जब से आत्मा भगवान से अलग हुई है, वह बेचैन है और असीम शांति की तलाश में भटक रही है।  मानव जीवन कर्मों के इर्द-गिर्द घूमता है। मनुष्यों द्वारा किए गए शुभ कर्म उसे मानव जीवन में सभी सुविधाएं और सुख प्रदान करते हैं जबकि पापों के परिणामस्वरूप दुःख और व्यथा होते है। हिंदू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म के अनुयायी कर्मों में दृढ़ता से विश्वास रखते हैं।

आत्मा जन्म और पुनर्जन्म की पीड़ा से छुटकारा पाना चाहती है; इसलिए, मानव जन्म में आत्मा अपने शुभ/पुण्य कर्मों को बढ़ाने और पापों को कम करने के लिए विभिन्न धार्मिक प्रथाओं का पालन करती है।  तथ्य यह है कि मानव जन्म सतभक्ति द्वारा, जो शास्त्र आधारित है, मोक्ष पाने के लिए प्राप्त होता है। यदि इस प्रमुख उद्देश्य से ध्यान भटकता है तो मानव जन्म बिल्कुल व्यर्थ है।  बाकी सब गतिविधियाँ जीव अन्य जीवन रूपों में भी कर रहे हैं।  परिवार के सदस्यों के साथ स्नेह, उनकी जिम्मेदारियों को पूरा करना और इनकी जैसी(गतिविधियां) अन्य जीव भी समान रूप से कर रहे हैं। फिर, मनुष्य और उन जानवरों और पक्षियों और अन्य प्रजातियों के बीच कहां अंतर रह जाता है?

अंतर यह है; मनुष्य बुद्धिमान हैं और आसानी से भगवान की अवधारणा को समझ सकते हैं और अपने मुख्य उद्देश्य अर्थात मोक्ष प्राप्त करने के लिए भक्ति कर सकते हैं। आज हम मनुष्य हैं और जीवन में बहुत सारी सुविधाएं हैं लेकिन हम भूल जाते हैं कि मृत्यु के बाद हम पशु बन जाएंगे। जिस लोक में हम रह रहे हैं उसे शैतान भगवान अर्थात ब्रह्म-काल का लोक कहा जाता है। वह भोली-भाली आत्माओं को धोखा देता है और झूठी धार्मिक प्रथाओं के माध्यम से गुमराह करता है ताकि आत्माएं उसके जाल में रह जाएं और भक्ति की सही विधि के बारे में, भगवान की अवधारणा के बारे में कभी भी न जानें; जिससे आत्माएं निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त कर सकेंगी।

निर्वाण प्राप्त करने का अर्थ है आध्यात्मिक जीवन जो बुरे कर्मों को नष्ट कर देता है को व्यतीत करते हुए जन्म और पुनःजन्म के चक्र को पार करने में विजय प्राप्त करना। जैन धर्म में निर्वाण (मोक्ष) की वही अवधारणा योगियों के लिए, अनुयायियों और साधकों जो तीर्थंकरों को भगवान मानते हैं के लिए आध्यात्मिक लक्ष्य है। यह उनके कर्मों को अच्छे आचरण द्वारा बढ़ाने के लिए है जो एक बेहतर पुनर्जन्म का मार्ग दिखाएंगे जो मुक्ति के एक कदम करीब हो सकता है। जैन धर्म के अनुयायियों जो कर्मों में दृढ़ता से विश्वास करते हैं और जिनका आध्यात्मिक लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है की जानकारी के लिए यह लेख आँखे खोलने वाला होगा।

जैन धर्म के पवित्र शास्त्रों के गहन शोध और विश्लेषण से पता चलता है कि जैन धर्म के साधकों के बीच प्रचलित वर्तमान धार्मिक प्रथाएं मोक्ष प्राप्ति के लिए अनुचित और व्यर्थ हैं। तो, भक्ति की सही विधि क्या है जिससे मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं? जैन धर्म में भगवान और तीर्थंकरों की क्या अवधारणा है?

हम जैन धर्म और उनकी धार्मिक प्रथाओं का विश्लेषण करेंगे और इस लेख के माध्यम से निर्णय करेंगे कि भक्ति की सही विधि क्या है जो आत्मा की मुक्ति की ओर ले जाती है। इस लेखन का मुख्य अंश यह होगा: -

  •  जैन धर्म के बारे में संक्षिप्त जानकारी
  •  जैन धर्म में धार्मिक प्रथाएं
  •  जैन धर्म में भगवान की अवधारणा
  •  जैन धर्म में तीर्थंकर कौन हैं?
  •  अरिहंत कौन है?
  •  ऋषभ देव कौन थे?
  •  भगवान आदिनाथ कौन थे?
  •  महावीर जैन कौन थे?
  •  जैन धर्म में जन्म और पुनर्जन्म की अवधारणा
  •  जैन धर्म के संस्थापक की मृत्यु कैसे हुई?
  •  भक्ति की सही विधि क्या है?
  •  परम ईश्वर कौन है?

 

जैन धर्म के बारे में संक्षिप्त जानकारी

जैनियों का मानना ​​है कि उनका धर्म सनातन है और ब्रह्मांड अनंतकाल से विद्यमान एक अनुपचारित(जिसे बनाया न गया हो) हस्ती है। जैन धर्म प्राचीन भारतीय धर्म है जिसका मुख्य धार्मिक परिसर अहिंसा, तप, अपरिग्रह (अनासक्ति) और अनेकांतवाद (अनेक-पक्षपात) हैं। जैन मुख्यतः शाकाहारी

जीवन शैली का नेतृत्व करते हैं।  वे जानवरों को नुकसान नहीं पहुंचाते। वे अहिंसा में विश्वास करते हैं और इसे न केवल अपनी गतिविधियों में बल्कि अपने बोल-चाल और विचारों में भी इसका अभ्यास करते हैं। जैन धर्म के अनुयायी सत्य बोलने में विश्वास करते हैं। तपस्या जैन धर्म में मुख्य बिंदु है जिसे पालन करने की परंपरा है क्योंकि जैन मानते हैं कि तपस्या के माध्यम से उनके चौबीस तीर्थंकर निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं।

जैन धर्म की उत्पत्ति को जानकर जैन धर्म के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त होगी।

  •  जैन धर्म की उत्पत्ति
  •  जैन धर्म के संस्थापक कौन हैं?
  •  जैन धर्म की धार्मिक पुस्तक कौन सी है?
  •  जैन धर्म में निर्वाण की अवधारणा

जैन धर्म की उत्पत्ति

 विद्वानों का मत है कि जैन धर्म की उत्पत्ति सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान 7वीं - 5वीं शताब्दी ई.पू. में भारत के पूर्वी भाग में गंगा के बेसिन में लगभग 3000 ई.पू. हुई। एक स्थायी सवाल उठता है; क्या जैन धर्म दुनिया का सबसे पुराना धर्म है? जैन धर्म कोई धर्म नहीं है, यह जीवन का मार्ग है। हिंदू धर्म यानी सनातन धर्म सबसे पुराना धर्म है जो जैन धर्म से पहले आया था।

जैन धर्म के संस्थापक कौन हैं?

 जैन धर्म के संस्थापक ऋषभ देव या ऋषभ नंदा हैं जो प्रथम तीर्थंकर हैं। वह 'इक्ष्वकु वंश' के संस्थापक हैं। वह सूर्यवंशी राजा नाभिराज के पुत्र हैं, जो अवसर्पिनी (जैन धर्म के अनुसार अंतरिक्षीय समय के आधे से उतरते हुए) के अंतिम कुलकार (एक बुद्धिमान व्यक्ति जो जीवित रहने के लिए परिश्रमी कार्यों के बारे में मार्गदर्शन करता है) थे। ऐसा माना जाता है कि राजा नाभिराज ने पुरुषों को सिखाया था कि नाभि को कैसे काटते है।

पुस्तक 'जैन धर्म का विश्वकोश', 'जैन संस्कृति शब्दकोश, भाग 1, 'जैन संस्कृति का इतिहास', 'कला और पुरातत्व' जिसके लेखक प्रो भागचंद्र जैन भास्कर हैं। सनमति प्रज्ञा रिसर्च इंस्टीट्यूट, नागपुर, कला और धार्मिक अनुसंधान संस्थान, वाराणसी और प्रकाशक डॉ. प्रेम शंकर द्विवेदी और डॉ. भागचंद्र जैन भास्कर हैं।

यह पुस्तक इस बात का प्रमाण देती है कि ऋषभ देव जी जैन धर्म के संस्थापक हैं

पृष्ठ 175 पर, यह उल्लेख किया गया है कि ऋषभ देव के पोते मरीचि (भरत के पुत्र) जिन्हें वैदिक धर्म का संस्थापक माना जाता है, बाद में जैन धर्म के महावीर जैन बन गए।

पृष्ठ 176-177 पर- जैन धर्म का इतिहास। प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव जी के जीवन इतिहास का उल्लेख है। यह नीचे समझाया जाएगा कि ऋषभ देव कौन थे?

जैन धर्म की धार्मिक पुस्तक कौन सी है?

जैन धर्म में पवित्र पुस्तक एक नहीं है जैसा कि अन्य धर्मों में कुरान और बाइबिल है। जैन साहित्य दो भागों में विभाजित है; दिगंबर और श्वेतांबर। पवित्र पुस्तकों की ये दो श्रेणियां हैं।

अगम साहित्य: यह प्राकृत भाषा में लिखा गया है जिसमें मूल ग्रंथ शामिल हैं जो गंधारों द्वारा संकलित किए गए हैं जिनमें महावीर जैन और श्रुत-केवली के उपदेश हैं जो अंग-अगम के विस्तार हैं।

गैर-अगम साहित्य: यह मराठी, संस्कृत, प्राकृत, गुजराती, हिंदी, तमिल, जर्मन और अन्य भाषाओं में लिखा गया है। इसमें अगम साहित्य और विद्वानों, तपस्वियों और बड़े भिक्षुओं के आत्मनिर्भर कार्यों की व्याख्या है।

जैन धर्म में निर्वाण की अवधारणा

जैनों का मानना ​​है कि एक सुरक्षित, सुखी और शांत जगह है, जहाँ पहुंचना मुश्किल है, जहाँ न कोई बीमारी, न बुढ़ापा, न दर्द, न मौत है। वह निपुणता या निर्वाण है। उनका मानना ​​है कि महान संत वहां पहुंच चुके हैं और दुखों से मुक्त हो चुके हैं। उन्होंने अस्तित्व के प्रवाह पर विराम लगा दिया है।

नोट: संत बताते हैं कि 'सतलोक' नामक एक अविनाशी स्थान है, जहाँ परमात्मा परम अक्षर ब्रह्म रहते हैं, जहाँ न कोई बुढ़ापा है, न दुःख है, न मृत्यु है। तत्त्वदर्शी संत द्वारा दी गयी पूर्ण परमात्मा की सत भक्ति से उस अविनाशी स्थान को प्राप्त किया जाता है।  इसे आगे इस लेख में समझाया जाएगा।

जैन धर्म में धार्मिक प्रथाएं

यहां, हम विश्लेषण करेंगे: - क्या जैन धर्म में ओंकार मंत्र वेद और श्रीमदभगवद गीता में 'ओम' मंत्र के समान है?

जैनों का मानना ​​है कि ऐसे कई तरीके और साधन हो सकते हैं जिससे परमात्मा की भक्ति की जा सकती है। जैन धर्म सबसे मजबूत तपस्वी परंपरा को दर्शाता है जो तपस्या से प्रेरित है।  इसमें निःवस्त्र रहना, उपवास और तपस्या करना शामिल है।  यह पिछले कर्मों को नष्ट और नए कर्मों की उतपत्ति को समाप्त करने के विश्वास के साथ किया जाता है। यह हठ योग की श्रेणी में आता है।

जैन धर्म में, दो प्रकार के ऋषि हैं-

  • जो निःवस्त्र रहते हैं और पिछले/पूर्व महापुरुषों/संतों का अनुसरण करते हैं। जैन धर्म के सभी अनुयायी; पुरुष, महिलाएं, बच्चे, बूढ़े उन नग्न संतों की पूजा करते हैं। उन्हें 'दिगंबर ऋषि' कहा जाता है। इसमें स्त्रियों को ऋषि नहीं बनाया जाता है।

नोट: समझने के लिए जरूरी है;  क्या जैन महिलाएँ मोक्ष प्राप्त करना नहीं चाहती हैं? अगर आपका रास्ता सत्य है, तो महिलाओं को भी निःवस्त्र करें और जुलूस निकालें। सच को नकारने और केवल परंपरा का पालन करने से भगवान को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

  • दूसरी श्रेणी 'श्वेतांबर ऋषियों' की है। वे सफेद कपड़े पहनते हैं और मुंह पर कपड़े की एक पट्टी बांधते हैं। इसमें महिलाएं भी ऋषि होती हैं। जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों को सांसारिक सुखों से खुद को अलग करना पड़ता है।  उन्हें कामुक सुखों से दूर रहना होगा और संपत्ति और सभी सामाजिक संबंधों को त्यागना होगा।

नोट:- जो महिलाएं या पुरुष श्वेतांबर से दीक्षा लेते हैं, उनके सिर और दाढ़ी के बाल उनके हाथों से खिंचवा कर निकलवाये जाते हैं। यह अत्यधिक दर्दनाक है। जैन अनुयायी साधना में मानते हैं; शरीर को यातना देना अत्यधिक लाभदायक है। जबकि वास्तव में, इस तरह का अभ्यास और विश्वास व्यर्थ है और नरक की ओर जाता है। मोक्ष कल्पना से भी परे है।

नोट: - श्रीमद् भागवत गीता जैसा पवित्र ग्रंथ का अध्याय 6 श्लोक 16 भगवान प्राप्ति के मार्ग में उपवास को सख्ती से प्रतिबंधित करता है। गीता अध्याय 4 श्लोक 25-31 में कहा गया है कि सभी साधक गलती से अपनी धार्मिक प्रथाओं को पापनाशक मानते हैं और इन व्यर्थ प्रथाओं को करते रहते हैं।

इसलिए, इस तरह की धार्मिक प्रथाएं भक्तों के मन में एक प्रश्न चिन्ह उठाती हैं। क्या यह भक्ति की सही विधि है? क्या इस भक्ति विधि से भगवान प्राप्त होंगे?  आइए हम एक महान संत के प्रवचनों से समझने की कोशिश करें।

महान संत गरीबदास जी अपनी अमृत वाणी में कहते हैं जो उन्हें सर्वशक्तिमान कविर् देव ने बताया था

ग़रीब, प्रथम अन्न जल संयम रखें,
योग युक्त सब सतगुरु भाखे।

अर्थ: व्यक्ति को अपने खान-पान में संयम बनाए रखना चाहिए।  भक्ति का यह तरीका मुझे मेरे सतगुरु ने बताया है। इससे सिद्ध होता है कि हठ योग और उपवास पूजा का सही तरीका नहीं है।

क्या जैन धर्म में 'नमोंकार' मंत्र वेद और गीता जी में 'ओंकार' मंत्र के समान है?

जैन धर्म में 'नमोंकार' मंत्र सामान्य प्रार्थना है। वे 'णोंकार' मंत्र का जाप करते हैं जो पवित्र श्रीमद भगवद गीता अध्याय 8 श्लोक 13 और वेद में उल्लिखित 'ॐ' मंत्र का गलत रूप और गलत उच्चारण है।

नोट: गीता जी का ज्ञान दाता यानी ब्रह्म-काल कहता है कि जो प्राणी 'ॐ' मंत्र का जाप करके ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं अर्थात ब्रह्म तक की पूजा करने वाले भी पुनरावृत्ति में हैं- गीता अध्याय 8 श्लोक 16। वह गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में बताता है कि उसकी साधना(जो उसकी भक्ति करते हैं उनकी भक्ति साधना) हीन है। 'ओम' मंत्र केवल तभी काम करता है जब वह एक तत्वदर्शी संत द्वारा दिया गया हो। यह धार्मिक साधना भी गीता जी के अनुसार व्यर्थ है।

यह स्पष्ट करता है कि 'नमोंकार' मंत्र का जाप जीव को मुक्त नहीं करेगा। हां, यह वही 'ओम' मंत्र है, लेकिन उच्चारण गलत है। यह निर्वाण प्राप्त करने के लिए अनुचित है।

गीता अध्याय 17 श्लोक 23 परमात्मा प्राप्ति के लिए अर्थात पूर्ण मोक्ष प्राप्त करने के लिए बतलाता है कि साधक द्वारा तीन मंत्रों का जाप किया जाना चाहिए जो तभी काम करता है जब केवल प्रबुद्ध संत, तत्वदर्शी संत ॐ-तत्-सत (सांकेतिक) मन्त्र प्रदान करता है।

गीता अध्याय 4 श्लोक 32-34 बताता है कि केवल तत्वदर्शी सन्त द्वारा बताई गई भक्ति विधि से पूर्ण मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

उपरोक्त प्रमाण साधकों में शंका उतपन्न करते हैं कि जैन धर्म में की जाने वाली धार्मिक प्रथाएं परमात्मा प्राप्ति के लिए अनुचित और महत्वहीन प्रतीत होती हैं। फिर पूजा का सही तरीका क्या है? आइए आगे बढ़ें और जैन धर्म में भगवान का गहनता से विश्लेषण करें। 

जैन धर्म में भगवान की अवधारणा

हम जैन धर्म के अनुसार पता करते हैं; भगवान साकार है? या वह निराकार है?

एक बहुदेववादी धर्म होने के नाते जैनी एक भगवान में विश्वास नहीं रखते हैं। जैनियों का मानना है कि जीव की गुणवत्ता को कर्म निर्धारित करते हैं और ब्रह्मांड को अस्तित्व में रखने के लिए कोई परम शक्ति की आवश्यकता नहीं है। कोई रचनात्मक परम शक्ति नहीं है जिसने ब्रह्मांड की रचना की है। ब्रह्मांड का कोई निर्माता भगवान नहीं है। आरम्भ से ही

अस्तित्व है जो एक महिला का एक पुरुष के साथ मिलन होने के बाद से होता है और बाद में सभी मर जाते हैं। 

जैनी मूर्तिपूजा में विश्वास करते हैं। वे हिंदुओं की तरह भगवान उदाहरण के लिए, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी, श्री ब्रह्मा जी या देवी दुर्गा जी की कोई मूर्ति नहीं रखते हैं। उनका मानना है कि तीर्थंकर मनुष्यों की तरह पैदा हुए/जन्में; ध्यान और आत्म-बोध के माध्यम से जब वे ज्ञान प्राप्त करते हैं तो जैन धर्म में वे भगवान हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया है। तीर्थंकरों का आध्यात्मिकता का अंतिम स्तर जिना है। उनका मानना है कि जिना जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो चुके हैं। इसलिए, तीर्थंकर अमर हैं। वे पवित्र आत्माएं हैं और जैन धर्म में भगवान हैं और उनकी मूर्तियों को अपने मंदिरों में रखते हैं।

नोट: यदि जैन धर्म की भगवान की अवधारणा पर भरोसा किया जाता है तो यह दर्शाता है कि हम सभी भगवान बन सकते हैं क्योंकि प्रत्येक इंसान के पास सामर्थ्य है और हठ योग और उपवास जैसी प्रथाओं से हर आत्मा निपुण हो सकती है। हर कोई भगवान हो सकता है। अतः, जैन धर्म में भगवान की अवधारणा भक्तों की शंका बढ़ाती है क्योंकि कभी भी बहुत सारे भगवान नहीं हो सकते। 

गीता ज्ञान दाता अध्याय 15 श्लोक 16 और 17 में अर्जुन को बताता है कि यदि तू परम शांति चाहता है तो परम अक्षर ब्राह्म की पूजा कर जो तीनों लोकों (क्षेत्रों) में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है। वह परम शक्ति है और उनकी जानकारी तत्वदर्शी संत प्रदान करेगा। इसका मतलब है कि कोई परम शक्ति है जो पूरे ब्रह्मांड को चला रही है। वेद भी समर्थन करते हैं और प्रमाण देते हैं कि भगवान मनुष्य रूप में है। लेकिन जैनों का मानना है कि कोई परम शक्ति नहीं है, कोई भगवान नहीं है। 

गीता अध्याय 16 श्लोक 8 कहता है: 'राक्षसी स्वभाव वाले लोग जो बताते हैं कि संसार आश्रय रहित है, पूर्णरूप से कृत्रिम है और परम शक्ति के बिना, भगवान के बिना है; यह अपने आप पुरुष और महिला के मेल से बनाया गया है। इसका मुख्य कारण केवल प्राकृतिक शारीरिक इच्छाएँ हैं। और क्या?

आइए आगे बढ़ें और समझें कि तीर्थंकर कौन हैं और क्या वे भगवान हैं?

जैन धर्म में तीर्थंकर कौन हैं?

आइये प्रमाणों के आधार पर हम विश्लेषण करते हैं:

  • क्या तीर्थंकर भगवान हैं? और जैन धर्म में कितने तीर्थंकर हैं?
  • क्या तीर्थंकर भगवान हैं?
  • जैन धर्म में कितने तीर्थंकर हैं? 

जैन धर्म में तीर्थंकर एक धार्मिक मार्ग का आध्यात्मिक शिक्षक होता है जिसे जन्म और पुनर्जन्म के दुष्चक्र पर विजय प्राप्त किया हुआ माना जाता है; जिनकी धार्मिक विचारधारा को जैन धर्म के सभी भक्त निर्वाण-मोक्ष प्राप्त करने के लिए पालन करते हैं। पवित्र अपार आध्यात्मिक ज्ञान यानी केवल्य ज्ञान प्राप्त करने पर, तीर्थंकर एक अरिहंत बन जाता है और उसे भगवान माना जाता है।

'केवल्य ज्ञान' का अर्थ क्या है जो जैनियों को यकीन दिलाता है कि तीर्थंकर भगवान हैं? आइए समझें।

केवल्य ज्ञान क्या है?

संदर्भ: 'स्वसम वेद बोध', कबीर सागर अध्याय 32, पृष्ठ 77 से 86 तक में-   

पांच प्रकार के शरीर हैं 

  1. स्थूल शरीर - स्थूल शरीर
  2. स्थूल शरीर में सूक्ष्म यानी लिंग शरीर है- सूक्ष्म शरीर
  3. सूक्ष्म शरीर मे कारण शरीर है- कारण शरीर
  4. कारण शरीर में महाकारण शरीर है- महाकारण शरीर
  5. महाकारण शरीर मे कैवल्य शरीर है- कैवल्य शरीर

नोट: जीवात्मा इन सभी में कैद की गयी है जिसे काल जाल से मुक्त किया जाना है।

जब ऐसा कहा जाता है कि किसी ने केवल्य ज्ञान प्राप्त कर लिया है तो यह दर्शाता है कि काल के लोक में मनमानी पूजा के माध्यम से आत्मा ने कुछ आध्यात्मिक उपलब्धियों को केवल्य शरीर के स्तर तक प्राप्त कर लिया है जो जीव (आत्मा) की मुक्ति नहीं है। यह केवल कुछ उपलब्धियों/सिद्धियों को प्राप्त करने तक ही सीमित है।

संदर्भ: कबीरसागर में 'भवतारण बोध'। सर्वशक्तिमान कविर देव जी के अमृत प्रवचन।

चार प्रकार की मुक्ति बताई गई है

  1. सामिप्य
  2. सयुजय
  3. सरूपय
  4. सलोकय

जीव-आत्मा मनमाना आचरण यानी हठ योग से, उपवास, तपस्या और जैसे; यदि कुछ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और उपर्युक्त चार क्रमो में से किसी भी क्रम तक की मुक्ति प्राप्त होती है तो भी जन्म और पुनर्जन्म का दीर्घ रोग समाप्त नहीं होता है। वे प्राणी उनकी तरह पुनरावृत्ति में रहते हैं, जो 'ॐ' मंत्र का जाप करके ब्रम्ह लोक प्राप्ति के बाद या भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शिव और देवी दुर्गा की भक्ति करते हैं। (गीता अध्याय 7 श्लोक 12-15 और 20-23)। 

यह केवल परम अक्षर ब्रह्म यानी कवीर देव जो सृष्टि के रचयिता हैं, उसकी सतभक्ति से आत्मा जन्म और पुनर्जन्म से मुक्त हो जाती है। कबीर सागर में सर्वशक्तिमान कविर देव ने अपनी अमृत वाणी में प्रमाण दिए हैं।

संदर्भ: 'भवतारण बोध' का सारांश पृष्ठ 61-62 पर, मुक्ति बोध अध्याय 20 पृष्ठ 63, 'उग्र गीता' अध्याय 25 पृष्ठ 105-144 और गीता अध्याय 17 श्लोक 23- 'ॐ-तत्-सत, मन्त्र परमात्मा प्राप्ति के लिए है।

जैन धर्म के अनुयायी मानते हैं कि उनके तीर्थंकर भगवान हैं क्योंकि वे कुछ आध्यात्मिक सिद्धियों को प्राप्त कर चुके हैं। वे सफल उद्धारक हैं। यहां, पाठकों को स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है कि आध्यात्मिकता के केवल्य स्तर को प्राप्त करके जीव निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता। यह एक गलत धारणा है कि तीर्थंकर भगवान हैं और उन्होंने उन्हें ईश्वरीय श्रेणी में रखा है।

इसलिए, यह प्रश्न, क्या तीर्थंकर भगवान को स्पष्ट किया गया है। यह केवल एक गलत धरना है। तीर्थंकर भगवान नहीं हो सकते। तथ्य यह है कि केवल एक परमात्मा है जिसके बारे में सभी पवित्र शास्त्र प्रमाण देते हैं। वह सर्वशक्तिमान कविर देव है। 

जैन धर्म में कितने तीर्थंकर हैं?

जैन धर्म के अनुसार ब्रह्मांड के समय का चक्र दो हिस्सों में बांटा गया है। आरोही समय चक्र को उत्सर्पिनी कहा जाता है और अवरोही समय चक्र को अवसरपिनी कहा जाता है। जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हैं जिन्हें उनके आध्यात्मिक शिक्षक और सफल उद्धारक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि सभी चौबीस तीर्थंकर ब्रह्मांड पर समय चक्र के प्रत्येक आधे हिस्से में कृपा करते हैं। ऋषभ देव प्रथम तीर्थंकर थे और महावीर जैन आखिरी यानी चौबीसवें तीर्थंकर थे जिन्होंने केवल्य ज्ञान प्राप्त किया था।

अरिहंत कौन होता है? 

केवल्य ज्ञान (आध्यात्मिक ज्ञान में एक स्तर) प्राप्त करने के बाद तीर्थंकर एक अरिहंत बन जाता है और धार्मिकता का प्रचार करता है, फिर वह एक विजेता (जिना) कहलाता है। इसका मतलब है कि उन्होंने काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार जैसी वासनाओं को जीत लिया है। वे व्यक्तिगत इच्छाओं और आंतरिक जुनून से मुक्त हैं। केवल्य स्तर का आध्यात्मिक ज्ञान उनमें सिद्धियाँ बढ़ाता है। वे इसे मोक्ष की प्राप्ति का आध्यात्मिक स्तर मानते हुए अपने अनुयायियों को समान ज्ञान बताते हैं।

आइए यह समझने के लिए आगे बढ़ें कि ऋषभ नंदा नामक प्रथम तीर्थंकर ने उन धार्मिक प्रथाओं का जिनका उन्होंने पालन किया उनसे मोक्ष प्राप्त कर चुके है? ऋषभ देव कौन था? 

ऋषभ देव कौन था?

ऋषभ देव जैन धर्म के संस्थापक और पहले तीर्थंकर हैं। आइये हम उनके बारे में विस्तार से जानें।

संदर्भ: कबीर सागर अध्याय 31 'जैन धर्म बोध' पेज नंबर 45 (1389) पर।

सूर्यवंशी नाभिराज अयोध्या के प्रसिद्ध शासक थे। वह 'इक्ष्वकु' राजवंश से संबंधित थे। 'इक्ष्वकु' श्री मनु के पुत्र थे। मनु भगवान ब्रह्मा का पुत्र था।

राजा नाभीराज की पत्नी का नाम मारुदेवी था। उनका ऋषभ देव या ऋषभनन्दा नामक एक पुत्र था जो बाद में अयोध्या का राजा बना। वह धार्मिक विचारों वाला राजा था। वह अपनी प्रजा की विशेष देखभाल करता था। ऋषभ देव की सुनंदा और सुमंगला नाम की दो पत्नियां थीं। सुनंदा से उन्हें पुत्र  बहुबली और सुंदरी नाम की पुत्री हुई और सुमंगला से उनके भरत सहित कुल 97 पुत्र हुए और ब्राह्मी नाम की एक पुत्री हुई। ऋषभनन्दा के कुल 100 बच्चे थे जिनमें से 98 पुत्र और दो पुत्रियां थीं। सबसे बड़ा भरत था। 

सर्वशक्तिमान कविर्देव अपने विधान अनुसार पुण्य आत्माओं को मिलते हैं। वह ऋषभ देव जी से मिले और ऋषि 'काबी' के रूप में अपना परिचय दिया। उन्होंने ऋषभ देव जी में आत्म-बोध का आह्वान किया। राजा ऋषभ देव की आंतरिक चेतना बिल्कुल उस तरह से हिल हो गयी थी जैसे कोई दिव्य दृष्टि मिलने के बाद गहरी नींद से जागा हो। ऋषभ देव जी ने भक्ति के मार्ग, अपने कबीले के धार्मिक गुरुओं से भगवान को प्राप्त करने के मार्ग को जानने की कोशिश की। उन्होंने उसे 'ॐ' नाम का जाप और हठ योग करने यानी ध्यान लगाने के लिए कहा। उन्होंने भगवान को प्राप्त करने और जन्म व पुनर्जन्म के दुष्चक्र से राहत पाने के उद्देश्य से तपस्या करने का फैसला किया।

उन्होंने अपने राज्य की जिम्मेदारी अपने पुत्रों में विभाजित कर दी। अपने सबसे बड़े बेटे भरत को उन्होंने अयोध्या का राज्य दिया और बहुबली को उन्होंने तकशिला का। इसी तरह अन्य राज्यों को बाकी पुत्रों को दे दिए। तब ऋषभ देव जी ने घर त्याग दिया और जंगलों में चले गए और एक तपस्वी के जीवन का नेतृत्व किया। सर्वशक्तिमान कविर्देव जी ने उन्हें जंगल में मिले और फिर उन्हें मोक्ष प्राप्ति के लिए सतभक्ति करने के लिए प्रेरित किया। परमात्मा ने उसे बताया कि आपने भगवान के लिए राज्य छोड़ दिया लेकिन आप जो भक्ति कर रहे हैं वह आपको मोक्ष प्राप्ति में मदद नहीं करेगी। मुझसे दीक्षा लो, सतभक्ति करो, तुम्हारा जन्म और पुनर्जन्म का रोग हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

ऋषभ देव जी ने अपने गुरु द्वारा बताई गई भक्ति विधि को भक्ति का बिल्कुल सही तरीका माना है इसलिए, उन्होंने 'काबी' ऋषि द्वारा बताई गई भक्ति विधि को महत्व नहीं दिया। सर्वशक्तिमान कविर् देव चले गए। राजा ऋषभ देव जी पहले एक वर्ष तक उपवास करते रहे। उन्होंने 1000 वर्षों तक तपस्या की और 'कैवल्य' का ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने सबसे पहले भरत के पुत्र अर्थात अपने पौत्र मारीचि को दीक्षा दी।

नोट: भगवान के दर्शन के बाद ऋषभ देव जी ने एक तपस्वी के जीवन का नेतृत्व करना शुरू कर दिया और वे नग्न रहते थे क्योंकि वे अपनी स्थिति से अनभिज्ञ थे।  वे भगवान की याद में इतना लीन थे कि उन्हें पता ही नहीं था कि वे नग्न है। ऋषभ देव जी अपने मुंह में पत्थर का एक टुकड़ा लिए हुए नग्न अवस्था मे कर्नाटक के 'कुटुक' जंगलों में दिन-रात भटकते रहते थे। वे भोजन भी नहीं करते और उपवास पर रहते थे।

वे एक पुण्य आत्मा, धार्मिक व्यक्ति थे और हमेशा ईश्वर के विचारो में खोए रहते थे। जैनी तीर्थंकरों का अनुसरण इस मान्यता के साथ करते हैं कि इन सफल उद्धारकों ने निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं। वर्तमान जैन अनुयायी, धर्मगुरु ऋषभ देव जी की नकल करते हैं। जैन साधु/संत इस विश्वास के साथ नग्न रहते हैं, उपवास रखते हैं, हठ योग करते हैं कि ऋषभ देव के समान जीवन शैली की तरह वे भी निर्वाण प्राप्त कर लेंगे। यह केवल परंपरा की पूर्ति करना है।

आगे वर्णन यह सिद्ध करेगा कि ऋषभ देव जी के कई जन्म हुए थे। उन्हें मोक्ष नहीं मिला। समझने के लिए, हमें भगवान आदिनाथ/बाबा आदम के बारे में जानना होगा।

भगवान आदिनाथ / बाबा आदम कौन थे?

एक स्थायी प्रश्न जो साधक जानना चाहते हैं, क्या इस्लाम धर्म के बाबा आदम और जैन धर्म के ऋषभ देव जी अभिन्न हैं?

आइए हम पवित्र शास्त्र से तथ्यों का विश्लेषण करें। वास्तविकता क्या है?

संदर्भ: पुस्तक 'आओ जैन धर्म को जाने', लेखक हैं प्रवीण चंद्र जैन, एम ए शास्त्री, जम्मू द्वीप शास्त्री। प्रकाशक श्रीमती सुनीता जैन हैं, जम्मूदीप, हस्तिनापुर, मेरठ, उत्तर प्रदेश। मुद्रक धीरेंद्र जैन, न्यू ऋषभ ऑफसेट प्रिंटरस, मेरठ हैं। पृष्ठ 154 पर।

इस पुस्तक में इस बात का प्रमाण हैं कि ऋषभ देव जी की आत्मा का जन्म बाद में आदिनाथ / बाबा आदम के रूप में हुआ, जिन्हें आदि पुरुष/पहले व्यक्ति और मुसलमानों, ईसाइयों और यहूदियों के पैगंबर माना जाता है। आइए हम उस पुस्तक के संवाद पढ़ते हैं जिसमें ऋषभ देव जी के आदम बाबा के रूप में पुनर्जन्म की व्याख्या की गई है।

प्रश्न- अन्य सभी धर्मों में कौन से तीर्थंकरों की पूजा की जाती है?

 Ans - भगवान श्री आदिनाथ अर्थात ऋषभ देव जी

 प्रश्न- इस्लाम धर्म में भगवान आदिनाथ को क्या माना गया है?

 Ans - आदम बाबा

इससे सिद्ध होता है कि ऋषभ देव जी इस्लाम धर्म के बाबा आदम थे।

नोट: ऋषभदेव जी जिन्होंने जैन धर्म की शुरुआत की, अपनी मृत्यु के बाद बाबा आदम के रूप में आये।  इसका मतलब पुनर्जन्म होता है। जैन धर्म और इस्लाम धर्म के अनुयायी पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते हैं। जबकि पूर्वोक्त सिद्ध करता है कि ऋषभ देव जी का फिर से जन्म हुआ था और उन्हें भगवान आदिनाथ/ अदम बाबा कहा जाता था।  साथ ही यह भी उजागर करना है कि बाबा आदम से पहले सृष्टि थी, ऋषभ देव जी से भी पहले थी। 

बाबा आदम अर्थात ऋषभ देव पितृ लोक गए। एक आम जगह है जहाँ एक तरफ स्वर्ग है दूसरी तरफ एक विशाल पितृ लोक है।  पितृ का जीवन प्राप्त करने वाले जीव पितृ लोक में जाते हैं।

संदर्भ: जीवनी हज़रत मोहम्मद सलालाहु अलेसी वसलम मोहम्मद इनायतुल्लाह सुब्हानी का अनुवाद नसीम गाज़ी पलानी, मरकज़ी मकतबा, इस्लामी पब्लिशर्स, नई दिल्ली द्वारा किया गया। डी-307, दावत नगर, अब्दुल फ़ज़ल एन्क्लेव, जामिया नगर, नई दिल्ली और मुद्रक, प्रिंटर एच.एस. ऑफसेट प्रिंटस, नई दिल्ली -2 हैं। पृष्ठ संख्या न. 161 पर।

सलाल हजरत मोहम्मद  वर्णन कर रहे हैं, “आज रात 'बुराक’ नाम का जानवर आया था जिस पर बैठ कर मैंने 'बैतूल मकदीस’ का दौरा किया था। जब मैं वहाँ पहुँचा, तो महान व्यक्तियों का एक समूह आया, जिसमें इब्राहिम अलेही सलम, हज़रत मूसा जी और हज़रत ईसा-अली भी थे।  मैंने उन सबको 'नमाज़' करने के लिए कहा।"

इसका मतलब हजरत मोहम्मद जी बाबा आदम और उनके सभी बच्चों से मुलाकात की जो नरक, कुछ स्वर्ग में थे।

यह पुस्तक एक जबरील भगवान का वर्णन करती है जो हजरत मोहम्मद जी को एक शायर के घोड़े पर ले गया था। अपनी दाईं ओर देखकर वह हंस रहा था और बाईं ओर देखकर वह बुरी तरह रो रहा था। हज़रत मोहम्मद जी ने पूछा कि यह आदमी कौन है जो रो रहा है? उस जब्रील भगवान ने बताया कि वह बाबा आदम है। दाईं ओर स्वर्ग में उनके सभ्य बच्चे हैं और खुश हैं, उन्हें देखकर वह खुशी महसूस कर रहे हैं और बाईं ओर उनके निकम्मे बच्चे हैं जो नरक में बहुत पीड़ा सहन कर रहे हैं। जिस पीड़ा और यातना को वो झेल रहे हैं, उसे देखकर वह रो रहा है।

नोट: ऋषभ देव ने मनमानी पूजा (हठ योग) ध्यान करके बाबा आदम के रूप में जन्म लिया।  वह पितृ लोक गए। उन्होंने मोक्ष नही मिला, बल्कि फिर से जन्म हुआ। यह सिद्ध करता है कि पुनर्जन्म होता है और जैन मानते हैं कि तीर्थंकर दोबारा जन्म नहीं लेते हैं। ऋषभ देव जैन धर्म में प्रथम तीर्थंकर हैं, जिन्हें मृत्यु के बाद स्वर्ग में भी शांति नहीं थी।  ऋषभ देव/बाबा आदम कभी हंसते हैं; कभी वह रो रहे होते हैं।  इससे सिद्ध होता है कि मनमानी पूजा/भक्ति का कोई लाभ नहीं है। जीव पुनरावृत्ति में रहता है।  कैवल्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी ऋषभानंदा जन्म और मृत्यु के चक्र में बने रहे। उन्होंने निर्वाण प्राप्त नहीं किया।

संदर्भ: कबीर सागर में अध्याय 'मोहम्मद बोध' पृष्ठ 276 पर।

600 साल पहले सर्वशक्तिमान कविर् देव, जब पृथ्वी पर काशी-वाराणसी में अवतरित हुए, उन्होंने एक जुल्हे की दिव्य लीला की। उन्होंने बादशाह सिकंदर लोधी की बीमारी ठीक की जिसके बाद वह उनका शिष्य बन गया। नीचे वर्णित बातचीत में सिकंदर लोधी की शंकाओं का समाधान करते हुए सर्वशक्तिमान कविर् देव उन्हें भगवान आदिनाथ के बारे में समझा रहे हैं।

सिकंदर लोधी पूछता है: -

प्रश्न- भगवान! ब्रह्म-काल नामक यह शक्ति कौन है? वह सबके सामने क्यों नहीं आता?

उत्तर- भगवान कबीर जी ने उत्तर में सृष्टि रचना समझाई।

प्रश्न- क्या बाबा आदम जैसे महापुरुष भी काल के जाल में फंस गए थे?

उत्तर- भगवान कबीर ने बाइबल में दिए साक्ष्यों से समझाया कि ब्रह्म-काल ने आदम और हव्वा को सांप के रूप में कैसे धोखा दिया? काल अपने सभी कार्यों को अपने तीनों पुत्र ब्रह्मा, विष्णु और शिव से करवाता है और भूत-प्रेत की तरह किसी के शरीर में प्रवेश करके वह सभी बुरे कर्मों को करता है।

प्रश्न- क्या बाबा आदम से पहले सृष्टि थी?

उत्तर- भगवान कबीर जी ने ऋषभ देव के जन्म की व्याख्या की और बताया कि वही आत्मा बाबा आदम के रूप में प्रकट हुई।  पिछले जन्म के पाप कर्मों के आधार पर, ऋषभ देव/बाबा आदम की आत्मा ने ब्रह्म-काल के लोक में जन्म लिया। फिर, मनमानी पूजा करके जो पवित्र शास्त्रों के विरुद्ध है, उसने पितृ का जीवन प्राप्त किया और पितृलोक गया।

नोट: यह सिद्ध करता है कि ऋषभ नंदा का जन्म बाबा आदम के रूप में हुआ था और सृष्टि अनादि काल से ही है।  ऋषभ देव/बाबा आदम भगवान नहीं हो सकते। वह जन्म और मृत्यु के चक्र में है। परमपिता परमात्मा, रचियता, मुक्तिदाता कोई और है। पूरे जैन समुदाय को गुमराह किया गया है और उनका मानना ​​है कि कोई भी परम शक्ति नहीं हो सकती है जो इस रचना को चलाता है। उनकी मान्यता कि कोई भगवान नहीं है, बल्कि बहुत से भगवान अर्थात तीर्थंकर भगवान हैं, पूरी तरह से एक मिथक है।

पुनर्जन्म का एक और उदाहरण जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर यानी महावीर जैन का है। आइये हम विश्लेषण करते हैं।

कौन थे महावीर जैन?

महावीर जैन जैन धर्म के अंतिम यानी चौबीसवें तीर्थंकर थे। भगवान श्री महावीर के अन्य नाम वीर, अतिवीर, सनमती, महावीर और वर्धमान हैं। महावीर जैन का जीव मारिची वाला जीव ही था जो ऋषभ देव के पोते थे जिसे उन्होंने सर्वप्रथम दीक्षा दी थी। पवित्र पुस्तकें इस बात का प्रमाण देती हैं कि महावीर जैन के कई जन्म हुए हैं। आइये हम अध्ययन करें।

संदर्भ: कबीर सागर

तुम जो बोओगे वही काटोगे?

मरीचि के जीव; ऋषभ देव जी के पोते की सत्य कथा। वही जीव बाद में महावीर जैन बना। नीचे वर्णित तथ्य मारीचि वाली आत्मा ने अन्य मानव जीवन मे, जब वह राज्य का शासक था, जो कष्ट उठाये पर प्रकाश डालते हैं।

एक बार की बात है, मारिची मतलब महावीर जैन की आत्मा, शासक था।  उनके पसंदीदा मुलाजिमों में से एक उनके मनोरंजन के लिए एक वाद्य यंत्र बजाया करते थे। मधुर संगीत सुनकर राजा को सुकून मिलता था और वह सो जाता था। निर्देश दिए गए थे कि एक बार राजा सो जाए तो संगीत को तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए। एक दिन संगीत बजाते हुए मुलाजिम सुरीली आवाज से झूमने लगा। राजा सो गया लेकिन मुलाजिम संगीत बन्द करना भूल गया जिसके कारण कुछ समय बाद राजा की नींद खराब हो गई। आवाज से जागकर राजा क्रोधित हो गया और उसने मुलाजिम को दंड देने का आदेश दिया। सजा गर्म पिघला हुआ कांच उसके कानों में डालने की थी। अभिमानी राजा ने मुलाजिम द्वारा मांगी गई माफी के बावजूद अपने शब्दों को वापस नहीं लिया और अंगरक्षकों को अपने आदेश का पालन करने के लिए मजबूर किया। पहरेदारों ने गरम पिघला हुआ काँच मुलाजिम के कानों में डाल दिया, जो उसके लिए बहुत दर्दनाक था। वह चिल्लाया जो हृदय में चुभने वाली (चीख) थी लेकिन घमंडी राजा ने उसे ठीक नहीं किया। मुलाजिम कुछ समय बाद दर्द से तड़प कर मर गया।

बाद में राजा की भी मृत्यु हो गई।  उस आत्मा ने फिर से जन्म लिया और बाद में महावीर जैन के रूप में जैन समुदाय के लिए पूजनीय हो गया। उसने घर त्याग दिया और जंगल में अभ्यास करने लगा। उसी इलाके में गोपाल नाम का एक चरवाहा रहता था।  गोपाल और राजा दोस्त बन गए।  वह चरवाहा महावीर जी के लिए भोजन लाता था। एक दिन गोपाल को अपने गृह-नगर जाना था, इसलिए उसने अपनी गायों की देखभाल करने की जिम्मेदारी ऋषि को दे दी। महावीर जी ध्यान के लिए बैठ गए और गायों के बारे में भूल गए। गायें जंगल की गहराई में चली गईं। जब चरवाहा वापस लौटा और गायों के लापता होने के बारे में पूछा तो ऋषि शांत हो गए और अपनी गलती के लिए माफी मांगी। उन्होंने बताया ध्यान में होने के कारण उनकी एकाग्रता गायों से हट गई थी।

चरवाहे को अच्छी तरह पता था कि जरूर कोई जंगली जानवर उसकी गायों को खा गया होगा, वह आग बबूला हो गया और उसने बांस की छड़ी से ऋषि की पिटाई कर दी। उसने हिंसक रूप से उन्हें जमीन पर फेंक दिया और गुस्से के कारण उसने 2 इंच आकार के छह बांस के कांटे ऋषि के कान में डाल दिए। ऋषि जोर से चिल्लाया। तब चरवाहा चला गया और उसके बाद उस जगह कभी नहीं लौटा। एक महीने बाद दवा के लिए कुछ जड़ी-बूटियों की तलाश में एक चिकित्सक उस जंगल में पहुंचे, तब महावीर जैन के कष्ट का पता चला। चिकित्सक ने ऑपरेशन किया और ऋषि के कानों को ठीक किया। ऑपरेशन के दौरान महावीर दर्द के कारण चिल्ला रहे थे। महावीर को ठीक होने में कुछ महीने लगे लेकिन बहरे हो गए।  बाद में उनकी मृत्यु हो गई और मृत्यु के बाद विभिन्न प्रजातियों में कई अन्य जीवन रूपों का अधिग्रहण किया। वही आत्मा बाद में महावीर जैन बनी।

महावीर जैन ने 363 पाखण्ड मत चलाये। पूरा जैन धर्म इन प्रथाओं का पालन करता है।

नोट: उपर्युक्त कहानी से संदेश निकलता है कि जो अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं और दूसरों को दुखी करते हैं, उन्हें किसी न किसी तरह भारी भुगतान करना पड़ता है। इसलिए व्यक्ति को कभी भी अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

महावीर जैन के जन्म और पुनर्जन्म के संबंध में एक और प्रमाण जैन धर्म की एक पुस्तक से सिद्ध होता है। आइये अध्ययन करें।

संदर्भ: पुस्तक 'आओ जैन धर्म को जाने’। लेखक हैं प्रवीण चंद्र जैन, एम ए शास्त्री, जम्मू द्विप शास्त्री। प्रकाशक श्रीमती सुनीता जैन, जम्मुदीप, हस्तिनापुर, मेरठ, उत्तर प्रदेश हैं। मुद्रक धीरेंद्र जैन, न्यू ऋषभ ऑफसेट प्रिंटर, मेरठ हैं। पृष्ठ 154 पर।

जैन धर्म के अनुयायी जन्म और पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते हैं।  पाठकों को भी यह उजागर करना है कि अपने स्वयं ढिंढोरा पीटने के बजाय हमें अपनी सभी पवित्र पुस्तकों पर भरोसा करने और महान लोगों के इतिहास से समझने की आवश्यकता है। यह पुस्तक इस बात का प्रमाण देती है कि मारीचि वाली आत्मा जिसने अपने दादा ऋषभ देव, जो जैन धर्म के संस्थापक हैं और प्रथम तीर्थंकर हैं जो कई जन्मों के बाद भगवान महावीर बने, से दीक्षा ली। महावीर जैन ने विभिन्न जीवो की जूनियों को प्राप्त किया जैसा कि इस पुस्तक में बताया गया है।

उनके अनेक जन्मों के बारे में संक्षिप्त जानकारी।

वह पुष्कलावती देश के एक स्थान पुंडरिकीनही के भीलों का राजा था। उन्होंने ऋषि सागर सेन से मांस और मदिरा का सेवन नहीं करने का संकल्प लिया था, जिसका उन्होंने जीवन भर पालन किया। फिर वह समुद्र के जीवन काल के समान आयु का सौधर्म स्वर्ग में देवता बन गया। तब उनका जन्म रानी अनंतमति और राजा भरत के सबसे बड़े पुत्र मरीचि के रूप में हुआ था। इसके बाद वह ब्रह्म स्वर्ग में देवता बन गए। तब उनका जन्म अयोध्या में कपिल ब्राह्मण की काली स्त्री से 'जटिल' नामक एक पुत्र के रूप में हुआ। तब वह सौधर्म स्वर्ग में एक समुद्री आयु वाला देवता बन गए। वह 'सल्काया ब्राह्मण' की पत्नी से मंडीर क्षेत्र में भारद्वाज के रूप में पैदा हुए।

बीच में, 1000 बार वह आक वृक्ष बना, 80000 बार सीप के भव, 20000 बार वह नीम वृक्ष बना, 90 हजार बार केली वृक्ष का भव, 3000 बार चंदन वृक्ष का भव, 5 करोड़ बार कनेर वृक्ष का भव, 60 हजार बार वेश्या का भव, 5 करोड़ बार शिकारी का जीवन, 20 करोड़ बार हाथी का भव, 60 करोड़ बार गधा, 30 करोड़ बार कुत्ते का भव, 60 करोड़ बार नपुंसक का भव, 20 करोड़ बार स्त्री के भव, 90 लाख बार धोबी, 8 करोड़ बार घोड़ा बना, 20 करोड़ बार बिल्ली, 60 लाख बार वह गर्भपात से मरण और केवल 80 लाख बार वह देवता बना। वह नरक में भी कष्ट उठाना पड़ा। उन सभी कष्टों को झेलते हुए वही जीव भगवान महावीर बने जिन्हें पूरा जैन समुदाय पूजता है।

इससे यह सिद्ध होता है कि जन्म और पुनर्जन्म होता है।

नोट: मरीचि के उसी जीव ने पहले तीर्थंकर ऋषभ देव जी से दीक्षा ली थी और उनके द्वारा बताई गई वैसी ही भक्ति साधना की थी। परिणाम यह हुआ कि वह गधा, कुत्ता, घोड़ा, बिल्ली, धोबी वगैरह बना। उन्होंने एक वेश्या का जीवन व्यतीत किया और स्वर्ग और नरक में भटकते रहे। फिर महावीर जैन बने।

पाठकों और जैन धर्म के अनुयायियों को स्वयं परखना चाहिए कि तीर्थंकरों का अनुसरण करके जो धार्मिक प्रथाओं(भक्ति साधना) का पालन कर रहे हैं क्या वे निर्वाण प्राप्त करने के लिए उचित और सही हैं? क्या इन धार्मिक प्रथाओं से वे मुक्ति और भगवान प्राप्ति कर पाएंगे?

आगे यह लेख समझाएगा कि महावीर जैन का कोई गुरु नहीं था। महावीर जैन के गुरु कौन थे?

महावीर जैन के गुरु कौन थे?

संदर्भ: कबीर सागर में अध्याय 'सुमिरन बोध' पृष्ठ 35-50।  मोक्ष प्राप्त करने के लिए गुरु धारण करने का महत्व।

सर्वशक्तिमान परमात्मा कविर् देव जी सतभक्ति के मार्ग में गुरु बनाने का महत्व बताते हैं। केवल पूर्ण गुरु ही सतभक्ति का प्रचार करता है जिसे करने से साधक मोक्ष प्राप्त करेंगे। अन्यथा, साधक अविनाशी स्थान आगामी निर्वाण प्राप्त नही कर पाएंगे।

गुरु ते अधिक ना कोई ठहरायी,
मोक्षपंथ नहि गुरु बिनु पाई।

सूक्ष्म वेद यानी सच्चिदानंद घन ब्रम्ह यानी पीरम अक्षर ब्रम्ह की वाणी में कहा गया है- 

गुरु बिन वेद पढ़े जो प्राणी, 
समझे ना सार रहे अज्ञानी।

गुरु धारण करने का महत्व बताते हुए सर्वशक्तिमान कविर देव जी कहते हैं:-

गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान।
गुरु बिन दोनों निष्फल है, पूछो वेद पुराण।।

श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय 4 श्लोक 34 बताता है कि तत्त्वदर्शी संत जो पूर्ण गुरु है वह परमात्मा का जानकार है। वह परमेश्वर के बारे में सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान बताएगा।

पवित्र ग्रंथों से उपर्युक्त प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि भक्ति के मार्ग में गुरु बनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

महावीर जैन जी ने कोई गुरु नहीं बनाया। उन्होंने किसी से दीक्षा नहीं ली और मनमानी पूजा की, जो पवित्र श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 16 के श्लोक 23-24 में वर्जित है।

इस कारण से महावीर जी को मोक्ष नहीं मिला। अपने आध्यात्मिक अनुभवों के आधार पर, महावीर जी ने 363 पाखंड मत चलाये जो वर्तमान जैन धर्म में प्रचलित हैं। यह समझा जा सकता है कि मृत्यु के बाद महावीर जी की आत्मा को क्या कष्ट हुआ होगा। यह स्पष्ट है क्योंकि राजा ऋषभ देव जी वेदों के अनुसार भक्ति करते थे। वही दीक्षा उन्होंने मरीचि जी को दी।  उसी भक्ति को करके मरीचि की आत्मा को बहुत पीड़ा झेलनी पड़ी। ऋषभ नंदा के भी जन्म और पुनर्जन्म जारी हैं।

महावीर जी ने भक्ति की जो शास्त्रों के निषेध से रहित (शास्त्रविरुद्ध) थी। उन्होंने किसी गुरु से दीक्षा नहीं ली थी। वह कभी भी स्वर्ग या निर्वाण-मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाएंगे, तो फिर उनके अनुयायियों के साथ क्या होगा, यह अच्छी तरह से समझा जा सकता है। 

नकली गुरुओं के बारे में गीता अध्याय 16 श्लोक 9 कहता है: 'इस झूठे ज्ञान का पालन करके जिसकी प्रकृति नष्ट हो गई है, वे मंदबुद्धि के हैं; मतलब अज्ञानी हैं। जो लोग दूसरों को मुसीबत में डालते हैं मतलब दूसरों के अनमोल मानव जीवन को गलत ज्ञान और पूजा का गलत तरीका क्रूरता वाला (जैसे जो सारे बाल खरोंचते हैं, नग्न रहते है, गर्म और ठंडे मौसम में मानव शरीर को यातनाएं देते हैं, वस्त्र नही पहनते, कई दिनों तक उपवास रखते है और भूख से मर जाते हैं आदि सभी क्रूर गतिविधियां हैं) प्रदान करके बर्बाद करते हैं। ऐसे क्रूर लोग केवल दुनिया के विनाश के लिए पैदा होते हैं।

नोट: यह मारिची की वही जीव-आत्मा के कई मानव जन्मों से स्पष्ट है जो 24 वें तीर्थंकर  यानी महावीर जैन बने कि उन्हें कई जीवो की जूनि मिली और विभिन्न प्रजातियों के जीव जैसे पेड़, घोड़े, कुत्ते, देवता आदि बने। वह स्वर्ग में भी गए, नरक में भी गए और बहुत कुछ भुगतना पड़ा, तो उनके अनुयायियों के साथ क्या होगा। 

महावीर जैन के अनुयायियों को समझना जरूरी है; और प्रचलित धार्मिक प्रथाओं को करना बंद करे। उन्हें जागना चाहिए और महान संत रामपाल जी को अपना गुरु बनाना चाहिए। उन्हें उनकी शरण लेनी चाहिए। उन्हें शास्त्रों पर आधारित भक्ति करनी चाहिए जिससे वे निर्वाण-मोक्ष प्राप्त करेंगे।

उपरोक्त वर्णन सिद्ध करता है पूर्ण गुरु साधकों को निर्वाण प्राप्त करने के लिए भक्ति के सच्चे मार्ग का मार्गदर्शन करता है। नही तो जीव जन्म और पुनर्जन्म में रह जाता है। मनमानी पूजा मोक्ष प्रदान नहीं करती। गुरु बनाये बिना जीव-आत्मा पुनरावृत्ति में रहती है और 84 लाख जूनियों में कष्ट उठाती है।

जैन धर्म में जन्म और पुनर्जन्म की अवधारणा 

श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 2 श्लोक 22-23 जीव की स्थिति को समझाया गया है 'जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र बदलते हैं और नए वस्त्र पहनते हैं, वैसे ही जीव मृत्यु के बाद शरीर बदलता रहता है'। आत्मा अमर है। 

ऐसा ही प्रमाण गीता अध्याय 4 श्लोक 5 और 9, गीता अध्याय 2 श्लोक 12 में है।

गीता अध्याय 10 श्लोक 2 कहता है कि सभी जीवों की तरह 21 ब्रह्मांड का मालिक यानी ब्रह्म-काल भी जन्म और पुनर्जन्म के चक्र में है, तो ऋषभ देव जी/बाबा आदम और महावीर जैन 'ओम' मंत्र का जाप करके और मनमानी पूजा करने से मुक्त कैसे हो सकते हैं।

ऊपर अलग-अलग प्रमाणों ने जैन धर्म की धारणा; कि कोई पुनर्जन्म नहीं होता को गलत सिद्ध कर दिया है। जैन पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते हैं, विशेष रूप से उनके अनुसार तीर्थंकर जन्म नहीं लेते हैं क्योंकि उन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया है। जैनियों का मानना है कि सांसारिक जीवन से दूर रहने के बाद कोई भी दुबारा जन्म नहीं लेता। जबकि, पवित्र शास्त्रों के तथ्यों ने साबित कर दिया है कि उनके प्रथम और अंतिम तीर्थंकर दोनों के अनेक जन्म हुए हैं।ऋषभ देव जी का जन्म बाबा आदम और मारिची का महावीर जैन के रूप में हुआ था। वे अन्य जीवों की जूनियों जैसे जानवरों, पक्षियों, पेड़, सरीसृप आदि के जीवन में भी पीड़ित हुए। उन्हें नरक में भी कष्ट उठाने पड़े। वे स्वर्ग में देवता भी बने। पुनरावृत्ति जारी रही। उन्होंने निर्वाण प्राप्त नही किया तो को बाद में उनके अनुयायी भी मुक्त नहीं होंगे।

नोट: इक्कीस ब्रह्मांडो में जहां हम आत्माएं फंसी हुई हैं, यहाँ तक कि इसके(21 ब्रह्मांड के) मालिक यानी ज्योति-निरंजन-ब्रह्म-काल का भी 

जन्म और पुनर्जन्म का रोग हमेशा बना रहता है। जब तक जीव-आत्मा पूर्ण संत, तत्वदर्शी संत की शरण मे नही आती और परम अक्षर ब्राहम की सतभक्ति नही करती तब तक उसे राहत नहीं मिलती। ऋषभ देव जी और महावीर जैन दोनों ने 'ओम' मंत्र का जाप किया और 'ब्रम्हलोक' प्राप्त किया, इसलिए वे पुनरावृत्ति में बने रहे। 

जैन धर्म के संस्थापक की मृत्यु कैसे हुई? 

संदर्भ: जैन धर्म पर कबीर सागर में अध्याय और श्रीमद्भागवत सुधा सागर की पुस्तक गीता प्रेस गोरखपुर, गोविंद भवन कार्यालय द्वारा प्रकाशित। कोलकाता संस्थान। पृष्ठ 280

ऋषभ देव ने 1000 वर्षों तक तपस्या की और सिद्धियां प्राप्त की। एक तपस्वी होते हुए, वह जंगलों में घूमते थे। धार्मिक राजा ऋषभनंदा हमेशा परमात्मा की याद में खोए रहते थे। ऋषभ देव जी अपने मुंह में पत्थर का टुकड़ा लिए, नग्न होकर कर्नाटक के 'कुटुक' जंगल में कई कई दिन और रातो को भटकते रहते थे। एक बार, बांस की घर्षण के कारण, जंगलों ने आग लग गयी। भयंकर आग ने पूरे जंगल को जला कर राख कर दिया था। ऋषभ देव जी भी उस आग में जिंदा जल गए थे।

नोट: उपरोक्त प्रमाण सिद्ध करते हैं; ऋषभ देव जी ने जो धार्मिक साधनाएं की, उससे उनकी ऐसी दुखदायक मृत्यु हुई। वह जिंदा जल गए और मर गए। यह अत्यंत दुखदायक मौत तब हुई; जब वह ब्रह्म-काल की धार्मिक साधनाओं के अनुसार भक्ति कर रहे थे। जैन धर्म के भक्त उसी का अनुसरण करते हैं तो इससे यह समझा जा सकता है कि उनका क्या होगा।

इस लेखन पर चलते हुए संक्षिप्त होगा कि साधकों द्वारा निर्वाण प्राप्त करने के लिए सही भक्ति विधि क्या है?

भक्ति की सही विधि क्या है?

जीव का एकमात्र उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है। यह केवल मानव जन्म में ही संभव है।

सर्वशक्तिमान कविर्देव चारों युगों में आते हैं और एक तत्त्वदर्शी संत की दिव्य लीला करते हैं और अपने सत्य आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से, वे अपनी पुण्य आत्माओं को जागृत करते हैं और मानव जन्म का महत्व समझाते हैं। वह कहते हैं-

मानुष जन्म पाए कर, जो नहीं रटे हरि नाम।
जैसे कुआँ जल बिना, फिर बनवाया क्या काम ।।

परमात्मा ने समाधान भी दिया है;  जो कि पूर्ण संत द्वारा बताई गई सतभक्ति करना है जो एक सच्चा आध्यात्मिक नेता है और शास्त्र आधारित भक्ति बताता है जिससे मानव जन्म की सभी समस्याएं समाप्त हो जाएँगी और जन्म और पुनर्जन्म का दुष्चक्र भी समाप्त हो जाएगा। परमात्मा कहते हैं कि पूर्ण गुरु होना चाहिए, नियमों में रहकर भक्त को सतभक्ति करनी चाहिए, फिर मोक्ष दूर नहीं है।

सर्वशक्तिमान कविर देव जी कहते हैं; काल के 21 ब्रह्मांडों में, यह चारों ओर बवाल है। कोई सुखी नहीं है। सभी इस शैतान ब्रह्म-काल द्वारा धोखे में रखे गए हैं।

ब्रह्मांड 21 में आग लगी है,
कृतम बाजी सभी ठगी है ।।

वह उस पथ का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते हैं जो आत्मा को सभी कष्टों से छुटकारा दिलाता है ताकि वह मृत्यु के बाद जानवर, भूत और प्रेत न बने।  तो, इससे पहले कि देर हो जाए आत्मा को जागने की जरूरत है।

फिर पीछे तू पशुआ कीजिये, गधा बैल बनाई।

गीता अध्याय 4 श्लोक 32 कहता है कि सच्चे मन्त्रों का जाप करने के साथ-साथ पाँच प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान(यज्ञ) भी करने चाहिए। पूर्ण आध्यात्मिक गुरु मार्गदर्शन करेगा।

गीता अध्याय 17 श्लोक 23 भक्ति की सही विधि यानी पूर्ण संत से दीक्षा लेने के बाद ओम-तत्-सत् (सांकेतिक) मंत्रों का जाप करने के बारे में प्रमाण देता है।  

परमात्मा कौन है?

अर्जुन गीता ज्ञान दाता से अध्याय 8 श्लोक 1 में पूछता है कि गीता अध्याय 7 श्लोक 29 में जिस ’तत्-ब्रह्म’ के बारे में बताया है, वह 'तत्-ब्रह्म' कौन है? गीता ज्ञान दाता अध्याय 8 श्लोक 3 में इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है कि 'वह परम अक्षर ब्रह्म है'।

गीता अध्याय 2 श्लोक 16 में गीता ज्ञान दाता कहता है कि 'नश्वर  हमेशा के लिए अस्तित्व में नहीं रहता, लेकिन अविनाशी हमेशा के लिए है'। श्लोक 17 में वह कहता है ‘वास्तव में, अविनाशी तो वह सतपुरुष है यानी पूर्ण ब्रह्म या परम अक्षर ब्रह्म। कोई उसे नष्ट नहीं कर सकता।

गीता अध्याय 2 श्लोक 19-21 और 24-25, अध्याय 12 श्लोक 25, अध्याय 13 श्लोक 22, अध्याय 15 श्लोक 17, अध्याय 18 श्लोक 62, अध्याय 15 श्लोक 1-4, 16 और 17 और अध्याय 7 श्लोक 29 में पूर्ण परमात्मा के बारे में प्रमाण है।

पवित्र ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 4 मंत्र 3 और 4, ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 96 मंत्र 16, 17।

पवित्र कुरान शरीफ- सूरत अल फुरकानी 25 आयत संख्या: 52-59।

पवित्र बाइबिल- इयोव 36:5 और उत्पत्ति ग्रन्थ पृष्ठ संख्या 2 पर, वचन 1:20-2:5।

पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब में।

पूजनीय सर्वशक्तिमान कबीर जी यानी सच्चिदानंदघन ब्रह्म की वाणी में अर्थात सुक्षम वेद में और अन्य विभिन्न स्थानों पर।

परमात्मा कविर देव हैं जिनकी महिमा सभी पवित्र शास्त्र गाते हैं।  परमात्मा अविनाशी है और वह मानव सदृश्य है। वह मां के गर्भ से जन्म नहीं लेता। वह सृष्टि का रचियता है। वह परम निवास स्थान अर्थात सतलोक में निवास करता है।

निष्कर्ष:

आज महान संत रामपाल जी इस धरती पर एकमात्र पूर्ण गुरु हैं, जो सतभक्ति प्रदान कर रहे हैं जो कि शास्त्र आधारित है। पाठकों को उनकी शरण लेने की सलाह दी जाती है। परमात्मा को पहचानें और अपना कल्याण करवाएं।

उपरोक्त वर्णन निम्नलिखित को सिद्ध करता है:-

  • तीर्थंकर भगवान नहीं हैं। यह जैन धर्म में एक मिथक है।
  • काल के राज्य में आत्मा के जन्म और पुनर्जन्म होते हैं।
  • काल का खतरनाक जाल है- ऋषभ देव/बाबा आदम, महावीर जैन जैसी महान आत्माए भी शास्त्र विरुद्ध पूजा करने से पुनरावृत्ति में रहे।
  • मनमानी पूजा से जन्म और पुनर्जन्म समाप्त नहीं होते।
  • जन्म और पुनर्जन्म का रोग केवल पूर्ण परमात्मा अर्थात परम अक्षर ब्रह्म की भक्ति से समाप्त होता है। 
  • सतभक्ति एक तत्वदर्शी संत द्वारा प्रदान की जाती है।
  • सतभक्ति के मार्ग में गुरु धारण करना अत्यधिक जरूरी है।
  • जैन धर्म में प्रचलित वर्तमान धार्मिक साधनाओं से मोक्ष प्राप्ति असंभव है।
  • केवल एक पूर्ण परमात्मा यानी सर्वशक्तिमान कविर देव हैं जो सृष्टि के रचियता हैं।

अतः, नकली धार्मिक गुरुओं से सावधान रहें। नकली गुरुओं के बारे में सर्वशक्तिमान भगवान कविर देव जी एक शब्द में कहते हैं-

निरंजन धन तेरा दरबार, जहां पर तनिक ना न्याय विचार।
कहें कबीर सुनो भाई साधो, यहां सब उल्टा व्यवहार।
साचों को तो यह झूठा बतावें, इन झूठों का ऐतबार।
निरंजन धन तेरा दरबार।।
पाखंडी की पूजा जग में, संत को कहें लबार।
अज्ञानी को परम विवेकी, ज्ञानी को मूढ़ गंवार।
निरंजन धन तेरा दरबार, जहाँ तनिक न न्याय विचार।।