क्या ध्यान करने से और व्रत रखने से शांति प्राप्त होगी < Jagat Guru Rampal Ji

Jagat Guru Rampal Ji Maharaj

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क्या ध्यान करने से और व्रत रखने से शांति प्राप्त होगी

प्रश्न - मैं गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 में वर्णित विधि अनुसार एक आसन पर बैठकर सिर आदि अंगों को सम करके ध्यान करता हूँ, एकादशी का व्रत भी रखता हूँ इस प्रकार शान्ति को प्राप्त हो जाऊँगा।

उत्तर - कृप्या आप गीता अध्याय 6 श्लोक 16 को भी पढ़े जिसमें लिखा है कि हे अर्जुन यह योग (साधना) न तो अधिक खाने वाले का, न बिल्कुल न खाने (व्रत रखने) वाले का सिद्ध होता है। न अधिक जागने वाले का न अधिक श्यन करने (सोने) वाले का सिद्ध होता है न ही एक स्थान पर बैठकर साधना करने वाले का सिद्ध होता है। गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 तक वर्णित विधि का खण्डन गीता अध्याय 3 का श्लोक 5 से 9 में किया है कि जो मूर्ख व्यक्ति समस्त कर्म इन्द्रियों को हठपूर्वक रोक कर अर्थात् एक स्थान पर बैठकर चिन्तन करता है वह पाखण्डी कहलाता है। इसलिए कर्मयोगी (कार्य करते-2 साधना करने वाला साधक) ही श्रेष्ठ है। वास्तविक भक्ति विधि के लिए गीता ज्ञान दाता प्रभु (ब्रह्म) किसी तत्वदर्शी की खोज करने को कहता है (गीता अध्याय 4 श्लोक 34) इस से सिद्ध है गीता ज्ञान दाता (ब्रह्म) द्वारा बताई गई भक्ति विधि पूर्ण नहीं है। इसलिए गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 तक ब्रह्म (क्षर पुरुष-काल) द्वारा अपनी साधना का वर्णन है तथा अपनी साधना से होने वाली शान्ति को अति घटिया (अनुत्तमाम्) गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में कहा है। उपरोक्त अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 में कहा है कि मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाला साधक एक विशेष आसन तैयार करे। जो न अधिक ऊंचा हो, न अधिक नीचा। उस आसन पर बैठ कर चित तथा इन्द्रियों को वश में रखकर मन को एकाग्र करके अभ्यास करे। सीधा बैठकर ब्रह्मचर्य का पालन करता हुआ मन को रोक कर प्रयाण होवे। इस प्रकार साधना में लगा साधक मुझमें रहने वाली (निर्वाणपरमाम्) अति बेजान अर्थात् बिल्कुल मरी हुई (नाम मात्र)

शान्ति को प्राप्त होता है। इसीलिए गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में अपनी साधना से होने वाली गति (लाभ) को अति घटिया (अनुत्तमाम्) कहा है। इसी गीता अध्याय 18 श्लोक 62 तथा अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा है कि हे अर्जुन ! तू परम शान्ति तथा सतलोक को प्राप्त होगा, फिर पुनर् जन्म नहीं होता, पूर्ण मोक्ष प्राप्त हो जाता है। मैं (गीता ज्ञान दाता प्रभु) भी उसी आदि नारायण पुरुष परमेश्वर की शरण हूँ, इसलिए दृढ़ निश्चय करके उसी की साधना व पूजा करनी चाहिए।

अपनी साधना के अटकल युक्त ज्ञान के आधार पर बताए मार्ग को अध्याय 6 श्लोक 47 में भी स्वयं (युक्ततमः मतः) अर्थात् अज्ञान अंधकार वाले विचार कहा है। अन्य अनुवाद कर्ताओं ने ‘मे युक्ततमः मतः‘ का अर्थ ‘परम श्रेष्ठ मान्य है‘ किया है, जबकि करना था कि यह मेरा अटकल लगाया अज्ञान अंधकार के आधार पर दिया मत है। क्योंकि यथार्थ ज्ञान के विषय में किसी तत्वदर्शी सन्त से जानने को कहा है (गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में) वास्तविक अनुवाद गीता अध्याय 6 श्लोक 47 का -

अध्याय 6 का श्लोक 47

योगिनाम्, अपि, सर्वेषाम्, मद्गतेन, अन्तरात्मना,
श्रद्धावान्, भजते, यः, माम्, सः, मे, युक्ततमः, मतः।।

अनुवाद: मेरे द्वारा दिए भक्ति विचार जो अटकल लगाया हुआ उपरोक्त श्लोक 10 से 15 में वर्णित पूजा विधि जो मैंने अनुमान सा बताया है, पूर्ण ज्ञान नहीं है, क्योंकि (सर्वेषाम्) सर्व (योगिनाम्) साधकों में (यः) जो (श्रद्धावान्) पूर्ण आस्था से (अन्तरात्मना) सच्ची लगन से (मद्गतेन्) मेरे द्वारा दिए भक्ति मत के अनुसार (माम्) मुझे (भजते) भजता है (सः) वह (अपि) भी (युक्ततमः) अज्ञा अंधकार से जन्म-मरण स्वर्ग-नरक वाली साधना में ही लीन है। यह (मे) मेरा (मतः) विचार है।

इसी का प्रमाण पवित्र गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में तथा गीता अध्याय 5 श्लोक 29 तथा गीता अध्याय 6 श्लोक 15 में स्पष्ट है। इसीलिए गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि हे भारत, तू सर्व भाव से उस  परमात्मा की शरण में जा, उसकी कृपा से ही तू परमशान्ति को तथा सनातन परम धाम अर्थात् सतलोक को प्राप्त होगा। गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में कहा है कि जब तुझे गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में वर्णित तत्वदर्शी संत मिल जाए उसके पश्चात उस परमपद परमेश्वर को भली भाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए साधक फिर लौट कर इस संसार में नहीं आते अर्थात् जन्म-मृत्यु से सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं। जिस परमेश्वर ने संसार रूपी वृक्ष की रचना की है, मैं भी उसी आदि पुरुष परमेश्वर की शरण में हूँ। उसी की भक्ति करनी चाहिए।

गीता अध्याय 3 श्लोक 5 से 9 में भी गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 15 के ज्ञान को गलत सिद्ध किया है। अर्जुन ने पूछा प्रभु मन को रोकना बहुत कठिन है। भगवान ने उत्तर दिया अर्जुन मन को रोकना तो वायु को रोकने के समान है। फिर यह भी कहा है कि निःसंदेह कोई भी व्यक्ति किसी भी समय क्षण मात्रा भी कर्म किए बिना नहीं रहता। जो महामूर्ख मनुष्य समस्त कर्म इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से कुछ न कुछ सोचता रहता है। इसलिए एक स्थान पर हठयोग करके न बैठ कर सांसारिक कार्य करते-करते (कर्मयोग) साधना करना ही श्रेष्ठ है। कर्म न करने अर्थात् हठ योग से एक स्थान पर बैठ कर साधना करने की अपेक्षा कर्म करते-करते साधना श्रेष्ठ है। एक स्थान पर बैठ कर साधना (अकर्मणा) करने से तेरा जीवन निर्वाह कैसे होगा? शास्त्र विधि त्याग कर साधना (हठयोग एक आसन पर बैठकर) करने से कर्म बन्धन का कारण है, दूसरा जो शास्त्र अनुकूल कर्म करते-करते साधना करना ही श्रेष्ठ है। इसलिए सांसारिक कार्य करता हुआ साधना कर। गीता अध्याय 8 श्लोक 7 में कहा है कि युद्ध भी कर, मेरा स्मरण भी कर, इस प्रकार मुझे ही प्राप्त होगा। गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में तथा अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि परन्तु मेरी साधना से होने वाली (गति) लाभ अति घटिया (अनुत्तमाम्) है। इसलिए उस परमेश्वर की शरण में जा जिसकी कृपा से तू परमशान्ति तथा (शाश्वतम् स्थानम्) सतलोक को प्राप्त होगा। उस परमेश्वर की भक्ति विधि तथा पूर्ण ज्ञान (तत्वज्ञान) किसी तत्वदर्शी संत की खोज करके उससे पूछ, मैं (गीता ज्ञान दाता ब्रह्म/क्षर पुरुष) भी नहीं जानता।