कुरान शरीफ में छिपे हुए आध्यात्मिक तथ्यों का खुलासा

आज हम जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज द्वारा प्रमाण सहित "पवित्र कुरान शरीफ में छिपे हुए आध्यात्मिक तथ्यों" के बारे में जानकारी साझा करने जा रहे हैं।

प्रत्येक आत्मा, चाहे वे किसी भी धर्म में जन्मी और पली हों; भगवान के लिए कई तरह से खोज करते हैं जैसे घोर तप करना, ध्यान लगाना, उपवास रखना, पवित्र तीर्थयात्राओं पर जाना आदि। दुर्भाग्य से, किसी को भी पूजा की सही विधि के बारे में निर्णायक प्रमाण नहीं मिल पाए और यहां तक ​​की आध्यात्मिकता की मूल बातें भी बहुत पेचीदा थीं।

चाहे हम अपनी वर्तमान स्थिति को कितना भो झुठला दें, सच्चाई यह है कि हर कोई किसी न किसी कारण से हताश है।
भले ही हम कई बार खुश होते हैं, लेकिन परिणाम अल्पकालिक होता है। ऐसी भूमि को भगवान के राज्य के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है जहाँ कोई भी आपदा चाहे वह प्राकृतिक हो या मानव निर्मित; तुरंत खुशी को दुखों के निशान में बदल देती है।

किसी विशेष धर्म और उसके आध्यात्मिक प्रवचन को समझने के लिए, एक बुद्धिमान व्यक्ति उस धर्म से संबंधित लोगों के व्यवहार और उनकी साधनाओं को नहीं देखेगा, इसके बजाय वह उस धर्म के पवित्र ग्रंथों के अंदर झांक कर देखेगा। इस लेख में, हम इस्लाम के पांच सबसे चिंतनशील प्रश्नों को शामिल करेंगे, ताकि लोगों को उन वास्तविक तथ्यों का पता चल सके, जिनकी पहले गलत व्याख्या की गई थी।

प्रश्न 1: पवित्र क़ुरान शरीफ का ज्ञान दाता कौन है?

उत्तर: पूरा मुस्लिम समाज ये मानता है कि पवित्र क़ुरान शरीफ का ज्ञान दाता स्वयं अल्लाह (पूर्ण  प्रभु) ही है।
लेकिन आइए हम उस सच्चाई पर एक नज़र डालें जो अब तक छिपी हुई थी।

पवित्र कुरान शरीफ़ 
सूरह अल-फुरकान 25 आयत नं. 59

जिसने आसमानों और जमीन और जो कुछ उनके बीच में है (सबको) छः दिन में पैदा किया, फिर तख्त पर जा विराजा (वह अल्लाह बड़ा) रहमान है, तो उसकी खबर किसी बाखबर (इल्मवाले) से पूछ देखो। (59)

भावार्थ : कुरान ज्ञान दाता अल्लाह (प्रभु) किसी और पूर्ण प्रभु की तरफ संकेत कर रहा है जो सर्व ब्रह्मण्डों का रचनहार है, जिसका वास्तविक ज्ञान तो किसी तत्वदर्शी संत(बाखबर) की शरण ग्रहण करने से ही हो सकता है। कुरान ज्ञान दाता स्वयं स्वीकारता है कि उसकी खबर किसी बाखबर (इल्मवाले) से पूछो, मैं नहीं जानता।

इस प्रकार, यह अपने आप में इस तथ्य पर प्रकाश डालता है कि कुरान का ज्ञान दाता पूर्ण प्रभु नहीं है। इतना ही नहीं, वह इस बारे में ज्ञान भी नहीं रखता है कि सर्वशक्तिमान कौन है और वह हजरत मुहम्मद को "तत्वदर्शी संत(बाखबर) की शरण ग्रहण करने के लिए कह रहा है, जो सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान अर्थात तत्वज्ञान प्रदान करने योग्य है यानी इल्मवाला है।

सूरह अल-फुरकान 25 आयत नं. 55

और अल्लाह के सिवाय ऐसों को पूजते हैं जो न उनको नफा पहुँचा सकते हैं और न उनको नुकसान पहुँचा सकते हैं।  
और काफ़िर तो अपने परवरदिगार से पीठ दिए हुए (मुँह मोड़े) हैं।

भावार्थ : कुरान ज्ञान दाता अल्लाह (प्रभु) पैगंबर मुहम्मद को बता रहा है कि ऐसे लोग हैं जो अल्लाह को भगवान नहीं मानते हैं और अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, जो उन्हें कोई लाभ नहीं दे सकते हैं, न ही उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं। वे भगवान के प्रति अविश्वास रखते हैं और उन्हें काफिर मानना चाहिए क्योंकि वे गलत साधनाएं कर रहे है

इसका तात्पर्य यह है कि कुरान ज्ञान दाता से अन्य कोई और पूर्ण परमात्मा है, वह सर्व के पूजा करने योग्य है। उन्होंने पैगम्बर मुहम्मद से कहा कि काफिरों का कहा मत मानना व अल्लाह / प्रभु के लिए संघर्ष (जिहाद) करना, लड़ाई नहीं करना।

जीवनी हजरत मुहम्मद(सल्लाहु अलैहि वसल्लम) लेखक हैं - मुहम्मद इनायतुल्लाह सुब्हानी, मूल किताब - मुहम्मदे(अर्बी) से, अनुवादक - नसीम गाजी फलाही, प्रकाशक - इस्लामी साहित्य ट्रस्ट प्रकाशन नं. 81 के आदेश से प्रकाशन कार्य किया है।

मर्कजी मक्तबा इस्लामी पब्लिशर्स, डी-307, दावत नगर, अबुल फज्ल इन्कलेव जामिया नगर, नई दिल्ली।
पृष्ठ नं. 67 - 75

एक समय प्रभु प्राप्ति की तड़फ में हजरत मुहम्मद जी नगर से बाहर एक गुफा में साधना कर रहे थे। अचानक एक आवाज़ आई। वे बहुत डर गए, आंखें खोली तो सामने एक फरिश्ता खड़ा था। उसने कहा पढ़ो। हजरत मुहम्मद जी ने कहा मुझे पढ़ना नहीं आता। जिबराईल नामक फरिश्ते ने हजरत मुहम्मद जी को डरा धमकाकर, उनका गला घोंट-2 कर बलात कुरान शरीफ का ज्ञान समझाया। 

क्या भगवान दर्द दे सकता है और किसी भी आत्मा को डरा सकता है? सपने में भी यह संभव नहीं है। क्योंकि एकमात्र अल्लाह / प्रभु ही है जो हमारा वास्तविक पालनहार है। तथ्य यह है कि खलनायक, जो कि क्षर पुरुष (काल) के अलावा कोई और नहीं है, ने कुरान का ज्ञान उसी तरह से दिया जैसे उसने अन्य धर्मों के पवित्र ग्रंथों का ज्ञान प्रदान किया। वह किसी के भी शरीर में सूक्ष्म रूप बना कर प्रवेश कर जाता है और फिर, प्रवचन देता है।

इस प्रकार, पूर्ण परमात्मा ने उन्हें कुरान का ज्ञान दिया, यह अवधारणा गलत साबित होती है और वास्तविकता यह है कि काल ही कुरान का ज्ञान दाता है। काल ने ही हजरत मुहम्मद जी को बलपूर्वक यह ज्ञान समझाया।

इस तथ्य को जानने के बाद कि पूर्ण प्रभु ने कुरान का ज्ञान नहीं दिया है, आइए अगले प्रश्न पर चलते हैं जहां मुसलमान समाज एक गलत धारणा पर फंसा हुआ है।

प्रश्न 2 : क्या इस्लाम धर्म के अनुसार पुनर्जन्म एक मिथक है या वास्तविकता?

उत्तर : मुस्लिम समाज या इस्लाम धर्म में एक अस्पष्ट धारणा है कि कोई पुनर्जन्म नहीं है, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। सबसे पहले, हम उस मिथक को जांचते हैं जो वर्तमान में प्रचलित है। मुस्लिम संतों के अनुसार, एक व्यक्ति सिर्फ एक बार जन्म लेता है। मृत्यु के बाद, उस व्यक्ति को कब्र में दफना दिया जाता है जहां वह कयामत आने तक रहता है। कयामत के दिन यानी जब महाप्रलय होगी, उस समय सभी को जिनके शरीर को कब्र में दफनाया गया था, उन्हें जीवित कर दिया जाएगा और उनके अच्छे और बुरे कर्मों का लेखा-जोखा होगा। जिन्होंने अच्छे कर्म किए वे स्वर्ग (जन्नत) में जाएंगे और जिन्होंने पाप किए हैं उन्हें नरक (दोजख) में भेजा जाएगा, जहां वे हमेशा के लिए रहेंगे।

यह धारणा हर तरीके से गलत है। सबसे पहले, मृत्यु के बाद, शरीर निश्चित रूप से मृत रूप में कब्र में रहता है लेकिन आत्मा के साथ ऐसा नहीं है। आत्मा को धर्म राज के पास भेजा जाता है, जो भगवान के दरबार में मुख्य न्यायाधीश होता है, जहाँ वह अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब लेता है। अच्छे कर्मों का फल स्वर्ग में भोगा जाता है, जबकि बुरे कर्मों का फल नरक में जहां आत्मा को उन तरीकों से प्रताड़ित किया जाता है, जिन्हें अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है।

अवश्य पढ़ें : कुरान शरीफ  - सूरह अल-अंबिया में जन्म और पुनर्जन्म की अवधारणा

फिर कर्माधार से आत्मा को इस नश्वर पृथ्वी पर चौरासी लाख जूनियों में पटक दिया जाता है। दूसरा, स्वर्ग और नरक स्वयं नाश्वान हैं और वे भी महाप्रलय के दिन नष्ट हो जाते हैं। तीसरा, जहां तक ​​एक मानव शरीर के सिद्धांत का संबंध है, इस ग्रह पर रहने वाले जानवरों के बारे में क्या? वे कहाँ से उतरे? सच्चाई यह है कि पुनर्जन्म होता है और प्रत्येक आत्मा जन्म और मृत्यु के चक्र में तब तक फंसी रहती है, जब तक की वह "इल्मवाले" संत की शरण में जाकर मोक्ष प्राप्त नहीं कर लेती।

सूरह अल-मुल्क 67:2

जिसने मौत और ज़िन्दगी को पैदा किया ताकि तुम्हें आज़माए कि तुममें से काम में सबसे अच्छा कौन है और वह ग़ालिब (और) बड़ा बख्शने वाला है।

भावार्थ : अल्लाह/प्रभु ने जीवन के साथ-साथ मृत्यु को भी जन्म दिया ताकि ये पता लग सके कि लोगों में पवित्र आत्मा कौन हैं जो अच्छे कर्म करते हैं। इस पंक्ति में, यह स्पष्ट किया गया है कि कर्म का सिद्धांत प्रबल होता है, जिसके कारण कुछ लोग अमीर होते हैं, जबकि अन्य गरीब होते हैं, कुछ स्वस्थ होते हैं जबकि अन्य अस्वस्थ होते हैं आदि।

कुरान शरीफ  - सूरह अल अंबिया 21:104 में पुनर्जन्म के विषय में बताया है। 

जिस दिन हम आकाश को लपेट लेंगे जैसे पंजी में पन्ने लपेटे जाते हैं, जिस प्रकार पहले हमने सृष्टि का आरंभ किया था उसी प्रकार हम उसकी पुनरावृति करेंगे। यह हमारे जिम्मे एक वादा है। निश्चय ही हमें ये करना है। 

भावार्थ: यह पंक्ति मुसलमानों के विश्वास के विपरीत है, जिसमें यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि पुनर्जन्म होता है और जन्म और मरण का चक्र भी चलता रहता है। इसके अलावा, मुस्लिम समुदाय के संत यह बताने के लिए गीता से संदर्भ लेते हैं कि पुनर्जन्म नहीं होता है।

आइए इस बात की जांच हम श्रीमद्भगवत गीता जी के श्लोकों से करते हैं;

पवित्र श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 4 श्लोक 5 और 9; अध्याय 2 श्लोक 12; अध्याय 10 श्लोक 2

गीता ज्ञान दाता, जो स्वयं काल भी था, कहता है कि उसके पुनर्जन्म और कर्म छिपे हुए हैं। साथ ही, वह अर्जुन को बताता है कि वह इस सच्चाई से अवगत नहीं है कि उसके कई जन्म हो चुके हैं। और ऐसा ही हाल काल का भी है। काल ने यह भी कहा है कि देवी-देवता भी उसके जन्म से परिचित नहीं हैं। क्योंकि वे भी काल से ही जन्मे हैं।

इस प्रकार, काल/क्षरपुरुष (जिसने कुरान के साथ-साथ गीता जी का ज्ञान भी दिया) स्वयं जन्म और मृत्यु के चक्र में है, इस तथ्य पर जोर देता है कि पुनर्जन्म है। यह जानने के बाद, आइए अब हम तीसरा सवाल लेते हैं जो लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

प्रश्न 3 : क्या इस्लाम में मांस के सेवन की अनुमति है?

उत्तर : मुसलमान अल्लाह के नाम पर जानवरों का मांस खाते हैं और यहाँ तक की "बकरीद" नामक त्यौहार भी मनाते हैं, जिसमें वे बकरे को मारकर उसका मांस "प्रसाद" के रूप में खाते हैं। वे कलमा पढ़ कर निर्दोष जीवों की हत्या कर देते हैं।

एक तथ्य पर विचार करें। एक तरफ, मुसलमान अल्लाह की बंदगी करते हैं और दूसरी तरफ, वे उसी प्रभु के जीव का कत्ल करते हैं। जबकि परमात्मा की नज़र में सब जीव बराबर हैं। क्या माता-पिता ऐसे बच्चे से खुश हो सकते हैं जो उनके दूसरे बच्चे को मारता हो। इस बात पर मुसलमान भाई अपना तर्क देते हैं कि वे हिंदुओं की तरह नहीं हैं, जो झटके से जानवर को मार देते हैं। बल्कि, वे तो जानवर को प्यार से मारते हैं यानि हलाल करते हैं। कहाँ गया इनका विवेक? किसी भी तरीके से अपने परिवार के सदस्य को मारने की कोशिश करो, दर्द एक जैसा ही होता है और इसका पाप अलग।

साथ ही, मुसलमान भाइयों का कहना है कि बकरे की आत्मा सीधे जन्नत में जाती है। क्योंकि वे जानवरों को हलाल करते हुए कलमा पढ़ते हैं। अगर ऐसा है और आप इसे सच मानते हैं, तो बकरों की बारी तो कभी नहीं आती, लोग तो पहले स्वयं हलाल हो जाते और जन्नत में चले जाते।

प्रभु या धर्म के नाम पर मांस का सेवन करना, एक बहुत बड़ा पाप है। 

इन शब्दों पर ध्यान दें;

नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया।
एक लाख अस्सी कूं सौगंध, जिन नहीं करद चलाया।।
अरस कुरस पर अल्लह तख्त है, खालिक बिन नहीं खाली।
वे पैगम्बर पाख पुरुष थे, साहिब के अब्दाली।।

भावार्थ: नबी मोहम्मद तो आदरणीय हैं जो प्रभु के सन्देशवाहक कहलाए हैं। कसम है एक लाख अस्सी हजार को जो उनके अनुयायी थे उन्होंने भी कभी बकरे, मुर्गे तथा गाय आदि पर करद नहीं चलाया अर्थात् जीव हिंसा नहीं की तथा माँस भक्षण नहीं किया।

वे हजरत मोहम्मद, हजरत मूसा, हजरत ईसा आदि पैगम्बर (संदेशवाहक) तो पवित्र व्यक्ति थे तथा ब्रह्म(ज्योति निरंजन/काल) के कृपा पात्र थे, परन्तु जो आसमान के अंतिम छोर (सतलोक) में पूर्ण परमात्मा (अल्लाहू अकबर अर्थात्
अल्लाह कबीर) है उस सृष्टि के मालिक की नजर से कोई नहीं बचा।

नबी मोहम्मद तो इतने दयालु थे कि उन्होंने कभी किसी व्यक्ति से ब्याज तक की मांग नहीं की, जीव हत्या तो दूर की बात है।

साथ ही, ये बात भी सत्य है;

मारी गऊ शब्द के तीरं, ऐसे थे मोहम्मद पीरं।।
शब्दै फिर जिवाई, हंसा राख्या माँस नहीं भाख्या, एैसे पीर मुहम्मद भाई।।

भावार्थ : एक समय नबी मुहम्मद ने एक गाय को शब्द (वचन सिद्धि) से मार कर सर्व के सामने जीवित कर दिया था (वास्तव में यह पूर्ण प्रभु द्वारा ही किया गया था)। उन्होंने गाय का मांस कभी नहीं खाया। फिर उनके अनुयायी कैसे ये क्रूरता कर सकते हैं?

अब मुसलमान समाज वास्तविकता से परिचित नहीं है। जिस दिन गाय जीवित की थी उस दिन की याद बनाए रखने के लिए गऊ मार देते हो। आप जीवित नहीं कर सकते तो मारने के भी अधिकारी नहीं हो। आप माँस को प्रसाद रूप जान कर खाते तथा खिलाते हो। आप स्वयं भी पाप के भागी बनते हो तथा अनुयाईयों को भी गुमराह कर रहे हो। आप दोजख (नरक) के पात्र बन रहे हो।

गरीब, राबी मक्केकूं चली, धरया अल्हका ध्यान। कुत्ती एक प्यासी खड़ी, छुटे जात हैं प्राण।।
गरीब, केश उपारे शीशके, बाटी रस्सी बीन। जाकै बस्त्र बांधि कर, जल काढ्या प्रबीन।।
गरीब, सुनही कूं पानी पिया, उतरी अरस अवाज। तीन मजल मक्का गया, बीबी तुह्मरे काज।।

मुस्लिम धर्म में "राबिया" नाम से एक आदरणीय श्रद्धालु थी, जिसका दिल दया से इस हद तक भर गया था कि उसने एक कुतिया को कुँए से जल निकालकर पिलाने के लिए अपने सिर के बाल उखाड़कर रस्सी बनाई। कपड़े उतारकर उस रस्सी से बाँधकर जल निकालकर प्यासी कुतिया के जीवन की रक्षा की है। इसलिए अल्लाह अकबर ने यह करिश्मा किया कि मक्का यानी मस्जिद अपने स्थान से उठकर उड़कर कुँए के साथ लग गया। जब कोई आत्मा इस तरह का कृत्य करने के लिए इतनी दयालुता दिखा सकती है और बलिदान कर सकती है, तो अन्य लोग किस मानसिकता के आधार पर जीव हत्या या बिस्मिल करने को जायज़ ठहरा सकते हैं।

रोजा, बंग, नमाज दई रे। बिसमिल की नहीं बात कही रे।।

भावार्थ : नबी मुहम्मद जी ने रोजा(व्रत) बंग(ऊँची आवाज में प्रभु स्तुति करना) तथा पाँच समय की नमाज करना तो कहा था परन्तु गाय आदि प्राणियों को बिस्मिल करने (मारने) को नहीं कहा था।

इस प्रकार, मांस मनुष्यों का आहार नहीं है और कहीं नहीं लिखा है कि इस प्रथा का पालन इस धर्म के लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। यह एक जघन्य पाप है। जो मांस खाते हैं उनके सत्तर जन्म तक मानव या बकरा-बकरी, भैंस या मुर्गे आदि के जीवनों में सिर कटते हैं। यह जान लेने के बाद कि मांस का सेवन एक जघन्य पाप है, आइए अब हम अगले और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पर चलते हैं।

प्रश्न 4 : क्या इस्लाम धर्म में अल्लाह साकार है?

उत्तर: सभी भगवान की स्तुति करते हैं, भगवान की सुंदरता की झलक पाने के लिए अत्यधिक तप (ध्यान) करते हैं लेकिन जिन कथनों में वे विश्वास करते हैं कि भगवान निराकार है, वे विरोधाभासी हैं। यदि अल्लाह / प्रभु आकार में नहीं है, तो आप उसका दीदार कैसे कर पाएंगे?

आइए हम पवित्र कुरान से कुछ आयतें लें जो अनायास ही सिद्ध करती हैं कि प्रभु साकार है, मानव सदृश है।

कुरान शरीफ
सूरह अल-फुरकान 25:53

और वही है जिसने दो दरियाओं को मिला चलाया। एक का पानी मीठा प्यास बुझाने वाला है और एक का खारी कड़वा। और दोनों में एक आड़ और मजबूत रोक बना दी।

भावार्थ : कुरान शरीफ का ज्ञान देने वाला अल्लाह हजरत मुहम्मद को कह रहा है कि अल्लाह वही है जिसने दो दरियाओं को मिला चलाया। एक का पानी मीठा है, जिससे प्यास बुझाई जा सके और एक में नमकीन और कड़वा पानी है। उसने दोनों के बीच मज़बूत रोक लगा दी ताकि एक का पानी और स्वाद दूसरे में न मिल पाए।

इस से सिद्ध होता है कि परमात्मा साकार है व स्वयं ही सारी सृष्टि का कर्ता है।

कुरान शरीफ
सूरह अल-फुरकान 25:54

और वही है जिसने पानी की बूँद से आदमी को पैदा किया, फिर उसको साहिबे नसब और ससुरालवाला बनाया। और तुम्हारा परवरदिगार हर चीज़ करने पर शक्तिमान है।

भावार्थ : और वही परमात्मा है जिसने पानी की बूँद से इंसान को पैदा किया, फिर उसको किसी का बेटा या बेटी, किसी का दामाद-बहू बनाया। यानी स्पष्ट कर रहा है कुरान शरीफ के ज्ञान देने वाला अल्लाह हजरत मुहम्मद को कि वो तुम्हारा परवरदिगार हर चीज़ को करने में शक्तिमान है। 

इससे पता चलता है कि अल्लाह साकार है, वही कर्ता है।

कुरान शरीफ
सूरह अल-फुरकान 25:59

जिसने आसमानों और जमीन और जो कुछ उनके बीच में है (सबको) छः दिन में पैदा किया, फिर तख्त पर जा विराजा (वह अल्लाह बड़ा) रहमान है, तो उसकी खबर किसी बाखबर (इल्मवाले) से पूछ देखो। (59)

इसका वास्तविक भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद को कुरान शरीफ बोलने वाला प्रभु (अल्लाह) कह रहा है कि वह कबीर प्रभु वही है जिसने जमीन तथा आसमान के बीच में जो भी विद्यमान है सर्व सृष्टी की रचना छः दिन में की तथा सातवें दिन ऊपर अपने सत्यलोक में सिंहासन पर विराजमान हो(बैठ) गया।

पवित्र कुरान शरीफ ने प्रमाणित कर दिया कि परमात्मा मानव सदृश शरीर में आकार में है। 

अब तक, संतों ने गलत साधनाएं की, जिनका उल्लेख पवित्र पुस्तकों में नहीं किया गया था और इसलिए वे भगवान के रूप और भव्यता को नहीं देख पाए।

ये शब्द सत्य हैं:

खोजत खोजत थाकिया, अंत कहा बेचून।

लोगों ने भगवान को खोजने के लिए कई अनुष्ठान और अभ्यास किए और थक गए, लेकिन उन्हें खोजने में असमर्थ रहे। जिससे गलत निष्कर्ष निकाल दिया कि भगवान निराकार है; जबकि सच्चाई पूरी तरह से इसके विपरीत है। अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ते हुए, वास्तविकता को जानकर कि परमात्मा साकार है, उसे देखा जा सकता है। आइए अब इस लेख के सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम प्रश्न पर चलते हैं।

प्रश्न 5: इस्लाम के अनुसार अल्लाह / प्रभु कौन है?

उत्तर: "भगवान एक है" इस कथन को हमने बचपन से सुना है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर सभी का एक अलग अलग नज़रिया रहा है। अब समय आ गया है कि अज्ञानता को दूर करें और जानें कि वह परमात्मा वास्तव में एक ही है।

मुसलमानों का अल्लाह, हिंदुओं का राम, ईसाइयों का परमेश्वर और सिखों का वाहेगुरु एक ही है; सभी धर्मों की पवित्र पुस्तकों में उसका नाम स्पष्ट रूप से उल्लिखित है।

कुरान शरीफ
सूरह अल-फुरकान 25:52

आयत 52:- फला तुतिअल् - काफिरन् व जहिद्हुम बिही जिहादन् कबीरा(कबीरन्)।52।

भावार्थ : कुरान ज्ञान दाता हजरत मुहम्मद जी को कह रहा है कि आप काफिरों का कहा मत मानना, क्योंकि वे लोग कबीर को पूर्ण परमात्मा नहीं मानते जिनको हक्का कबीर, सत कबीर, अल्लाह हु अकबर, कबीरन, कबीरा, खबीरा, नामों से भी जाना जाता है। वह हजरत मुहम्मद जी को यह भी कहता है कि कबीर अल्लाह के लिए संघर्ष करना(लड़ना नहीं) अर्थात् अडिग रहना।

हजरत मुहम्मद जी को कबीर परमेश्वर अपने निज धाम सतलोक लेकर गए थे जैसे गरीबदास जी को, संत धर्मदास जी को और गुरु नानक देव जी को लेकर गए थे। जिसका वर्णन सूक्ष्म वेद में इस प्रकार किया गया है :-

हम मुहम्मद को सतलोक ले गया। इच्छा रूप वहाँ नहीं रहयो।
उल्ट मुहम्मद महल पठाया, गुज बीरज एक कलमा लाया।।

भावार्थ : कबीर परमेश्वर बता रहे हैं, कि वह जिंदा संत के रूप में आकर मुहम्मद को सतलोक (जो बहुत खुशहाल व समृद्ध भूमि है, वहां किसी वस्तु का अभाव नहीं है, न वृद्धावस्था है न मृत्यु) ले गए थे। लेकिन, मुहम्मद जी ने इस नाश्वान लोक में मिली प्रशंसा के कारण (यहां की मान बड़ाई के कारण), सतलोक (जो अमर है) में न रहने की इच्छा व्यक्त की। फिर परमेश्वर ने उनको पृथ्वी पर वापस भेज दिया।

कुरान शरीफ
सूरह अल-फुरकान 25:58

आयत 58:- व तवक्कल् अलल् हरिूल्लजी ला यमूतु व सब्बिह् बिहम्दिही व कफा बिही बिजुनूबि अिबादिही खबीरा (कबीरा)।58।

वास्तव में इस आयत संख्या 58 का भावार्थ है कि हजरत मुहम्मद जी को कुरान ज्ञान दाता अल्लाह (प्रभु) ने कहा कि ऐ पैगम्बर उस कबीर परमात्मा पर विश्वास रख जो तुझे जिंदा महात्मा के रूप में आकर मिला था। वक जन्म-मरण में नहीं आता। वह कभी मरने वाला नहीं है अर्थात अविनाशी है। तारीफ के साथ उसकी पाकी(पवित्र महिमा) का गुणगान किए जा, वह अपने बन्दों के गुनाहों से काफी खबरदार है तथा उनके सर्व पापों को विनाश करने वाला है। वह कबीर अल्लाह(कविर्देव) है।

कुरान शरीफ
सूरह अल-फुरकान 25:59

आयत 59:- अल्ल्जी खलकस्समावाति वल्अर्ज व मा बैनहुमा फी सित्तति अय्यामिन् सुम्मस्तवा अलल्अर्शि अर्रह्मानु फस्अल् बिही खबीरन् (कबीरन्)।59।।

भावार्थ : कबीर प्रभु वही है जिसने जमीन तथा आसमान के बीच में जो भी विद्यमान है सर्व सृष्टी की रचना छः दिन में की तथा सातवें दिन ऊपर अपने सत्यलोक में सिंहासन पर विराजमान हो(बैठ) गया। केवल तत्वदर्शी संत(बाखबर) ही सही पूजा की विधि बता सकता है, जिससे उस परमात्मा की प्राप्ति होगी। 

इस प्रकार, इन आयतों ने साबित कर दिया है कि परमात्मा एक है और उसका नाम कबीर है। कुरान ज्ञान दाता भी एक इल्मवाले संत के बारे में कह रहा है जो कि जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के अलावा कोई और नहीं, जो सामाजिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आये हैं।

जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने सभी धर्मों के पवित्र सतग्रंथों के आधार पर वास्तविक व निर्णायक ज्ञान दिया है। उन्होंने ये सिद्ध कर दिया कि परमात्मा साकार है, उसका नाम कबीर है। 

हम उसी सतलोक के वासी हैं जहां किसी वस्तु का अभाव नहीं, सभी चीज़ें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।

इतना ही नहीं, कुरान शरीफ में अल्लाह के गुणों का भी उल्लेख है।

भगवान के गुण 

कुरान शरीफ -  सूरा अल - इख़लास 112: 1 - 4 

112:1 कहो: "वह अल्लाह यकता है,

112:2 अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है,

112:3 न वह जनिता है और न जन्य,

112:4 और न कोई उसका समकक्ष है"

भगवान के गुणो का जो वर्णन कुरान शरीफ में सूरा अल-इख़लास में दिया है, वह कबीर परमात्मा पर पूर्ण रूप से लागू होता है।

निष्कर्ष: अल्लाह वह है जो कभी माँ के गर्भ से जन्म नहीं लेता। वह स्वयंभू है और सर्व शक्तिमान है। ये गुण केवल कबीर परमात्मा में ही विद्यमान हैं क्योंकि उन्होंने माँ के गर्भ से जन्म नहीं लिया। एक नि:संतान दंपत्ति, नीरू और नीमा ने कबीर परमात्मा को लहर तारा तालाब में कमल के फूल पर लेटे हुए पाया था। साथ ही, कबीर परमात्मा सशरीर अपने निज धाम वापस चले गए थे। और उस स्थान पर फूल पाए गए जहां कबीर परमात्मा सतलोक गमन से पहले लेटे थे। इससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि कबीर साहेब ही पूर्ण परमात्मा हैं, जिनको अब तक एक कवि की ही संज्ञा दी गयी थी।

मुसलमान समाज को अब यह समझना चाहिए कि कुरान ज्ञान दाता जिस बाखबर संत के बारे में ज़िक्र कर रहा है वह आज संत रामपाल जी महाराज के रूप में धरती पर हैं। उनके वचन की शक्ति व सतभक्ति ने उजड़े घर बसा दिए। उनकी शरण में आकर अपराधी व्यक्ति भी सुधर गए में बदल दिया है। उन्होंने अपने अनुयायियों को सभी बुराइयों व कुपरम्पराओं से दूर किया है। उसके द्वारा बताई गई भक्ति विधि मोक्ष की गारंटी देती है। भौतिक लाभ तो सतभक्ति के साथ यूँ ही मुफ्त में मिल जाते हैं। वह स्वयं परमात्मा के अलावा और कोई नहीं हो सकता है, जिसने विश्व स्तर पर लोगों को एक प्रमाणित दिशा व भक्ति विधि प्रदान की है। उनके द्वारा दिये गए तत्वज्ञान से हमें सृष्टि रचना से लेकर सतग्रंथों के गूढ़ रहस्यों के बारे में ज्ञान हुआ।

उन सभी से करबद्ध प्रार्थना है जिनको आज मानव शरीर प्राप्त हुआ है;

नगर निवासी सब ही आना, आपस के मतभेद भुलाना।
कोई दिन में सबको चला जाना। ये झूठी जग की आस।।

भावार्थ : प्रत्येक व्यक्ति को उन सभी बाधाओं को त्याग देना चाहिए जो हमें अलग करती हैं, चाहे वह धर्म या जाति हो और याद रखें कि हम सभी एक परमात्मा की संतान हैं। राग द्वेष से छुटकारा पाएं क्योंकि इस नाश्वान लोक में थोड़े ही समय का जीवन है।

अंत में, इन शब्दों के अनुसार कार्य करें;

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में प्रलय होएगी, फेर करोगे कब।।

भावार्थ : अपना एक पल भी बर्बाद न करें और संत रामपाल जी महाराज से नामदान लें क्योंकि मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है। कयामत के दिन को तो भूल ही जाएं, क्योंकि उससे पहले आत्मा के लिए सबसे बड़ी कयामत तो मृत्यु के समय होगी जब मानव जीवन का अनमोल समय पूरी तरह से बर्बाद हो चुका होगा।