पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब (सिक्ख धर्म) में पूर्ण-परमात्मा की जानकारी

सभी आत्माओं के पिता, जिसे हम अविनाशी और सर्वशक्तिमान भगवान के रूप में संबोधित करते हैं, उस परमपिता के बारे में फैले अंधकार को मिटाने के लिए प्रकाश आ चुका है। परम परमेश्वर के बारे में गुप्त जानकारी इस लेख के माध्यम से दर्शाया जा रहा है। वर्णित जानकारी पवित्र पुस्तक, "श्री गुरु ग्रंथ साहिब" (सिक्ख धर्म) से लिया गया है।  यहाँ सिख या सिक्ख धर्म के बारे में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों की सूची दी गई है, जिन्हें आपको अवश्य जानना चाहिए।

  • सिक्ख धर्म क्या है?  (सिक्ख धर्म के बारे में संक्षिप्त इतिहास और जानकारी)।
  • सिक्ख कहाँ पूजा करते हैं?
  • दस सिक्ख गुरुओं की सूची
  • सिक्ख किन ग्रंथों का अनुसरण करते हैं और इनकी उत्पत्ति कैसे हुई?
  • सिक्ख किसे कहते हैं?
  • सिक्खों का भगवान के प्रति दृष्टिकोण
  • सिक्ख धर्म में भगवान के नाम।
  • क्या सिक्ख ईश्वर में विश्वास करते हैं?
  • क्या सिक्ख स्वर्ग या नरक में विश्वास करते हैं?
  • सिक्ख अपने बाल क्यों नहीं कटवाते?
  • सिक्ख धर्म में 'वाहेगुरु' या ईश्वर कौन है?
  • नानक देव जी के गुरु कौन थे?

सिक्ख धर्म क्या है?  (सिक्ख धर्म के बारे में संक्षिप्त इतिहास और जानकारी)

आइए सिक्ख धर्म के इतिहास से जानकारी प्राप्त करते हैं कि आखिर सिक्ख धर्म क्या है।

15 वीं शताब्दी में स्थापित सिक्ख धर्म दुनिया के चार प्रमुख धर्मों में से एक है।  सिक्ख धर्म का मुख्य उद्देश्य लोगों को भगवान के सच्चे नाम (सतनाम) से जोड़ना है।  गुरु नानक जयंती सिक्ख धर्म का सबसे पवित्र त्योहार है और सिक्ख और अन्य हिंदू भक्तों द्वारा पूरे विश्व में मनाया जाता है।  गुरु नानक देव ने 'गुरु' के महत्व का वर्णन किया और कहा कि गुरु के बिना हम सुख और मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते।  सिक्ख धर्म मूर्तिपूजा, जाति प्रथा, कर्मकांड और तप का खंडन करता है।

सिक्ख कहां पूजा करते हैं ?

अब हम इस प्रश्न पर आते हैं कि "सिक्ख पूजा कहाँ करते हैं?"

गुरुद्वारा( हिंदी अर्थ: "गुरु का द्वार" ) सिक्खों का भक्ति स्थल है, जहां एक मंडली की उपस्थिति में सिक्ख / रागी(राग गाने वाले) गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ करते हैं तथा छंदों को समझाते हैं।  सिक्खों में भगवान के अमूर्त रूप की पूजा करने का विधान है। चित्रों या किसी अन्य वस्तु की पूजा करने की सख्त मनाही है।

दस सिक्ख गुरुओं की सूची

सिक्ख धर्म गुरु नानक (ई.स. 1469-1539) द्वारा स्थापित किया गया था और दक्षिण एशिया में सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में उनके नौ उत्तराधिकारियों द्वारा आकार दिया गया था। सभी नौ गुरु विवाहित थे। गुरु हरकिशन देव, जिनकी मृत्यु 8 वर्ष की उम्र में हो गयी थी, के अलावा सभी गुरुओं के बच्चे भी थे।

सिक्ख गुरु एवं उनका कार्यकाल –

  1. गुरु नानक देव जी - (1469 – 1539)
  2. गुरु अंगद देव जी - (1539 – 1552)
  3. गुरु अमर दास साहिब जी - (1552 – 1574)
  4. गुरु राम दास साहिब जी - (1574 – 1581)
  5. गुरु अर्जन देव जी - (1581 – 1606)
  6. गुरु हर गोबिंद साहिब जी - (1606 – 1644)
  7. गुरु हर राय साहिब जी - (1644 – 1661)
  8. गुरु हर कृष्ण साहिब जी - (1661 – 1664)
  9. गुरु तेग बहादुर साहिब जी - (1665 – 1675)
  10. गोबिंद सिंह साहिब जी - (1675 – 1708)
  11. गुरु ग्रंथ साहिब जी - (1708 से वर्तमान तक)

सिक्ख किन ग्रंथों का अनुसरण करते हैं और इनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

सिक्ख का पवित्र ग्रंथ "गुरु ग्रंथ साहिब" है।  ग्रन्थ का अर्थ है, "विशेष एवं बड़ी किताब" और "साहिब" इसकी धार्मिक पदवी को दर्शाता है।  गुरु ग्रंथ साहिब में 3,000 शबद सिक्ख गुरुओं द्वारा अभिलिखित हैं।  पुस्तक को गुरु के रूप में संबोधित किया जाता है, क्योंकि यह एक आधिकारिक आध्यात्मिक मार्गदर्शक है।

 यह सभी सिक्ख आध्यात्मिक विरासतों का भंडार है, जो गुरुओं द्वारा पंजाबी में लिखे गए थे, जिन्होंने तेरहवी शताब्दी के उत्तरार्ध में धर्म के शुरुआती दिनों में सिक्ख धर्म का नेतृत्व किया था।  इसके भजनों को काव्य रूप में लिखा जाता है, जिसे शबद कहा जाता है, और सिक्खों द्वारा उनके जीवन के लिए मार्गदर्शन और प्रेरणा दोनों के स्रोत के रूप में गाया और सुनाया जाता है।

सिक्ख किसे कहते हैं?

सिक्ख शब्द संस्कृत के शब्द 'शिष्य' से लिया गया है, जिसका अर्थ है "जो सीखता है"।  सिक्ख किसी भी समय और किसी भी स्थान पर प्रार्थना कर सकते हैं। और जल्दी उठकर स्नान करके दिन की शुरुआत भगवान के ध्यान से करते हैं।

सिक्खों का भगवान के प्रति दृष्टिकोण

एक सिक्ख का जीवन परमात्मा को याद करते हुए, ईमानदारी से गृहस्थ जीवन जीकर अपनी जीविका अर्जित करते हुए और जरूरतमंदो की मदद करते हुए व्यतीत होता है। उनके लिए उस परमात्मा के नाम का सुमिरन अन्य किसी भी कार्य से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। उनका मानना है कि इससे कई आत्माओं का उत्थान हुआ है और यह अशांत मन की इच्छा को शांत करता है। यह समदृष्टि प्रदान करता है।

सिक्ख धर्म में भगवान के नाम

भगवान के लिए सिक्ख धर्मग्रंथों एवं सिक्खों द्वारा उपयोग किए जाने वाले अभिव्यंजक शब्द / नाम इस प्रकार हैं: "अल्लाह, ठाकुर, प्रभु, स्वामी, शाह, पातशाह, साहिब, साईं"।

क्या सिक्ख ईश्वर में विश्वास करते हैं?

सिक्ख मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के मानव जीवन में एक गुरु होना चाहिए और बाकी सभी से ऊपर एक परमात्मा है।  सिक्ख धर्म की बुनियादी मान्यताओं को पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में व्यक्त किया गया है।  पवित्र ग्रंथ के अनुसार सामान्य दार्शनिक अवधारणाएं जैसे कर्म, धर्म, माया और मुक्ति का पालन किया जाता है। गुरुद्वारा में सामूहिक सिक्ख पूजा का आयोजन किया जाता है।

गुरु ग्रन्थ साहेब, राग आसावरी, महला 1 के कुछ अंश -

साहिब मेरा एको है। एको है भाई एको है।

आपे रूप करे बहु भांती नानक बपुड़ा एव कह।।

(पृ. 350)

जो तिन कीआ सो सचु थीआ, अमृत नाम सतगुरु दीआ।। (पृ. 352)​

गुरु पुरे ते गति मति पाई। (पृ. 353)​

बूडत जगु देखिआ तउ डरि भागे।​

सतिगुरु राखे से बड़ भागे, नानक गुरु की चरणों लागे।। (पृ. 414)

मैं गुरु पूछिआ अपणा साचा बिचारी राम। (पृ. 439)

उपरोक्त वाणी में, गुरु नानक जी स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि साहिब (भगवान) केवल एक हैं, और मेरे गुरु जी ने नाम जाप का उपदेश दिया। उनके अनेक रूप हैं। वो ही सत्यपुरुष हैं, वो जिंदा महात्मा के रूप में भी आते है, वो ही एक बुनकर (धानक) के रूप में बैठे हुए है, एक साधारण व्यक्ति यानी भगत की भूमिका करने भी स्वयं आते हैं।

मैंने देखा कि शास्त्र-विरुद्ध साधना करने की वजह से पूरी दुनिया कर्मफल में बंधी हुई थी और जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसी हुई थी। अपने जीवन के व्यर्थ होने के भय से मैंने गुरु जी के चरणों में शरण ली।

सिक्ख धर्म पूरी तरह से एकेश्वरवादी है अर्थात केवल एक ईश्वर के अस्तित्व को मानते हैं।  गुरु नानक ने एकेश्वरवाद के विचार पर जोर देने के लिए ओंकार शब्द के पहले "इक"(ੴ) का उपसर्ग दिया।

इक ओंकार सत-नाम करत पुरख निरभउ,

निरवैर अकाल मूरत अंजुनि सिभन गुर प्रसाद।

यहां केवल एक ही परम पुरुष है, शास्वत सच, हमारा रचनहार, भय और दोष से रहित, अविनाशी, अजन्मा, स्वयंभू परमात्मा। जिसकी जानकारी कृपापात्र भगत को पूर्ण गुरु से प्राप्त होती है।

एकेश्वरवाद की उनकी सामान्य मान्यता के अनुसार;  सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, और संहारकर्ता एक ही है।  वे एक ही परमात्मा के नाम का ध्यान करते हैं और निस्वार्थ सेवा में मग्न रहते हैं। गुरु नानक देव का अनुसरण करते हुए हर सिक्ख पगड़ी पहनता है। सिक्ख अपनी पगड़ी को सिक्ख होने की पहचान के रूप में संरक्षित करता है।

क्या सिक्ख स्वर्ग या नरक में विश्वास करते हैं?

सिक्ख स्वर्ग या नरक को अंतिम लक्ष्य नहीं मानते। सिक्खों के अनुसार, सभी की भलाई और समृद्धि के लिए भेदभाव रहित विधि से कार्य करके और पूर्ण आध्यात्मिक गुरु से दीक्षा लेकर यहीं स्वर्ग का अनुभव किया जा सकता है।  जबकि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के कारण होने वाले कष्ट और पीड़ा को पृथ्वी पर नरक माना जाता है। सिक्ख धर्म के अनुसार, जीवन का मुख्य उद्देश्य परमात्मा के साथ एक हो जाना है।  धार्मिक कार्य, ईमानदार आचरण, संपूर्ण मानव जाति की समानता और पूर्ण सत्य के साथ आजीविका सिक्खों के जीवन के सकारात्मक अनुभव हैं।

सिक्ख अपने बाल क्यों नहीं कटवाते?

बाल कटाना 'अमृतधारी' या 'खालसा सिखों' के लिए या उन लोगों के लिए मना है जिन्होंने संचार (10 अप्रैल - 10 मई) के दौरान एक समारोह में अमृत दीक्षा ली है। उनके लिए बाल कटाना निषेध है। हालाँकि संत रामपाल जी द्वारा दिए गए ज्ञान के अनुसार, आध्यात्मिकता या परमात्माप्राप्ति का 'बालों को  रखने या ना रखने' से कोई संबंध नहीं है। अतः किसी के लिए लंबे बाल रखना अनिवार्य नहीं है।  इसी तरह कोई फर्क नहीं पड़ता है अगर कोई लंबे बाल रखता है।

सिक्ख धर्म में 'वाहेगुरु' या ईश्वर कौन है?

गुरु नानक देव, सिख धर्म के संस्थापक ने हमें गुरु ग्रंथ साहेब में कई संकेत दिए हैं कि हम केवल  सद्गुरु / तत्त्वदर्शी गुरु की शरण में जाने से ही मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।  सद्गुरु मानव जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।  विभिन्न मूल भाषाओं में भगवान का वास्तविक नाम कविर्देव (वेदों में संस्कृत भाषा में), हक्का कबीर (पृष्ठ संख्या 721 पर गुरु ग्रंथ साहिब में पंजाबी भाषा में) है।

गुरु नानक जी की वाणी है कि,

सोई गुरु पूरा कहावे, दो अक्खर का भेद बतावे।

एक छड़ावै एक लखावै , तो प्राणी निज घर को पावै।।

"वाहेगुरु" सिक्ख परंपरा में भगवान का विशिष्ट नाम  है।  इसका अर्थ हिंदी भाषा में "अद्भुत गुरु" है।

नानक देव जी के गुरु कौन थे?

नीचे लिखे पवित्र वाणी में, श्री नानक जी स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि साहिब (परमपिता परमात्मा) केवल एक हैं, और मेरे गुरु जी ने मुझे नाम मंत्र का उपदेश दिया। उनके अनेक रूप हैं। वो ही सत्यपुरुष हैं, वो जिंदा महात्मा के रूप में भी आते है, वो ही एक बुनकर (धानक) के रूप में बैठे हुए है, एक साधारण व्यक्ति यानी भगत की भूमिका करने भी स्वयं आते हैं।

मैंने देखा कि शास्त्र-विरुद्ध साधना करने की वजह से पूरी दुनिया कर्मफल में बंधी हुई है और जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसी हुई है। अपने जीवन के व्यर्थ होने के भय से मैंने गुरु जी के चरणों में शरण ली।

गुरु ग्रन्थ साहिब में, राग ‘सीरी’ महला पहला, पृष्ठ न. 24, शब्द- 29 :

एक सुआन दुई सुआनी नाल, भलके भौंकही सदा बिआल।

कुड़ छुरा मुठा मुरदार, धाणक रूप रहा करतार।।1।।

मै पति की पंदि न करनी की कार।

 उह बिगड़ै रूप रहा बिकराल।।

तेरा एक नाम तारे संसार, मैं ऐहो आस एहो आधार।

मुख निंदा आखा दिन रात, पर घर जोही नीच मनाति।।

काम क्रोध तन वसह चंडाल, धाणक रूप रहा करतार।।2।।

फाही सुरत मलूकी वेस, उह ठगवाड़ा ठगी देस।।

खरा सिआणां बहुता भार, धाणक रूप रहा करतार।।3।।

मैं कीता न जाता हरामखोर, उह किआ मुह देसा दुष्ट चोर।

नानक नीच कह बिचार, धाणक रूप रहा करतार।।4।।

कबीर परमेश्वर ने सृष्टि रचना (ब्रह्मांड की रचना) का ज्ञान दिया और कहा कि मैं ही पूर्ण परमात्मा हूं, मेरा स्थान "सचखंड"(सत्यलोक) में है।  तुम मेरी आत्मा हो।  काल (ब्रह्म) सभी आत्माओं को झूठे ज्ञान से भ्रमित करके विचलित रखता है और सभी प्राणियों को कई प्रकार के शारीरिक कष्टों से परेशान करता है।

■ पूर्ण परमात्मा कबीर

नानक देव जी के गुरु कबीर परमेश्वर ने फिर कहा, मैं आपको सतनाम (सत्यनाम / वास्तविक मंत्र का जाप) दूंगा जिसे काल (ब्रह्म) ने गुप्त रखा है और किसी भी शास्त्र में नहीं है।

एहु जीउ बहुते जनम भरमिया, ता सतिगुरु शबद सुणाइआ।(पृष्ठ 465)

फाही सुरत मलूकी वेस, उह ठगवाड़ा ठगी देस।।

खरा सिआणां बहुता भार, धाणक रूप रहा करतार।।3।। (पृष्ठ 24)

■ बाबा नानक

ने पूर्ण गुरु द्वारा दिए गए "वास्तविक मंत्र" पर यहाँ जोर दिया है, जिन्होंने उन्हें (नानक जी को) सच्चा मंत्र दिया और यह बताया कि यह आत्मा (जीवात्मा) लंबे समय तक जन्म और मृत्यु के चक्र में भटकती रही है।

नानक देव जी का सतलोक भ्रमण

श्री नानक जी ने कबीर साहिब से सचखंड और परमेश्वर (अकाल पुरुष) को दिखाने करने का अनुरोध किया।  फिर, कबीर साहिब श्री नानक जी की आत्मा को सतलोक ले के गए गए।  सतलोक में, श्री नानक जी ने देखा कि पूर्ण परमेश्वर कबीर साहिब (कविर्देव) अपने वास्तविक रूप में बैठे हैं।

 “हक्का कबीर करीम तू, बेऐब  परवरदिगार

 नानक बुगोयद जान तूरा, तेरे चाकरां पाख़ाक।”

नानक जी ने  एक असीम तेजोमय मानव सदृश ईश्वर (जो सिंहासन पर बैठा था) के दर्शन किये; जिनके एक रोमकूप में, करोड़ सूर्यों और करोड़ चंद्रमाओं के संयुक्त प्रकाश से अधिक चमक है (लेकिन कोई गर्मी नहीं है)।  स्वयं के एक और रूप (वास्तविक तेजोमय रूप) पर, कबीर साहेब एक विनम्र सेवक की तरह चंवर करने लगे।

तब श्री नानक जी ने सोचा कि यह परमेश्वर है जो सिंहासन पर बैठा है;  कबीर यहाँ एक सेवक होंगे; परमेश्वर बहुत भव्य एवं दर्शनीय हैं। जब नानकजी यह सब सोच रहे थे, उसी समय भगवान का भव्य रूप खड़ा हो गया और कविर्देव सिंहासन पर बैठ गए।  तब, भगवान के वास्तविक भव्य रूप ने कबीर साहिब पर चंवर करना शुरू कर दिया।  इसके बाद, कबीर साहिब का भव्य रूप उनके कबीर वाले रूप में समा गया।

और केवल, पूर्ण परमेश्वर कविर्देव सिंहासन पर रह गए;  और चंवर अपने आप ही डोलने लगे।  तब नानक जी को विश्वास हुआ कि ये तो पूर्ण परमेश्वर हैं।  इस प्रक्रिया में तीन दिन लगे।  साहिब कबीर जी ने नानक जी की आत्मा को शरीर में वापस छोड़ दिया।  तीसरे दिन श्री नानक जी होश में आए।  कबीर साहेब को सतलोक में भगवान के रूप में देखने के बाद, श्री नानक जी के मुख से "वाहेगुरु" शब्द निकला।

 "झांकी देख कबीर की नानक किती वाह,

वाह सिक्खां दे गल पड़ी कौन छुड़ावै ता।"

'वाहेगुरु' एक शब्द है जिसे अक्सर सिक्ख धर्म में ईश्वर, परम पुरुष या सभी के निर्माता के  संदर्भ में प्रयोग किया जाता है।

कबीर साहेब की वाणी है,

 गुरु गोविंद दोनों खड़े, किसके लागूं पाय,

बलिहारी गुरु आपना जिन गोविंद दियो मिलाय।