गुरू जी से दीक्षा लेकर भक्ति करना लाभदायक है। बिना गुरू के भक्ति करने से कोई लाभ नहीं होता।

उदाहरण:-
एक राजा की रानी बहुत धार्मिक थी। उसने परमेश्वर कबीर जी से गुरू दीक्षा ले रखी थी। वह प्रतिदिन गुरू दर्शन के लिए जाया करती थी। राजा को यह अच्छा नहीं लगता था, परंतु वह अपनी पत्नी को वहाँ जाने से रोक नहीं पा रहा था। कारण, एक तो वह उस बड़े शक्तिशाली राजा की लड़की थी, दूसरे वह अपनी पत्नी को प्रसन्न देखना चाहता था।

एक दिन राजा ने अपनी पत्नी से कहा कि आप नाराज न हो तो बात कहूँ? रानी ने कहा कहो। राजा ने कहा कि आप अपने गुरू के पास जाती हंै, भक्ति तो गुरू के बिना भी हो सकती है। रानी ने कहा कि गुरू जी ने बताया है कि गुरू के बिना भक्ति करना व्यर्थ है। राजा ने कहा कि मैं तेरे साथ कल तेरे गुरू जी से मिलूँगा, उनसे यह बात स्पष्ट करूँगा।

राजा ने सन्त जी से प्रश्न किया कि आप जनता को मूर्ख बना रहे हो कि गुरू बिन भक्ति नहीं होती, क्यों भक्ति सफल नही होती? नाम मन्त्रा जाप करने होते हैं। एक-दूसरे से पूछकर जाप कर लें, पर्याप्त है। सन्त ने कहा राजन्! आपकी बात में दम है, मैं आपके राज दरबार में आऊँगा। वहाँ इस बात का उत्तर दूँगा। निश्चित दिन को सन्त जी राजा के दरबार में गए। राजा सिंहासन पर विराजमान था, आस-पास सिपाही खड़े थे। संत के बैठने के लिए अलग से कुर्सी रखी थी। सन्त ने जाते ही आस-पास खड़े सिपाहियों से राजा की ओर हाथ करके कहा कि इसे गिरफ्तार कर लो। सिपाही टस से मस नहीं हुए। सन्त ने लगातार तीन बार यही वाक्य, आदेश दोहराया कि इसे गिरफ्तार कर लो, परन्तु राजा को सिपाहियों ने गिरफ्तार नहीं किया।

राजा को सन्त पर क्रोध आया कि यह कमबख्त मेरी पत्नी को इसलिए बहका रहा था कि इसके राज्य को प्राप्त कर लूँ। राजा ने एक बार कहा कि सिपाहियो इसे गिरफ्तार कर लो। राजा के हाथ का सन्त की ओर संकेत था। उसी समय सिपाहियों ने सन्त को गिरफ्तार कर लिया।

सन्त ने कहा कि हे राजन्! आप घर पर बुलाकर सन्त का अनादर कर रहे हो, यह अच्छी बात नहीं। राजा ने कहा आप यह क्या बकवास कर रहे थे। मुझे गिरफ्तार करने का आदेश दे रहे थे। सन्त ने कहा मैं आपके उस प्रश्न का उत्तर दे रहा था कि गुरू से दीक्षा लेकर भक्ति करना क्यों लाभदायक है? मुझे छुड़ाओ तो मैं आपको उत्तर दूँ। राजा ने सिपाहियों से कहा कि छोड़ दो। सिपाहियों ने सन्त को छोड़ दिया। सन्त ने कहा कि हे राजा जी! मैंने यही वाक्य कहा था, “इसे गिरफ्तार कर लो।” सिपाही टस से मस नहीं हुए। आप जी ने भी यही वाक्य कहा था कि तुरंत सिपाहियों ने मुझे गिरफ्तार कर लिया। आपके वचन में राज की शक्ति है। मेरे वचन में आध्यात्मिक शक्ति है। आप उसी नाम-जाप के लिए किसी को भक्ति के लिए कहोगे तो वह मन्त्रा कोई कार्य नहीं करेगा। मैं वही नाम जाप करने को कहूँगा, वह तुरन्त प्रभाव से क्रियावान होगा। इसलिए पूर्ण सन्त से दीक्षा लेने से साधक में तुरंत आध्यात्मिक प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, उसकी आत्मा में भक्ति का अंकुर निकल आता है। सूक्ष्म वेद में कहा है किः-

सतगुरू पशु मानुष करि डारै, सिद्धि देय कर ब्रह्म बिचारें।

भावार्थ:- सतगुरू पहले मनुष्य को सत्संग सुना-सुनाकर नेक इंसान बनाते हैं, सर्व बुराईयों को छुड़वाते हैं। फिर अपनी भक्ति की सिद्धी अर्थात् शक्ति शिष्य के अन्तःकरण में शब्द से प्रवेश करके ब्रह्म अर्थात् परमात्मा की साधना करने के विचार प्रबल करते हैं जिससे साधक की रूचि भक्ति में दिनों-दिन बढ़ती है। फिर वह देवता बन जाता है। कबीर जी ने कहा है कि:-

कबीर, बलिहारी गुरू आपना, घड़ी-घड़ी सौ-सौ बार।
मानुष से देवता किया, करत ना लाई बार।।

इसलिए कहा है कि:-

कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान।
गुरू बिन दोनों निष्फल हैं, चाहे पूछो बेद पुराण।।
योग, यज्ञ तप दान करावै, गुरू विमुख फल कभी नहीं पावै।।

भावार्थ:- गुरू बिन नाम जाप की माला फिराते हैं या दान देते हैं, वह व्यर्थ है। यह वेदों तथा पुराणों में भी प्रमाण है। फिर अन्तिम चैपाई का भावार्थ है कि यदि दीक्षा लेकर फिर गुरू को छोड़कर उन्हीं मन्त्रों का जाप करता रहे तथा यज्ञ, हवन, दान भी करता रहे, वह भी व्यर्थ है। उसको कोई लाभ नहीं होगा।

कबीर, तांते सतगुरू शरणा लीजै, कपट भाव सब दूर करिजै।

अन्य प्रमाण:-

कबीर, गर्भयोगेश्वर गुरू बिना, करते हरि की सेव।
कहैं कबीर बैकुंठ से, फेर दिया सुखदेव।।
राजा जनक गुरू किया, फिर किन्ही हर की सेव।
कहैं कबीर बैंकुठ में, चले गए सुखदेव।।

भावार्थ:- ऋषि वेदव्यास जी के पुत्रा सुखदेव जी अपने पूर्व जन्म की भक्ति की शक्ति से उड़कर स्वर्ग में चले जाते थे। एक दिन वे श्री विष्णु जी के लोक में बने स्वर्ग में प्रवेश करने लगे। वहाँ के कर्मचारियों ने ऋषि सुखदेव जी से स्वर्ग द्वार पर पूछा कि ऋषि जी अपने पुज्य गुरूजी का नाम बताओ। सुखदेव जी ने कहा कि गुरू की क्या अवश्यक्ता है? अन्य गुरू धारण करके यहाँ आए हैं, मेरे में स्वयं इतनी शक्ति है कि मैं बिना गुरू के आ गया हूँ। द्वारपालों ने बताया ऋषि जी यह आपकी पूर्व जन्म में संग्रह की हुई भक्ति की शक्ति है। यदि फिर से गुरू धारण करके भक्ति नहीं करोगे तो पूर्व की भक्ति कुछ दिन ही चलेगी। आपका मानव जीवन नष्ट हो जाएगा।

उदाहरण के लिए:- वर्तमान में इन्वर्टर की बैट्री को चार्जर लगाकर चार्ज कर रखा है। यदि चार्जर हटा दिया जाए तो भी इन्वर्टर अपना कार्य करता रहेगा क्योंकि उसमें ऊर्जा संग्रह हो चुकी है। कुछ समय पश्चात् वह सर्व कार्य करना छोड़ देता है, न ट्यूब जलेंगी, न पँखा चलेगा। उसको फिर से चार्ज करना अनिवार्य है। उसके लिए चार्जर चाहिए। चार्जर गुरू जानो, बिजली परमेश्वर जानो।

ऋषि सुखदेव में अपनी सिद्धि का अभिमान था, वह नहीं माना। बात भगवान विष्णु जी तक पहुँच गई। श्री विष्णु जी ने भी यह बात कही कि ऋषि जी पहले आप गुरू बनाओ, फिर यहाँ आओ। सुखदेव जी ने कहा भगवान पृथ्वी लोक पर मेरे समान कोई नहीं है, न कोई ढं़ग का गुरू है। कृपा आप ही बताऐं कि मैं किसको गुरू बनाऊँ? श्री विष्णु जी ने बताया कि आप राजा जनक को गुरू बनाओ। यह कहकर श्री विष्णु जी अपने महल में चले गए। सुखदेव ऋषि वापिस पृथ्वी पर आए। राजा जनक से दीक्षा लेकर उनके बताए भक्ति मन्त्रों का जाप किया, तब ऋषि सुखदेव जी को स्वर्ग में रहने दिया। इसलिए गुरू बनाकर भक्ति करने से ही सफलता सम्भव है। बिना गुरू भक्ति, दान, आदि-आदि करना व्यर्थ है।

गुरू पूरा हो, झूठे गुरू से कोई लाभ नहीं होता।

प्रश्न:- पूरे गुरू की क्या पहचान है? हम तो जिस भी सन्त से ज्ञान सुनते हैं, वह पूर्ण सतगुरू लगता है।

उत्तर:- सूक्ष्मवेद में गुरू के लक्षण बताए हैं:-

गरीब, सतगुरू के लक्षण कहूँ, मधुरे बैन विनोद।
चार वेद छः शास्त्रा, कह अठारह बोध।।

सन्त गरीबदास जी (गाँव-छुड़ानी जिला-झज्जर, हरियाणा) को परमेश्वर कबीर जी मिले थे। उनकी आत्मा को ऊपर अपने सत्यलोक (सनातन परम धाम) में लेकर गए थे। ऊपर के सर्व लोकों का अवलोकन कराकर वापिस पृथ्वी पर छोड़ा था। उनको सम्पूर्ण आध्यात्म ज्ञान बताया था। उनका ज्ञानयोग परमेश्वर कबीर जी ने खोला था। उसके आधार से सन्त गरीबदास जी ने गुरू की पहचान बताई है कि जो सच्चा गुरू अर्थात् सतगुरू होगा, वह ऐसा ज्ञान बताता है कि उसके वचन आत्मा को आनन्दित कर देते हैं, बहुत मधुर लगते हैं क्योंकि वे सत्य पर आधारित होते हैं। कारण है कि सतगुरू चार वेदों तथा सर्व शास्त्रों का ज्ञान विस्तार से कहता है।

यही प्रमाण परमेश्वर कबीर जी ने सूक्ष्मवेद में कबीर सागर के अध्याय ‘‘जीव धर्म बोध‘‘ में पृष्ठ 1960 पर दिया है”:-

गुरू के लक्षण चार बखाना, प्रथम वेद शास्त्रा को ज्ञाना।।
दुजे हरि भक्ति मन कर्म बानि, तीजे समदृष्टि करि जानी।।
चैथे वेद विधि सब कर्मा, ये चार गुरू गुण जानों मर्मा।।

सरलार्थ:- कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि जो सच्चा गुरू होगा, उसके चार मुख्य लक्षण होते हैं:-

1. सब वेद तथा शास्त्रों को वह ठीक से जानता है।
2. दूसरे वह स्वयं भी भक्ति मन-कर्म-वचन से करता है अर्थात् उसकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता।
3. तीसरा लक्षण यह है कि वह सर्व अनुयाईयों से समान व्यवहार करता है, भेदभाव नहीं रखता।
4. चैथा लक्षण यह है कि वह सर्व भक्ति कर्म वेदों (चार वेद तो सर्व जानते हैं 1. ऋग्वेद, 2. यजुर्वेद, 3. सामवेद, 4. अथर्ववेद तथा पाँचवां वेद सूक्ष्मवेद है, इन सर्व वेदों) के अनुसार करता और कराता है।

वेदों (चारों वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद) में केवल ओम् = ॐ यह एक नाम है जाप करने का।

प्रमाण = यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 15 तथा 17 में।

मन्त्र 15 में कहा है कि ओम् (ॐ) नाम का स्मरण कार्य करते-करते करो, विशेष तड़फ के साथ करो, मनुष्य जीवन का परम कत्र्तव्य मानकर स्मरण करो, ¬ का जाप मृत्यु पर्यन्त करने से इतना अमरत्व प्राप्त हो जाएगा जितना ॐ के स्मरण से होता है। (यजुर्वेद 40ध्15)

यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 17 में वेद ज्ञान दाता ब्रह्म ही है। कहा है कि जो पूर्ण परमात्मा है, वह तो परोक्ष (छुपा है यानि अव्यक्त) है। वह सबकी दृष्टि में नहीं आता। (उसकी जानकारी यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 10 में बताई है कि उसका यथार्थ ज्ञान तत्वदर्शी सन्त ही जानते हैं, उनसे सुनो) फिर यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 17 में आगे कहा है कि (अहम् खम् ब्रह्म) मैं ब्रह्म हूँ। मेरा ओम् = ॐ नाम है। मैं ऊपर दिव्य आकाश रूपी ब्रह्म लोक में रहता हूँ। (यजुर्वेद 40/17)

यही प्रमाण श्री देवी महापुराण:- (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित, सचित्र मोटा टाईप केवल हिन्दी) के सातवें स्कंद में पृष्ठ 562-563 पर श्री देवी जी ने राजा हिमालय को बताया है कि राजन्! आप यदि आत्म-कल्याण चाहते हो तो मेरी भक्ति सहित सर्व बातों को छोड़ दो, केवल एक ॐ नाम का जाप करो, ब्रह्म प्राप्ति का उद्देश्य रखो। इससे आप ब्रह्म को प्राप्त हो जाओगे, वह ब्रह्म ब्रह्मलोक रूपी दिव्य आकाश में रहता है। इससे स्पष्ट हुआ कि वेदों मे केवल एक “ओम्” नाम ही जाप का है। श्रीमद् भगवत गीता जो वेदों का सारांश है, उसमें अध्याय 8 श्लोक 13 में कहा है:-

ओम् इति एकाक्षरम् ब्रह्म व्याहरन् माम् अनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्वजन् देहम् सः याति परमाम् गतिम्।।

अनुवाद:- गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने कहा है कि मुझ ब्रह्म का केवल ओम् = ॐ, यह एक अक्षर है, इसका उच्चारण-स्मरण करता हुआ जो साधक शरीर त्यागकर जाता है, वह मृत्यु उपरान्त ¬ नाम के स्मरण से मिलने वाली परम गति अर्थात् ब्रह्म लोक को प्राप्त होता है।

श्री मद्भगवत गीता तथा वेदों में इसके अतिरिक्त अर्थात् “ओम्” = ॐ के अतिरिक्त कोई नाम ब्रह्म साधना का नहीं है।

प्रमाणित हुआ कि ॐ = ओम् नाम का जाप शास्त्रा प्रमाणित है।

गीता ज्ञान दाता ने स्पष्ट किया है कि अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं, आगे भी होंगे। मेरी उत्पत्ति को ऋषि तथा देवतागण नहीं जानते।

(गीता अध्याय/श्लोक 2/12, 4/5, 10/2)

इससे सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता ब्रह्म नाशवान है तथा जन्मता-मरता है। इसके पुजारी भी जन्म-मरण के चक्र में ही रहेंगे। इसलिए गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में कहा है कि ब्रह्म लोक में गए साधक भी पुनर्जन्म में रहते हैं। इसलिए गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि हे भारत! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर की शरण में जा, उस परमेश्वर की कृपा से ही तू परमशान्ति तथा सनातन परम धाम अर्थात् सत्यलोक को प्राप्त होगा।

फिर गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि जब तत्वदर्शी सन्त से तत्वज्ञान प्राप्त हो जाए, उसके बताए अनुसार साधना करके उसके पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आते। केवल उस परमेश्वर की पूजा करो।

गीता अध्याय 7 श्लोक 29 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है:-

जरा मरण मोक्षाय माम् आश्रित्य यतन्ति ये।
ते तत् ब्रह्म विदुः कृतस्नम् अध्यात्मम् कर्म च अधिलम्।।

भावार्थ:- गीता ज्ञान दाता ने बताया है कि जो मेरे बताए ज्ञान पर आश्रित होकर अर्थात् मेरे कहे अनुसार तत्वदर्शी संतों से तत्वज्ञान जान लेते हैं। जो जरा अर्थात् वृद्धावस्था तथा मृत्यु के कष्ट से मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते हैं। संसार की किसी कीमती वस्तु की इच्छा भक्ति के प्रतिफल में नहीं करते हैं। वे (तत् ब्रह्म विदुः) उस ब्रह्म को संपूर्ण आध्यात्म को और सर्व कर्मों को जानते हैं। 

अर्जुन ने गीता अध्याय 8 श्लोक 1 में पूछा कि “तत् ब्रह्म” क्या है? 

इसका उत्तर गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 8 के ही श्लोक 3 में दिया है। कहा है कि वह “परम अक्षर ब्रह्म” है।
अ गीता अध्याय 8 श्लोक 5 तथा 7 में तो गीता ज्ञान दाता ने अपनी भक्ति करने को कहा है और विश्वास दिलाया है कि मेरी भक्ति से मुझे प्राप्त होगा, मेरी भक्ति से जन्म-मरण, कर्म चक्र बना रहेगा, युद्ध भी करना पड़ेगा, परमशान्ति नहीं
हो सकती।

फिर गीता ज्ञान दाता ने तुरन्त गीता अध्याय 8 श्लोक 8, 9, 10 में कहा है कि ‘‘तत् ब्रह्म‘‘ अर्थात् “परम अक्षर ब्रह्म” की भक्ति करने वाला उस सच्चिदानन्द घन ब्रह्म अर्थात् मेरे से दूसरे दिव्य परमेश्वर को प्राप्त होगा।

इसी प्रकार परम अक्षर ब्रह्म की महिमा गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में बताई है। गीता अध्याय 15 श्लोक 16 में दो पुरूष बताए हैं, एक क्षर पुरूष। यह गीता ज्ञान दाता है जिसका 21 ब्रह्मण्ड का क्षेत्रा है। यह गीता ज्ञान दाता ब्रह्म है।

दूसरा अक्षर पुरूष बताया है जिसका 7 शंख ब्रह्माण्ड का क्षेत्रा है। ये दोनों नाशवान बताऐं हैं। इनके लोकों में सर्व जीव भी नाशवान बताए हैंः-

गीता अध्याय 15 श्लेाक 17 में बताया है कि:-

उत्तम पुरूषः तू अन्यः परमात्मा इति उदाहृतः
यः लोक त्रायम् आविश्य विभर्ति अव्ययः ईश्वरः

अनुवाद:- उत्तम पुरूष = पुरूषोत्तम अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म तो ऊपर वर्णित क्षर पुरूष तथा अक्षर पुरूष से अन्य है जो परमात्मा कहा जाता है जो तीनों लोकों {क्षर पुरूष के 21 ब्रह्माण्डों के क्षेत्रा वाला लोक, दूसरा अक्षर पुरूष के 7 शंख ब्रह्माण्डों वाला लोक, तीसरा ऊपर के चार लोकों (सत्यलोक, अलख लोक, अगम लोक तथा अनामी लोक) इस प्रकार बने तीनों लोकों} में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है, वह वास्तव में अविनाशी परमेश्वर है।

गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में इस परम अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति के मन्त्र बताए हैं:-

ऊँ तत् सत् इति निर्देशः ब्रह्मणः त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणाः तेन वेदाः यज्ञाः च विहिता पुरा।।

ब्रह्मणः = सच्चिदानन्द घन ब्रह्म अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म की भक्ति की साधना के अर्थात् परमेश्वर के उस परमपद को प्राप्त करने के मन्त्रा बताए हैं, जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आते हैं। जहाँ परम शान्ति को प्राप्त होते हैं जो सनातन परम धाम है।

ऊँ = “ब्रह्म” अर्थात् “क्षर पुरूष” का मन्त्र है जो प्रत्यक्ष है।

तत् = यह “अक्षर पुरूष” का जाप मन्त्रा है। यह मन्त्रा सांकेतिक है, वास्तविक मन्त्रा सूक्ष्मवेद में बताया है। यह मन्त्रा दीक्षा के समय दीक्षार्थी को सार्वजनिक किया जाता है, अन्य को नहीं बताया जाता।

सत् = यह “परम अक्षर पुरूष” की साधना का मन्त्रा है। यह भी सांकेतिक है। दीक्षार्थी को दीक्षा के समय बताया जाता है। यथार्थ मन्त्रा सूक्ष्मवेद में लिखा है। यही प्रमाण सामवेद के मंत्रा सँख्या 822 में भी है कि तीन नाम के जाप से पूर्ण मोक्ष प्राप्त होता है:-

संख्या न. 822 सामवेद उतार्चिक अध्याय 3 खण्ड न. 5 श्लोक न. 8 (संत रामपाल दास द्वारा भाषा-भाष्य)ः-

मनीषिभिः पवते पूव्र्यः कविर्नृभिर्यतः परि कोशां असिष्यदत्।
त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरन्निन्द्रस्य वायुं सख्याय वर्धयन्।।8।।

 मनीषिभिः-पवते-पूव्र्यः-कविर्-नृभिः-यतः-परि-कोशान्-असिष्यदत्-त्रि-तस्य- नाम-जनयन्-मधु-क्षरनः-न-इन्द्रस्य-वायुम्-सख्याय-वर्धयन्।

शब्दार्थ- (पूव्र्यः) सनातन अर्थात् सबसे प्रथम प्रकट (कविर नृभिः) कबीर परमेश्वर मानव रूप धारण करके अर्थात् गुरु रूप में प्रकट होकर (मनीषिभिः) बुद्धिमान भक्तों को (त्रि) तीन (नाम) मन्त्रा अर्थात् नाम उपदेश देकर (पवते) पापरहित यानि पवित्रा करके (जनयन्) जन्म व (क्षरनः) मृत्यु से (न) रहित करता है तथा (तस्य) उसके (वायुम्) प्राण अर्थात् जीवन-स्वांसों को जो संस्कारवश गिनती के डाले हुए होते हैं को (कोशान्) अपने भण्डार से (सख्याय) मित्राता के आधार से (परि) पूर्ण रूप से (वर्धयन्) बढ़ाता है। (यतः) जिस कारण से (इन्द्रस्य) परमेश्वर के (मधु) वास्तविक आनन्द को (असिष्यदत्) अपने आशीर्वाद प्रसाद से प्राप्त करवाता है।

भावार्थ:- इस मन्त्र में स्पष्ट किया है कि पूर्ण परमात्मा कविर अर्थात् कबीर मानव शरीर में गुरु रूप में प्रकट होकर प्रभु प्रेमीयों को तीन नाम का जाप देकर सत्य भक्ति कराता है तथा उस मित्रा भक्त को पवित्राकरके अपने आशीर्वाद से पूर्ण परमात्मा अर्थात् अपनी प्राप्ति का मार्ग बताकर पूर्ण सुख प्राप्त कराता है। साधक की आयु बढाता है। यही प्रमाण गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में है कि ओम्-तत्-सत् इति निर्देशः ब्रह्मणः त्रिविद्य स्मृतः भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा को प्राप्त करने का ऊँ (1) तत् (2) सत् (3) यह मन्त्रा जाप स्मरण करने का निर्देश है। इस नाम को तत्वदर्शी संत से प्राप्त करो। तत्वदर्शी संत के विषय में गीता अध्याय 4 श्लोक नं. 34 में कहा है तथा गीता अध्याय नं. 15 श्लोक नं. 1 व 4 में तत्वदर्शी सन्त की पहचान बताई तथा कहा है कि तत्वदर्शी सन्त से तत्वज्ञान जानकर उसके पश्चात् उस परमपद परमेश्वर की खोज करनी चाहिए। जहां जाने के पश्चात् साधक लौट कर संसार में नहीं आते अर्थात् पूर्ण मुक्त हो जाते हैं। उसी पूर्ण परमात्मा से संसार की रचना हुई है।  विशेष:- उपरोक्त विवरण से स्पष्ट हुआ कि पवित्रा चारों वेद भी साक्षी हैं कि पूर्ण परमात्मा ही पूजा के योग्य है, उसका वास्तविक नाम कविर्देव (कबीर परमेश्वर) है तथा तीन मंत्रा के नाम का जाप करने से ही पूर्ण मोक्ष होता है।

यह तीन मन्त्र का जाप चारों वेदों के सारांश श्री मद्भगवत गीता में प्रमाण है कि इससे वह स्थान प्राप्त होता है, जहाँ जाने के बाद साधक लौटकर कभी संसार में नहीं आते। जो सनातन परम धाम है, जहाँ जाने के पश्चात् परम शान्ति प्राप्त होती है।

वेदों व गीता में यह अनमोल तीन नाम का मन्त्र अस्पष्ट अर्थात् सांकेतिक है। इसलिए चारों वेदों व गीतानुसार साधना करने से वह स्थान व परमात्मा प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए गीता अध्याय 4 श्लोक 32 तथा 34 में गीता ज्ञान दाता ने स्पष्ट किया है कि यज्ञों अर्थात् धार्मिक अनुष्ठानों का यथार्थ ज्ञान (ब्रह्मणः मुखे) सच्चिदानन्द घन ब्रह्म अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म अपने मुख-कमल से वाणी बोलकर बताता है, वह सच्चिदानन्द घन ब्रह्म की वाणी कही जाती है, उसे तत्वज्ञान तथा सूक्ष्म वेद भी कहते हैं। उसके जानने के पश्चात् सर्वपापों से मुक्त हो जाता है। जिसमें सम्पूर्ण भक्ति मन्त्रा तथा विधि बताई है। (गीता अध्याय 4 श्लोक 32)

गीता अध्याय 4 श्लोक 34 = उस तत्वज्ञान को तू तत्वदर्शी सन्तों के पास जाकर समझ, उनको दण्डवत् प्रणाम करने से, कपट छोड़कर नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्मा तत्व को भली-भाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। (गीता अध्याय 4 श्लोक 34)

सज्जनों ! वह तत्वदर्शी सन्त यह दास (संत रामपाल दास) है। वह तत्वज्ञान मेरे पास है। मेरे अतिरिक्त वर्तमान में किसी के पास नहीं है। विश्व में लगभग 7 अरब मानव आबादी है। इन अरबों मनुष्यों में मेरे अतिरिक्त कोई इस ज्ञान को जानने वाला नहीं है।

गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 तक तो गीता ज्ञान दाता ने तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी तथा तमगुण शिव जी) की भक्ति करने वाले 1. राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, 2. मनुष्यों में नीच, 3. दूषित कर्म करने वाले, 4. मूर्ख मेरी भक्ति भी नहीं करते।

फिर गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 7 श्लोक 16 से 18 तक अपनी साधना करने वालों की स्थिति बताई है कि मेरी भक्ति चार प्रकार के (1. आर्त, 2. अथार्थी, 3. जिज्ञासु, 4. ज्ञानी) करते हैं। इनमें केवल ज्ञानी साधक श्रेष्ठ बताया, परंतु वह भी तत्वज्ञान न होने के कारण मेरे वाली अर्थात् ब्रह्म की अनुतम् अर्थात् घटिया गति में ही स्थित रह गया।

गीता अध्याय 7 श्लोक 19 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि मेरी पूजा भी जन्म-जन्मान्तरों के अन्त के जन्म में कोई ज्ञानी आत्मा ठीक से करता है। अन्यथा अन्य उपासना में ही लगे रहते हैं। यह बताने वाला महात्मा तो बहुत दुर्लभ है कि केवल वासुदेव अर्थात् सर्वगतम् ब्रह्म ही सब कुछ है। उसी की भक्ति से परम शान्ति प्राप्त होती है, उसी की भक्ति से सनातन परम धाम प्राप्त होता है। उसी की भक्ति से वह परम पद प्राप्त होता है जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आते, वह परम अक्षर ब्रह्म सर्व का उत्पत्तिकर्ता है, वही संसार रूपी वृक्ष की मूल है जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है, वही पापनाशक है। वही पूर्ण मोक्षदायक है, उसी की भक्ति करनी चाहिए।

प्रिय पाठको! वह तत्वदर्शी सन्त वर्तमान में यह दास (संत रामपाल दास) है। मेरे पास सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों का ज्ञान है। वासुदेव भगवान की भक्ति के सम्पूर्ण मन्त्र हैं।