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सतसाहेब

सतगुरु देव की जय

बंदी छोड़ कबीर साहेब की जय

बंदी छोड़ गरीब दास जी महाराज की जय

स्वामी राम देवानंद जी गुरु महाराज जी की जय हो

बंदी छोड़ सतगुरु रामपाल जी महाराज जी की जय हो

सर्व संतों की जय,

सर्व भक्तों की जय,

धर्मी पुरुषों की जय

श्री काशी धाम की जय

श्री छुड़ानी धाम की जय।

श्री करोंथा धाम की जय।

श्री बरवाला धाम की जय

सतसाहेब।

गरीब दंडवतं गोविंद गुरु बंधु अविजन सोए पहले भए प्रणाम तिन नमो जो आगे होए। गरीब सतगुरु पूर्ण ब्रह्म हैं सतगुरु आप अलेख सतगुरु रमता राम है या में मीन ना मेख।

परमपिता परमात्मा कबीर जी की असीम रजा से बच्चों! आपको अपने घर की जानकारी हुई। इस काल के लोक के षड्यंत्र का आपको पता चला। सबसे ज्यादा नुकसान आपका, यदि इस जीवन में होता है वो अध्यात्म का होता है। बाकी संपत्ति, संतान, ये संस्कार से आपको मिलती रहती हैं। जो भक्ति नहीं करते और भक्ति सत्य नहीं करते, जहां तक जिस स्तर की भी है तो उस स्तर की भी सतभक्ति होनी चाहिए जैसे जो ब्रह्म साधना करते हैं वो भी वेद अनुकूल होनी चाहिए। वो वेद अनुकूल भी नहीं है।

गरीबदास जी कहते हैं:

तुम्हारी बात वेद के खिलाफ है रे! तुम जो बातें बनाते फिरते हो, इन नकली गुरूओ से कहते थे परमात्मा। तुम्हारा जो ज्ञान है ये भी वेद के विरुद्ध है। चारों वेदों का सारांश श्रीमद्भागवत गीता है।

इसमें तप को करने वालों को मूर्ख, राक्षस, मुझे भी दुखी करने वाले और शरीर के अंदर विराजमान शक्तियां, कमलों में विराजमान उनको भी परेशान करते हैं उनको असुर योनियों में डालूंगा। भक्ति कोई बच्चों का काम नहीं है। एक जीवन का सौदा है ये। सबसे बड़ा सौदा ये है। परमात्मा की कृपा से आपको इस सौदे के करने का सही तरीका मिला।

पूरा सतगुरु मिल गया। संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान मिला। कभी विचार करते हो आप बैठके बात बातों में ये क्या हो गया? प्रारंभ में इतनी रुचि नहीं होती। जितनी अब आपकी बनती जा रही है क्योंकि बच्चे प्रथम कक्षा में जब पढ़ते हैं उनका भाव कुछ और ही होता है। धीरे-धीरे वो उच्च classes (क्लासेस-कक्षा) में पहुंच जाते हैं तो उनकी लग्न विशेष हो जाती है। अब आपकी लग्न विशेष होती जा रही है अब आपका दिमाग, आपकी बुद्धि विकसित हो गई है इसलिए आप कोशिश करते हो कि ज़्यादा से ज़्यादा समय भगवान की सेवा में, सुमरन में और सत्संग जैसे अब परमात्मा की कृपा से दास ने आपको मालिक की महिमा बतानी शुरू की है इसमें भी आप बहुत अच्छी रुचि ले रहे हो।

तो इससे सिद्ध हो गया है कि आपको यह समझ आ चुकी है के किया जा तो यह काम है। बाकी तो मजबूरी है। वो तो ना करेंगे, तो तुरंत दिखाई दिया। ना करेंगे तो नुकसान घना होगा और इसको नहीं करेंगे, अध्यात्म ज्ञान से पता चलता है कि यह ना करेंगे तो कतई सत्यानाश हो जाएगा। किते जोगे नहीं रहेंगे (कहीं के नहीं रहेंगे)।

तो बच्चों? यह ज्ञान से ही सारी बातें होती हैं और ज्ञान सतगुरु बिना नहीं मिलता।

गुरू बिन काहूं ना पाया ज्ञाना, ज्यों थोथा भुस छड़े मूड किसाना। गुरु बिन वेद पढ़े जो प्राणी समझे ना सार रहे अज्ञानी।।

एक बात तो यह सिद्ध हो जाती है कि अभी तक गुरु किसी को प्राप्त नहीं था। यदि प्राप्त होता तो यह ज्ञान पहले ही होता हमारे पास और जिन महापुरुषों को ज्ञान हुआ उनकी किसी ने सुनी नहीं। आदरणीय गरीबदास साहेब जी, मेरे पूज्य गुरुदेव जी, तो उनकी किसी ने सुनी नहीं और परमात्मा ने अब जाकर के यह सब व्यवस्था की है। उनका वचन था जब कलयुग 5505 बीत जाएगा, 5500 वर्ष बीत जाएगा तब अपने एक दास को भेजूंगा।

गुरु बिन काहूं ना पाया ज्ञाना, ज्यों थोथा भुस छड़े मूड किसाना। गुरु बिन वेद पढ़े जो प्राणी, समझे ना सार रहे अज्ञानी।।

तो बच्चों! अब वो आपको गुरु प्राप्त हुआ है। जैसे आपको बताया है कि;

यह सौदा फिर नाहीं संतों, यो सौदा फिर नाहीं।।

मनुष्य जीवन का जो सौदा है, इस मानव जीवन का जो सौदा है इसमें अगर नुकसान हो गया तो यह बहुत ज़्यादा नुकसान है। इसका फिर इस जीवन में कई जीवनों के अंदर भी यह अक्षति पूर्त्ति नहीं होगी और इसके ज़िम्मेदार यह नकली गुरु हैं जो काल के दूत हैं। अब तो यह मान बढ़ाई के भूखे हज़ार, 2 हज़ार चेले हो जाएं, चेली हो जाएं। इनको दान दक्षिणा मिल जा, फिर इनकी मौज हो जा। परमात्मा की तरफ जो लगते हो, संस्कारी बच्चे होते हैं परमात्मा के। जैसे गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 और 20 से 23 में काल कहता है कि तीनों गुणों रजगुरु ब्रह्मा, सतोगुण विष्णु, तमगुण शिवजी से जो कुछ भी हो रहा है उसका निमित्त मैं हूं वो मेरे कारण हो रहा है।

इसको एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों को नित खाना होता है उनके शरीर से तप्तशिला में भून के, उनमें सूक्ष्म शरीर से वो शोरबा निकालता है और जीव को इतनी पीड़ा होती है, मूर्छित होने के बाद वह अचेत हो जाते हैं उसके बाद उनको उठाकर फेंक देता है। फिर धर्मराज के दरबार में लाइन लगती है। किसी को स्वर्ग, किसी को नरक, कोई राजा बने जाओ, सारा काल का खाजा।

तो बच्चों! यह काल का षड्यंत्र सतगुरु बिना नहीं कोई बता सकता। परमात्मा स्वयं सतगुरु बनकर आए उन्होंने यह पर्दाफाश किया। जैसे गीता के अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 और 20 से 23 में यह कहता है कि, जो कुछ ब्रह्मा जी से उत्पत्ति, विष्णु जी से स्थिति यानी पालन, शंकर जी से संहार इन तीनों गुणों के द्वारा, जो कुछ भी हो रहा है उसका निमित्त मैं हूं। फिर स्पष्ट कर दिया कि जो केवल इन तक की भक्ति करते हैं ब्रह्मा, विष्णु महेश तक तीनों गुणों की जो भक्ति करते हैंऔर इनसे आगे कोई बात सुनने को तैयार नहीं हैं राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यो में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूर्ख, यह मुझे भी नहीं भजते। 20 से 23 में यही स्पष्ट किया है कि अन्य देवता जो हैं इनसे हटकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश और नीचे के देवताओं की जो पूजा करते हैं उन अल्प बुद्धि वालों का वो ज्ञान अक्षिणिक है व लाभ उनकी भक्ति के कारण मैंने उनको कुछ शक्ति दे रखी है। यानी यह मूर्खों की पूजा है।

फिर बताता है कि मेरी भक्ति चार प्रकार के करते हैं आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। आर्त वो होते हैं जो संकट निवारण के लिए भगवान की भक्ति करता है। तो जो केवल वेदों अनुसार साधना करता है अपने संकट निवारण के लिए वेद मंत्रों का अनुष्ठान करता है वो आर्त है और एक अर्थार्थी यानी धन लाभ के लिए भगवान की जो भक्ति वेदों में लिखे मंत्रों के आधार से उसकी साधना करता है धन प्राप्ति को उद्देश्य लेकर भक्ति करता है वह अर्थाथी है।

जिज्ञासु। जिज्ञासु वो होते हैं जो जगह-जगह जाकर जैसा भी ज्ञान उनको मिलता है उसकी खिचड़ी बनाके और स्वयंभू गुरु बनकर जनता के, भोले श्रद्धालुओं के नाश करने पर जुट जाते हैं, लग जाते हैं। उनको ना सिर का पता होता, ना पैर का, ना वो अध्यात्म ज्ञान से परिचित होते। उनके गुरु भी ऐसे ही नकली और वो फिर आगे सारी साधना व्यर्थ की बताते हैं।

फिर बताया कि चौथी प्रकार के ज्ञानी। यह ज्ञानी आत्मा मुझे बहुत अच्छी लगती है क्योंकि यह मुझे चाहते हैं। सातवें अध्याय के 18 श्लोक में स्पष्ट कर दिया या है यह ज्ञानी आत्मा है तो उद्धार यानि कती (बिल्कुल) निर्मल आत्मा के, समर्पित हैं, कुर्बान हैं परमात्मा के लिए लेकिन यह मेरे वाली अनुत्तमा गतिम् मेरे से प्राप्त होने वाली अनुत्तम, अश्रेष्ठ, निष्कृष्ट, गति, मोक्ष में आश्रित। यह अनुत्तम शब्द है।

उत्तम माने अच्छा, अनुत्तम इसका विपरीतार्थक शब्द है। यह हमारे धर्मगुरु, इसका अनुवाद इसमें लिख रखा अति श्रेष्ठ जिससे श्रेष्ठ कोई ना हो। कोई फेल हो जाता बच्चा और वो कहता है मेरे लिख रखा है अनुतीर्ण। यानी फेल और कोई कहे इसमें लिख रखा है इससे बढ़कर कोई पास नहीं। सफल हो गया। वह कहने को तो कुछ भी कह सकता है परंतु वो बात गलत है। सातवें अध्याय के 19वें श्लोक में स्पष्ट कर दिया है;

बहु नाम जन्मा नाम अंते, ज्ञानवान माम प्रबद्यते।

यह ज्ञानी आत्मा भी अनेकों जन्मों में तो ऐसे गलत साधना करते रहे नीचे की। किसी अंत के समय में, कोई ज्ञानी आत्मा मेरी भक्ति करता है बस। कोई कोई और;

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:।

जो गीता, इतना पवित्र शास्त्र है कितना अनमोल ज्ञान इसके अंदर है। जिसने इसका अनुवाद ठीक से नहीं करना आया उन्होंने अनुवाद कर दिया यह तो और सत्यानाश कर दिया। अर्थों का अनर्थ करके जनता में भेज दिया। उसी आधार पर सब आश्रित होकर के बस। उस अच्छे ज्ञान को गलत बनाकर पेश किए गए को सत्य मान लिया यह स्पष्ट कर दिया है कि जो संत, जो महात्मा गुरु यह बताए कि वासुदेव है क्या? Definition of Vasudev (डेफिनिशन ऑफ़ वासुदेव- वासुदेव का मतलब क्या है)। वासुदेव यह श्री कृष्ण को कहते हैं। वासुदेव तो वेदों में लिखा है। श्री कृष्ण जी तो द्वापर युग में पैदा हुए। यह वासुदेव के पुत्र थे। एक नाम था, एक व्यक्ति का।

वासुदेव का अर्थ होता है बच्चों! जिस परमात्मा की सतह सब के ऊपर हो, चक्रवर्ती, सर्वव्यापक, अनंत कोटि ब्रह्मांड का स्वामी और जो ये बताए कि वासुदेव ही सब कुछ है। यज्ञों में प्रतिष्ठित करके, उसको मूल रूप से, ईष्ट रूप में पूजा जाता है। वह सारी सृष्टि का रचनहार है। सब का पालनकर्ता है। सबका धारण पोषण करने वाला वही है। जीव को मुक्ति दिलाने वाला पाप कर्मों का नाशक/ नाश करने वाला वही है केवल उसकी भक्ति करो। यह खुद गीता बोलने वाला कहता है कि 18वें अध्याय के 62वें श्लोक में, अर्जुन तू सर्व भाव से उस परमेश्वर की शरण में जा।

उसकी कृपा से ही तू परम शांति को, सनातन परमधाम को प्राप्त होगा। हमारी बात यहां पर अड़ी है दूसरे लोगों, संतों के साथ कि तुम उसको जानते नहीं तुम्हारा गीता बोलने वाला ही नहीं जानता, उसके लिए कह दिया की, किसी तत्वदर्शी संतों से जाकर पूछो,‌ बात खत्म हो गई। तो ये ऐसा ज्ञान देने वाला संत सो दुर्लभ है।

अब जैसे 15वें अध्याय के चौथे श्लोक में बताया है कि तत्वदर्शी संत प्राप्त होने पर, उससे प्राप्त तत्वज्ञान रूपी शस्त्र से, इस अज्ञान को काटके, उसके पश्चात परमेश्वर के, उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहां जाने के बाद साधक फिर संसार में लौटकर कभी नहीं आते।

तो बच्चों! यह बताने वाला संत सो दुर्लभ:। आपको सुलभ हो चुका है।

तत्वज्ञान कोई ना कहे रै झूमकरा। पैसे ऊपर नाच सुनो रई झूमकरा। कोटों मे तो कोई नहीं रे झूमकरा। अरबों में कोई गर्क सुनो रई झूमकरा।।

तत्वज्ञान बताने वाला संत। हे झूमकरा! हे रामराय! आपको करोड़ों में नहीं मिलेगा। अरबों में कोई गर्क। गर्क का अर्थ होता है कती परिपूर्ण, हर तरह से उसको अधिकार हो, उसको दीक्षा देने का, उसको ज्ञान हो संपूर्ण, पूरी भक्ति विधि उसके पास हो। उसको गर्क बोलते हैं। गर्क यानी सर्व संपन्न।

तो बच्चों! फिर वो सतगुरु क्या बताता है?

यो सौदा फिर नाही संतों यो सौदा फिर नाहीं। यो सौदा फिर नाहीं रे संतों यो सौदा फिर नाहीं।।ओए होए….

बच्चों! 1 सेकेंड में,‌ पल में, पता नहीं ये फूंक निकल जा कब और जिसका लालच देकर अपने को मूर्ख बना रखा है कति महामूर्ख। आपको और थोड़े से दिन में ये ज्ञान सुनते रहो अच्छी तरह समझ में आ जाएगी। लेकिन अब मूर्ख बन चुके हैं। हम मूर्ख बनकर संस्कार खराब कर चुके हैं। हमारा संस्कार, परिवार जो कुछ भी है यह बन चुका है। अब हमने इसको सेट करना है। अब काल के जाल को ऐसे काटना है। इन बच्चों को भी मालिक की शरण में लगा देंगे।

अब उस संस्कार को कति खत्म कर देगा परमात्मा। जिसने एक दूसरे को कष्ट देना था और कोई वैसे नहीं आ रहे बेटा- बेटी बनके। कोई ना कोई ऐसी रोज़ कांटा सा चुभोए जाते हैं। कोई लड़का बकवाद कर आवे, लठ्ठम लट्ठा हो जा। कोई लड़की बकवाद कर दे, भाग जा अपने दूसरी अपने कुल की मर्यादा तोड़कर। तो मां-बाप रो रो मर जा। तो परमात्मा इनको ऐसा सेट कर देगा, यह भगवान के बच्चे बनकर लाइन पर चलेंगे।

उदाहरण देख लो आपके प्रत्यक्ष सामने हैं। जिनके सुथरे दिन आ गए, सुदिन उन्होंने दास के प्रत्येक वचन को फॉलो किया। बेटी क्या होती है? बेटी पिछले जन्म का हमने इसका किते मार रख्या था धन और उस बटेयू (दामाद) का जो बेटी का पति बनता है पिछले जन्मों में हमने बकवाद करके, ठगी करके इनको ठग रखा होता है और फिर वो छाती पर बैठकर लेंगे सारा और देना पड़े।

तुमने उस दरगाह का महल नहीं देखा, धर्मराज के तिल तिल का लेखा।।

भगवान देगा उसमें कोई दुख नहीं होगा। ऐसे अटबट बकवास करके, किते ले लियो पाई पाई देनी होगी। अब ऐसे संस्कार बदलता है ये कबीर भगवान। अब इन बेटियों को हम, एक चवन्नी नहीं लगती हमारी एक पैसा नहीं लगता और बेटी कति खुश होकर, ज्ञान को समझ कर और अपना जीवन सफर शुरू कर देते हैं बच्चे। आश्रम में शादी कराई और जाओ- कमाओ बेटा। भक्ति करो भगवान की, दो रोटी देगा दाता। काट दिए संस्कार सारे। ना तो मरते दम तक आज भात आ गया, कल छूछक था। अब बालक का हो गया, छोरी को ये पहुंचना सै, नयूं लाना सै (है)। कोथली आ गई, सिंधारे आ गया। ब्रानमाटी चून में न्यू फूले फिरें जांदे पका के।

लेना एक न देना दो। तो अब यह संस्कार में हम फंस गए, लेकिन समर्थ की शरण क्यों लेते हैं? इसीलिए तो लेते हैं कि हमारे बिगाड़े हुए कर्मों को, हमारे किए गए उत्पातों को, अब दाता ठीक करेगा और करने लग रहा है। धीरे-धीरे कतई clear (कलियर-साफ) भी हो जाएगा। तो अब आपने और हमने क्या करना है? हम करते क्या रहे। सौदा क्या होता है? जैसे 10-20-5-7 लाख रुपए ले लिया किसी से उधार पर और देश-प्रदेश में चले जाते थे पहले।

वहां धर्मशालाओं में रूकते थे। जिन को लग्न होती थी, जिनको ज्ञान होता था, वो धन से सौदा खरीद-खरीद कर दुगना-तिगुना-चौगुना करके अपने घर आते थे और मालोमाल हो जाते थे। आप भी सुखी और परिवार भी सुखी और जिनकी बुद्धि भ्रष्ट थी उसी पैसे से वहां जाकर शराब पीते और होटलों में ऐश करते और जब वह खत्म हो जाते मुंह लटका के घर पर आते। जिनसे उधार लेकर गए थे, वो कहता है, ला वापस दे, ना मजदूर लग जा। तो बच्चों! यह वही प्रमाण दिया है जो आज ठीक ढंग से सच्चे गुरु के पास जाकर और डटकर भक्ति करेंगे, मर्यादित रहेंगे वो इस मनुष्य जीवन की पूंजी को दुगना-तिगुना-चौगुना कर लेंगे और कुछ मुर्ख भक्ति करते नहीं। बच्चों! यह जीवन का सौदा है।

यो सौदा फिर नाही संतों यो सौदा फिर नाही।

जो प्रदेश में जाके अपनी पूंजी नष्ट करके आ जाते हैं, उनकी दुर्गति होती है और जो इसको संभाल लेते हैं वो साहूकार बन जाता है।

कबीर, सब जग निर्धना धनवंता ना कोई, धनवान सोई जानिए जिस पर राम नाम धन होए।

यो सौदा फिर नाहीं संतों यो सौदा फिर नाहीं। यो सौदा फिर नाहीं संतों, यो सौदा फिर नाहीं। लोहे जैसा ताव जात है, लोहे कैसा ताव जात है काया दे सराही संतों यो सौदा फिर नाहीं। यो दम टूटै पिंडा फूटै वो लेखा दरगाह मांही संतों यो सौदा फिर नाहीं। तीन लोक और भवन चतुर्दस, तीन लोक और भवन चतुर्दस सब जग सौदे आही संतों यो सौदा फिर नाहीं। दूने तिने किये चौगने, दूने तिने किये चौगने, किन्ही मूल गवांई संतों यो सौदा फिर नाहीं। उस दरगह में मार पड़ेगी, जम पकड़ेंगे बांहीं संतों यो सौदा फिर नाही।।

परमात्मा के दरबार में जब जाओगे, भक्तिहीन प्राणियों की यम के दूत बांह मरोड़ के और जूत मारते ले जाते हैं।

वा दिन की मोहे डरनी लागे। वा दिन की मोहे डरनी लागे, लज्जा रहे कि नाहीं संतों यो सौदा फिर नाहीं। नर नारायण देह पायकर, फिर 84 जांही रे संतों यो सौदा फिर नांही।।

परमात्मा ने अपने जैसा शरीर आपको दिया है। यह नर रूप, नारायण के जैसी ये शरीर है, देही है। ऐसे सुंदर शरीर को पाकर फिर 84 लाख कुत्ते, गधे, सूअर के शरीर प्राप्त करने जा रहे हो। धिक्कार है तुम्हारे को!

जा सतगुरु की मैं बलिहारी, जा सतगुरु की मैं बलिहारी, जो जामन मरण मिटाई रे संतो यो सौदा फिर नांही।।

स्पष्ट कर दिया है कि उस सतगुरु के ऊपर बलिहारी जाऊं, कुर्बान हो जाऊं, जो जन्म-मरण मिटा दे।

कुल परिवार तेरा सकल कबिला। कुल परिवार तेरा सकल कबिला, मसलत एक ठहरायी रे संतों यो सौदा फिर नाहीं। बाध पिंजरी आगे धर लिया, मरघट ने ले जाही रे संतों यो सौदा फिर नाहीं।।

मृत्यु के बाद, सब की एक राय हो जाती है। इसको उठाओ और फूंको। ना तो कीड़े पड़ जाएंगे बांस उठेगी।

बांध पिंजरी आगे धर लिया, फिर मरघट में ले जाई। अग्नि लगा दिया जद लंबा। अग्नि लगा दिया जद लंबा फूंक दिया उस ठांई रे संतों यो सौदा फिर नाहीं।।

अब कर दिया काम। फूंक फांककर और जब तक यह शरीर में ठीक-ठाक चाले (चल रहा) था, उद्मस तार रखा था। जो काम करने का था वो करा नहीं और करना चाहा तो यह दुश्मन नकली गुरु, काल के दूत यह ऐसा जुल्म करते हैं।

यह पैसे ऊपर नाच सुनो राय झूमकरा, पैसे के लिए। वेद बांध फिर पंडित आए, पीछे गरुड़ पढ़ाही रे संतों यो सौदा फिर नाहीं।।

उसके मरने के बाद गरुड़ पुराण का पाठ करते हैं। आप करते जिंदे जी, मरने से पहले करते ताकि उसके अकल पड़े। अच्छे बुरे कर्मों का, निर्णय पता लगे। अपने जीवन को उसके अनुसार set (सेट-तरीक से) करके शुभ कर्म करके जावे। गरुड़ पुराण में बताया जाता है कि जिसने ऐसे कर्म करे उसको ऐसा जन्म मिलता है, जो ऐसे करता है उसको ऐसा मिलता है। परमात्मा कहते हैं, “वो मर गया। ईब उस पुराण ने पढ़ लो क्या फायदा उसका? यह शिक्षा तो पहले देनी चाहिए थी उसको। ताकि पाप करने से बचता, शुभ कर्म ठीक से करता। अब गरुड़ पुराण का पाठ भी कर दिया। फिर क्या हुआ?”

नर सेती फिर पशुआ कीजै, गधा बैल बनाई रे संतों यो सौदा फिर नाहीं। नर सेती फिर पशुआ कीजै, नर सेती फिर पशुआ कीजै, गधा बैल बनाई रे संतों यो सौदा फिर नाहीं।।

बच्चों! एक-एक पंक्ति का, एक-एक, आधी-आधी पंक्ति भी ऐसा गज़ब का ज्ञान से भरी हुई है जै ध्यान दो। थोड़ा सा डर लगेगा। आदमी से पशु बनेंगे और;

56 भोग कहां मन बोरे, कुरड़ी चरणे जाई।

बताओ। नर सेती फिर पशुआ कीजै, गधा बैल बनाई। नर सेती फिर पशुआ किजै, गधा बैल बनाई। रे संतों यो सौदा फिर नाहीं। ये 56 भोग कहां मन बोरे, किते कुरड़ी चरणे जाईं रे संतों यो सौदा फिर नाहीं।।

बच्चों! ये ब्रह्म मुहूर्त और ये अमृत वचन आपको सारा दिन ऐसा बांध के रखेंगे मन पापी के बकवाद करने की सोच रहा होगा तो भी हाथ उल्टे हो जाएंगे। आज हम कितना सुंदर भोजन खाते हैं। जब चाहे भूख लगे खा लेते हैं। बढ़िया से बढ़िया भोजन, जितना जिसकी औकात है खूब सुथरा खाते हैं। पशु-पक्षियों से तो अच्छा खाते हैं। भक्ति न करने से, भक्ति गलत करने से, पशु बन गए, गधे बन गए, कहते हैं;

यह सुंदर भोजन कहां मन बोरे, कितै कुरड़ी चरने जाईं।

यह किसी डूम भाट के गीत नहीं। कोई नॉवल की बनावटी कथा नहीं। यह परमात्मा कबीर जी का दिया गया ज्ञान, उसके बच्चे संत गरीबदास जी महापुरुष का दिया एक शब्द भी गलत नहीं है इसमें एक शब्द, एक अक्षर भी। हम अपनी बुद्धि से तोलें तो अलग बात है। अब अपनी बुद्धि जीव की है, यह परमात्मा प्राप्त महापुरुष थे इनकी किसी भी बात पर अविश्वास, स्वप्न में भी नहीं करना हमने।

बच्चों! एक-एक बात आपकी छाती में रखा जाएगा यह। पहले दास ने जो ज्ञान दिया आपको सब प्रमाणों से प्रमाणित किया। 8, 9, 10 साल तक लगातार यह दिखाने पड़े। आज आपको जो भी दास कहेगा, किसी प्रमाण के दिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। तो दास कहना चाहता है कि, आपको यह ज्ञान सुनाया जा रहा है यह महापुरुष गरीबदास जी द्वारा बोला गया है और उन्होंने भगवान को आंखों देखा था। उनसे प्राप्त ज्ञान है यह।

अब क्या बताते हैं : उधर तो गरूड़ पुराण का पाठ किया। फिर श्राद्ध शुरू हो गए। फिर महीना। पहले तो बहुत पंगा था क्योंकि कई तो महीने मनाए जाते। फिर छमाही। छठे महीने। फिर वर्षी। फिर उसका काज करना और फिर जैसे मृत्यु के बाद अस्थियों को उठाकर गंगा में गेर के आना। वो सारी क्रिया मुक्ति के लिए करी जाती थी। अस्थियां उठाकर गंगा में डलवाना पंडित जी के द्वारा क्रिया मंत्र बोल कर डालेगा तेरे पिता की मुक्ति हो जाएगी। गति हो जाएगी। फिर तेरहवीं करनी। फिर महीने करा करते। फिर छमाही, फिर बरसी। उसके बाद श्राद्ध शुरू हो जाते। फिर पिंड भरवाओ। अब क्या कहते हैं;

प्रेत शिला पर जाए विराजे। प्रेत शिला पर जाए विराजे, पितरों पिंड भराई रे संतों यो सौदा फिर नाहीं।।

अब सारी क्रिया कर्म कर दिए। अब श्राद्ध काढो। श्राद्ध निकालो किस लिए? के हो सकता है तुम्हारा पिता, माता कौवा बन गए हों। उनको भोग लग जाएगा।

बहुर श्राद्ध खान को आए। बहुर श्राद्ध खान को आए। काग भए कल मांही रे संतों यो सौदा फिर नाहीं।

भूत बन गए, फिर प्रेत बन गए, पिंडदान करो। परमात्मा कहते हैं, पिंड दान कर दिया।

भूत जूनि जहां छूटत है, पिंड प्रदान करंत गरीबदास, जिंदा कहे नहीं मिले भगवंत।।

भूत जूनी छूट गई काग बन गए। अब काग के लिए आए साल श्राद्ध करो और पिता जी को कौवा बनके आ गया इसको भोग लगाओ। कहां से गति कराण लगे थे, मोक्ष करा थे कौवा बना कर छोड़ दिया।

रे भोली सी दुनिया सतगुरु बिन कैसे सरिया। रे भोली सी दुनिया सतगुरु बिन कैसे सरिया। अपने लला के बाल उतरवावें देखो ना कैंची लग जइयां। एक बकरी का बच्चा लेके उसका गला कटिया। रे भोली सी दुनिया सतगुरु बिन कैसे सरिया। जीवित बाप गैले लठम लट्ठा मूए गंग पहुचियां। जब आवे आसोज का महीना फिर कौवा बाप बनईया। अरे भोली सी दुनिया सतगुरु बिन कैसे सरिया। काच्चा पाक्का भोजन बनाकर माता धोंकने जईयां। उस माता ऊपर कुत्ता ‌मूते ओ क्यों ना मर गईयां। रे भोली सी दुनिया सतगुरु बिन कैसे सरिया।

अब गरीबदास जी कहते हैं;

प्रेतशिला पर जाएं बिराजे, प्रेतशिला पर जाएं बिराजे पितरों पिंड भराईं रे संतों यो सौदा फिर नाहीं। बहुर श्राद्ध खान कूं आए। बहुर श्राद्ध खान को आए, काग भए कल माही। रे संतों यो सौदा फिर नाही। जे सतगुरु की संगत करते। जे सतगुरु की संगत करते, सकल कर्म कट जाईं रे संतों यो सौदा फिर नाही।।

एकै वाणी में स्पष्ट कर दिया परमात्मा के बच्चे ने,

जे सतगुरु की संगत करते सारे झंझट मिट जाते। सकल कर्म कट जाहीं, अमर पुरी पर आसन होते हैं जहां धूप ना छांही। अमरपुरी पर आसन होते। अमरपुरी पर, सतलोक में, जहां धूप न छाई। रे संतों यो सौदा फिर नाही। सुरती निरती मन पवन पियाना। सुरति निरती मन पवन पियाना शब्दे शब्द समाई रे संतों यो सौदा फिर नाही। यो सौदा फिर नाही रे संतों यो सौदा फिर नाहीं।। गरीबदास गलतान महल में, गरीबदास गलतान महल में मिले कबीर गोसाईं। रे संतो यो सौदा फिर नाहीं। संतो यो सौदा फिर नाहीं। यो सौदा फिर नाहीं रे संतों यो सौदा फिर नांही।

बच्चों! परमात्मा के इस प्रयत्न को, इस अनमोल ज्ञान को हल्के में ना लो। ना तो दास का आपसे कुछ लालच है आपको देख लिया होगा इतने वर्षों से लग रहा है दास। ना कोई ऐसा मैं रोटी न मिलने के पाखंड करने निकला हूं। परमात्मा को देख लो क्या स्वार्थ था उनका? कपड़े बुनने की लीला करते थे हमारे लिए। जगह-जगह भटक के हमें राह दिखाया करते थे। अब बालक मत रहो। अब इस ज्ञान से mature (मेच्योर- समझदार) हो जाओ। इस गंदे लोक से निकलने की कति दृढ़ संकल्प कर लो। क्या कहते हैं;

मन नेकी कर ले दो दिन को मेहमान। कहां से आया कहां जाएगा तन छूटेगा तब कहां समाएगा। आखिर तुझको कौन कहेगा गुरु बिन आत्म ज्ञान। मन नेकी कर ले दो दिन को मेहमान।

परमात्मा आंखों में आंसू भर कर 50-100 खड़े होते थे सत्संग सुनने के लिए बैठ जाते चौराहे पर खड़े होकर कहा करते थे, और ये कहते थे;

आखिर तुझको कौन कहेगा यह गुरु बिन ऐसा ज्ञान जो तुम कौन हो? कहां से आए हो? इस गंदे लोग में क्यों फंसे पड़े हो? यह तरीका है इससे निकलने का। बच्चों! जैसे गोरखनाथ जी को परमात्मा कबीर जी ने कहा था,

“गोरखनाथ में सबन का गुरुवा।”

तो गोरखनाथ जी बोले, तुमरा वचन मोहे लागे कड़वा। के बहुत गलत बोल रहे हो।

कबीर साहब बोले,

“कड़वा लगे सो मीठा होई। हमरी बात पतीजे सोई। गोरखनाथ सिद्धि में भूला, टूणें टामण हांडे फूला।”

सोने का पर्वत को, पहाड़ को, सोने का बना दिया था उसने, अपने वचन की शक्ति से। यहां तक सिद्धि प्राप्त था गोरखनाथ और गरीबदास जी कहते हैं;

“गोरखनाथ सिद्धि में भूला और टूणें टामण हांडै फूला। ये टूणे टामण बताए। जंतर-मंतर योग नहीं भाई कालचक्र जमजोरा खाई। भ्रम भक्ति ना कीजै भाई। तुम हो जम की फर्दी माहीं।।

तुम काल की फरद में चढ रहे हो पक्के। उसके नाम हो चुके हो। हम बतावें यह साधना कर लो। आजा गोरख तेरा पीछा छुटवां दूं। गोरखनाथ जी एक बार प्रभावित हुए, ज्ञान सुना। प्रथम मंत्र दाता ने, second (सेकींड-दूसरा) और प्रथम मंत्र उसको दे दिया था। लेकिन सारनाम बिना मोक्ष नहीं हो सकता क्योंकि वो परमात्मा का बच्चा था तगड़ी तड़प थी।

तो बच्चों! आप भी कभी गोरखनाथ जैसे सिद्ध रहे हो। लेकिन आपका वो process (प्रोसेस-प्रक्रिया) पूरा हो चुका है। अब आपका final (फाइनल-अंतिम) game (गेम-खेल) है। इन बातों को हल्के में ना लेना। यह मत समझना मैं वैसे ही कह रहा हूं। कति प्रमाणित, एक नंबर की, सारी की सारी सच्चाई है।

आपका फाइनल जीवन है। ईब के आपने कति कुर्बान होना पड़ेगा क्योंकि आपको सभी foul point (फाउल पॉइंट-गलत पहलू) पता लग गया और कैसे-कैसे हम इस स्थिति तक पहुंच चुके हैं। अब क्या आप, अब भी धोखा खाओगे? अब भी ऐसी गलती करोगे? यह बच्चों का खेल नहीं है जो आपको परमात्मा ने शरण दी है। यह ज्ञान समझ में आया, उसकी कृपा बिना नहीं हो सकता। आपके गांव में, पूरा-पूरा गांव भरा है और कोई सुनता भी नहीं। बिना भाग के क्योंकर सुनें इंसान।

लखबर सुरा जूझ ही लखवर सांवत देह। लखवर यति जहान में तब सतगुरु शरणा ले।।

आप ऐसी पुण्य आत्मा हो। आपकी किस्मत की प्रशंसा जितनी करूं उतनी थोड़ी है। पर इसको आप भी समझो। कुर्बान हो जाओ। यह दो दिन का ढमढमा है पता नहीं कब फूंक निकल जाएगी। स्धरा धराया रह जाएगा। जिसके लिए सत्संग सुनने का टाइम भी नहीं तुम्हारे पास और यह कहां से क्या हो रहा है देखो। अरे! कहीं तो देख लो किसी दृष्टिकोण से तो मालिक ने पहचान लो। बच्चों! परमात्मा आपको मोक्ष दे। आपको सद्बुद्धि दे।‌ आपको सतलोक का सुख और काल का कष्ट गहराई से याद रहे।

सतसाहेब

विशेष संदेश 30: भक्ति का महत्त्व और भक्त धर्मदास जी का मोक्ष →