, हम सतलोक से आए थे। हम बिल्कुल नहीं रुके। तो, वही विरह, वही तड़प यहाँ होगी और यह इस ज्ञान से होगी। जो भक्ति आप कर रहे हैं, सेवा, सुमिरण, और दान आपको ज़बरदस्त सहारा देगा। इसलिए, यह अभ्यास आपसे कराया जा रहा है, ये सारे यत्न इसीलिए कराया जा रहा है और यदि आप ऐसा करते रहेंगे तो आप आगे चलो और यह सोचकर आगे बढ़ो कि वे सभी भी वहीं आएंगे क्योंकि वे उसी पटरी पर हैं।
उनका समय आएगा। वे भी शरीर छोड़ेंगे और सीधे वहाँ आएंगे। वहाँ कभी मृत्यु नहीं है।
बच्चों! ज्ञान का बहुत प्रभाव होता है। मेरी माँ, शरीर की माँ, बहुत वृद्ध हो चुकी थीं और जब अंतिम सांस आई, उनका समय आया उन्होंने ऐसे कहा "भाई, गुरु जी, मुझे अपने साथ ले चलो, मुझे वहाँ छोड़ दो'। मैंने अपनी माँ से कहा 'माँ, चिंता मत करो मैं तुम्हारे साथ चलूंगा और तुम्हें भगवान के दरबार में, सच्चे दरबार में, सतलोक में छोड़ आऊंगा। तो, उन्हें इतना विश्वास था, यह ज्ञान से ही हुआ। जब जाने के संस्कार निकट आए, बिल्कुल बोलते-बोलते, लेटे-लेटे दो दिन हल्का सा बुखार रहा। अन्यथा, वह व्हीलचेयर पर बैठती थीं। वह लाठी लेकर चलती भी थीं। तो, वह रोने लगीं। बहन वहीं थी। उसने कहा 'माँ, कुछ दिन और रुक जाओ। हमारी सेवा चली जाएगी'। उसने कहा,
'बेबे, मुझे जाने दो। गुरु जी आएंगे। तुम दूसरी सेवा कर लेना। मैं अब जाऊँगी'।
वह रोने लगी और बोंली,
'तू पागल है। तुझे तो खुश होना चाहिए कि अब मुझे सतलोक जाना है। नहीं, ऐसे मत कर'।
यह कहकर उन्होंने शरीर छोड़ दिया।
तो बच्चों! यह भक्ति और यह ज्ञान अंत में अद्भुत सहारा देगा। आपका मोक्ष चुपचाप हो जाएगा। तो यह दास पागल नहीं है, स्वार्थी नहीं है। आपसे कुछ नहीं लेना है, केवल देना ही है। इतना करो, भक्ति करो। इन बातों को अपने दिल में रखो। देखो, भगवान भी देख रहा है, उसके घर जाना है।
पिछला इतिहास देखो, पूरी दुनिया को देखो। एक पागल कुत्ते की तरह दो रोटी के लिए वह पूरा दिन संघर्ष करता है। यह उनके वश से बाहर है। यह काल की प्रेरणा है। इस भक्ति से, भगवान की शरण से काल का प्रभाव दूर होता रहेगा।
अब आप वही बच्चे हो, बेटा-बेटी। आपके पास सत्संग जाने के लिए दो घंटे का समय नहीं था। अब रोज़ाना, कोई पूरा दिन पुस्तक सेवा करता है, कोई पोस्टर सेवा करता है, कोई बर्तन धोने आता है। भगवान ने आपकी ज़मानत ले ली है और आपको यह धर्म-कर्म करने के लिए काल के कोल्हू से छुड़ा लिया है। तो अब धीरे-धीरे वह आपको काल के कोल्हू से मुक्त कर देंगे। जितना अधिक धर्म-कर्म आप करेंगे, पहले से अधिक सुख होता रहेगा। घर में बरकत होगी और ऐसे नियम बनाए गए हैं। उनके कारण आप वैसे भी हल्के हो गए हैं। यह आप पर भगवान की कृपा है। आप इन सांसारिक बोझों को ढोते हुए ऐसे ही मरते रहे और कुछ भी हासिल नहीं हुआ।
बच्चों! यदि हम यहाँ किसी चीज़ को अपनी मान लें, ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे हमें अपना मानना चाहिए और ऐसा सोचना चाहिए कि चलो हम अपना मान लें। कल मृत्यु हो जाती है, धत! क्या यह हमारा है? कबीर साहेब हमारे हैं।
बच्चों! वह आपको बार-बार याद दिलाते हैं कि आप कहाँ फंसे हैं? काल की व्यवस्था कैसी है? षड्यंत्र कैसा है? उसने यह कर्तव्य तीनों पुत्रों, रजोगुण ब्रह्मा, सतोगुण विष्णु, तमोगुण शिव जी को दिया है। एक के पास रजोगुण है जिसमें जीव बिना इच्छा के भी बच्चे पैदा करते हैं। पशुओं, भैंस, गाय में समय पर बच्चे पैदा करने की इच्छा होती है। यह प्रबल हो जाती है। वे रंभाने लगते हैं। दूसरी तरफ, नर पशु ज़बरदस्ती बच्चे पैदा करता है।
बच्चों! उसने ये सभी सूत्र प्रत्येक जीव पर लागू किए हैं क्योंकि उसने हमें बांध रखा है। भगवान इस बंधन से, इस बकवास से छुड़ाएंगे।
तो बच्चों! रजोगुण ब्रह्मा से उत्पत्ति, विष्णु जी से स्थिति। स्थिति का अर्थ है एक-दूसरे के साथ मोह, बिल्कुल जकड़े हुए। यह मोह ऐसी छूत की बीमारी है। आप किसी छोटे बच्चे से 10 दिन ऐसे ही बात कर लो आपको उससे मोह हो जाएगा। बेटी से कर लो। कुछ पशुओं पर ध्यान केंद्रित करो। वह कितना सुंदर है। उसे खरीदा जाना चाहिए। कुछ घोड़े, घोड़ियां, बहुत सुंदर चलते हैं। वे अच्छे लगने लगते हैं।
उसी प्रकार यहाँ, किसी अन्य पुरुष या किसी अन्य स्त्री से अधिक जुड़ जाओ तो वह छूत की बीमारी बढ़ती रहेगी। इसलिए, आपको इससे सावधान रहना होगा। इसे स्थिति कहा जाता है। बच्चों में मोह होता है। यह उनकी स्थिति है और यह हमें यहाँ रोकती है। यह उसके द्वारा नियंत्रित करने योग्य नहीं है। मनुष्य पागल हो जाता है और काल का दांव लग जाता है। धत! क्या यह मोह है? वह मर गया जिस पर मोह था। अब दीवार में सिर मारो।
तो यह सब याद रखना होगा। इसलिए छूत की बीमारी को फैलने मत दो, इससे बचो और फिर तीसरा हर कोई जानता है शंकर जी संहार करते हैं। क्यों? क्या यह कोई बात है, बताओ? और हम फिर भी, हाँ। एक भगवान बनाते हैं, एक पालन करते हैं और एक संहार करते हैं और हम उनके गुण गाते थे। —ओए होए—
यह सब एक षड्यंत्र है। गरीब दास जी कहते हैं,
दृष्टि परै सो धोखा रे। खंड पिंड ब्रह्मांड चलेंगे, थिर न रहसी लोका रे॥
रजगुण ब्रह्मा तमगुण संकर, सतगुण विस्णु कहावै रे। चौथे पद का भेद न्यारा, बिरला साधु पावै रे॥
ये तीनों, रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तमगुण शिव जी, चौथा इनका पिता ज्योति निरंजन काल है जो गुप्त रहता है। उसने एक प्रतिज्ञा ली है, और वचनबद्ध हुआ है। उसने दुर्गा से कहा था 'मैं अपने वास्तविक रूप में किसी के सामने नहीं आऊंगा और तुम पूरी व्यवस्था संभालो। मैं अपने सारे कार्य गुप्त रूप में करूंगा'।
तो बच्चों, यह चौथा पद है। ऐसा कहा गया है कि केवल बहुत कम लोगों को चौथे पद का ज्ञान है और चौथे से ऊपर, पांचवां सतपुरुष कबीर साहेब है।
चौथे को छोड़ै पाँचवें को ध्यावै, कहै कबीर सो अमरपद पावै, सो हम परसै आवै रे।
ऋग, यजु, साम, अथर्वण ये चारों, वेद चित्त भंगी रे। सूक्ष्म वेद बाँचै साहिब का, सो हंसा सतसंगी रे॥ —ओए होए—
इन चारों वेदों में अधूरा ज्ञान है, भ्रमित करने वाला ज्ञान है। वे 'चित्त भंगी' हैं।
ऋग, यजु, साम, अथर्वण चारों, वेद चित्त भंगी रे। सूक्ष्म वेद बाँचै साहिब का, सो हंसा सत्संगी रे॥
बच्चों! आप उस सूक्ष्म वेद को सुन रहे हैं, इसे पुस्तकों में पढ़ रहे हैं।
अलख रूप है अनुरागी, दृष्टि मुष्टि नहीं आवै रे। अकह लोक का भेद न जानैं, चार वेद क्या गावैं रे॥
अकह का अर्थ है जिसे कहा न जा सके, अर्थात् जिसकी इस धरती पर कहीं भी कभी चर्चा नहीं हुई हो। ऊपर के वे चार भाग, उन सभी को अकह लोक भी कहा जाता है और उन चारों में सबसे ऊपर वाले को अकह-अनामी लोक भी कहा जाता है। सतलोक, अलख लोक, अगम लोक और अकह लोक। वह अकह लोक का भेद जानेगा जो नीचे के तीन लोकों का भेद भी जानता है। ये महापुरुषों की वाणी में कूट शब्द हैं, सांकेतिक शब्द हैं।
कुछ चारों वेदों को कंठस्थ कर लेते हैं, ऋषि, ब्राह्मण। उन्हें चतुर्वेदी कहा जाता था। उनकी महिमा अनोखी होती थी, वे बहुत बुद्धिमान थे और कुछ तीन वेदों को कंठस्थ कर लेते थे, वे त्रिवेदी थे, कुछ दो वेदों को कंठस्थ कर लेते थे, रट लेते थे। उन्हें द्विवेदी कहा जाता था।
तो बच्चों, उन्हें इससे कोई लाभ नहीं हुआ। उन्होंने इसे रट लिया, इसे सीख लिया। उन्हें अन्यथा पढ़ें। ये भी हमारी बीमारियां हैं, वाह! भक्त को बहुत सी वाणियां याद हैं, कई याद हैं, तेज़ी से वाणियां सुनाता है। इसे किसी से भी सुनो चाहे तुम स्वयं पढ़ो। बात वह है जो समझ में आए।
तो, यह भी एक कमज़ोरी है।
जो गुरु तजै भजै जो आना, ता पसुआ को फोकट ज्ञाना।
दास ने सारा ज्ञान सुना दिया है। यदि कोई दो अनावश्यक बातें कहता है और आपका विश्वास उसमें बन जाता है तब भी आपकी भक्ति में गिरावट आएगी। आपको अपने आप को सुगम रखना होगा, हर तरह से मर्यादा में रखना होगा। तभी आप वफादारी के पद पर आएंगे और वह वफादारी का पद कहलाएगा।
अब कहा गया है जब आपको ऊपर के लोकों का अमर ज्ञान नहीं है, चाहे आप चारों वेदों को गाएं और जितना सुनाएं, क्या लाभ है? कुछ नहीं, व्यर्थ।
आवहिं जावहिं सो हंसा कहिये, परमहंस नहिं आया रे। पंच तत्व तीन गुन तूरा, या तो कहिये माया रे॥
सुन्न मंडल सुख सागर दरिया, परमहंस परवाना रे। सतगुरु महली भेद लखाया, है सतलोक निदाना रे॥
अगम दीप अमरापुर कहिये, हिलमिल हंसा खेलै रे। दास गरीब देस है दुर्लभ, सच्चा सतगुरु मेलै रे॥ दास गरीब देस है दुर्लभ, सच्चा सतगुरु मेलै रे॥अगम दीप अमरापुर कहिये, हिलमिल हंसा खेलै रे। दास गरीब देस है दुर्लभ, सच्चा सतगुरु मेलै रे॥
अब, क्या कहा गया है?
सुन्न मंडल सुख सागर वह संसार, वह सुख का सागर, सबसे ऊपर के लोक में है। 'सतगुरु महली', वहाँ के निवासी ने स्वयं आकर मुझे यह ज्ञान बताया, उस पूर्ण परमात्मा ने।
अगमदीप, सबसे प्रमुख, सबसे ऊपर वाले को अमरापुर, अमरलोक, अमरपुरी कहा जाता है। वहाँ जाकर, ये सभी जीव जो मुक्त हो चुके हैं या पहले वाले जो पहले से ही वहाँ आनंदपूर्वक रह रहे हैं, मौज करते हैं। न तो वहाँ मृत्यु है और न ही कोई बीमारी। न तो वहाँ बुढ़ापा है और न ही कोई तनाव। खैर, यह एक अद्भुत बात है। भगवान ने स्वयं बताया, आँखों देखे संत बताते हैं कि ऊपर ऐसा संसार है। क्या आपकी रुचि नहीं जागती? इस गंदे संसार में सड़ रहे हैं। गर्मियों में गर्मी, दुख, सर्दियों में ठंड, बारिश होती है, कपड़े लेकर इधर-उधर भागते हैं। घर के अंदर पानी घुस जाता है, भूकंप आते हैं, गर्मी। हम इतना कष्ट सहते हुए यहाँ रहना चाहते हैं क्योंकि हमारा विश्वास इनमें है और यह ज्ञात है कि हम यहाँ नहीं रह सकते। यह ज्ञात है कि सब कुछ ठीक है, फिर भी हम यहाँ नहीं रह सकते।
खैर, हम इतने अभ्यस्त हो गए हैं, हम ढीठ हो गए हैं। हम इतने सारे संकट को कुछ नहीं समझते और वह संताप, मृत्यु कभी भी हो सकती है। इससे डरो और ऊपर क्या-क्या बातें बताई गई हैं? वहाँ जाने की प्रक्रिया बताई गई है? मर्यादा बताई गई है तो, इस ज्ञान से आप में वहाँ जाने की एक इच्छा उत्पन्न होगी, अन्यथा यह नहीं होगी। यह निश्चित रूप से होगी। आप इस मार्ग पर दृढ़ रहें। भगवान के नाम में दृढ़ रहें और भगवान के इन विचारों को सुनते रहें। आपके पास सभी साधन हैं।
तो, दास ने इतनी मेहनत की है। 27-28 साल हो गए इस मिट्टी में मिट्टी मिला दी है। एक पशु से भी अधिक मेहनत करवाई और फिर भी आप परिणाम नहीं दे रहे हैं। दास को दुख होता है। अंत में, इसी तरह दुखी होकर पूर्ण परमात्मा अंततः सभी को ठोकर मारकर चले गए। वह सतलोक राजधानी को छोड़कर इस गंदे संसार में 120 वर्ष तक रहे। तो अब आँखें खोलो। उस समय, आप अशिक्षित थे। कोई प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई नहीं देता था। अब गुरुदेव की आज्ञा और आशीर्वाद से, सर्वशक्तिमान की कृपा से सब कुछ खुला रखा है। सारा इतिहास, सारे सद्ग्रंथ आपके सामने हैं और नकली व्यवस्था बिल्कुल धोखा है।
दृष्टि पड़े सो धोखा रे।
गरीब दास जी कहते हैं 'दृष्टि पड़े' यह नकली है, 'धर अंबर कैलाश यह कृत्रिम बाजी', यह सब असत्य है। भगवान की भक्ति करो।
सुरत सुमो स्वांस।।
अब, क्या कहा गया है?
गरीब, जूनी संकट मेटिहूँ, जौ बिसरै नहिं मोहि। कह कबीर जे संसारी चित्त धरी, तो न छुड़ाऊँ तोहि॥
गरीब, लाख चौरासी बंध तैं, सतगुरु लेत छुड़ाय। जौ उर अंतर नाम है, तौ जूनी बहुरि न जाय॥
गरीब, जूनी संकट मेटिहूँ, देवों निश्चल वास। उर अंतर राखूँगा, जम की नाहिं तरास॥ —ओए होए—
गरीब दास जी कहते हैं, सर्वशक्तिमान कबीर जी बता रहे हैं जब तुम मेरे हो जाओगे, मेरे प्रति निष्ठावान हो जाओगे।
गरीब, पतिव्रता ज्यूँ-ज्यूँ धरै धरती ऊपर पाँव। समरथ झाडू देत हैं, ना काँटा लगि जाय॥
जब भक्त सर्वशक्तिमान के प्रति सच्ची लगन से जुड़ जाएगा।
एकै साधे सब साधे।
वह इस मार्ग पर आएगा, ऐसा कहा गया है तब वे कांटे जो उस समर्पित प्यारी आत्मा के जीवन में आने वाले थे, जो दुःख आने वाले थे, भगवान पहले से ही उन्हें साफ करते हुए आगे चलते हैं। भगवान आगे, जैसे झाड़ू साफ करती है।
समरथ झाडू देत हैं, ना काँटा लगि जाय॥
वही यहाँ बताया जा रहा है,
जूनी संकट मेटिहूँ, देवों निश्चल वास।
बिल्कुल स्थायी निवास दूंगा। आप सदा के लिए सतलोक में रहोगे। कभी मृत्यु नहीं होगी।
उर अंतर राखूँगा,
मैं उन बच्चों को अपने हृदय के पास रखूंगा।
जम की नाहिं तरास॥
मैं उन्हें काल से कोई कष्ट नहीं भोगने दूंगा।
गरीब, जो जन हमरी शरण है ताका हूँ मैं दास। अनहद बंदगी मुक्ति पद, अनंत लोक परकाश।।
गरीब, बेमुख प्राणी जाहिंगे, दोजख द्वंद बहीर। जाकूँ नर नहिं सुमरहीं, जिन यहु घड़्या सरीर॥
गरीब, जो जन मेरी शरण है ताका हूँ मैं दास, गैल गैल लाग्या फिरूं जब लग धरती आकाश।
बंदी छोड़ बिल्कुल स्पष्ट करते हैं कि जो कोई भी मेरा बच्चा, बेटा, बेटी एक बार भी मेरी शरण में आता है मैं उसका दास हूँ और जब तक मैं उसे मुक्त नहीं कर दूंगा तब तक साथ रहूंगा।
अब, बच्चों! वह हमारे साथ थे जब हम 600 वर्ष पूर्व जन्मे थे और भगवान से शरण ली थी। अब, भगवान के हमारे साथ रहने के इस प्रयास को सफल बनाओ। अब, आँखें खुलनी चाहिएं। आप पढ़े-लिखे हो, साक्षर हो। अब क्या समस्या है?
गरीब, जो जन मेरी शरण है ताका हूँ मैं दास, गैल गैल लाग्या फिरूं जब लग धरती आकाश।
बताओ, क्या आपने दास की परिभाषा सुनी है? दास का अर्थ है गुलाम, बिल्कुल एक गुलाम, इसका अर्थ हुआ करता था जो कहा जाए वह करो, जो खाने को दिया जाए वह खाओ। कोई आपत्ति नहीं। चाहे किसी को बचा हुआ खाना मिले या अच्छा भोजन। जो कपड़े पहनने को मिलें वे पहनो और गुलाम का दूसरा विशेष काम झाड़ू लगाना, कपड़े धोना, बिस्तर लगाना, सफाई करना, कुछ उठाना है, जो मांगा जाए। भगवान ने एक दासी का रूप धारण करके इब्राहिम सुल्तान का बिस्तर लगाया। क्यों? वह उनका क्या लगता था? वह उनकी आत्मा है। आप भी उनकी आत्मा हैं और जो कोई भी बच्चा थोड़ा सा भी रास्ते पर आने लगता है, माता-पिता उससे और भी अधिक प्रेम करते हैं ताकि वह बुराई छोड़ दे। वह व्यर्थ के साथियों की संगति छोड़ दे। इसे दास कहा जाता है। वह आपके साथ ऐसे दास हैं।
जैसे, त्रिलोचन नाम का एक भक्त था। उसका सेवक घर चला गया। उसी दिन शाम को भक्त को दस्त लग गए। जिस क्षण वह जाने लगा उसी समय उसे गंभीर दस्त हो गए। उसने कहा 'गुरुदेव, मैं नहीं जाऊंगा। आपको अधिक बेचैनी है'। गुरु जी ने कहा 'भाई जाओ। तुम्हें घर गए बहुत दिन हो गए हैं। यह ठीक हो जाएगा। मामूली दस्त हो जाते हैं'।
वह चला गया और त्रिलोचन भक्त को अधिक संकट हो गया। वह खड़ा भी नहीं हो सकता। उसने पास में ही शौच करना शुरू कर दिया। सर्वशक्तिमान उसी समय उस भक्त का रूप धारण करके आ गए। वह उसका मल उठाते हैं, उसके कपड़े धोए। सेवक एक महीने में आया। भगवान ने एक महीने तक उसकी सेवा की। वह भक्त आया और घर से सारा सामान लाया। वह गुरुदेव के लिए माँ द्वारा बनाई गई कुछ खाने की चीजें लाया और उन्हें गुरुदेव के चरणों में रख दिया। उसने गठरी खोलनी शुरू की और बताने लगा 'महाराज, मेरी माँ ने यह दिया है, यह दिया है'। वह सेवक वेतन पर था। भक्त पैसे इकट्ठे करते थे और उसे देते थे। वह भी एक भक्त था। जैसे आजकल हम अपने बच्चों के साथ वही कर रहे हैं और कहा 'मेरी माँ ने आपके लिए ये कपड़े भेजे हैं। आपके खाने के लिए यह सूखा हलवा बनाया है'। वह त्रिलोचन भक्त कहता है 'क्या बात है? तुम यह कहाँ से लाए हो? वैसे, तुम तो कहीं नहीं गए। तुम क्या कह रहे हो?'
उसने कहा अरे, मैं अभी आया हूँ। मैं उसी दिन चला गया था, मैं सच कहता हूँ। इसे देखो। क्या मैं आपके सामने झूठ बोलूंगा!?' अब, त्रिलोचन भक्त मुँह के बल लेट गया और रोने लगा। 'हे भगवान, हे सर्वशक्तिमान, हे प्रभु, आपने ऐसे निकम्मे व्यक्ति का इस तरह साथ दिया'।
तो बच्चों!
गरीब, जो जन मेरी शरण है ताका हूँ मैं दास, गैल गैल लाग्या फिरूं जब लग धरती आकाश।
आप इन बातों को हल्के में मत लो। ये बिल्कुल शत-प्रतिशत सत्य हैं। भगवान दूर नहीं हैं। हम उनसे बहुत दूर चले गए हैं। हम काल के इतने निकट जाकर उनकी पहुँच से दूर हैं। अब, वह वहाँ से खींच रहे हैं। इतना ज्ञान देकर मुश्किल से आपकी बुद्धि विकसित हुई है। अब भी काल मन में कोई न कोई बकवास बनाए रखता है। लेकिन इन उदाहरणों से, इस सच्चे ज्ञान से, सच्ची सेवा और इस दास के प्रयासों से, सर्वशक्तिमान का आशीर्वाद अवश्य बरसेगा। आपकी आँखें खुलेंगी। क्या कहा गया है?
गरीब, इस माटी के महल में मग्न भया क्यों मूढ़।
'इस माटी के महल में' तुम क्यों मग्न रहते हो?
कर साहिब की बंदगी उस सांई को ढूंढ।
गरीब, झिलमिल दीपक तेज के, दसों दिसा दरहाल। सतगुरु की सेवा करै, सो पावै मुक्ता माल॥ —ओए होए —
जो सतगुरु की शरण में हैं, गुरु जी की सेवा में हैं उनके लिए झिलमिल दीपक तेज।। उनके घर के चारों ओर सुख ही सुख होगा और
पावे मुक्ता माल।।
'मुक्ता' का अर्थ है मोक्ष। वे जन्म-मरण रूपी झंझट से मोक्ष रूपी दौलत प्राप्त करेंगे। अरे, भले आदमी
नंगा आया जगत में, नंगा ही तू जाय। बीच में ख्वाब ख्याल हैं, मन माया भरमाय॥
वह जो बीच में था वह सपना था और
या सुपन सा टूटिहै, मूँड पकड़ि-पकड़ि रोवै।
—ओए होए—
तो बच्चों! यह इतना अद्भुत ज्ञान है और यह मन हम पर इतना हावी हो रहा है। इतने ज्ञान के बाद भी, मुश्किल से ही आत्मा ऊपर उठती है। यह जागने के लिए खिंचती है लेकिन लगे रहो, सुनते रहो। भक्ति अवश्य करो। सेवा करने से मत बचो। दिल खोलकर दान करो।
कबीर, चिड़ी चोंच भरि लै गई, नदी न घटियो नीर। दान दिये धन ना घटै, कहि गये साहिब कबीर॥
लेकिन कैसे?
कबीर, गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान। गुरु बिन दोनों निष्फल हैं, चाहे पूछो वेद पुरान॥
गुरु पूर्ण होना चाहिए, समर्थ होना चाहिए, पूर्ण तत्वज्ञान होना चाहिए, पूरी विधि होनी चाहिए, नाम दीक्षा देने के लिए अपने गुरु का आदेश होना चाहिए। वह सतगुरु है। बच्चों! आपको यह सब कुछ मिल रहा है। अब, पूर्ण रूप से समर्पित हो जाओ।
गरीब, ये संसार समझता नाहिं, कहंदा शाम दुपहरे नूँ। गरीबदास ये वक्त जात है, रोवोगे इस पहरे नूँ॥ गरीबदास ये वक्त जात है, रोवोगे इस पहरे नूँ॥
बच्चों! जो भक्ति नहीं करते वे वैसे ही रोएंगे और जो भक्ति करते हैं और अधूरे घूमते हैं और मुक्त नहीं होते वे रोएंगे। वे फिर से केवल मनुष्य के रूप में ही जन्म लेते हैं। यह प्रक्रिया फिर से शुरू हो जाती है। बच्चे पैदा हुए, छोटे थे, फिर जवान हुए फिर पढ़ाई में लग गए। फिर शादी हो गई, बाल-बच्चों में उलझ गए। यदि रोज़गार नहीं मिला तो यह तनाव। पता नहीं, तब भक्ति अच्छी लगे या अच्छी न लगे। पाप इतने बढ़ जाते हैं। तो, अब आपको भक्ति अच्छी लगती है।
अब, आपके पास अच्छी लगन है। आपकी आत्मा का बुखार हल्का पड़ गया है। अब, इस इलाज को ढीला मत करो। यह सेवा, सुमिरण, दान, मर्यादा का पालन करते रहो। सत्संग अवश्य सुनो। इसके बाद, आपको इन सत्संगों में संक्षेप में बहुत कुछ बताया जा रहा है। पहले, विस्तार में, बहुत समय लगता था। इस गीता को देखो, इन वेदों को देखो, इन पुराणों को देखो। वह 4 घंटे का सत्संग अब एक घंटे में पूरा हो जाता है, यह सारगर्भित है। यह एक कैप्सूल बन गया है।
यह यहाँ से शुरू हुआ था कि कभी इस दास के पुराने कैसेट सुनो। उस समय, दिखाने के लिए कुछ नहीं था। पता नहीं था कि प्रमाण क्या थे? पूरी बात वैसी की वैसी बताई गई है। फिर बीच में सभी प्रमाणित किए गए। आज, वही बात है।
तो बच्चों! उस परमपिता को पहचानो और अपने गुरुदेव को पहचानो। सर्वशक्तिमान आपको मोक्ष प्रदान करें। वह आपको सुबुद्धि प्रदान करें। आप भगवान को याद करते रहें, सतलोक याद रहना चाहिए। काल का संकट भी याद रहे। यहाँ भी सुखी रहो और सतलोक में सदा के लिए सुखी रहो। यह इस दास का आशीर्वाद है।
सत साहेब!