Satguru-is-the-Sole-Well-wisher-of-Averse-Souls-Hindi-Photo

सत साहिब, सतगुरु देव की जय! 
बंदी छोड़ कबीर साहिब जी की जय! 
बंदी छोड़ गरीब दास जी महाराज जी की जय!
स्वामी राम देवानंद जी गुरु महाराज जी की जय हो! 
बंदी छोड़ संत रामपाल जी महाराज जी की जय!
सर्व संतों की जय! 
सर्व भक्तों की जय!
धर्मी पुरुषों की जय! खोज करने लगा।;
श्री काशी धाम की जय! श्री छुडानी धाम की जय! 
श्री करोंथा धाम की जय!
श्री बरवाला धाम की जय! 

सत साहिब

कबीर दंडवत गोविंद गुरु बंधु अजन सोए, 
पहले बहे प्रणाम तन नमो जो आगे।
सतगुरु पूर्ण ब्रह्म सतगुरु आप अलेख।
सतगुरु रमता राम है या में मीन ना मेख। 

बच्चों, परम पिता परमात्मा कबीर जी की असीम रज़ा से आज आपके ऊपर उस मूल ज्ञान की वर्षा हो रही है जिसकी प्यास आत्मा को युगों-युगों से थी। बच्चों, इस गंदे लोक को समझो अच्छी तरह। जब तक आपके दिल में यह बात नहीं बैठेगी कि मैं कहाँ फँस गया, कि यह घर अपना नहीं, यह परिवार अपना नहीं, यह लोक-संसार या ब्रह्मांड अपना नहीं, तो हम किस आस पर जी रहे हैं? केवल अपना सत पुरुष है, उसका नाम कबीर है। सारी सृष्टि का रचनहार है, वह सुख का सागर है, हमारा अपना है, हमारा पिता है, हमारी माँ है, हमारा सच्चा साथी-सखा है, हमारा वही बंधु-भाई है। 

बच्चों, आप इस बात को आज मान लो, न तो फिर घने दुखी हो जाओगे, फिर माननी पड़ेगी कि यह भक्ति करनी पड़ेगी और बकवास त्यागनी पड़ेगी। आज शरीर स्वस्थ है, दो रोटी का रोजगार चंगा है, परमात्मा कति याद नहीं आवे। सौ जतन कर ले इसको कितना समझा ले, माचा-माचा फिर कल यह कर दूंगा, परसों यह कर दूंगा। और उसको जब हो जाती है कैंसर, उसकी शक्ल देखे उस अफलातून की, गिनती के दिन शेष दिखाई देते उसको। इसलिए परमात्मा कबीर जी हमें याद दिलाते हैं—

कबीर, दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय।
जे सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।।
कबीर, सुख में सुमिरन किया नहीं, दुख में करते याद।
कहै कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद।।

आज जो सुखी है, थोड़ा-मोटा कोई पद-पोस्ट मिली हुई है, छोटी-मोटी घर में दो पैसे का जुगाड़ ठीक है, कार-कोठी है, उनके तो नखरे न्यारे हैं।  उनकी बातों में सुनकर हैरान रह जाते थे हम तो। जब हमको ज्ञान नहीं था, हम भी ऐसे निकम्मे थे। इस अध्यात्म ज्ञान ने तोड़ दिया इस मन की बकवास, इस अहंकार को फोड़ दिया कति और यह सतगुरु बिना बात बनी नहीं। सतगुरु ऐसा ज्ञान सुनाता है कि आत्मा एकदम सतर्क हो जाती है और परमात्मा की तरफ बनती है।

एक नितानंद नाम के ब्राह्मण थे, नंदलाल नाम था उनका। वह नारनौल के नवाब के यहाँ तहसीलदार की पोस्ट पर थे आज से 300 वर्ष पहले।  उनके मात-पिता की डेथ हो गई थी, नाना-नानी ने उनको पाला, जवान किया, वहाँ नौकरी लगवा दी। उनके नाना जी उस दरबार में पहले से ही नौकरी करते थे।  एक तो जाति ब्राह्मण, ऊपर से पोस्ट तहसीलदार! उस समय तो पटवारी भी भारी होता था। उनको फिर ज्ञान समझ में आया।  एक विष्णु जी के उपासक, वैष्णव परंपरा के संत गुमानी दास नारनौल शहर में किसी भगत के—अपने सेवक के यहाँ—सत्संग करने आए।  उनके साथ में ही नंदलाल तहसीलदार का मकान था। रात के समय सुहाना मौसम था, चांदनी रात थी, न गर्मी थी न सर्दी थी। छत पर बैठ गया, घूम रहा था।

इतने में आवाज आई सत्संग की, और जो संत बोल रहा था, एक-एक बात—रात के समय साइलेंट होता है सब कुछ—सारी सुनने लगा उसको।  तो नंदलाल तहसीलदार जी को भगवान की तड़प बनी, क्योंकि उसको चोट बहुत लग चुकी थी। बचपन से मात-पिता की डेथ हो गई, अनाथ हो गया था।  तो ऐसे दुख से गुजरे हुए व्यक्ति को शीघ्र समझ में आ जाती हैं ये बातें। उसको तड़प बनी कि यह संसार कुछ नहीं।  आपको सत्संग के कुछ अंश सुनाता हूँ पहले। यह संत जो हैं, वाणी तो कबीर साहिब की गाते हैं और मार्ग काल का बताते हैं।  वाणी ऐसी गजब की है, खींच लेती है आत्मा को—जैसे चुंबक लोहे को खींचता है। लेकिन यह कलम गलत चढ़ाते हैं, इनके पास वह संपूर्ण दीक्षा नहीं।  बात यहाँ बिगड़ी, काल ने पूरा लाभ उठा रखा मालिक की अट्रैक्टिव वाणी का—

मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रत्नागर।
कोटि जनम तने भ्रमत हो गए, कुछ नहीं हाथ लाग्या रे।
कूकर शूकर खर भया बोरे, कौवा हंस बुगा रे।
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रत्नागर।
कोटि जनम तू राजा कीन्हा, मिटी न मन की आसा।
भिक्षुक होकर दर-दर हांड्या, फिर मिला न निर्गुन रासा।
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रत्नागर।
इंद्र कुबेर ईश की पदवी, ब्रह्मा, वरुण, धर्मराया।
विष्णु नाथ के पुर को जाके, फिर भी उलटा आया।
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रत्नागर।
असंख जनम तने मरता हो गए, जीवित क्यों न मरा रे।
असंख जनम तोहे मरता हो गए, जीवित क्यों न मरा रे।
द्वादश दार मद महल मठ बोरे, बहुर ना देह धरा रे।
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रत्नागर।
दोजख भिस्त सभी ते देखे, राजपाट के रसिया।
तीन लोक से तिरपति नाहीं, यू मन भोगी खसिया।
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रत्नागर।
सतगुरु मिले तो इच्छा मेटे, पद मिल पड़े समाना।
सतगुरु मिले तो इच्छा मेटे, पद मिल पड़े समाना।
चल हंसा उस लोक पठाऊँ, जो आदि अमर अस्थाना।
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रत्नागर।
चार मुक्ति जहाँ चम्पी करती, माया हो रही दासी।
चार मुक्ति जहाँ चम्पी करती, माया हो रही दासी।
दास गरीब अभय पद परसे, मिले राम अविनाशी।।
मन तू चल रे सुख के सागर, जहाँ शब्द सिंधु रत्नागर।

सत्संग में बताया गया कि कोटि जन्म तने भ्रमत हो गए जन्म से मृत्यु तक, और कुछ नहीं हाथ लगा रे।  कुकर (कुत्ता), शूकर (सुअर), खर (गधा), कौवा और बगुला —यह सभी यानी 84 लाख प्रकार के प्राणियों की योनि/शरीर में तुमने दुख उठाए।  इस संसार में सुख नाम की चीज़ जीव को नहीं है। कोटि जन्म तने भ्रमत हो गए, कुछ नहीं हाथ लगा रे। 

आज सेठ है, सारा कुछ धन है, कार-कोठी है, और समय आ गया जाने का—एक सेकंड भी न लगने दें।  तुरंत उठाकर यम के दूत पटक देंगे धर्मराज के आगे। अबकी हाथ लग गया सारा जीवन खो दिया कति, कर्म बिगाड़ लिए, पल्ला झाड़ के जा खड़ा निरभाग। यह सपना टूटते ही सारी बात समझ में आ जाती है। सारा स्वप्न था—न कोई बेटा अपना था, न कोई बेटी अपनी थी, न यह कार-कोठी अपनी थी। अपना जो काम था, वह तो स्टार्ट भी नहीं किया मूर्ख ने! बच्चों, वहाँ बहुत बार रो लिए हम जा-जाकर।
 
जब भी मनुष्य जीवन मिला, हम वायदा करके आते थे भगवान से: "हे परमात्मा! इब दया कर दो। मनुष्य जीवन में कभी गलती नहीं करूंगा/करूंगी, भक्ति करेंगे, मालिक को याद रखेंगे।  रोटी के लिए काम भी करेंगे, तेरी भूल नहीं होगी दाता।" कति कसम खाते, वचन भर के, कान पकड़ के, नाक रगड़ के आते वहाँ से प्राण।

और यहाँ आते ही यह काल इनको ऐसा अचेत कर देता है, नए सिरे से सिखाना पड़ता है—यह बेटा, यह चाचा, यह काका, यह ताऊ, यह गिलास, यह चमचा, यह थाली, यह कटोरा।   यह ए-बी-सी-डी पढ़नी पड़ती है कति! सारा भुला देता है, इतना जुल्म कर रखा हमारे साथ।   इस अज्ञान को आके सतगुरु कबीर भगवान सतगुरु रूप में आते हैं, वह इस अंधेरे को अपने वचनों के माध्यम से हटाते हैं। अब बच्चों—

मन नेकी कर ले दो दिन का मेहमान…
 मन नेकी कर ले दो दिन का मेहमान। 

परमात्मा हमारे सामने खड़े होकर रोया करते कि "किसी तरह तो समझ लो तुम!"   यह शब्द इसलिए सुनाया करते कि इस आवाज—प्यारी आवाज दाता की—खींच ले पशु-पक्षियों को भी! और इस वाणी में कसक थी। बच्चों, परमात्मा कहीं भी खड़े हो जाते थे किसी गाँव-नगर में जाकर, और उनको वाणी सुनाते थे। क्योंकि कान का विषय भी हमारे अंदर है विकार, तो मीठी वाणी सुनकर तकरीबन लोग इधर-उधर से खिंच के आसपास बैठ जाते हैं आकर। जैसे कोई जाके तुतली बजाने लग जाए, ऐसे ही वहाँ भी लोग इकट्ठे हो जाते हैं। फिर परमात्मा उनको समझाते थे।
  
इस काल के जाल में फँसे, इस नकली सुख को सुख मानकर अंधे हुए बैठे प्राणियों को समझाते थे। क्योंकि यह अपने पिता हैं, और यह रह नहीं सकते हमारे को राह बताए बिना। तो क्या सुनाते थे?—


कहाँ से आया, कहाँ जाएगा। तन छूटे तब कहाँ समाएगा।।
आखिर तुझको कौन कहेगा, गुरु बिन आत्मज्ञान।।
मन नेकी कर ले दो दिन का मेहमान...


  
बच्चों, परमात्मा याद दिला रहे हैं तुम्हें। सतगुरु के बिना, गुरु के बिना यह आत्मज्ञान कौन कराएगा?  आत्मज्ञान क्या है? तू कौन है? कहाँ से तू आया? किसलिए जन्म और मर रहा है? इसका समाधान क्या है? यह है आत्मज्ञान। आत्मज्ञान तो सारे गुरु बताते हैं, नकली-सकली सब: "भाई, नहीं करोगे तो पशु-पक्षी बन जाओगे। मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से मिलता है।"
 
यह सारा कुछ परमात्मा का बताया ज्ञान बताकर आखिर में काल के खूँटे बाँध देते हैं—यह उपासना करो जो शास्त्रविरुद्ध, बात यहाँ बिगड़ी पड़ी थी। तो बच्चों, फिर कहते: यह तो आत्मज्ञान हो गया। कबीर सतगुरु बताता है आत्मज्ञान—तुम सतलोक में रहते थे, वहाँ किसी चीज़ का कष्ट नहीं था। कोई दुख नहीं, कोई रोग नहीं, कोई शोक नहीं, कोई जन्म नहीं, कोई मृत्यु नहीं, सदा सुखी। यही सृष्टि ऐसी की ऐसी ऐज़-इट-इज़ है। ऐसे गाँव बसे हैं, ऐसे बाजार लगे हैं, बाग-बगीचे कदम-कदम पर सुंदर तरीके से लगे हुए हैं एक पंक्ति के अंदर गजब के! और उसको छोड़कर तुम इस काल के जाल में फँस गए। 

अब यह तो तुम्हें मूर्ख बनाए बैठा है, उस घर की कति खबर मिटा दी, नाम और निशान खत्म कर दिया।  आत्मज्ञान यह है कि तुम यह कष्ट उठा रहे हो जन्म-मृत्यु के, इसका समाधान है कि पूरा सतगुरु हो, उससे दीक्षा लो, डट के भक्ति करो, मर्यादा का पालन करो—यह तो है आत्मज्ञान।  परमात्मा ज्ञान क्या है? परमात्मा कौन है? यह श्री कृष्ण जी को भगवान बताते हैं, विष्णु और को भगवान बताते हैं, इनका परमात्मा ज्ञान खाक है! परमात्मा ज्ञान है ही नहीं।  फिर गरीबदास जी कहते हैं—

कूप की छाया कूप के माहीं, ऐसा आत्मज्ञाना।
या से परे परम पद, वाका भेद न जाना॥

आत्मज्ञान तो ऐसा है जैसे कुएँ की छाँव कुएँ तक है, बाहर उसका कोई यूज़ नहीं।  इसका मतलब है कि जिस ज्ञान पर ये आत्मज्ञान बताते हैं, परमात्मा पहचानते नहीं, वह तो इस काल के कुएँ के अंदर ही गिरे रहेंगे, यही कष्ट उठाएंगे।  यह साधना गलत बताते हैं, उनकी पोल खोल रखी है 'बहदे के अंग' में।

बच्चों, फिर बताया जाता है कि कोटि जन्म तने भ्रमत हो गए। परमात्मा जगह-जगह खड़े होकर आया करते थे हमारे लिए, और कुछ आकर्षित भी होते थे। कोयल के बच्चे तो लाग ही जाते हैं, वह डटते ही नहीं, उनको तुरंत प्रभाव हो जाता है—"सचमुच भक्ति करनी चाहिए।" इस प्रकार मालिक के 64 लाख शिष्य हो गए थे 600 साल पहले। इस ज्ञान को तो सिर्फ इतना सुनते थे कि सचमुच जो कह रहे हैं बात सच्ची है, मर जाएंगे।

यह वाणी ऐसी है, सीधी फोड़ देती है आत्मा के महल को। फिर सुख होने शुरू हो जाते थे दाता का नाम लेते ही। इसलिए चिपकते चले गए। दाता भी चाहते थे—परमात्मा भी—कि इनके अपनी कलम चढ़ा दें एक बार बस। इनको पार तो होना नहीं। कलम चढ़ा गए दाता उस समय 64 लाख के वह... 64 लाख ने कुछ भक्ति करी उन्होंने बहुत अच्छी, परमात्मा काफी संग रहे। फिर जब देखा कि अब इनको ज्ञान नहीं है, और ज्ञान बिना मुक्ति हो नहीं सकती, जब तक पूरा ज्ञान नहीं होगा यह डट नहीं सकते। दो काम हो जाते हैं, तीसरा नहीं होता है। तो फिर वह झाड़े लैन चले जाते। यह स्थिति हो गई थी वहाँ, तो एक झटका दिया था, परीक्षा ली थी—सारे विमुख हो गए!

जब परमात्मा ने हाथी पर बैठकर, गंगाजल बोतल में भरकर (जैसे शराबी शराब पिया करे), एक वैसा प्रसिद्ध वैश्या जो परमात्मा की शिष्या हो चुकी थी और अपने धर्म-कर्म को ठीक कर लिया था— लेकिन उस समय भी उसको वैश्या की छाप ही थी समाज की दृष्टि से। उस लड़की को हाथी पर बैठाकर, उसके कंधे पर हाथ धर के भगवान, और वह पानी/गंगाजल पी रहे थे। उस हाथी को बाजार के बीचों-बीच घुमा दिया!  जो भी देखे—"ओह देख लो भाई! बड़ी-बड़ी बातें बनाया करता कबीर, और वैश्या को साथ लेकर घूम रहा है!"  उनके शिष्यों को बुला-बुला के देखो: "हम तो पहले कहा करते, पाखंडी आदमी है, अपनी आँखों देख लो, अय्याशी करता घूम रहा है, शराबी कबीर है यह!"  जो भी देखे वह कहे: "मैं तो कभी-कभी जाया करता, मैं तो जाना छोड़ रखा, मैं उसके साथ चला गया था..."   ऐसे 64 लाख भगवान से विमुख हो गए। सतगुरु भी यही चाहते थे कि यह बोझ उनके सिर से पड़े। वे अभी इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं।

गरीब, भड़वा-भड़वा सब कहें, कोई न जाने खोज।
दास गरीब कबीर कर्म, बांटत सिर का बोझ।।

कि उस लीला को कोई नहीं समझ रहा था। वह तो अपने सर का बोझ— पूरी आस्था थी नहीं उन शिष्यों की, इसलिए इनको पटक रहे हैं। बच्चों, गुरुद्रोही नहीं बने तुम उस समय, सतगुरु विमुख हो गए। तो कबीर साहब कहते हैं—

सतगुरु विमुखा युग-युग रोवे।
मानुष जनम पाकर खोवे।
सतगुरु संगत छोड़कर, लाख वर्ष जप कीन।
इन्द्री करम ना मोक्ष हो, रहे काल के आधीन।।

इसके लिए बहुत से प्रमाण आपको दिए गए हैं। जैसे राबिया सतगुरु विमुख हुई थी, गुरुद्रोही नहीं हुई थी। चार साल दाता ने कितनी मेहनत करके उस बेटी के लिए, आत्मा के... उनकी भेड़-बकरियों के बीच में बैठकर, उस बदबू में, उस प्यारी आत्मा जो दलदल में फँसी पड़ी थी। राबिया को ज्ञान सुनाया: "बेटी, अल्लाह-खुदा की भक्ति करनी चाहिए। यह जीवन थोड़ा ही है, इसमें कभी मृत्यु हो जाएगी, फिर पता नहीं कहाँ जन्म होगा।"


कई दिन लगातार यह बात करते-करते लड़की कहती थी कि "महाराज, हम इबादत करते हैं, नमाज़ करते हैं, सारा कुछ करते हैं।"

उसका सारा अंधेरा हटाया लड़की का, समझ में आ गई। सृष्टि-रचना बताई, चार साल भक्ति करी। और कोई साथी था नहीं दूसरा भक्त भाई-बहन इस मार्ग के बताने वाला। समाज के प्रभाव से परमात्मा वाली सत-साधना छोड़ दी। क्योंकि सत्संग न सुनने से इस तरह मैल आवेगा, यह भूल जरूर पड़ जाती है। क्योंकि गलत बताने वाले तो सारा समाज, सारा वही साधना सब कर रहे थे, तो वही अपनी साधना करने लगे। लेकिन प्रेरणा इतनी हो गई थी: "शादी नहीं कराऊँगी, मोक्ष पाऊँगी," सारा कुछ हो गया था। लेकिन मात-पिता को टेंशन हो गई कि लड़की को घर पर नहीं रख सकते। तो कह दिया: "बेटी, या तो निकाह करा ले, नहीं तो हम दोनों मरेंगे।"

लड़की ने विचार कर लिया कि माता-पिता की हत्या का दोष मुझे लगेगा, इसलिए 'यस' कर देती हूँ, अपने पति से बात करूंगी निकाह करने की (यानी शादी की)।  हाँ भर ली और ब्याह हो गया, अपने पति के घर चली गई। वह एक अच्छा इंसान था, शरीफ था, नेक आत्मा था। राबिया ने स्पष्ट कर दिया: "बात सुनो मेरी, मैं भक्ति करना चाहती हूँ और मैं संतानोत्पत्ति नहीं करूंगी। अगर आपने जबरदस्ती की तो मैं फांसी खाकर मरूंगी, यह फाइनल है।" उसके पति ने कहा कि "एक बात बताना राबिया, जब निकाह हुआ आपने स्वयं कबूल किया था कि 'मैं निकाह कबूल करती हूँ'। मुसलमानों के अंदर एक विशेष बात है कि लड़का-लड़की चाहेंगे तो ब्याह होगा, नहीं तो नहीं। तेने उस समय कबूल क्यों किया था?"

राबिया बोली: "मेरी मजबूरी थी, समाज का दबाव था मेरे मात-पिता पर। मेरे मात-पिता ने शर्त रखी थी कि 'शादी करा ले, नहीं तो हम दोनों मरेंगे'। तो इसलिए मैंने शादी कर ली। अब आप पर फैसला है, वहाँ तो दो मरते, यहाँ एक मरूंगी। मैं भक्ति करूंगी, यह मेरा फाइनल फैसला है।"  तो समझदार था। मुसलमान कई-कई शादी कर लेते हैं, उसको इसकी कोई समस्या नहीं थी। परमात्मा की दया से गुजारा भी खूब था।

वह बोला: "राबिया, बात सुन ले। जैसा समाज का दबाव तेरे ऊपर था, तेरे मात-पिता पर, ऐसा समाज मेरा भी है। और यहाँ मुझे भी जवाब देना भारी हो जाएगा अगर तू इधर-उधर जावेगी। जाइये भक्ति के लिए, इसलिए घर में रहेगी। मेरी तरफ से मेरी बहन होगी, संसार की दृष्टि में मेरी पत्नी बनके रहना होगा।" राबिया ने कबूल कर लिया, 'यस' कर दी उसने अपने, और विवाह करा लिया। जब वह हो गई 50 साल के ऊपर, हज करने चली। उसके पति ने कहा: "आपके लिए मैं गाड़ी-घोड़ा-ऊँट तैयार करवा देता हूँ, अरे जाओ, बहुत खुशी की बात है, मुझे पुण्य मिलेगा आपके सहयोग में।"
 
वह कहने लगी: "मैं पैदल जाऊंगी।" यानी भावना अलग होती है भगत की, या धार्मिकता रंगी हुई होती है पिछले जन्मों की। वह चल पड़ी, पैदल चल पड़ी। रेगिस्तान ज्यादा होते थे, उस समय सभी जगह सूखे पड़ते थे मक्का में। चली मक्का के राह पर, काफी सफर तय करने के बाद एक कुआँ आया। उस कुएँ पर न बाल्टी थी न कोई रस्सी थी। वह लगता था उसमें गिर गई थी। उधर एक कुतिया बहुत प्यासी थी, प्राण जाने को हो रहे थे उसके। राबिया को समझते देर नहीं लगी। वह कभी राबिया के पैरों में आवे, कभी कुएँ की तरफ जावे, बहुत बुरा हाल था उसका। उसके छोटे-छोटे बच्चे भी थोड़ी सी दूरी पर तड़प रहे थे। उस पुण्यात्मा में धार्मिकता भर दी थी दाता ने।

उसने अपने सिर के बाल उखाड़े, उसकी रस्सी बाटी—पांच-पांच, चार-चार बाल लेकर और लंबी रस्सी गांठ लगा-लगाकर बनाकर। अपने कपड़े उतार के, उस रस्सी के कपड़े बाँध दिए। पहले मोटे-मोटे कपड़े होते थे सूत के, और वह बहुत पानी सोख लेते थे। कुएँ में बाल्टी की तरह डाले, बाहर लाकर उनको निचोड़ा। एक मटके का टेकरा सा पड़ा था टुकड़ा फूटा हुआ, उसमें पानी भरती गई। कुतिया पी गई दो किलो पक्का पानी, और पीकर चली गई।


अब उसने अपने कपड़ों से—गीले कपड़ों से—सिर का ब्लड साफ किया और झाड़-झूड़ के कपड़े (गर्मी के दिन थे, ठीक सा मौसम था) वह कपड़े निचोड़कर पहन लिए, और सफर पर चलने को तैयार हुई।

इतने में वह मक्का मकान उठ गया! वह महल, मंदिर, वह काबा उठ गया और कुएँ के साथ आकर लग गया, जैसे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन आकर लगती है! राबिया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं कि मक्का आ गया! "मैं तो मक्का ही जाना था!" पट से चढ़ गई। उसके बैठते ही उठ लिया, चढ़ते ही उठ लिया, उड़कर चल पड़ा। उधर से अब्राहिम सुल्तान आदम (पहले किसी और जन्म में था), जैसे परमात्मा गरीबदास जी कहते हैं—

वाहन गरुड़ कृष्ण असवारा, लक्ष्मी ढोरें चंवर अपारा।

असुर निकंदन रमैणी में, अब गरीबदास जी को कृष्ण-विष्णु दिखाई देता है, और कृष्ण को ज्यादा लोग मानते हैं। इसी प्रकार उस समय जो अब वर्तमान में वाणी बोली गई, अब्राहिम सुल्तान को अधिक जानते हैं, इसलिए सुल्तान अधम का जिक्र किया, जबकि पहले यह किसी और शरीर में था—राबिया के समकालीन था। सब कहने लगे: "भाई! मक्का कहाँ गया? मक्का कहाँ गया? मंदिर कहाँ गया?" अब्राहिम सुल्तान भी वहाँ जाता रहता था, मुसलमान भाइयों को समझाना चाहता था गुरुदेव के आदेश से, अपनी सच्ची राह बताया करता, क्योंकि वहाँ धार्मिक लोग ही जाते हैं। वहाँ चर्चा चली कि मक्का कहाँ गया, मक्का कहाँ गया। सबको आश्चर्य हुआ। अब्राहिम सुल्तान जो पहले किसी और शरीर में था, गरीबदास जी की वाणी में है कि—

सुल्तान अधम मक्के गया, मक्का नहीं मुकाम।
गया राँड को लेन को, यों कहै अधम सुल्तान।।

सुल्तान अब्राहिम सुल्तान अदम कहता है: "एक निकम्मी औरत को लेने गया। वह पहले सतगुरु शरण में आई थी, वह साधना छोड़कर अब यह वही ढोंग रच रही है।" उपस्थित मुसलमानों को उसकी बात अच्छी नहीं लगी, दुख भी हुआ। लेकिन मुसलमान था, इसलिए आगे बात बढ़ी नहीं। इतने में मक्का अपने यथास्थान पर स्थापित हो जाता है। लोगों ने देखा उसमें एक लड़की है, एक औरत है, एक बहन है। नाम पता करा तो पता चला यह ऐसे-ऐसे इसका राबिया नाम है। सारे मुसलमान समाज में यह हो गया—"भक्ति हो तो राबिया जैसी! अल्लाह को खुश कर लिया, इसको तो जन्नत मिलेगी ही मिलेगी!"
 
अगला जन्म उसका एक बांसुरी नाम की लड़की का हुआ। परमात्मा तो उसको चार्ज कर गए थे, वह परमात्मा की छाप उसके अंदर फिर भी तड़प रही थी। उसने ब्याह उस समय भी नहीं कराया, और अपना शब्द गाती रही, परमात्मा अल्लाह की महिमा सुनाने लगी और बांसुरी रूप में 50 साल से ऊपर हो गई, हज करने गई। तो उसको यह ज्ञान हो गया था—परमात्मा की धार्मिक बातें डेली गाती और सुनती थी—कि जो मक्का में मरता है उसको सीधी जन्नत मिलती है, स्वर्ग-बहिश्त।  तो उसने सोचा शरीर तो एक दिन जाएगा, और कहते मक्का में मृत्यु होगी तो जन्नत मिलेगी, जन्नत के लिए सब कुछ किया जा रहा है। उसने वहीं गर्दन काट दी अपने हाथ तलवार मार के!  सब कहने लगे: "हो गया भाई! बांसुरी तो गई स्वर्ग में! बांसुरी ने कुर्बानी दे दी और जन्नत में गई।"
 
अगला जन्म उस आत्मा का कर्महीन वैश्या का बना! दो जन्म कति ब्रह्मचर्य के पालन कर लिए, आखिर में सारी कसर काट दी काल ने! परमात्मा कहते हैं: काल के षड्यंत्र को तुम क्या समझोगे? ब्रह्मा, विष्णु, महेश अभी तक नहीं समझ पाए! फिर दया करी दाता ने। वह गंदा नर्क भोग के वह फिर मरी। एक शेख तकी नाम का सिकंदर लोदी राजा का धार्मिक गुरु था, और यह भी कहते हैं उनका एक प्रधानमंत्री भी था, जो भी हो, उसके घर जन्म हुआ उसका। 12-13 वर्ष की होकर वह मर गई, कब्र में दबा दिया गया।

एक दिन परमात्मा ने ऐसी लीला करी, क्योंकि "सौ छल छिद्र मैं करूँ अपने जन के काम।" तो काम तो उनका था सारा उस बेटी के लिए। शेख तकी ने जब सारे हथकंडे अपना लिए—कबीर साहब हारते नहीं, मुर्दे जिंदे कर दिए। उसने कहा (वह तो सदमे में था कमाल/रामानंद के जादुई जंत्र से जिंदा कर दिया): "जब जानूँ मेरी बेटी कब्र में दबी रही है, उसको जिंदा कर दें!" कई दिन हो गए, 15-16 दिन हो गए। परमात्मा ने कहा: "ठीक है भाई, सब इकट्ठे कर लो।" मुनादी करा दी उसने खुद, क्योंकि जिसकी पोल खुलेगी... परमात्मा ने समय बता दिया: "उस दिन करूंगा जिंदा।"

हजारों आदमी, सिकंदर लोदी, शेख तकी। वह इकट्ठे हुए, कब्र फड़वा दी। लड़की का शरीर था, तो परमात्मा ने कहा: "शेख तकी, तू कोशिश कर ले।" ताकि पाछे नंबर बनावे और कहे यह सदमे में थी। दूसरे बोले: "जी, अगर इसके पास कुछ एलम होता, तो अपनी बेटी को कौन कब्र में दाबे मिट्टी में? आप दया करो।"

कबीर साहब ने कहा: "हे शेख तकी की बेटी! जीवित हो जा।" नहीं हुई। दूसरी बार कहा, नहीं हुई। शेख तकी ने भंगड़ा पा दिया, नाचन लागा कि ढोंगी की पोल खुल गई! "देख लो, कहा था न मैं, कभी मुर्दे जिंदे होते हैं? यह तो कयामत के समय होते हैं।" तो परमात्मा बोले: "डट जा बंडेले, रुक!" तब कहा: "हे कबीर की बेटी! जहाँ भी है, वापस शरीर में प्रवेश कर।" बेटी... और इतना ही कहा था, शरीर में कंपन हुई, लड़की उठी। मालिक के चरणों में आकर दंडवत प्रणाम, और खड़ी होकर डेढ़ घंटे अपने पिछले कर्म, वह पाप-बकवास गलती सारी दोहरा दी, और अपने भगवान के साथ चली गई।

परमात्मा ने कहा: "जा बेटी, अपने पिता के साथ।" शेख तकी की लड़की बोली: "मेरा बाप आप हो, इनका इतना संस्कार था इन दाबी मिट्टी में। अब इनका मेरा कोई संस्कार नहीं था। आगे मेरा पशु योनि में जाने का नंबर था, और यह भगवान वहाँ गए धर्मराज के दरबार से मुझे बाई-फोर्स ले आए।" तो बच्चों, कहते हैं—


गोरख से ज्ञानी घने, शुकदेव जती जहान।
सीता सी बहु भार्या, संत दूर अस्थान।।

यह बड़े-बड़े भाषण करते हैं, सत्संग सुनाते हैं। 

कहते हैं:

"बीजक की बातें कहें, बीजक नहीं हाथ।
पृथ्वी डोबन उतरे, ये कहै कहै मीठी बात।।"

बच्चों, प्रसंग चल रहा था सत्संग का—'सतगुरु विमुखा युग-युग रोवे'। तो इसी प्रकार हम सतगुरु विमुख हुए, तब आज तक रो रहे हैं। हमारा वह कुछ भक्ति कराकर चार्ज कर गए थे, जिस कारण से अपने को मनुष्य जीवन मिलते हुए आ रहे हैं। और भक्ति की छाप भी है, यह गलती फिर न दोहराएँ। अब नितानंद का जो प्रसंग था उस पर आता हूँ। और सत्संग चला कि 'कोटि जन्म तने भ्रमत हो गए, कुछ नहीं हाथ लगा रे। कुकर, शूकर, खर कौवा हंस...' कोटि जन्म राजा की... महावीर जैन, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर, राजा बने, महाराजा बने, स्वर्ग में देव बने, फिर कुत्ते, गधे, सुअर बने! खाक है फिर के देव पद बन गया!  इंद्र, कुबेर, ईश की पदवी... ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पद पा चुके। इंद्र तक की पदवी पाई है, और फिर यही भटक रहे। दोजक-बिशत सभी तू देखे... स्वर्ग-नर्क सभी धक्के खा चुके, भटक चुके हो। राज-पाट के रसिया, तीन लोक से संतुष्टि नहीं है। यह मन भोगी खसिया। 

कोई एमएलए बन जाए, सरपंच बने, मन में आता है चेयरमैन बनूँ। चेयरमैन भी बन जाता है, एमएलए में बात बने। मर-पड़ के एमएलए कभी बन जाता है, उसने सोचा मंत्री बनूँ तब बात बने। एमएलए में कोई नहीं पूछता। मंत्री यह सोचता है: "चले तो मुख्यमंत्री की है, हम तो टाइम पास कर रहे।" मुख्यमंत्री बनने के बाद उसकी तड़प हो जाती है: "प्रधानमंत्री बनूँ तो बात बने।" वह बनेगा कि न बनेगा, इतने मृत्यु हो जाएगी! फिर गधा बनेगा बच्चों!
 तीन लोक से तृप्ति नाही, यो मन भोगी खिया।

सतगुरु मिले तो इच्छा मिटे, पद मिल पदे समाना। 
चल हंसा उस लोक पठाऊँ, जो आदि अमर अस्थाना॥

कि सतगुरु मिलेगा तो इन बकवासों से मन हटाएगा, और कहेगा: "चल हंसा उस लोक पठाऊँ जहाँ कभी मृत्यु नहीं होती।"

चार मुक्ति जहाँ चंपी करती, माया हो रही दासी। यहाँ चार मुक्ति प्रमुख मानी गई हैं, और यह थोड़े से थोड़े समय की होती हैं। जैसे सालोक्य—जिस देवता की भक्ति करे उस देवता के लोक में चला जाएगा। सारूप्य—उस देवता का रूप जैसा बनाकर वहाँ रहेगा। सामीप्य—उस अपने देवता के समीप रहेगा। तो इस प्रकार की चार मुक्ति। लेकिन रहेंगे कितने? उनका समय सीमित होता है, वह चारों मुक्ति भी नष्ट होती हैं, वह भी हाथ से चली जाती हैं। फिर कुत्ता, गधा, सुअर बनता है और वहाँ सदा रहेंगी सतलोक में—

चार मुक्ति जा चंपी करती, माया हो रही दासी।
 दास गरीब अभय पद परसे, मिले राम अविनाशी॥

यानी चरणों में पड़ी रहेगी, सदा के लिए भगवान के साथ रहेंगे। और इस धन-संपत्ति की वहाँ कमी नहीं, भरे पड़े हैं खजाने आपके। दास गरीब अभय पद परसे—वहाँ कभी भय नहीं किसी चीज़ का, मौत का भय सबसे बड़ा डर है, यह मौत का भय वहाँ जाते ही खत्म होगा।

दास गरीब अभय पद परसे, मिले राम अविनाशी।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश नाशवान, ब्रह्म नाशवान, क्षर पुरुष, अक्षर पुरुष यह नाशवान, देवी नाशवान, और देवता की…

गीता प्रमाण देती है दूसरे अध्याय के 12वें श्लोक में, चौथे अध्याय के 5वें श्लोक में, 9वें और 10वें में कि दो में गीता बोलने वाला इनका ब्रह्म कहता है काल कि: "तेरे-मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं अर्जुन, तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। आगे भी होंगे, मेरी उत्पत्ति हुई है, ये देवता नहीं जानते।" तो बच्चों, वह अविनाशी राम... दूसरे अध्याय के 17वें श्लोक में कहा है, 18वें के 46वें, 18वें के 61 और 62 में, और 15वें अध्याय के 17वें श्लोक में बताया:

उत्तम पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। 
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥

 वह अविनाशी भगवान मिलेगा वहाँ पर। कबीर साहब कहते हैं: यहाँ भी तुझे राज-पाट भी चाहिए, हमरा धर ले ध्यान। यह राज-पाट कैसा देंगे आपको? और संसार के लोगों से ज्यादा सुविधा देंगे परमात्मा और कहते हैं जिसके मन में परमात्मा की भक्ति है, होय-होय! फिर के इंद्र का राज। उसको... कभी नफरत हो जाती है उस राज से! तो महाराजा बन जाता है। और यहाँ सुख देंगे परमात्मा, कहते हैं—

माया दासी भगत की, संत की उभय दे आशीष।
बरती और लातों छड़ी, सुमिर-सुमिर जगदीश।।

 कहते हैं इतना धन दे देगा बंदी छोड़ कि खाइयो, खर्चियो खूब, धर्म फैलाइयो!

माया दासी संत की, उभय दे आशीष।


दोनों तरफ से आशीर्वाद देगी—खाओ, खर्चो और दान करो।

बरती और लातों छड़ी, कबीर साहब कहते सुमर-सुमर जगदीश…


सुमर कौन सा जगदीश? सच्चा नाम, सच्ची भक्ति, सत पुरुष कबीर साहब की भक्ति कर-कर के।

अब नितानंद यह सारा सत्संग सुन रहा था। यह क्या करते हैं? बात तो सुनाओ सतलोक के मिलती-जुलती अध्यात्म ज्ञान, भक्ति विष्णु तक की। अब नंदलाल पंडित जी ऊपर से तहसीलदार, दो मरोड़ इकट्ठी! उसने सोचा: "यहाँ जाऊंगा संत के पास, तो नगरी के लोग क्या कहेंगे? 'ब्राह्मण और तहसीलदार होकर किसी के घर में आकर संत के चरणों में पड़ा!'"

काल ने तो कई रास्ते रोक रखे हैं। तो उसको पता चला कि महात्मा का डेरा है यहाँ नारनौल से 2 किलोमीटर दूरी पर। संत चले गए अगले दिन। उस दिन तक खूब विचार किया, सुबह-सुबह घोड़े पर बैठकर (जो सरकार की तरफ से मिलता था उनको) आश्रम में चला। संत जी ने सिर को उस्तरा फिरवा रखा था, और सुबह-सुबह ईज़ी मूड में घूमने के लिए उसी रास्ते आ रहे थे जिस रास्ते नंदलाल जा रहा था तहसीलदार जी।

अब यह ब्राह्मण उस समय सारे सिर मुँड़ाने वालों को अशुभ माना करते। उसने सोचा: "देख यह मनहूस बाल कटवा के आगे आ गया मेरे! और मैं कितना अनमोल काम करने जा रहा था आज! गुरु बनाने जा रहा था, अपने जीवन का सौदा करना था। यह कैसा हो गया, क्या अशुभ-अपलक्षण हो गया!"  तो उसने अपने मन में सोच लिया: "इसे टोला (उंगली से चटकाना) मार दे, दोष टल जाएगा।"

हम भी पहले कहा करते न बच्चे थे जब कि: "झूठ बोला, पाप लगेगा!" तो उंगली पर उंगली धर बोली थी, "कोई न लगे पाप!" यह अपनी बनावटी बातें थीं उंगली पर उंगली चढ़ा ली थी, इसलिए पाप न लगा करे।
 
तो उसने इस दृष्टिकोण से उस महात्मा के सिर में उल्टे हाथ से टोले मारे तीन-चार, और बोला: "अरे निर्भाग मनहूस! तेने आज मेरा... मैं गुरु बनाने जा रहा था आज, अपने जीवन का सौदा करूंगा..."  अब वह संत जी हैरान रह गए: पढ़ा-लिखा दिखे, घोड़े पर सवार, कोई अफसर होगा, और ऐसा व्यवहार कर दिया! अच्छा, ऐसे संतों के साथ ऐसा व्यवहार करने वाले बहुत मिला करें, वह ज्यादा माइंड नहीं करते। वह चला गया आश्रम में।

वह पहुँचा तो घोड़ा उतार के एक वृक्ष पर बाँध दिया। जो भगत उपस्थित थे, वह बड़ा अफसर आया देखकर प्रणाम किया उन्होंने। पूछा: "संत जी कहाँ पर हैं? मैंने दीक्षा लेनी।"

वह बोले: "आओ बैठो," आदर से बैठा दिया। आसन लग रहा था, उसके आगे बोरी बिछा रखी थी कि बैठ जाओ, स्नान करके अभी घूमने-फिरने जा रहे हैं सैर करके। आधे घंटे में घूम-फिरकर, नहाकर महात्मा जी आसन पर आए। सामने घोड़ा बँधा देखा और आदमी बैठा देखा। देख लिया यह तो महात्मा जी थे! "तेने बहुत बड़ी गलती कर दी पापी आत्मा, यह धमकाएगा, यहाँ से भगाएगा!" नीची गर्दन कर ली। अब नंदलाल शर्म के मारे गड़ गए, नीची गर्दन कर ली।

महात्मा जी भी समझ गए (गुमानी दास)—वहीं आदमी आ गया। उसने कहा: "श्रीमान जी, आप गुरु बनाने आए हो, इसमें कोई परेशान होने की बात नहीं है। जैसे हम कुम्हार के घर जाते हैं, कोई मटका मोल लेते हैं या कोई बेचने अपने घर पर आता है, तो हम उसको टोले मार-मार के देखा करें ताकि वह किते टूटा-फूटा तो नहीं, साबत है कि नहीं? तो आपने अपना गुरु परख लिया टोले मार के! बेटा, कोई बात नहीं, आप उद्देश्य बताओ आने का।"

अब परमात्मा ने उसकी यह अकड़ तोड़नी थी कि संत ऐसे होते हैं। बच्चों, संत तो स्वभाव से सबका ही अच्छा होता है। बात यहाँ बिगड़ रही है कि सच्ची राह न होने से फिर क्या अच्छी भाषा, अच्छे बोल!

गोरख से ज्ञानी घने, सुखदेव जती जिहान। 
सीता सी पतव्रता, दूर संत स्थान॥


 
नितानंद तो चरणों में पड़ गया, रो रहा है कि "भगवान..." अपना सारा इंट्रोडक्शन दिया, सारी पहचान बताई: "ऐसे-ऐसे मैं नारनौल के नवाब के यहाँ तहसीलदार हूँ, और परसों आपका सत्संग रात को सुना, मेरी आँख खुल गई। मैं मोक्ष चाहता हूँ।" उसने जैसा जंत्र-मंत्र दिया, उसने शिरोधार्य कर लिया और करने लगा। इतना प्रेरित हो गया कि नौकरी भी छोड़ दी, और गुरु जी तो चले गए। वह अपना घर त्याग के उस मंत्र को साथ लेकर एकांत स्थान जंगल की खोज करने लगा।

तो हरियाणा में यह एक माजरा गाँव है, बिगोवा है, बास है—इन तीन-चार गाँवों की सीमा इकट्ठी है। वहाँ एक तालाब बना हुआ था जोहड़ी सी, उस पर काफी जंगल... जंगल तो पहले बहुत होते थे। उसको जटला जोहड़ बोलते हैं। वहाँ आकर उसने अपना शेष जीवन बिताया। भक्ति सही नहीं थी, आदमी खरा था। परमात्मा की चाह खूब थी, पिछला संस्कार कोई प्रबल था, लेकिन भविष्य जीरो था उसका। फिर भी उसने जब ज्ञान हुआ तो क्या कहा? क्या कहते हैं? उसका नाम फिर नितानंद रख दिया उसके गुरु जी ने, नाम बदल दिया। नाम इसलिए बदलवाया करते थे कि और जाकर भक्ति करूंगा, पीछे घर वाले न ढूँढते फिरें। तो वहाँ उस नाम से कोई जानेगा ही नहीं। तो क्या कहते हैं नितानंद जी? फिर अपने विचार व्यक्त करते हैं अपने फॉलोवर के सामने—

ब्राह्मण कुल में जन्म था, मैं करता बहुत मरोड़। 
गुरु गुमानी दास ने, दिया कुबुद्धि गढ़ तोड़॥


  
जाति का अभिमान, पोस्ट का अभिमान, धन का अभिमान, और पहलवानी (पहलवान हो जाए) काया का अभिमान—यह जीव का दुश्मन होता है। ब्राह्मण कुल में जन्म था, मैं करता बहुत मरोड़। बड़ा अहंकार था मेरे में। गुरु गुमानी दास ने दिया कुबुद्धि गढ़ तोड़—यह कुबुद्धि का गढ़ था, एक कति तोड़ दिया। 

आखिर तुझको कौन कहेगा, गुरु बिन आत्मज्ञान? मन नेकी कर ले दो दिन का मेहमान...। बच्चों, सतगुरु पूरा मिला नहीं, अधूरी सीख! "तेली केरे बैल जो, चले एक नहीं बीक।" पूरा सतगुरु न मिलने से इतनी पुण्यात्मा फिर कर्म फोड़ के चली गई, स्वर्ग तक गई, फिर जन्म लेगी। उसने तो आनंद किया बस। 

कुछ निष्कर्ष देकर दास आपको, हीरे-मोती-लालों को आपकी पहचान बताना चाहता हूँ कि तुम क्या प्राप्त कर चुके हो! आपकी कितनी अच्छी किस्मत, कितना गुण लगा है, आँख खोल लो! मैं कोई बालक नहीं, कोई डूम-भाट नहीं हूँ, मैंने कोई स्वार्थ नहीं तुम्हारे से। आप मुझे अपने दिखाई देते हो, आप मुझे भगवान के बच्चे दिखाई देते हो।
 
मुझे नौकरी खरी दिखाई देती है तुम्हारे कारण। मैं अपनी ड्यूटी पूरी करूंगा, भगवान का दोषी नहीं रहूंगा। मेरी उम्र देख लो, आपके लिए भौंक रहा हूँ, कुत्ता हूँ परमात्मा का, गुरुदेव का! जागो—थारी भला, न जागो—तेरी मर्जी! आशा करता हूँ जागोगे, सत-भक्ति पर लगोगे, इस गंदे लोक को त्यागोगे, सतलोक में जाकर स्थान पाओगे। परमात्मा आपको मोक्ष दे, सदा सुखी रखे।

 सत साहिब! 
 

विशेष संदेश भाग 33: इन मंत्रों के जाप से होगा पूर्ण मोक्ष! →