सुमिरन का अंग

सुमिरन का अंग का सरलार्थ

> परमेश्वर की भक्ति के लिए साधनाऐं करनी अनिवार्य हैं:-

(क) यज्ञ अर्थात् धार्मिक अनुष्ठान:-

यज्ञ कई प्रकार की हैं। जैसे:

1- धर्म यज्ञ:-

धार्मिक भण्डारे करना, धर्मशाला, प्याऊ आदि बनवाना।

2- ध्यान यज्ञ:-

परमेश्वर में अटूट मन लगाना संत मत की ध्यान यज्ञ है। कुछ व्यक्तियों ने इसको अंग्रेजी में मेडिटेशन (Meditation) कहकर इसकी परिभाषा ही बदल डाली। उनका मानना है अर्थात् सिद्धांत है कि एकांत स्थान में बैठकर आँखें बंद करके विचार शुन्य हो जाना मेडिटेशन (Meditation) है। यह योगासन का एक अंग कहा है। वे मानते हैं कि इससे कई शारीरिक उपचार होते हैं। विचार करें यह तो एक व्यायाम है जो दिमाग के लिए की जाती है।

संत मत में जो ध्यान (Meditation) है, वह परमात्मा की प्राप्ति की तड़फ में प्रति क्षण उसी की याद बनी रहे जैसे चिंता (टैंशन=Tension) होती है तो पल-पल मन उसी केन्द्र पर केन्द्रित हो जाता है। कोशिश करने पर भी नहीं हटता। ठीक ऐसे परमात्मा की चिंता जो चिंतन कहा जाता है, संत-मत का ध्यान यज्ञ है।

3- हवन यज्ञ:-

इस यज्ञ को कई प्रकार से करते हैं:-

  1. जो अपने आपको वेदवित् कहते हैं, वे हवन कुण्ड बनाते हैं या वैसे पृथ्वी को लीपकर शुद्ध करके लकड़ियाँ जलाकर, गाय या भैंस का घी डालकर वेद के कुछ मंत्र बोलते हैं। इस प्रकार हवन यज्ञ करते हैं।
  2. कुछ व्यक्ति केवल धूप अगरबत्ती जलाकर ही हवन करते हैं। धूप या अगरबत्ती को घी से बनी मानते हैं।
  3. कुछ व्यक्ति कुछ जड़ी-बूटियों को कूटकर घी में मिलाकर अग्नि के अंगारों के ऊपर डालकर हवन यज्ञ करते हैं।

विचार करें:- प्रत्येक साधक को अपने सद्ग्रन्थों में वर्णित भक्ति कर्म ही करने चाहिऐं। श्रीमद् भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में भी यही कहा है कि जो साधक शास्त्राविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, उसको न कोई सुख प्राप्त होता है, न सिद्धि प्राप्त होती है और न ही उसकी गति होती है। (गीता अध्याय 16 श्लोक 23)

इससे तेरे लिए अर्जुन! कर्तव्य अर्थात् जो भक्ति कर्म करने चाहिऐं और अकर्तव्य अर्थात् जो भक्ति कर्म नहीं करने चाहिऐं, उनके लिए शास्त्रा ही प्रमाण हैं। (गीता अध्याय 16 श्लोक 24) भक्ति करने की साधना के सद्ग्रन्थ केवल वेद हैं। वेद दो प्रकार के हैं:

(1) सामान्य वेद:- जो सँख्या में चार हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद, इन्हीं चारों वेदों का सारांश श्रीमद् भगवत गीता है।

(2) सूक्ष्म वेद:- यह वह वेद है जिसको परमेश्वर स्वयं पृथ्वी पर प्रकट होकर अपने मुख कमल से कवित्व से बोलकर सुनाते हैं। जिसको गीता अध्याय 4 श्लोक 32 तथा 34 के अनुसार तत्वज्ञान भी कहते हैं। वह संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान है, इसी के विषय में ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 86 मंत्र 26-27, मण्डल 9 सूक्त 82 मंत्र 1-2, ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 20 मंत्र 1, ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 94 मंत्र 1, ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 95 मंत्र 2 और ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 17-18 में वर्णन है।

संत-मत:- संत-मत सूक्ष्मवेद पर आधारित है। जिसमें हवन यज्ञ का प्रावधान शुद्ध गाय या भैंस के घी का दीप जलाना है, इसको ‘ज्योति यज्ञ‘ कहा जाता है। इसी का समर्थन ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 86 मंत्र 10 में है कि साधक को ज्योति जलाकर हवन यज्ञ करना चाहिए। सूक्ष्मवेद की अमृतवाणी परमात्मा के श्री मुखकमल से उच्चारित होने के कारण अधिक प्रभाव करती हैं।

 हम ज्योति यज्ञ करते हैं तथा साधकों से करवाते हैं। सूक्ष्मवेद की आरती तथा अन्य वाणी बोलते हैं।

4- प्रणाम यज्ञ:-

यह दो प्रकार की होती है:-

(1) नमस्कार अर्थात् प्रणाम:- इसमें दोनों हाथ जोड़कर शीश झुकाकर नमस्कार, प्रणाम या नमस्ते शब्द बोला जाता है जो गणमान्य देवों व मनुष्यों के लिए है। गीता अध्याय 18 श्लोक 65 तथा अध्याय 9 श्लोक 14 तथा 34 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि मुझे नमस्कार कर।

(2) डण्डवत प्रणाम:- इसमें जमीन पर मुख के बल लेटकर हाथों को सिर के आगे सीधा जोड़कर दोनों पैरों को भी जोड़कर डण्डे की तरह सीधा रहकर प्रणाम या नमस्कार शब्द बोला जाता है। इसे डण्डवत प्रणाम या दण्डवत प्रणाम कहते हैं। यह केवल परम संत तथा पूर्ण परमात्मा को ही करना होता है जिसका प्रमाण गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में दिया है, कहा है कि जिस संत के पास सूक्ष्मवेद अर्थात् तत्वज्ञान है, उसको दण्डवत प्रणाम करो।

5- ज्ञान यज्ञ:-

सद्ग्रन्थों का पठन-पाठन तथा संतों के विचार सुनना अर्थात् सत्संग सुनना-सुनाना ज्ञान यज्ञ कहलाता है।

(ख) भक्ति की साधना में ‘नाम स्मरण‘ साधना भी है।

अब जो सरलार्थ किया जाएगा, यह नाम स्मरण साधना के विषय में है। सूक्ष्मवेद की कुछ अमृतवाणियों का सरलार्थ यहाँ किया जाएगा जो नित्य पाठ में लिखी हैं। सुमिरण (स्मरण) के अंग से

वाणी:- कबीर, सुमिरन मारग सहज का, सतगुरू दिया बताय।
श्वांस-उश्वांस जो सुमिरता, एक दिन मिल सी आय।।(1)
कबीर, माला श्वांस-उश्वांस की, फेरैंगे निजदास।
चौरासी भरमै नहीं, कटै कर्म की फाँस।।(2)

> परमेश्वर कबीर जी ने स्वंय पृथ्वी पर प्रकट होकर कलयुग के प्रथम चरण में यह सूक्ष्मवेद (तत्वज्ञान) अपने मुख कमल से बोलकर लोकोक्तियों, साखियों, दोहों तथा चौपाईयों के रूप में बोलकर सुनाया। जिस कारण से परमेश्वर कबीर को प्रसिद्ध कवि की उपाधि भी प्राप्त है। भक्ति की साधना में नाम स्मरण करने का सही तथा सहज(आसान) मार्ग बताया है जो श्वांस-उश्वांस से किया जाता है। श्वांस जो बाहर आता है, उश्वांस जो वापिस शरीर में जाता है। ऐसे सतनाम का स्मरण करने को कहा है, यही वास्तविक साधना है जिसको तत्वदर्शी संत ही जानता है या स्वयं परमेश्वर जानते हैं। (1)

> सत्यनाम के स्मरण को श्वांस-उश्वांस रूपी माला अर्थात् यथार्थ भक्ति साधना कोई खास भक्त ही फेरेगा। भावार्थ है कि पूर्ण संत सत्य साधना बताता है। पूर्ण संत किसी भाग्यवान को ही मिलता है। वह विशेष किस्मत वाला ही उस श्वांस-उश्वांस से स्मरण को प्राप्त करके नाम जाप करता है जिससे उस साधक के पाप कर्मों का नाश होकर कर्म बंधन रूपी जाल नष्ट हो जाता है। जिस कारण से वह साधक फिर से जन्म-मरण के चक्र से निकल जाता है, चौरासी (84) लाख प्रकार के जीवों के शरीरों में नहीं भटकता।(2)

वाणी:- कबीर, सुमिरन सार है, और सकल जंजाल।
आदि अन्त मध्य सोधिया, दूजा देख्या ख्याल।। (3)

> सरलार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने बताया है कि भक्ति के लिए की जाने वाली साधनाओं में नाम का स्मरण सार है अर्थात् निष्कर्ष है। भावार्थ है कि जैसे कई साधक केवल सद्ग्रन्थों का पठन-पाठन अधिक करते हैं जो ज्ञान यज्ञ है। कुछ धार्मिक भण्डारे-भोजन कराने को महत्व देते हैं। कई धर्मशाला, प्याऊ आदि के निर्माण में अधिक समय देते हैं। कई हवन करने में अधिक समय लगाते हैं। परंतु इन सर्व साधनाओं में सबसे अधिक समय नाम स्मरण में लगाना चाहिए। नाम स्मरण न करके अन्य क्रियाओं को करना तो जंजाल बताया है अर्थात् व्यर्थ बताया है। आदि से तथा वर्तमान के अंत तक सब शोध करके देख लिया, नाम का स्मरण करना ही लाभदायक है। (यही प्रमाण यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 15 में भी है, कहा है कि:-

वायु अनिलम् अथ इदम् अमृतम् भस्मान्तम् शरीरम्।
ओम् (ॐ) कृतो स्मर, किलबे स्मर, कृतुम् स्मर।।

> अनुवाद:- (वायु) हवा अर्थात् श्वांस (अनिलम्) अग्नि अर्थात् गर्म (अथ) प्रारंभ कर (इदम्) इस प्रकार स्मरण से (भस्मान्तम् शरीरम्) देहान्त के बाद जो (अमृतम्) अमरत्व मिलेगा, उसके लिए (ओम्) ॐ नाम का (कृतो) कार्य करते-करते (स्मर) स्मरण कर (किलबे स्मर) विशेष कसक के साथ स्मरण कर (कृतुम् स्मर) मानव जीवन का मूल कर्तव्य जानकर स्मरण कर।

भावार्थ:- गर्म श्वांस से आरंभ कर अर्थात् जो श्वांस बाहर छोड़ा जाता है, वह गर्म है। जो सतनाम है, उसमें दो अक्षर है। एक ¬ (ओम्) और दूसरा तत् = यह गुप्त मंत्र है, उपदेश लेने वाले को दीक्षा के समय बताया जाता है। इनमें से एक अक्षर अर्थात् नाम बाहर छोड़ते समय श्वांस के द्वारा जपा जाता है। दूसरा श्वांस अंदर लेते समय उश्वांस द्वारा जपा जाता है। सिद्ध हुआ कि अपने सद्ग्रन्थ नाम स्मरण को अधिक महत्व देते हैं। (3)

वाणी:- कबीर, जिन मुख आत्म राम है, दूजा दुःख अपार।
मनसा वाचा कर्मना, कबीर सुमिरन सार।। (4)

> सरलार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने बताया है कि आत्मा को वास्तविक सुख परमात्मा से मिलता है। इसके अतिरिक्त सर्व असीमित दुख है। जैसे मानव जीवन में पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों से यहाँ पर कितना बड़ा पद प्राप्त है, चाहे राजा भी बना है, यदि नाम जाप अर्थात् भक्ति नहीं की तो 84 लाख प्रकार के प्राणियों के शरीरों में कष्ट उठाना पड़ेगा जो अपार दुःख है जिसका कोई अन्त नहीं है। अन्त नाम स्मरण से ही होगा, वह मानव जीवन में ही संभव है। इसलिए परमेश्वर कबीर जी ने अति दृढ़ता के साथ कहा है कि मैं मन-कर्म-वचन से कह रहा हूँ कि नाम का स्मरण मोक्ष के लिए मूल रूप है।(4)

वाणी:- कबीर, दुख में सुमिरन सब करैं, सुख में करे ना कोय।
जो सुख में सुमिरन करें, तो दुख काहे को होय।। (5)
कबीर, सुख में सुमिरन किया नहीं, दुख में किया याद।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद।। (6)

> सरलार्थ:- आपत्ति आने पर तो सब परमात्मा को याद करते हैं, परंतु सुख समय में याद नहीं करते। यदि सुख में परमात्मा का नाम स्मरण करते तो दुख नहीं होता। (5)

> परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि जिस समय जीवन सुखी था, उस समय तो परमात्मा का नाम स्मरण किया नहीं, जिस समय पाप कर्मों के भोगने का दौर प्रारंभ हुआ, दुख आया, तब लगे परमात्मा को याद करने। उस समय उस स्वार्थी की प्रार्थना परमात्मा कैसे सुनेगा अर्थात् फिर तो कष्ट भोगने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होगा। (6)

विशेष:- यहाँ पर यह स्पष्ट करना अनिवार्य समझता हूँ कि उपरोक्त वाणी सँख्या 6 का अर्थ ऊपर किया, ठीक है। यह उनके लिए है जिनको दुख के समय परमात्मा की खोज में जाने के पश्चात् भी पूर्ण संत नहीं मिलता, नकली गुरूओं या जंत्र-मंत्र करने वाले तांत्रिकों की भेंट चढ़ जाते हैं। यदि दुख समय में भटकते व्यक्ति को पूर्ण संत मिल जाता है तो उसका संकट निवार्ण हो जाता है, दुख दूर हो जाता है। परमेश्वर कबीर जी ने कहा है:

कबीर, सतगुरू शरण में आने से, आई टलै बला।
जै भाग्य में शूली हो, काँटे में टल जाय।।

वाणी:- कबीर, सांई यूंही मत जानियो, प्रीत घटे मम चित।
मरूं तो सुमिरत मरूं, जीवित सिमरूं नित्य।। (7)

> सरलार्थ:- परमेश्वर कबीर जी भक्तों को समझाना चाहते हैं कि नामदान होने के पश्चात् परमेश्वर को सामान्य भाव से मत याद करना क्योंकि नाम को प्राप्त करके कुछ व्यक्ति यह समझते हैं कि यह कैसा नाम, कभी सुना ही नहीं। या फिर कई यह भावना बनाते हैं कि इतनी साधना कैसे बनेगी 108 मंत्र जाप करना संभव नहीं। इस प्रकार से भगवान को जानने से श्रद्धा कम हो जाती हैं परमेश्वर कबीर जी ने श्रद्धा की दृष्टि से कहा है कि आप तो एक माला 108 नाम की जाप करने में कठिनाई मानते हो, मैं तो परमात्मा के नाम का स्मरण करते-करते प्राण त्यागने का वरदान माँगता हूँ और जब तक जीवन है, तब तक परमेश्वर को नित्य अर्थात् सदा क्षण-क्षण स्मरण करूँ, ऐसा आशीर्वाद गुरूदेव दें, मैं मेरी मृत्यु हो तब भी मरते-मरते नाम को याद करता हुआ प्राण त्यागूँ और जीवन प्रयन्त कभी स्मरण न भूलूँ। (7)

वाणी:- कबीर, जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के मांही।
कबीर, जानै राम जन, सुमिरन बिन कुछ नाहीं।। (8)

> सरलार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि हे भक्त! जो तुम अन्य मनमाने नामों का जप करते हो तथा हठयोग करके तप करते हो और अपनी इन्द्रियों पर संयम करने के लिए अनेकों क्रियाऐं करते हो, उसकी बजाय आप सतनाम का स्मरण करो, ये सर्व साधना अपने आप सिद्ध हो जाऐंगी, इस रहस्य को रामजन अर्थात् पूर्ण संत का शिष्य जानता है कि सत्य साधना सतनाम से होती है, इसके बिना अन्य क्रियाऐं व्यर्थ हैं। जैसे कोई विष्णु संहस्रनामा का जाप करता है, कोई गायत्राी मंत्र का (जो यजुर्वेद के अध्याय 36 का मंत्र 3 है, उससे पहले ओम् = ॐ अक्षर जोड़कर गायत्राी मंत्र बनाया है,उसका) जाप करते हैं। इन्द्रियों पर संयम करने के लिए श्रृंगी ऋषि वन में चला गया। अभ्यास करके इतना संयम कर लिया कि दिन में एक बार वृक्ष की छाल को चाटने मात्र से भूख-प्यास शांत हो जाती थी। राजा दशरथ की लड़की ने वृक्ष के उस स्थान पर शहद लगा दिया जहाँ श्रृंगी ऋषि जीभ से चाटता था। तीसरे दिन श्रृंगी ऋषि ने खीर खानी प्रारंभ कर दी, अंत में उस लड़की से विवाह करके ग्रहस्थ बन गया। सैंकड़ों वर्ष संयम बनाने के लिए साधना की, भक्ति की नहीं, अंत में पहले जैसे ही हो गए। इसलिए परमेश्वर कबीर जी से प्राप्त तत्वज्ञान में संत गरीबदास जी ने कहा है:

इन्द्री कर्म ना लगे लगारम, जो भजन करै निर्दुन्द रे।
गरीबदास, जग कीर्ति होगी, जब लग सूरज चंद रे।।

भावार्थ:- यदि परमात्मा के नाम स्मरण में लीन रहे तो इन्द्रियों के विषय विकारों का चिंतन करने का समय ही नहीं मिलेगा। सत्यनाम की साधना से इन्द्री कर्म साधक में लिप्त नहीं होते। परमात्मा के लगातार नाम स्मरण करने से साधक का यश भी पृथ्वी पर बना रहता है। जैसे पूर्व के महान भक्त ध्रू, प्रहलाद, मीरा बाई, भीलनी, धन्ना भक्त, संत रविदास जी, परमेश्वर कबीर जी, संत नामदेव जी, संत गरीबदास जी आदि-आदि महान भक्तों के नाम भक्त समाज में सूरज की तरह रोशन हैं।(8)

वाणी:- कबीर, जिन हर जैसा सुमरिया, ताको तैसा लाभ।
ओसां प्यास न भागही, जब तक धसै नहीं आब।। (9)

> सरलार्थ:- जो भक्त जैसी श्रद्धा से तथा अधिकता तथा न्यूनता से भक्ति करता है, उसको उतना ही साधना का लाभ होता है। परमेश्वर कबीर जी ने सटीक उदाहरण दिया है कि जैसे ओस जल जो घास पर रात्रि के समय जमा होता है, यदि कोई उस ओस के जल को जीभ से चाटकर प्यास शांत करना चाहे तो संभव नहीं। प्यास शांत करने के लिए आब अर्थात् पानी में धंसना पड़ेगा अर्थात् प्यास शांत करने के लिए गिलास के गिलास जल पीना पड़ेगा। धँसना का अर्थ है किसी तरल पदार्थ में खड़ा होना, उदाहरण के लिए जब कोई दलदल गारा में प्रवेश कर जाता है तो कीचड़ उसके पैरों से चिपट जाती है। उसको कहते हैं गारा में धँस गया। दूसरा उदाहरण यह जानें जैसे कोई लालची अधिक है तो उसका व्यवहार देखकर अन्य व्यक्ति कहते हैं कि यह तो लालच में धँसा है। इसी प्रकार ओस जल प्यास शांत करने के लिए पर्याप्त नहीं होता, प्यास शांत करने के लिए अधिक जल पीना पड़ता है। इसी प्रकार आत्मा की भक्ति वाली प्यास शांत करने के लिए अधिक स्मरण, दान-धर्म करना पड़ेगा। जैसे हम तत्वज्ञान न होने के कारण रूई की पतली-सी ज्योति घी में गीली-सुखी करके जलाते थे। वह शीघ्र ही शांत हो जाती थी तथा मंगलवार को सवा रूपये या सवा दो रूपये की बुन्दी प्रसाद बाँटकर अपने आपको धन्य मानते थे। वह हम ओस चाट रहे थे। अब हम सुबह शाम ज्योति (दीप) देशी घी में जलाते हैं, लगभग 100 ग्राम घी प्रतिदिन हवन करते हैं, पाठ करते हैं, हजारों रूपये वर्ष में धर्म पर लगाते हैं, यह हम आब में धँस रहे हैं अर्थात् गट-गट पानी के गिलास पी रहे हैं। (9)

वाणी:- कबीर, सुमिरन की सुध यूं करो, जैसे दाम कंगाल।
कह कबीर विसरै नहीं, पल-पल लेत संभाल।। (10)

> शब्दार्थ:- (1- सुध का अर्थ है संभाल, देखरेख, ध्यान 2- दाम = रूपये 3- कंगाल = निर्धन 4- विसरना = भूलना)

> सरलार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि परमात्मा के नाम के स्मरण की सुध अर्थात् संभाल ऐसे करनी चाहिए जैसे किसी निर्धन ने कुछ रूपये उधार लिए। वे कुछ दिन बाद आने वाले किसी धनी का कर्ज देना था। निर्धन व्यक्ति उन रूपयों को दिन में तथा रात्रि में कई-कई बार संभालता है, देखता है सुरक्षित है, पूरे हैं कि नहीं, कहीं कोई चोर तो नहीं चुरा ले गया। इस प्रकार की चिंता उसको सताती रहती है और निर्धन व्यक्ति अपने दामों (रूपयों) की देखरेख करता है। वह चिंतित रहता है कि यदि रूपये (दाम) चोरी हो गये तो मेरा तो दिवाला ही निकल जाएगा। इसी प्रकार एक साधक को अपने नाम स्मरण रूपी धन की संभाल करनी चाहिए अर्थात् रह-रहकर स्मरण में लगन लगानी चाहिए, स्मरण करना चाहिए, भूल लगे तो फिर तुरंत स्मरण कर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।(10)

वाणी:- कबीर, सुमिरन स्यों मन लाईये, जैसे पानी मीन।
प्राण तजै पल बिछुड़ैं, सार कबीर कह दीन्ह।। (11)

> सरलार्थ:- स्मरण से मन को ऐसे लगाकर रखें जैसे मछली पानी से लगाती है। यदि मछली एक पल भी जल से बाहर निकाल दी जाए तो तड़फ-तड़फकर मर जाती है। परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि यह सार अर्थात् निचोड़ कह दिया है। भावार्थ है कि जैसे मछली जल के अभाव में प्राण त्याग देती है, उसके बिना मरना उचित समझती है। साधक को वह दिन तथा समय जिस दिन किसी कारण से स्मरण न कर सका हो, ऐसा लगना चाहिए जैसे सब कुछ लुट गया हो। तुंरत स्मरण में लगकर क्षतिपूर्ति करनी चाहिए। (11)

वाणी:- कबीर, सत्यनाम सुमरले, प्राण जाहिंगे छूट।
घर के प्यार आदमी, चलते लेंगे लूट।। (12)

> सरलार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने मानव को सतर्क किया है, कहा है कि हे मानव! परमात्मा के सत्यनाम (वास्तविक नाम मंत्र) का स्मरण करले, न जाने कब जीवन का अंत हो जाएगा। मृत्यु के उपरांत जो आपके प्यारे व्यक्ति (पुत्र, पत्नी या पति, बेटी, भाई) आपकी जेब की तलाशी लेकर सब रूपया निकाल लेंगे तथा गले या नाक-कान में पहने हुए स्वर्ण के आभूषण निकाल लेंगे और वस्त्रा भी उतार लेंगे, बिल्कुल नंगा करके एक कपड़े के टुकड़े (कफन) से ढ़ककर शमशान घाट पर ले जाकर स्वाह कर देंगे। भावार्थ है कि अज्ञानता के कारण आप परमात्मा का स्मरण न करके परिवार के मोह में पड़कर सर्व समय व्यर्थ कर रहे हो। मृत्यु के पश्चात् पता चलेगा कि कौन प्यारा है और कौन-सा धन तुम्हारा है। आपके साथ आपका सत्यनाम के स्मरण का धन चलेगा, दान-धर्म किया, वह तथा तेरा पाप तेरे साथ चलेगा। इसलिए हे मानव! सत्यनाम का स्मरण कर, तेरा कल्याण हो जाएगा। (12)

वाणी:- कबीर, लूट सकै तो लूट ले, राम नाम की लूट।
फिर पीछै पछताएगा, प्राण जांहिंगे छूट।। (13)

> सरलार्थ:- हे मानव! तू भौतिक धन को संग्रह करने के लिए बेसब्रा होकर जनता को लूट रहा है। कोई रिश्वत लेकर, कोई चोरी करके, कोई मिलावट तथा हेराफेरी करके धन लूटने में लगा है, यह साथ चलना नहीं। जब मृत्यु होगी और परमात्मा से रूबरू होने का समय आएगा, तब तुझे याद आएगा कि मुझे मानव शरीर तो भक्ति करने के लिए मिला था, वह तो किया नहीं। जो सारे जीवन म भौतिक धन जोड़ा, वह सब यहीं रह गया। अब घर का रहा न घाट का। तब तुझे पाश्चाताप होगा। इसलिए कुछ समय धंधे (सांसारिक कार्य) से निकालकर राम के नाम की लूट करले, यह वास्तविक लूट है, यदि लूट सकता है तो भक्ति लूट ले। (13)

वाणी:- कबीर, सोया तो निष्फल गया, जागो सो फल लेय।
साहब हक ना राखसी, जब माँगे तब देय।। (14)

> सरलार्थ:- जो व्यक्ति मोह तथा अज्ञान रूपी निन्द्रा में सोये हैं अर्थात् भक्ति नहीं करते, उनका जीवन व्यर्थ गया और जो सन्तों के विचार सुनकर मोह तथा अज्ञान निन्द्रा से जाग गए, वे भक्ति का फल प्राप्त करते हैं। परमात्मा किसी के किए कर्म का हक अर्थात् हिस्सा नहीं रखते, जब माँगोगे, उसी समय आपको वह भक्ति धन प्रदान कर देंगे। आपको आपत्ति से बचा लेंगे। (14)

वाणी:- कबीर, चिंता तो हरि नाम की, और न चिन्ता दास।
जो कुछ चितवै नाम बिना, सोई काल की फाँस।। (15)

> सरलार्थ:- हे दास अर्थात् मेरे (कबीर जी के) भक्त! यदि चिन्ता करे तो नाम स्मरण की करना। यदि नाम स्मरण के अतिरिक्त जो भी चिन्ता उत्पन्न होती है, वह काल पुरूष की फाँस अर्थात् बन्धन है। अन्य चिन्ता स्मरण से दूर होती है। नाम स्मरण की चिन्ता है, वह वास्तविक चिन्ता है, यह करनी चाहिए अर्थात् भक्ति कम होने की चिन्ता होती है तो स्मरण में लगन लगेगी और मोक्ष प्राप्त होगा। यह चिन्ता करने योग्य है, अन्य तो बिना किए ही हो जाती है। (15)

वाणी:- कबीर, जब ही सत्यनाम हृदय धर्यो, भयो पाप को नाश।
मानो चिंगारी अग्नि की, पड़ी पुराणे घास।। (16)

> सरलार्थ:- कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि जिस समय साधक को सत्यनाम अर्थात् वास्तविक नाम मंत्र मिल जाता है और साधक हृदय से सत्यनाम का स्मरण करता है तो उसके पाप ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे हजारों टन सूखा पुराने घास में अग्नि की एक छोटी-सी चिंगारी लगा देने से वह जलकर भस्म हो जाता है। उसी प्रकार सत्यनाम के स्मरण से साधक का पाप नाश हो जाता है जो दुखों का मूल है। पाप नाश हुआ तो साधक सुखी हो जाता है।(16)

वाणी:- कबीर, राम नाम को सुमरतां, अधम तरे अपार।
अजामेल गणिका स्वपच, सदना सबरी नारी।। (17)

> सरलार्थ:- राम नाम अर्थात् परमात्मा के सत्यनाम का स्मरण करने से बहुत से अधम (नीच कर्मी प्राणी) भी भव सागर से पार हो गए। उदाहरण दिया है कि अजामेल नामक शराबी-कबाबी दुराचारी व्यक्ति सन्तों की शरण में आकर सुधरकर भक्ति करके अपना कल्याण करा गया। इसी प्रकार गणिका (वैश्या) को ज्ञान हुआ, वह भी सुधर गई और सत्यनाम का स्मरण करके पार हो गई। एक सदना कसाई था, सुधरकर नाम स्मरण करके पार हुआ। इसी प्रकार भीलनी जाति की शबरी नारी भी शुद्र होते हुए भी सत्यनाम का स्मरण करके अपना कल्याण करा गई। इस प्रकार सत्यनाम का स्मरण करके अनेकों बुरे व्यक्ति भी सुधरकर पार हो गए तो अन्य व्यक्ति भी सत्यनाम का स्मरण करके अपना कल्याण आसानी से करा सकते हैं। (17)

वाणी:- कबीर, स्वपन में बर्राय के, जो कोई कहे राम।
वाके पग की पांवड़ी, मेरे तन को चाम।। (18)

> सरलार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने भक्ति करने वाले मानव को कितना महान बताया है तथा उसका कितना सम्मान किया है, कहा कि यदि कोई मानव स्वपन में बरड़ाय कर भी परमात्मा के नाम का जाप कर देता है, वह मुझे इतना प्रिय है कि उसके पाँव की जूती अपने शरीर के चाम से बनवा दूँ। कई व्यक्ति सोते समय स्वपन देखते हैं तो उस समय दृश्य को सोते-सोते बोलते हैं जो अस्पष्ट भाषा होती है, उसको बरड़ाना कहते हैं कि अमूक व्यक्ति सोते समय बरड़ाता है। स्वपन में वही दृश्य दिखाई देते हैं जो दिन में देखे होते हैं। एक व्यक्ति केले बेचता था, वह दिनभर बोलता था कि ले लो 10 के 12 केले, ले लो 10 के 12 केले। रात्रि में भी कई बार जोर से आवाज लगाता, कहता कि ले लो 10 के 12 केले, ले लो 10 के 12 केले।

ऐसे ही एक किसान बाजरे की फसल की पक्षियों से रखवाली करता था। वह दिनभर कहता रहता था, हर्र चिड़िया--------। कई बार सोते समय भी इसी प्रकार ऊँची आवाज में बोलता था। कारण यह है कि दिनभर किया अभ्यास ही स्वपन बनकर रात्रि में दिखता है। इसी प्रकार स्वपन में वही भक्त राम नाम का उच्चारण करेगा जो दिनभर परमात्मा का नाम जाप करता है। वह भक्त परमात्मा का प्रिय होता ही है। इसलिए परमेश्वर कबीर जी ने हम साधकों को संकेत दिया है कि भक्ति निर्धुंध करो अर्थात् भक्ति का तूफान उठा दो, अधिक से अधिक भक्ति करो। उस भक्त के लिए मैं (परमेश्वर) अनहोनी कर दूँगा।(18)

वाणी:- कबीर, नाम जपत कन्या भली, साकट भला न पूत।
छेरी के गल गलथना, जिसमें दूध न मूत।। (19)

> सरलार्थ:- परमात्मा की भक्ति करने वाली बेटी अच्छी है साकट पुत्र से। साकट उसको कहते हैं जो स्वयं भक्ति नहीं करता तथा अन्य को भी बाधा करता है। भक्ति करने वाली कन्या के जीवन में आने वाली कर्म की आपत्ति को परमात्मा दूर करेगा। बेटी जो भक्ति करती है, वह सदा सुखी रहेगी। माता-पिता भी अपनी बेटी को सुखी देखकर खुश रहते हैं। जो लड़का भक्ति नहीं करता तो वह कोई ऐसा कार्य करेगा जिसके कारण वह स्वयं तो जेल में जाएगा तथा पिताजी उसके दुख में दुखी रहेगा। माताजी भी उस नालायक के दुख से अत्यधिक दुखी रहती है। इसलिए परमात्मा ने उस साकट पुत्र को बकरी के गले में गलथना की उपमा दी है जो न तो पेशाब करने के काम आता और न उससे दूध ही निकलता, व्यर्थ में ही गले में भार बना होता है। वह साकट पुत्र माता-पिता के गले का गलथना सिद्ध होता है।(19)

वाणी:- कबीर, सब जग निर्धना, धनवंता ना कोय।
धनवंता सो जानिये, जा पै राम नाम धन होय।।(20)

> सरलार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने कहा है कि जो व्यक्ति संसार में अधिक धन संपत्ति के स्वामी हैं, सामान्यतः जनता उनको धनवान कहती है। कबीर जी ने बताया है कि उस धनवान व्यक्ति की मृत्यु हो गई, सारा धन यहीं छोड़ गया। जब धन यहीं रह गया तो वह संसार से निर्धन बनकर गया। जो भक्त भक्ति करता है, वह राम नाम की कमाई करके राम नाम का धन संग्रहित करता है। भक्त को यहाँ पर भी परमात्मा धन देता है, मृत्यु के उपरांत भक्ति धन उसके साथ जाता है। धनवंता अर्थात् साहूकार तो वह है जिसके पास राम नाम की भक्ति का धन है। उदाहरण:- ‘‘काशी शहर में भोजन भण्डारा करना‘‘ अ परमेश्वर कबीर जी ने स्वयं एक भक्त का अभिनय करके उपरोक्त अमृतवाणी की सत्यता दृढ़ की है।

सर्व विदित है कि काशी शहर में रहने वाला कबीर जुलाहा एक झोंपड़ी में रहता था। कुल पाँच सदस्यों का परिवार था। दो मुँहबोले माता-पिता (नीमा तथा नीरू) जिनको परमेश्वर कबीर जी काशी शहर के बाहर लहरतारा नामक तालाब में कमल के फूल पर नवजात शिशु के रूप में मिले थे। एक लड़की मृत्यु के उपरांत उसके परिवार ने कब्र में दफना रखी थी। लड़की का पिता शेखतकी पीर था जो दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी का धार्मिक गुरू भी था। राजा सिकंदर का असाध्य रोग परमेश्वर कबीर जी के आशीर्वाद से ठीक हो गया था। जिस कारण से सिकंदर लोधी राजा कबीर जी को अल्लाह की जात कहता था। जो उस धार्मिक पीर शेखतकी को गवारा नहीं था। वह कबीर जी से ईर्ष्या रखता था। कबीर जी को नीचा दिखाकर राजा की नजरों में अपनी महिमा बरकरार रखना चाहता था। वह कबीर जी को अल्लाह तो छोड़, वह संत भी मानने को तैयार नहीं था। उसने शर्त रखी कि यदि कबीर जी किसी मुर्दे को जीवित कर दे तो मैं इन्हें अल्लाह (भगवान) मान लूंगा।

एक 12 वर्ष के लड़के का शव गंगा में बहता जा रहा था। शेखतकी ने राजा सिकंदर से कहा कि यदि कबीर जी इस मुर्दे बालक को जीवित कर दें तो मैं इन्हें अल्लाह मान लूंगा और इनका मुरीद (शिष्य) बन जाऊँगा। हजारों व्यक्तियों की उपस्थिति में परमेश्वर कबीर जी ने उस 12 वर्षीय लड़के को तत्काल जीवित कर दिया। दर्शकों ने कहा कमाल कर दिया। बालक का नाम कमाल रख दिया और अपने पुत्र के रूप में कबीर जी ने रखा। शेखतकी ने कहा यह बालक सदमे में था, मृत नहीं था। एक दिन से अचेत था, ऐसा तो इत्तफाक (संयोग) से होना था, नाम कबीर का हो गया। मैं तो तब मानूं जब मेरी लड़की को जीवित करे जो 20 दिन से कब्र में है। परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि आज से तीसरे दिन तेरी लड़की को जीवित कर दूंगा। ऐसा कर, दिल्ली शहर तथा आसपास में मुनादी (।कअमतजपेमउमदज) करा दे, सब देखने आऐं। ऐसा ही किया गया। लड़की की कब्र खोद दी गई। परमेश्वर कबीर जी ने उस लड़की को तुरंत जीवित कर दिया। सर्व दर्शकों ने कहा कमाल कर दिया। लड़की का नाम कमाली रखा। लाखों दर्शकों ने परमेश्वर कबीर जी से दीक्षा ली, परंतु भाग्यहीन शेखतकी फिर भी नहीं समझा। उसकी ईर्ष्या बढ़ती ही चली गई। उस लड़की ने अपने पिता शेखतकी के साथ जाने से मना कर दिया और 1) घण्टे तक उपस्थित जनता को प्रवचन कर बताया कि ये स्वयं अल्लाह अकबर कबीर जी हैं, ये सामान्य व्यक्ति नहीं हैं। आपने भी देख लिया है मेरे को जीवन दान दिया है। मेरे मानव जीवन का संस्कार शेष नहीं था। मुझे अपना वास्तविक पिता मिल गया है। मैं कबीर अल्लाह के साथ जाऊँगी। कबीर जी ने उस कमाली लड़की को अपनी बेटी के रूप में रखा। इस प्रकार परमेश्वर कबीर जी का परिवार पाँच सदस्यों का था। परमेश्वर कबीर जी जुलाहे का कार्य करते थे जो धन कमाने की दृष्टि से नहीं था। परमेश्वर कबीर जी तो लीला करके हमें सच्चे भक्त की भूमिका करके उदाहरण देना चाहते थे, उसी उद्देश्य से यह कार्य चुना था। कपड़ा बुनने से जो कमाई (पदबवउम) होती थी, उससे कठिनता से निर्वाह चलता था। परमात्मा कबीर जी सत्यज्ञान अर्थात् तत्वज्ञान का प्रचार भी करते थे। हिन्दू धर्म के गुरूजन ब्राह्मणों की अज्ञानता उजागर करते थे। जिस कारण से सर्व पंडित कबीर जी के विरोधी हो गए थे। दूसरी ओर मुसलमान धर्म के मुल्ला-काजी भी कबीर जी के यथार्थ ज्ञान से बौखला गए थे।

शेखतकी सब मुसलमानों का मुखिया अर्थात् मुख्य पीर था जो पहले से ही खार खाए था अर्थात् पहले से ही ईर्ष्या करता था। सर्व ब्राह्मणों तथा मुल्ला-काजियों व शेखतकी ने मजलिस (मीटिंग) करके षड़यंत्र के तहत योजना बनाई कि कबीर निर्धन व्यक्ति है। इसके नाम से पत्र भेज दो कि कबीर जी काशी में बहुत बड़े सेठ हैं। उनका पूरा पता है कबीर पुत्र नूरअली अंसारी, जुलाहों वाली कॉलोनी, काशी शहर। कबीर जी तीन दिन का धर्म भोजन-भण्डारा करेंगे। सर्व साधु संत आमंत्रित हैं। प्रतिदिन प्रत्येक भोजन करने वाले को एक दोहर (जो उस समय का सबसे कीमती कम्बल के स्थान पर माना जाता था), एक मोहर (10 ग्राम स्वर्ण से बनी गोलाकार की मोहर) दक्षिणा देगें। प्रतिदिन जो जितनी बार भी भोजन करेगा, कबीर उसको उतनी बार ही दोहर तथा मोहर दान करेगा। भोजन में लड्डू, जलेबी, हलवा, खीर, दही बड़े, माल पूडे़, रसगुल्ले आदि-2 सब मिष्ठान खाने को मिलेंगे। सुखा सीधा (आटा, चावल, दाल आदि सूखे जो बिना पकाए हुए, घी-बूरा) भी दिया जाएगा। एक पत्र शेखतकी ने अपने नाम तथा दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी के नाम भी भिजवाया। निश्चित दिन से पहले वाली रात्रि को ही साधु-संत भक्त एकत्रित होने लगे। अगले दिन भण्डारा होना था। परमेश्वर कबीर जी को संत रविदास दास जी ने बताया कि आपके नाम के पत्र लेकर लगभग 18 लाख साधु-संत व भक्त काशी शहर में आए हैं। भण्डारा खाने के लिए आमंत्रित हैं। कबीर जी अब तो अपने को काशी त्यागकर कहीं और जाना पड़ेगा। कबीर जी तो जानीजान थे। फिर भी अभिनय कर रहे थे, बोले रविदास जी झोंपड़ी के अंदर बैठ जा, सांकल लगा ले। अपने आप चले जाएंगे झख मारकर। हम बाहर निकलेंगे ही नहीं। परमेश्वर कबीर जी अन्य वेश में अपनी राजधानी सत्यलोक में पहुँचे। वहाँ से नौ लाख बैलों के ऊपर गधों जैसा बौरा (थैला) रखकर उनमें पका-पकाया सर्व सामान भरकर तथा सूखा सामान (चावल, आटा, खाण्ड, बूरा, दाल, घी आदि) भरकर पृथ्वी पर उतरे। सत्यलोक से ही सेवादार आए। परमेश्वर कबीर जी ने स्वयं बनजारे का रूप बनाया और अपना नाम केशव बताया। दिल्ली के सिकंदर बादशाह तथा उसका धार्मिक पीर शेखतकी भी आया। काशी में भोजन-भण्डारा चल रहा था। सबको प्रत्येक भोजन के पश्चात् एक दोहर तथा एक मोहर (10 ग्राम सोना{ळवसक}) दक्षिणा दी जा रही थी। कई बेईमान संत तो दिन में चार-चार बार भोजन करके चारों बार दोहर तथा मोहर ले रहे थे। कुछ सूखा सीधा (चावल, खाण्ड, घी, दाल, आटा) भी ले रहे थे। यह सब देखकर शेखतकी ने तो रोने जैसी शक्ल बना ली और जाँच (Enquiry) करने लगा। सिकंदर लोधी राजा के साथ उस टैंट में गया जिसमें केशव नाम से स्वयं कबीर जी वेश बदलकर बनजारे (उस समय के व्यापारियों को बनजारे कहते थे) के रूप में बैठे थे। सिकंदर लोधी राजा ने पूछा आप कौन हैं क्या नाम है आप जी का कबीर जी से क्या संबंध है केशव रूप में बैठे परमात्मा जी ने कहा कि मेरा नाम केशव है, मैं बनजारा हूँ। कबीर जी मेरे पगड़ी बदल मित्र हैं। मेरे पास उनका पत्र गया था कि एक छोटा-सा भण्डारा (भोजन कराने का आयोजन) करना है, कुछ सामान लेते आइएगा। उनके आदेश का पालन करते हुए सेवक हाजिर है। भण्डारा चल रहा है। शेखतकी तो कलेजा पकड़कर जमीन पर बैठ गया जब यह सुना कि एक छोटा-सा भण्डारा करना है जहाँ पर 18 लाख व्यक्ति भोजन करने आए हैं। प्रत्येक को दोहर तथा मोहर और आटा, दाल, चावल, घी, खाण्ड भी दिए जा रहे हैं। इसको छोटा-सा भण्डारा कह रहे हैं। परंतु ईर्ष्या की अग्नि में जलता हुआ विश्राम गृह में चला गया जहाँ पर राजा ठहरा हुआ था। सिकंदर लोधी ने केशव से पूछा कबीर जी क्यों नहीं आए केशव ने उत्तर दिया कि उनका गुलाम जो बैठा है, उनको तकलीफ उठाने की क्या आवश्यकता जब इच्छा होगी, आ जाएंगे। यह भण्डारा तो तीन दिन चलना है। सिकंदर लोधी हाथी पर बैठकर अंगरक्षकों के साथ कबीर जी की झोंपड़ी पर गए। वहाँ से उनको तथा रविदास जी को साथ लेकर भण्डारा स्थल पर आए। सबसे कबीर सेठ का परिचय कराया तथा केशव रूप में स्वयं डबल रोल करके उपस्थित संतों-भक्तों को प्रश्न-उत्तर करके सत्संग सुनाया जो 24 घण्टे तक चला। कई लाख सन्तों ने अपनी गलत भक्ति त्यागकर कबीर जी से दीक्षा ली, अपना कल्याण कराया। भण्डारे के समापन के बाद जब बचा हुआ सब सामान तथा टैंट बैलों पर लादकर चलने लगे, उस समय सिकंदर लोधी राजा तथा शेखतकी, केशव तथा कबीर जी एक स्थान पर खड़े थे, सब बैल तथा साथ लाए सेवक जो बनजारों की वेशभूषा में थे, गंगा पार करके चले गए। कुछ ही देर के बाद सिकंदर लोधी राजा ने केशव से कहा आप जाइये आपके बैल तथा साथी जा रहे हैं।

जिस ओर बैल तथा बनजारे गए थे, उधर राजा ने देखा तो कोई भी नहीं था। आश्चर्यचकित होकर राजा ने पूछा कबीर जी! वे बैल तथा बनजारे इतनी शीघ कहाँ चले गए उसी समय देखते-देखते केशव भी परमेश्वर कबीर जी के शरीर में समा गए। अकेले कबीर जी खड़े थे। सब माजरा (रहस्य) समझकर सिकंदर लोधी राजा ने कहा कि कबीर जी! यह सब लीला आपकी ही थी। आप स्वयं परमात्मा हो। शेखतकी के तो तन-मन में ईर्ष्या की आग लग गई, कहने लगा ऐसे-ऐसे भण्डारे हम सौ कर दें, यह क्या भण्डारा किया है महौछा किया है। महौछा उस अनुष्ठान को कहते हैं जो किसी गुरू द्वारा किसी वृद्ध की गति करने के लिए थोपा जाता है। उसके लिए सब घटिया सामान लगाया जाता है। जग जौनार करना उस अनुष्ठान को कहते हैं जो विशेष खुशी के अवसर पर किया जाता है, जिसमें अनुष्ठान करने वाला दिल खोलकर रूपये लगाता है। संत गरीबदास जी ने कहा है कि:-

गरीब, कोई कह जग जौनार करी है, कोई कहे महौछा।
बड़े बड़ाई किया करें, गाली काढे़ औछा।।

सारांश:- कबीर जी ने भक्तों को उदाहरण दिया है कि यदि आप मेरी तरह सच्चे मन से भक्ति करोगे तथा ईमानदारी से निर्वाह करोगे तो परमात्मा आपकी ऐसे सहायता करता है।

भक्त ही वास्तव में सेठ अर्थात् धनवंता हैं। भक्त के पास दोनों धन हैं, संसार में जो चाहिए वह भी धन भक्त के पास होता है तथा सत्य साधना रूपी धन भी भक्त के पास होता है।

वाणी:- कबीर, कहता हूँ कह जात हूँ, कहूँ बजा कर ढ़ोल।
श्वांस जो खाली जात है, तीन लोक का मोल।। (21)

> सरलार्थ:- कबीर जी ने श्वांस के द्वारा सत्यनाम के स्मरण की कीमत बताई है कि एक श्वांस के द्वारा किए गए सत्यनाम के स्मरण की कीमत (Value) तीन लोक (1- स्वर्ग लोक 2- पाताल लोक 3- पृथ्वी लोक) के समान है। ऐसे मँहगे (कीमती) श्वांस को स्मरण के बिना गँवाना (खोना) भक्त के लिए हानिकारक है। यह बात मैं (कबीर जी) ढ़ोल के डंके पर कह रहा हूँ अर्थात् पूरे विश्वास से कह रहा हूँ कि आपका एक श्वांस भी स्मरण के बिना जाता है तो यह तीन लोक के समान कीमत वाला है।(21)

वाणी:- कबीर, ऐसे मँहगे मोल का, एक श्वांस जो जाय।
चौदह लोक न पटतरे, काहे धूर मिलाय।।

> सरलार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने एक श्वांस से सत्यनाम के स्मरण की ऊपर लिखी वाणी सँख्या 21 में कीमत बताई है। उसके बाद इस वाणी 22 में दृढ़ किया है कि ऐसा कीमती श्वांस एक भी बिना स्मरण के जाता है तो आपको कितनी हानि होती है फिर कहा है कि ऊपर की वाणी में जो एक श्वांस के स्मरण की कीमत तीन लोक कही है, वह तो थोड़ी है, इसकी कीमत के पटतरै अर्थात् बराबर तो चौदह लोक भी नहीं हैं। चौदह लोक उपरोक्त तीन लोकों (1- स्वर्ग 2- पाताल 3- पृथ्वी) से भिन्न हैं। जैसे श्री विष्णु जी का लोक, श्री शिव जी का लोक, श्री दुर्गा जी का लोक, श्री इन्द्र जी का लोक, ब्रह्म लोक, गोलोक आदि-आदि 14 लोक तीन लोकों से भिन्न हैं। संत गरीबदास जी ने परमेश्वर कबीर जी से प्राप्त तत्वज्ञान में इसी श्वांस के द्वारा सत्यनाम के स्मरण की कीमत इस प्रकार बताई है:-गरीब, सत्यनाम पालड़ै रंग होरी हो, चौदह लोक चढ़ावै राम रंग होरी हो। तीन लोक पासंग धरै रंग होरी हो, तो ना तुलै तुलाय राम रंग होरी हो।। अ सरलार्थ:- सत्यनाम दो अक्षर का मंत्र है। इसमें एक ओम् (ॐ) अक्षर है, दूसरा सांकेतिक ‘तत्‘ मन्त्र है। इन दोनों अक्षरों का स्मरण एक का श्वांस से (जो श्वांस बाहर छोड़ते हैं) तथा दूसरे का उश्वांस (जो श्वांस अंदर लेते हैं) से किया जाता है। संत गरीबदास जी ने बताया है कि इस प्रकार सत्यनाम को स्मरण करने की कीमत है कि तुला (तराजु ठंसंदबम) के एक पलड़े में यह श्वांस-उश्वांस का सत्यनाम का स्मरण रख दे, दूसरे पालड़े में चौदह (14) लोक रख दे और तीन लोक तो पासंग के स्थान पर रख दे तो भी सत्यनाम के स्मरण की कीमत अधिक होगी। तुला का वह पलड़ा जिसमें सत्यनाम रखा है, फिर भी भारी रहेगा अर्थात् सत्यनाम का श्वांस से किया जाने वाला स्मरण अनमोल है। इस प्रकार स्मरण करने वाले साधक का भक्ति धन अधिक संग्रहित (इकट्ठा) होता है। शीघ्र भक्ति का धनी बनकर मोक्ष प्राप्त करता है। (22)

वाणी:- कबीर, जीवन तो थोड़ा भला, जे सत्य सुमिरन होय।
लाख वर्ष का जीवना, लेखे धरे ना कोय।। (23)

> सरलार्थ:- जैसा कि ऊपर बताया है कि वह सत्य स्मरण विधि है। यदि ऐसी विधि से स्मरण किया जाए तो यदि थोड़ा जीवनकाल भी बचा हो तो भी मोक्ष प्राप्त हो जाएगा। सत्य स्मरण न करके अन्य विधि से साधना चाहे लाख वर्ष की लम्बी आयु तक करते रहो, उसका कोई लेखा (।बबवनदज) नहीं होगा, व्यर्थ प्रयत्न होगा।(23)

वाणी:- कबीर, कहता हूँ कह जात हूँ, सुनता है सब कोय।
सिमरन से भला होएगा, नातरै भला न होय।। (24)

> सरलार्थ:- कबीर परमेश्वर जी ने स्पष्ट किया है कि भक्ति की साधना में नाम स्मरण सर्वोत्तम है। जैसे कुछ साधक ज्ञान यज्ञ अर्थात् सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय या सत्संग करना, कीर्तन-जागरण करना अधिक पसंद करते हैं। कुछ साधक हवन यज्ञ को अधिक महत्व देते हैं। कुछ धर्म यज्ञ को ही करके मोक्ष मानते हैं। परमेश्वर कबीर जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि:-

जप-तप सयंग साधना, सब स्मरण के मांहीं।
कबीर जाने रामजन, सुमिरन सम कछु नाहीं।।

सरलार्थ पहले कर दिया है। कबीर जी के कहने का तात्पर्य है कि यज्ञ भी करना है, परंतु नाम बिना यज्ञ व्यर्थ है।

उदाहरण के लिए = जैसे किसान गेहूँ बीजता है। उसके पश्चात् खाद भी डालता है, सिंचाई भी करता है। यदि किसान खेत में बीज डाले नहीं और खाद-पानी डालता रहे तो उसको गेहूँ प्राप्त नहीं हो सकते। अब गेहूँ के बीज को तो नाम मानो और खाद-पानी को यज्ञ। यज्ञों की जानकारी पूर्व में बता दी है। (धर्म यज्ञ, ध्यान यज्ञ, ज्ञान यज्ञ, हवन यज्ञ और प्रणाम यज्ञ) इसलिए उपरोक्त वाणी सँख्या 24 में कहा है कि नाम स्मरण से भला होगा अन्यथा लाभ नहीं होगा।(24)

वाणी:- कबीर, हरि की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार।
धूवें जैसा धौलहरा, जात न लागै बार।। (25)

> सरलार्थ:- परमेश्वर की भक्ति के बिना मनुष्य का जीवन धिक्कार है। जिस परिवार तथा प्रोपर्टी को अपना मानकर फूला फिरता है, यह तो जैसे धुवाँ बहुत फैला नजर आता है, हवा चलते ही पता नहीं चलता, धुँवा कहाँ चला जाता है। इसी प्रकार जिस बड़ी कोठी और कार को प्राप्त करके परमात्मा की भक्ति भूल गया है। इन सबको जाते तथा जीवन अन्त होते देर नहीं लगेगी। जैसे भूकम्प में 8-8 मंजिल की कोठियाँ समाप्त हो गई थी, अन्दर ही मालिक सपरिवार मर गए थे। इसलिए कहा है कि परमात्मा की भक्ति बिना मनुष्य जन्म धिक्कार है।(25)

वाणी:- कबीर, भक्ति भाव भादौ नदी, सभी चलैं गहराय।
सरित सोय जानियो, जो ज्येष्ठ मास ठहराय।। (26)

> सरलार्थ:- जैसे भादौ मास में वर्षा अधिक होती है, जिस कारण से सर्व नाले भी विशाल रूप धारण करके बहने लगते हैं और नदी जैसे दिखाई देते हैं। परंतु सरिता अर्थात् दरिया तो उसको मानो जिसमें ज्येष्ठ महीने में भी पर्याप्त जल बह रहा हो। जैसे भक्तों को परमात्मा सुख दे रहा है तो सबका भाव-श्रद्धा उमड़ती दिखाई देती है। सब ही परम भक्त नजर आते हैं क्योंकि उस समय उन पर परमेश्वर की कृपा बरस रही होती है। वह समझें भादौ मास। जब कभी ज्येष्ठ मास आए अर्थात् कोई आपत्ति का समय आ जाए। यदि उस समय भी परमात्मा में श्रद्धा और विश्वास बना रहता है तो समझें वह परम भक्त है।(26)

वाणी:- कबीर, भक्ति बीज बिनसै नहीं, आ पड़ै सौ झोल।
जै कंचन बिष्टा पड़ै, घटै न ताका मोल।। (27)

> सरलार्थ:- कबीर परमेश्वर जी ने भक्त के लक्षण तथा महिमा बताई है। कहा है कि जो भक्ति बीज अर्थात् सच्चा भक्त होगा, उसका नाश नहीं होता। वह भक्ति नहीं छोड़ता चाहे सैंकड़ों आपत्तियाँ आ पड़ें। चाहे संसार के लोग उसे कितना ही बदनाम करें, चाहे कितना ही अपमानित करें। परमात्मा के दरबार में उसकी महिमा कम नहीं होती। जैसे स्वर्ण यदि बिष्टे (टट्टी-गोबर) में गिर जाए तो भी उसकी कीमत कम नहीं होती।(27)

वाणी:- कबीर, कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।
भक्ति करै कोई सूरमा, जाति वर्ण सब खोय।। (28)

> सरलार्थ:- कामी जो विषय-वासना में लिप्त हो, जो क्रोधी है, लालची है, उससे भक्ति नहीं होती। भक्ति तो कोई शूरवीर करेगा जो जाति तथा कुल से ऊपर उठकर विचार करेगा और कुल की लाज को समाप्त करके अपना कल्याण कराऐगा।(28)

वाणी:- कबीर, जब तक भक्ति सकामना, तब लग निष्फल सेव।
कहैं कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी निज देव।। (29)

> सरलार्थ:- जब तक भक्त स्वार्थ पूर्ति के लिए भक्ति करता है। कभी कार माँगता है, कभी कोठी। तब तक उसकी सेव अर्थात् पूजा व्यर्थ है। परमेश्वर कबीर जी समझा रहे हैं कि ऐसे साधक को वह परम पुरूष प्राप्त नहीं होता। केवल आत्म कल्याण के लिए भक्ति करने वाले को संसारी लाभ तथा मोक्ष दोनों मिलते हैं।

उदाहरण:- जैसे किसान गेहूँ की फसल उगाता है। उसका उद्देश्य भुष प्राप्त करना नहीं होता। उसका उद्देश्य जीवनदाता अन्न गेहूँ प्राप्त करना होता है। फिर भुसा तो अपने आप ही प्राप्त हो जाता है। यदि किसान भूसा प्राप्त करने घास बीजकर सर्व लाभ की इच्छा करे तो वह व्यर्थ है। इसी प्रकार ऐसी भक्ति करें जिसका उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति हो, उससे सांसारिक लाभ भी अवश्य मिलेंगे, वे तो भक्ति के ठल च्तवकनबज होते हैं अर्थात् भक्ति के साथ मुफ्त मिलते हैं।(29)