भारतभूमि का आध्यात्मिक और सामाजिक इतिहास अत्यंत गहरा, विविधताओं से भरा और अनेक ऐतिहासिक उतार-चढ़ावों का प्रत्यक्ष साक्षी रहा है। सदियों से इस महान धरती ने कभी जातिवाद का अत्यंत कठोर दंश झेला है, तो कभी बाहरी आक्रमणों के कारण भयंकर धार्मिक कट्टरता का सामना किया है। जब-जब समाज में पाखंड और अंधविश्वास की जड़ें गहरी होने लगती हैं, तब-तब परमेश्वर पूर्ण ब्रह्म अपने अद्वितीय ज्ञान के जरिए उस पाखंड और अंधविश्वास को जड़ से खत्म करने के लिए धरती पर अवतरित होते हैं।
हमारी संस्कृति अपनी वास्तविक मान्यताओं और आधार से भटक चुकी है। इसी भटकाव को दूर करने और सत्य को पुनः स्थापित करने के लिए आज एक ऐसे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक सत्य का गहन पर्दाफाश करना आवश्यक है, जो सदियों से समाज की आंखों से ओझल रहा है। इस विश्लेषणात्मक लेख में हम डॉ. भीमराव अंबेडकर जी के जीवन के एक महत्वपूर्ण निर्णय, महात्मा बुद्ध के जीवन से जुड़े भ्रामक मिथकों, और जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा प्रस्तुत आदि सनातन धर्म के यथार्थ ज्ञान पर सविस्तार चर्चा करेंगे।
डॉ. भीमराव अंबेडकर का ऐतिहासिक निर्णय और उनकी सबसे बड़ी आध्यात्मिक भूल
डॉ. भीमराव अंबेडकर जी एक बेहद सुशिक्षित और प्रबुद्ध व्यक्तित्व थे, जिन्होंने अपने जीवनकाल में 32 डिग्रियां प्राप्त की थीं। भारतीय संविधान के निर्माण में उनका योगदान अतुलनीय है, जिसकी बदौलत आज भारत देश का प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों को सरलता से प्राप्त कर पा रहा है। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यदि गहराई से विचार किया जाए, तो संत रामपाल जी महाराज का यह स्पष्ट विश्लेषण है कि बाबा साहेब अंबेडकर जी से अपने आध्यात्मिक मार्ग के चयन में एक बहुत बड़ी भूल हुई थी।
बाबा साहेब ने 14 अक्टूबर 1956 को 5 लाख दलित भाई-बहनों के साथ मिलकर हिंदू धर्म त्याग दिया था और बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। उस समय भारत में बौद्ध धर्म अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था, यानी लगभग खत्म हो चुका था, लेकिन डॉ. अंबेडकर जी ने इसे अपनाकर दोबारा फैलने का मौका दिया। इसका एक बड़ा परिणाम यह हुआ कि बौद्ध धर्म अपनाने से करोड़ों लोग ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर नास्तिक बन गए।
विडंबना यह है कि डॉ. अंबेडकर जी के आदरणीय पिता श्री राम जी मालोजी सकपाल स्वयं कबीरपंथी थे। डॉ. अंबेडकर जी की आत्मकथा के पृष्ठ 30 और 145 के अनुसार, कबीरपंथी होने के कारण उनके पिता मांस, मछली और शराब से दूर रहते थे, वे पक्के शाकाहारी थे तथा उनका मूर्ति पूजा पर कोई विश्वास नहीं था। हिंदू धर्म की अन्य जातियों द्वारा दलित समाज के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार और छुआछूत से तंग आकर उन्होंने धर्म परिवर्तन का यह कदम उठाया था।
लेकिन धर्म परिवर्तन के बाद भी उन दलितों को उनके गांव और शहर में रहने वाले लोगों ने स्वर्ण जाति वाला नहीं माना और छुआछूत का दुख उन्होंने फिर भी झेला। संत रामपाल जी महाराज बताते हैं कि यदि बाबा साहेब अपने ही कुल में जन्मे संत शिरोमणि रविदास जी के इतिहास और उनके द्वारा अपनाए गए कबीर परमेश्वर के 'आदि सनातन धर्म' को सही से समझ लेते, तो वे बौद्ध धर्म को अपनाने की गलती कभी नहीं करते। जातिवाद का किला ब्राह्मणों द्वारा बनाया गया था, जिसे 15वीं सदी में कबीर परमेश्वर जी और संत शिरोमणि रविदास जी ने अपने सत्य ज्ञान से ढहाने की शुरुआत कर दी थी।
सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) के जीवन से जुड़े भ्रामक मिथक और उनकी वास्तविकता
हम बचपन से महात्मा बुद्ध के बारे में कई आकर्षक कहानियां सुनते आए हैं, लेकिन बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी द्वारा स्वयं लिखित पुस्तक "बुद्ध और उनका धम्म" का यदि निष्पक्षता और गहनता से अध्ययन किया जाए, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं जो प्रचलित मान्यताओं को पूरी तरह से झुठलाते हैं।
सिद्धार्थ गौतम का जन्म और उनकी पारिवारिक स्थिति (वे राजकुमार नहीं थे)
समाज में आज तक यही भ्रम फैलाया जाता रहा कि सिद्धार्थ गौतम जी ने एक राजकुमार होते हुए राजमहलों का त्याग कर दिया था। बाबा साहेब अंबेडकर जी की पुस्तक "बुद्ध और उनका धम्म" के पेज आठ के अनुसार, शाक्यों के जनतंत्र में कई राज्य परिवार थे और वे एक दूसरे के बाद क्रमशः शासन करते थे । सिद्धार्थ गौतम के जन्म के समय शुद्धोधन की राजा बनने की बारी थी। शाक्य राज्य भारत के उत्तर-पूर्व में था, जिसे आगे चलकर कौशल नरेश ने अपने शासन क्षेत्र में मिला लिया था। इसके परिणामस्वरूप, कौशल नरेश की स्वीकृति के बिना शाक्य राज्य स्वतंत्र रूप से अपने राजकोषीय अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकता था।
सिद्धार्थ गौतम जी के पिता शुद्धोधन एक बड़े धनी आदमी थे, उनके पास बहुत बड़े-बड़े खेत थे और नौकर चाकर अनगिनत थे । पुस्तक में कहा गया है कि अपने खेतों को जोतने के लिए उन्हें 1000 हल चलवाने पड़ते थे। स्वतः सिद्ध हो जाता है कि जब सिद्धार्थ गौतम जी के पिताजी ही राजा नहीं थे, तो सिद्धार्थ गौतम जी राजकुमार कैसे हुए? वे वास्तव में एक बड़े जमींदार के पुत्र थे। यह कहना कि उन्होंने राजकुमार होते हुए घर का त्याग कर दिया था, केवल अज्ञान मात्र है।
गृहत्याग का वास्तविक कारण: चार दृश्य नहीं, बल्कि युद्ध का भय
यह कहानी बहुत प्रसिद्ध है कि सिद्धार्थ ने भ्रमण के दौरान एक वृद्ध, एक बीमार, एक शव और एक सन्यासी को देखकर वैराग्य धारण किया। यह उक्ति पूर्णतः निराधार और सुनी-सुनाई मालूम होती है।
अंबेडकर जी की पुस्तक के अनुसार, उनके गृहत्याग का असली कारण शाक्य संघ और कोली संघ के बीच रोहिणी नदी के जल बंटवारे को लेकर छिड़ा युद्ध था। शाक्य संघ ने 20 से 50 वर्ष के नौजवानों के लिए कोलियों के विरुद्ध सेना में भर्ती होना अनिवार्य कर दिया था। चूँकि सिद्धार्थ की पत्नी यशोधरा कोली संघ परिवार से थीं, जो उनका ससुराल पक्ष था, इसलिए सिद्धार्थ ने अपने रिश्तेदारों के विरुद्ध युद्ध में भाग लेने और सेना में शामिल होने से साफ मना कर दिया।
इस पर सेनापति ने उन्हें धमकियां दीं कि संघ उन्हें फांसी दे सकता है, देश से निकाल सकता है, या उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर उनके खेतों को जब्त कर सकता है। अपने परिवार को इन भयंकर संकटों से बचाने के लिए सिद्धार्थ ने परिव्राजक बनना (यानी देश निकाला) स्वीकार किया। स्वयं सिद्धार्थ गौतम जी ने पुस्तक के पृष्ठ 35 पर यह स्पष्ट स्वीकार किया था कि "यह सत्य है कि मैंने युद्ध के कारण ही गृहत्याग किया था"। अतः उनका संन्यास राजद्रोह के दंड से बचने के लिए उठाया गया एक मजबूर कदम था, न कि चार दृश्यों को देखकर उपजा वैराग्य ।

बिना गुरु के ज्ञान प्राप्ति का मिथक और कपिल मुनि के सिद्धांतों की नकल
बौद्ध भिक्षु यह भी दावा करते हैं कि सिद्धार्थ ने सभी गुरुओं को त्याग कर बिना किसी गुरु के उपदेश के ही स्वयं ज्ञान प्राप्त कर लिया। वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। पुस्तक के पेज 12 के अनुसार, उनके प्रथम आठ आचार्य वही ब्राह्मण थे जिन्होंने उनके जन्म की भविष्यवाणी की थी। उन्होंने सव्यमित्र से उस समय के सभी दर्शन शास्त्रों का ज्ञान लिया और भारद्वाज ऋषि (जो आलार कलाम के शिष्य थे) से चित्त को एकाग्र तथा समाधिस्थ करने का मार्ग सीखा।
जब आलार कलाम जैसे ऋषियों के बताए अनुसार 6 वर्ष तक कठोर तप करने के बाद उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ, तो उन्होंने अपनी मर्जी से केवल 28 दिन तक साधारण समाधि अभ्यास किया और घोषणा कर दी कि उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया है। असल में उन्होंने जो भी सिद्धांत बताए, वे उनके अपने नहीं थे। पृष्ठ 46 और 47 के अनुसार, वे हिंदू धर्म के कपिल मुनि द्वारा रचित सांख्य दर्शन की हूबहू नकल मात्र थे, जिसमें सत्व, रज और तम गुणों की बात कही गई है। गौतम बुद्ध जी को ब्रह्म की वास्तविकता का कोई प्रमाण नहीं मिला, इसलिए उन्होंने उपनिषदों को अस्वीकार कर दिया और कपिल मुनि के ज्ञान पर अपना लेबल लगा दिया ।

बौद्ध धर्म के अंतर्विरोध: नास्तिकता, आत्मा का खंडन और पुनर्जन्म का उलझा हुआ सिद्धांत
बौद्ध धर्म (धम्म) के सिद्धांत मुख्य रूप से नास्तिकता पर आधारित हैं। वे मानते हैं कि ईश्वर है ही नहीं और न ही उसने संसार का निर्माण किया है, तथा आत्मा का भी कोई अस्तित्व नहीं है ।
इसके बावजूद, बौद्ध धर्म पुनर्जन्म को मानता है। उनका तर्क है कि पुनर्जन्म आत्मा का नहीं, बल्कि भौतिक तत्वों (शरीर) का होता है। अंबेडकर जी की पुस्तक के अनुसार, मनुष्य का शरीर केवल चार महाभूतों से बना है: पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु। मृत्यु के बाद ये तत्व मरते नहीं हैं, बल्कि आकाश में विद्यमान समान भौतिक पदार्थों में मिल जाते हैं। जब इन तैरती हुई राशियों में से इन चारों महाभूतों का पुनर्मिलन होता है, तो पुनर्जन्म होता है। यह आवश्यक नहीं कि वे तत्व उसी शरीर के हों जिसका मरण हुआ है; भिन्न-भिन्न मृत शरीरों के भौतिक अंश मिलकर नया शरीर बना सकते हैं।
यहाँ सबसे बड़ा और तार्किक विरोधाभास यह उत्पन्न होता है कि यदि आत्मा या जीव है ही नहीं, तो चार तत्वों से बने शरीर रूपी वस्त्र (चोले) को धारण कौन करेगा? जिस प्रकार बिना आदमी के कपड़े बनाने का कोई औचित्य नहीं, उसी प्रकार बिना आत्मा के शरीर के निर्माण का कोई अर्थ नहीं।
इसके अलावा, बौद्ध धर्म की रीढ़ की हड्डी माना जाने वाला 'त्रिपिटक ग्रंथ' भी कोई बुद्ध द्वारा लिखा गया प्रमाणित शास्त्र नहीं है। इसे गौतम बुद्ध की मृत्यु के 3 महीने बाद आनंद नाम के एक भिक्षुक ने केवल स्मृति के आधार पर बोला था । बाद में इसे नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ाया गया, जिसे मुस्लिम शासक बख्तियार खिलजी ने जलाकर खाख कर दिया।
अहिंसा का उपदेश और तथागत बुद्ध द्वारा मांस भक्षण की वास्तविकता
बौद्ध धर्म स्वयं को अत्यंत शांत और अहिंसक बताता है। भिक्षु दावा करते हैं कि वे प्राणी हिंसा नहीं करते। लेकिन डॉ. अंबेडकर जी की पुस्तक के पृष्ठ 187 और 188 के अनुसार, स्वयं दुनिया को अहिंसा का उपदेश देने वाले गौतम बुद्ध जी मांस खाते थे ।
- एक ब्राह्मण ने भगवान बुद्ध के पास आकर कहा कि "यद्यपि आप कहते हैं कि आप मुर्दार मांस नहीं खाते, लेकिन आप पक्षियों के मांस का बना हुआ एक से एक बढ़िया भोजन कर लेते हैं"।
- इसके बचाव में सिद्धार्थ गौतम जी ने कुतर्क देते हुए कहा कि किसी प्राणी की हत्या करना, चोरी, झूठ बोलना, ठगी, व्यभिचार, निर्दयता, और कुसंगति ही मुर्दार मांस हैं, मांस भोजन नहीं है।
- आमगंध नाम के एक अन्य ब्राह्मण तपस्वी ने भी देखा कि सिद्धार्थ गौतम जी मछलियों का मांस खाते हैं और दूसरों को अहिंसा का उपदेश देते हैं।
- यहाँ तक कि इतिहासकारों का मानना है कि स्वयं सिद्धार्थ गौतम बुद्ध जी की मृत्यु सूअर का जहरीला मांस या जहरीली मशरूम खाने से हुई थी। यह स्पष्ट करता है कि बुद्ध के पास कोई ऐसी भक्ति शक्ति नहीं थी जिससे जहर का उनके शरीर पर असर न हो, जबकि मीराबाई जी ने जहर को भी अमृत में बदल दिया था।
बौद्ध धर्म का विभाजन, पतन तथा आदि शंकराचार्य के सिद्धांतों की त्रुटियां
सन 102 ईसवी के आसपास बौद्ध धर्म दो मुख्य शाखाओं में बंट गया: हीनयान और महायान ।
- हीनयान: ये रूढ़िवादी थे, जो आत्मा और परमात्मा दोनों को नहीं मानते थे और मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे । बाबा साहेब अंबेडकर इसी शाखा के अनुयायी थे ।
- महायान: इन्होंने बुद्ध को ही भगवान मान लिया, मूर्ति पूजा शुरू कर दी और ये आत्मा को मानते थे लेकिन परमात्मा को नहीं ।
- बाद में छठी शताब्दी में वज्रयान शाखा का उदय हुआ, जो तंत्र-मंत्र, जादू-टोना और कर्मकांड में विश्वास रखती थी, जिससे लोगों की श्रद्धा टूट गई और बौद्ध धर्म पतन की ओर चला गया।
बौद्ध धर्म को समाप्त करने में आदि शंकराचार्य जी का भी बड़ा हाथ रहा। उन्होंने 10 प्रकार के संन्यासी तैयार किए और भारत के चारों कोनों में पीठ स्थापित कर बौद्ध भिक्षुओं को शास्त्रार्थ में हराना शुरू किया। हालांकि, आदि शंकराचार्य जी का मुख्य सिद्धांत "अहम ब्रह्मास्मि" (मैं ही ब्रह्म हूँ) स्वयं पूरी तरह अतार्किक है। यदि सीमित और असहाय जीव स्वयं ब्रह्म (परमात्मा) होता, तो वह लकवाग्रस्त कैसे हो सकता है? क्या वह स्वयं इस अरबों की विविधता वाली सृष्टि की रचना कर सकता है?
सुप्रसिद्ध शिक्षक डॉ. विकास दिव्य कीर्ति जी ने अपनी क्लास में आदि शंकराचार्य की प्रशंसा की और गौतम बुद्ध के गृहत्याग की भ्रामक कहानी सुनाई, जो अंबेडकर जी की पुस्तक के तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है। संत रामपाल जी महाराज ने इन सभी सिद्धांतों को राष्ट्रीय चैनल पर खुली ज्ञान चर्चा में निराधार और गलत सिद्ध किया है।
संत शिरोमणि रविदास जी, कबीर परमेश्वर और आदि सनातन धर्म का यथार्थ
बौद्ध धर्म के इस नास्तिक और अंतर्विरोधी मार्ग के विपरीत, संत शिरोमणि रविदास जी ने जातिवाद के दंश को झेलते हुए भी कबीर परमेश्वर के आदि सनातन धर्म का मजबूत मार्ग अपनाया। संत रविदास जी पहले हिंदू धर्म में प्रचलित अयोध्या के राजा रामचंद्र जी की भक्ति करते थे। बाद में परमेश्वर कबीर जी के सानिध्य में आने और तत्वज्ञान समझने के बाद उन्होंने आदि सनातन धर्म अपना लिया।
कबीर परमेश्वर जी ने काशी के सुप्रसिद्ध पंडित स्वामी रामानंद जी (जो केवल ब्राह्मणों को नाम दीक्षा देते थे) को ज्ञान में पराजित किया और उन्हें अपनी शक्ति से सतलोक दिखाया। रामानंद जी ने कबीर जी को पूर्ण परमात्मा मान लिया, लेकिन समाज की मर्यादा बनाए रखने के लिए कबीर जी ने रामानंद जी को दुनिया की नजर में अपना गुरु बनाए रखा। संत शिरोमणि रविदास जी ने भी स्वामी रामानंद जी से ही नाम दीक्षा ली थी ।
संत रविदास जी ने अपनी सद्भक्ति की शक्ति से अद्भुत चमत्कार किए और जातिवाद के किले को ढहा दिया:
- उन्होंने 700 ब्राह्मणों का अहंकार तोड़कर उन्हें अपने शरीर को चीर कर अंदर सोने का जनेऊ दिखाया।
- रानी द्वारा आयोजित भंडारे में उन्होंने अपने 700 रूप बनाए और प्रत्येक ब्राह्मण की थाली में साथ भोजन किया, जिससे उनके होश उड़ गए और उन सभी 700 ब्राह्मणों ने उनसे दीक्षा ली ।
- 8-9 वर्ष की आयु में रविदास जी ने अपने एक मृत ब्राह्मण मित्र को अपनी पूर्व जन्म की भक्ति की शक्ति से जीवित कर दिया था।
- दीक्षा उपरांत उन्होंने एक निर्धन महिला की मृत गाय को भी अपने हाथ लगाते ही जीवित कर दिया था।
- एक ब्राह्मण की जान बचाने के लिए उन्होंने अपनी चमड़ा भिगोने वाली कठौती में गंगा प्रकट कर दी और उसमें 20-20 तोले (200 ग्राम) के सोने के कई कंगन तैरते दिखा दिए।
संत रविदास जी और कबीर परमेश्वर जी के बीच हुई ज्ञान चर्चा में यह पूर्ण रूप से स्पष्ट हुआ कि जीव आत्मा अगम लोक से आई है और परमात्मा के नाम जाप से ही काम, क्रोध, मोह जैसे विकार शांत होते हैं तथा मोक्ष प्राप्त होता है। कबीर जी संत रविदास जी को अमरलोक (सतलोक या बेगमपुर) की सैर पर भी लेकर गए थे, जहां कोई दुख या डर नहीं है। यही कारण था कि भक्तमती मीराबाई जी और 52 राजाओं ने बौद्ध धर्म को न अपनाकर संत रविदास जी से नाम दीक्षा ली।
आधुनिक युग में सद्भक्ति के प्रत्यक्ष प्रमाण: विज्ञान और अध्यात्म का मिलन
विज्ञान को सर्वोपरि मानने वाले और आत्मा को नकारने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए संत रामपाल जी महाराज की आदि सनातनी भक्ति आज प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत कर रही है।
- अघोरी दियाना (डॉक्टर): जर्मनी से कॉस्मेटोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाली इस डॉक्टर का भयंकर एक्सीडेंट हुआ, जिसमें उनका आधा शरीर काम करना बंद कर दिया और वे कोमा में चली गईं । उन्होंने अपनी आत्मा को शरीर से बाहर (Out of Body Experience) देखा और महसूस किया कि कोई उन्हें हथेली पर रखकर ले जा रहा है । यह अनुभव बौद्ध धर्म के इस सिद्धांत को सिरे से गलत साबित करता है कि आत्मा नहीं होती ।
- डॉ. ओ.पी. हुड्डा (पूर्व सीएमओ): इन्हें भयंकर हार्ट अटैक आया था और डॉक्टर उन्हें बचा पाने में असमर्थ थे । अचेतन अवस्था में उन्होंने स्पष्ट देखा कि काल के यमदूत उन्हें लेने आ रहे हैं, तभी कबीर परमेश्वर और संत रामपाल जी महाराज ने प्रकट होकर काल के दूतों को भगाया और उनकी उम्र बढ़ाकर उन्हें नया जीवनदान दिया ।
- सरोज दासी की पुत्री: मध्य प्रदेश के कटनी की रहने वाली सरोज दासी की पुत्री बुरी तरह जलने के कारण अस्पताल में मृत घोषित कर दी गई थी और वह वेंटिलेटर पर थी । लेकिन संत रामपाल जी महाराज की भक्ति और उन पर पूर्ण विश्वास से वह लड़की जीवित उठ बैठी, उसने तुरंत लड्डू मांगे और आज वह यूपीएससी की तैयारी कर रही है ।
ये सभी प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाणित करते हैं कि परमात्मा का अस्तित्व है, आत्मा सत्य है, और सत्य सद्भक्ति से ही जीवन के सभी संकट दूर होते हैं।
'बुद्धम शरणम गच्छामि' या 'कबीर शरणम गच्छामि'?
बौद्ध धर्म के नास्तिकता के सिद्धांत और कपिल मुनि की नकल मात्र से मानव समाज का पूर्ण कल्याण कभी संभव नहीं हो सकता। जो गलती डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने बौद्ध धम्म को अपनाकर की, वह भूल हमें नहीं करनी चाहिए। सिद्धार्थ गौतम जी को मृत्यु के उपरांत जीव कहां जाता है, इसका कोई ज्ञान नहीं था।
कबूतर की तरह आंखें बंद कर लेने से वास्तविकता नहीं बदलती। यद्यपि श्रुतियों और मनगढ़ंत कहानियों ने कुछ लोगों का महिमामंडन इस कदर कर दिया है कि आज वे बहुत बड़े विद्वान माने जाते हैं, परंतु हमें अपने इस अनमोल मानव जीवन को इन सुनी-सुनाई बातों की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहिए। आदि सनातन धर्म हमें पूर्ण सत्य बताता है कि परमात्मा साकार है, नर आकार है और उनका वास्तविक नाम कबीर है। कबीर ही पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर हैं, जो सर्व सृष्टि के रचयिता और सबका धारण-पोषण करने वाले अविनाशी भगवान हैं।
अतः अब निर्णय आपको करना है कि बिना किसी आधार वाले नास्तिकता वाले मार्ग पर चलना उचित है या उस प्रमाणित आदि सनातनी मार्ग पर जिससे जीव जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर सनातन परमधाम (सतलोक/बेगमपुर) प्राप्त कर सकता है। मोक्ष और जीवन के कल्याण के लिए "बुद्धम शरणम गच्छामि" को छोड़कर "कबीर शरणम गच्छामि" होना ही एकमात्र सत्य और यथार्थता का मार्ग है। मानव जीवन बार-बार नहीं मिलता, इसलिए संत रामपाल जी महाराज के अद्वितीय तत्वज्ञान को समझकर सद्भक्ति अपनाएं और अपना पूर्ण कल्याण करवाएं।


