श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी में गुरु जी की महिमा < Jagat Guru Rampal Ji

Jagat Guru Rampal Ji Maharaj

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श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी में गुरु जी की महिमा

कप्या पढ़ें श्री गुरु ग्रन्थ साहेब जी में निम्न पष्ठों पर ढेर सारे प्रमाण कि श्री नानक जी को गुरु जी मिले थे। जिन्होंने नानक जी को दीक्षा दी थी। श्री नानक जी ने यह भी स्पष्ट किया है कि वक्त गुरु के बिना भक्ति सफल नहीं हो सकती। यह भी जोर देकर कहा है कि गुरु पूरा हो। जो श्रद्धालु वक्त गुरु की शरण में नहीं जाते, वे श्री गुरु नानक देव जी की आज्ञा की अवहेलना कर रहे हैं।

विचारणीय विषय है कि श्री गुरु ग्रन्थ साहेब जी महापुरूषों की अमतवाणी है तथा आदरणीय है तथा श्री मद्भगवत गीता तथा पवित्रा चारों वेद, परमेश्वर कबीर जी की अमतवाणी जो पांचवा वेद है। यह तो परमात्मा का विधान है। जैसे देश का संविधान है। वह प्रधान मन्त्राी नहीं है। प्रधान मन्त्राी कि आवश्यकता इसलिए है कि वह उस विधान अनुसार जनता की सुरक्षा करे। उनको उनका अधिकार दिलाए।

श्री नानक देव जी ने पष्ठ 1342 पर कहा है:-
‘‘गुरु सेवा बिन भक्ति ना होई, अनेक जतन करै जे कोई’’

श्री गुरु नानक जी ने पष्ठ 946 पर कहा है:-
‘‘बिन सतगुरु भेंटे मुक्ति न कोई, बिन सतगुरु भेंटे महादुःख पाई।’’

श्री गुरु नानक जी ने पष्ठ 437 पर भी कहा है:-
‘‘नानक गुरु समानि तीरथु नहीं कोई साचे गुरु गोपाल।’’

गुरु साहेबानों का जनता को संदेश है कि पूरे गुरु की खोज करो। पूरा गुरु परमात्मा समान ही होता है। पूरा गुरु वह होगा जो श्री नानक देव जी जैसा परमेश्वर का कपा पात्रा होगा। जैसे भाई बाले वाली जन्म साखी (पंजाबी भाषा वाली) के पष्ठ 272-273 पर मरदाना ने प्राद से पूछा कि यहां और कौन आए हैं। प्रहलाद ने कहा कि यहां केवल दो महापुरूष आऐ हैं। प्रथम (परमेश्वर) कबीर जी दूसरे श्री नानक देव जी, केवल एक और आवैगा जो इन जैसा ही होगा, वह पंजाब की धरती पर जाट जाति से होगा। कप्या देखें फोटो कापी पष्ठ 272-273 जन्म साखी की पुस्तक ‘‘धरती पर अवतार’’ के पष्ठ 17 पर।

सर्व मानव समाज से प्रार्थना है कि तीसरा महापुरूष जो श्री नानक देव तथा परमेश्वर कबीर जैसा आध्यात्मिक ज्ञान लिए है। वह सन्त रामपाल दास जी महाराज हैं। सर्व सिख गुरु साहेबानों ने यह कहा है कि गुरु बिन मोक्ष नहीं हो सकता। वक्त गुरु नाम उपदेश देवेगा, जो अधिकारी होगा। उसी से नाम लेने से लाभ होगा। बिना अधिकारी के नाम प्राप्त करना भी मोक्षदायक नहीं है।

श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के पष्ठ 946 पर स्पष्ट किया है कि:-

बिन सतगुरु सेवे जोग न होई। बिन सतगुरु भेटे मुक्ति न होई।
बिन सतगुरु भेटे नाम पाइआ न जाई। बिन सतगुरु भेटे महा दुःख पाई।
बिन सतगुरु भेटे महा गरबि गुबारि। नानक बिन गुरु मुआ जन्म हारि।

इस अमर संदेश में श्री नानक जी ने स्पष्ट किया है कि बिना वक्त गुरु की शरण में जाए न तो मोक्ष होगा न जीव का अहंकार नाश होगा। जो जीव को परमात्मा से दूर रखता है। सतगुरु के सेवे अर्थात् शरण में जाए बिना जोग अर्थात् साधना सफल नहीं हो सकती। गुरु जी की शरण बिना नाम नहीं मिल सकता। नाम बिना मुक्ति नहीं हो सकती। झूठे गुरु से भी कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। बिना सतगुरु के महादुःख होगा तथा बिना गुरु की शरण मानव जन्म को जुऐ में हारे जुआरी की तरह जन्म हार कर मर जाएगा। श्री गुरु नानक देव जी सख्ती के साथ कह रहे हैं कि पूरे गुरु की शरण प्राप्त करके जन्म सफल करो। यह मानव जीवन अनमोल है बार-2 प्राप्त नहीं होगा। कप्या प्रमाण के लिए पढ़ें निम्न वाणी:-

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 1342 (गुरु महिमा) प्रभाती असटपदीआ महला 1

बिभास सतिगुरु पूछि सहज घरू पावै।।3।। रागि नादि मनु दूजै भाइ।। अंतरि कपटु महा दुखु पाइ।। सतिगुरु भेटै सोझी पाइ।। सचै नामि रहै लिव लाइ।।4।। सचै सबदि सचु कमावै।। सची बाणी हरि गुण गावै ।। निज घरि वासु अमर पदु पावै।। ता दरि साचै सोभा पावै।।5।। गुर सेवा बिनु भगति न होई ।। अनेक जतन करै जे कोई।। गिआनु धिआनु नरहरि निरबाणी।। बिनु सतिगुरु भेटे कोई न जाणी।। सगल सरोवर जोति समाणी।। आनद रूप विटहू कुरबाणी।।3।। भाउ भगति गुरमती पाए।। हउमै विचहु सबदि जलाए।।

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 1039 (गुरु महिमा) राग मारु सोलहे महला 1

ऐसे जन विरले संसारे।। गुर सबदु वीचारहि रहहि निरारे।। आपि तरहि संगति कुल तारहि तिन सफल जनमु जगि आइआ।।11।। घरू दरू मंदरू जाणै सोई जिसु पूरे गुर ते सोझी होई।।

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 946 (गुरु महिमा) रामकली महला 1

सिध गोसटि नामे नामि रहै बैरागी साचु रखिआ उरि धारे।। नानक बिनु नावै जोगु कदे न होवै देखहु रिदै बीचारे।।68।। गुरमुखि साचु सबदु बीचारै कोइ।। गुरमुखि सचु बाणी परगटु होइ।। गुरमुखि मनु भीजै विरला बूझै कोइ।। गुरमुखि निज घरि वासा होइ।। गुरमुखि जोगी, जुगति पछाणै।। गुरमुखि नानक एको जाणै।।69।। बिनु सतिगुर सेवे जोगु न होई।। बिनु सतिगुर भेटे मुकति न कोई।। बिनु सतिगुर भेटे नामु पाइआ न जाइ।। बिनु सतिगुर भेटे महा दुखु पाइ।। बिनु सतिगुर भेटे महा गरबि गुबारि।। नानक बिनु गुर मुआ जनमु हारि।।70।। गुरमुखि मनु जीता हउमै मारि।। गुरमुखि साचु रखिआ उर धारि।। गुरमुखि जुगु जीता जमकालु मारि बिदारि।। गुरमुखि दरगह न आवै हारि।। गुरमुखि मेलि मिलाए सुो जाणै।। नानक गुरमुखि सबदि पछाणै।।71।।

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 466 (गुरु महिमा) आसा महला 1

मः 1।। मिटी मुसलमान की पेड़ै पई कुमिआर।। घड़ि भाँडे इटा कीआ जलदी करे पुकार।। जलि जलि रोवै बपुड़ी झड़ि झड़ि पवहि अंगिआर।। नानक जिनि करतै कारणु कीआ सो जाणै करतारू।।2।। पउड़ि।। बिनु सतिगुर किनै न पाइओ बिनु सतिगुरु किनै न पाइआ।। सतिगुर विचि आपु रखिओनु करि परगटु आखि सुणाइआ।। सतिगुर मिलिऐ सदा मुकतु है जिनि विचहु मोहु चुकाइआ।। उतमु एहु बीचारु है जिनि सचे सिउ चितु लाइआ।। जगजीवनु दाता पाइआ।।6।। किरपा करे जे आपणी ता गुर का सबदु कमाहि।। नानकु कहै सुणहु जनहु इतु संजमि दुख जाहि।।2।।

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 1171 (गुरु महिमा) महला 1 बसंतु हिंडोल घरू 2

बसंतु हिंडोल महला 1 ।। साचा साहु गुरु सुखदाता हरि मेले भुख गवाए।। करि किरपा हरि भगति दड़ाए अनदिनु हरि गुण गाए।।1।। मत भूलहि रे मन चेति हरि।। बिनु गुर मुकति नाही त्रै लोई गुरमुखि पाईऐ नामु हरि।।1।।रहाउ।। बिनु भगति नहीं सतिगुरु पाईऐ बिनु भागा नही भगति हरी।। बिनु भागा सतसंगु न पाईऐ करमि मिलै हरि नामु हरी।।2।।

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 1040 (गुरु महिमा) मारू सोलहे महला 1

मारू महला 1।। सचु कहहु सचै घरि रहणा।। जीवत मरहु भवजलु जगु तरणा।। गुरु बोहिथु गुरु बेड़ी तुलहा मन हरि जपि पारि लंघाइआ।।1।। हउमै ममता लोभ बिनासनु।। नउ दर मुकते दसवै आसनु।। ऊपरि परै परै अपरम्परू जिनि आपे आपु उपाइआ।।2।। गुरमति लेवहु हरि लिव तरीऐ।। अकलु गाइ जम ते किआ डरीऐ।। जत जत देखउ तत तत तुम ही अवरू न दुतीआ गाइआ।।3।। सचु हरि नामु सचु है सरणा।। सचु गुर सबदु जितै लगि तरणा।। अकथु कथै देखै अपरम्परू फुनि गरभि न जोनी जाइआ।।4।। सच बिनु सतु संतोखु न पावै।। बिनु गुर मुकति न आवै जावै।। मूल मंत्रु हरि नामु रसाइणु कहु नानक पूरा

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 33 (गुरु महिमा) सिरी राग महला 3

सतगुरि मिलिऐ सद भै रचै आपि वसै मनि आइ।।1।। भाई रे गुरमुखि बूझे कोइ।। बिनु बूझे कर्म कमावणे जनमु पदारथु खोइ।।1।। रहाउ।। गुर कै सबदि जीवतु मरै हरि नामु वसै मनि आइ।।1।। सुणि मन मेरे भजु सतगुर सरणा।। गुर पदसादी छुटीऐ बिखु भवजलु सबदि गुर तरणा।।1।। रहाउ।। त्रै गुण सभा धातु है दूजा भाउ विकारु।। पंडितु पड़ै बंधन मोह बाधा नह बूझै बिखिआ पिआरि।। सतगुरु मिलिऐ तकटी छूटै चउथै पदि मुकति दुआरु।।2।। गुर तो मारगु पाईऐ चूकै मोहु गुबारु।। सबदि मरे ता उधरै पाए मोख दुआरु।। गुर परसादी मिलि रहै सचु नामु करतारु।।3।। इहु मनुआ अति सबल है छडे न कितै उपाइ।। दूजै भाइ दुखु लाइदा बहुती देइ सजाइ।। नानक नामि लगे से उबरे हउमै सबदि गवाइ।।4।।18।।51।। सिरीरागु महला 3।। किरपा करे गुरु पाईऐ हरि नामो देइ दड़ाइ।। बिनु गुर किनै न पाइओ बिरथा जनमु गवाइ।। 
मनमुख कर्म कमावणे दरगह मिलै सजाइ।।1।। मन रे दूजा भाउ चुकाइ।। अंतरि तेरै हरि वसै गुर सेवा सुखु पाइ।। रहाउ।।

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 1348 महला 5 (गुरु महिमा) बिभास प्रभाती महला 5 असटपदीआ

बिनु सतिगुर किनै न पाई पर्म गते।। पूछहु सगल बेद सिम्मते।। मनमुख कर्म करै अजाई।। जिउ बालू घर ठउर न ठाई।।7।। जिस नो भए गुोबिंद दइआला।। गुर का बचनु तिनि बाधिओ पाला।। कोटि मधे कोई संतु दिखाइआ।। नानकु तिन के संगि तराइआ।।8।। जे होवै भागु ता दरसनु पाईऐ।। आपि तरै सभु कुटम्बु तराईऐ।।1।।

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 436 (गुरु महिमा) रागु आसा महला 1 छंत घरू 1

आसा महला 1 ।। अनहदो अनहदु वाजै रुण झुणकारे राम।। मेरा मनो मेरा मनु राता लाल पिआरे राम।। अनदिनु राता मनु बैरागी सुन्न मंडलि घरु पाइआ।। आदि पुरखु अपरम्परु पिआरा सतिगुरि अलखु लखाइआ।। आसणि बैसणि थिरु नाराइणु तितु मनु राता वीचारे।। नानक नामि रते बैरागी अनहद रुण झुणकारे ।।1।। तितु अगम तितु अगम पुरे कहु कितु बिधि जाईऐ राम।। सचु संजमो सारि गुणा गुर सबदु कमाईऐ राम।। सचु सबदु कमाईऐ निज घर जाईऐ पाईऐ गुणी निधाना।। तितु साखा मूलु पतु नही डाली सिरि सभना परधाना।। जपु तपु करि करि संजम थाकी हठि निग्रहि नही पाईऐ।। नानक सहजि मिले जगजीवन सतिगुर बूझ बुझाईऐ।।2।। गुरु सागरो 

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 437 (गुरु महिमा) राग आसा महला 1 छंत घरू 1

रतनागरु तितु रतन घणेरे राम।। करि मजनो सपत सरे मन निर्मल मेरे राम।। निर्मल जलि नाए जा प्रभ भाए पंच मिले वीचारे।। कामु करोधु कपटु बिखिआ तजि सचु नामु उरि धारे।। हउमै लोभ लहरि लब थाके पाए दीन दइआला।। नानक गुर समानि तीरथु नही कोई साचे गुर गोपाला।।3।। हउ बनु बनो देखि रही तणु देखि सबाइआ राम।। तभवणो तुझहि कीआ सभु जगतु सबाइआ राम।। तेरा सभु कीआ तूं थिरु थीआ तुधु समानि को नाही।। तूं दाता सभ जाचिक तेरे तुधु बिनु किसु सालाही।। अण्मंगिआ दानु दीजै दाते तेरी भगति भरे भंडारा।। राम नाम बिनु मुकति न होई नानकु कहै वीचारा।।4।।2।।

श्री गुरु ग्रंथ साहेब जी पष्ठ 879 (गुरु महिमा) रामकली महला 1 घरू 1 चउपदे

रामकली महला 1 ।। जा हरि प्रभि किरपा धारी।। ता हउमै विचहु मारी।। सो सेवकि राम पिआरी।। जो गुर सबदी बीचारी।।1।। सो हरि जनु हरि प्रभ भावै।। अहिनिसि भगति करे दिनु राती लाज छोडि हरि के गुण गावै।।1।। रहाउ।। धुनि वाजे अनहद घोरा।। मनु मानिआ हरि रसि मोरा।। गुर पूरै सचु समाइआ।। गुरु आदि पुरखु हरि पाइआ।।2।। सभि नाद बेद गुरबाणी।। मनु राता सारिगपाणी।। तह तीर्थ वरत तप सारे।। गुर मिलिआ हरि निसतारे।।3।। जह आपु गइआ भउ भागा।। गुर चरणी सेवकु लागा।। गुरि सतिगुरि भरमु चुकाइआ।। कहु नानक सबदि मिलाइआ।।4।।10।।

गुरु ग्रन्थ साहेब, राग आसावरी, महला 1 के कुछ अंश -

साहिब मेरा एको है। एको है भाई एको है।
आपे रूप करे बहु भांती नानक बपुड़ा एव कह।। (प. 350)
जो तिन कीआ सो सचु थीआ, अमत नाम सतगुरु दीआ।। (प. 352)
गुरु पुरे ते गति मति पाई। (प. 353)
बूडत जगु देखिआ तउ डरि भागे।
सतिगुरु राखे से बड़ भागे, नानक गुरु की चरणों लागे।। (प. 414)
मैं गुरु पूछिआ अपणा साचा बिचारी राम। (प. 439)

उपरोक्त अमतवाणी में श्री नानक साहेब जी स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि साहिब (प्रभु) एक ही है तथा मेरे गुरु जी ने मुझे उपदेश नाम मन्त्रा दिया, वही नाना रूप धारण कर लेता है अर्थात् वही सतपुरुष है वही जिंदा रूप बना लेता है। वही धाणक रूप में भी विराजमान होकर आम व्यक्ति अर्थात् भक्त की भूमिका करता है। शास्त्रा विरुद्ध पूजा करके सारे जगत् को जन्म-मत्यु व कर्मफल की आग में जलते देखकर जीवन व्यर्थ होने के डर से भाग कर मैंने गुरु जी के चरणों में शरण ली।

बलिहारी गुरु आपणे दिउहाड़ी सदवार।
जिन माणस ते देवते कीए करत न लागी वार।
आपीनै आप साजिओ आपीनै रचिओ नाउ।
दुयी कुदरति साजीऐ करि आसणु डिठो चाउ।
दाता करता आपि तूं तुसि देवहि करहि पसाउ।
तूं जाणोइ सभसै दे लैसहि जिंद कवाउ करि आसणु डिठो चाउ। (प. 463)

भावार्थ है कि पूर्ण परमात्मा जिंदा का रूप बनाकर बेई नदी पर आए अर्थात् जिंदा कहलाए तथा स्वयं ही दो दुनियाँ ऊपर (सतलोक आदि) तथा नीचे(ब्रह्म व परब्रह्म के लोक) को रचकर ऊपर सत्यलोक में आकार में आसन पर बैठ कर चाव के साथ अपने द्वारा रची दुनियाँ को देख रहे हो तथा आप ही स्वयम्भू अर्थात् माता के गर्भ से जन्म नहीं लेते, स्वयं प्रकट होते हो। यही प्रमाण पवित्रा यजुर्वेद अध्याय 40 मं. 8 में है कि कविर् मनीषि स्वयम्भूः परिभू व्यवधाता, भावार्थ है कि कबीर
परमात्मा सर्वज्ञ है (मनीषि का अर्थ सर्वज्ञ होता है) तथा अपने आप प्रकट होता है। वह सनातन (परिभू) अर्थात् सर्वप्रथम वाला प्रभु है। वह सर्व ब्रह्मण्डों का (व्यवधाता)अर्थात् भिन्न-भिन्न सर्व लोकों का रचनहार है।

एहू जीउ बहुते जनम भरमिआ, ता सतिगुरु शबद सुणाइया।। (प. 465)

भावार्थ है कि श्री नानक साहेब जी कह रहे हैं कि मेरा यह जीव बहुत समय से जन्म तथा मत्यु के चक्र में भ्रमता रहा अब पूर्ण सतगुरु ने वास्तविक नाम प्रदान किया। 

फिर प्रमाण है ‘‘राग बसंत महला पहला‘‘ पौड़ी नं. 3 आदि ग्रन्थ(पंजाबी) पष्ठ नं. 1188

नानक हवमों शब्द जलाईया, सतगुरु साचे दरस दिखाईया।।

इस वाणी से भी अति स्पष्ट है कि नानक जी कह रहे हैं कि सत्यनाम (सत्यशब्द) से विकार-अहम् (अभिमान) जल गया तथा मुझे सच्चे सतगुरु ने दर्शन दिए अर्थात् मेरे गुरुदेव के दर्शन हुए। स्पष्ट है कि नानक जी को कोई सतगुरु आकार रूप में अवश्य मिला था। वह ऊपर तथा नीचे पूर्ण प्रमाणित है। स्वयं कबीर साहेब पूर्ण परमात्मा (अकाल मूर्त) स्वयं सच्चखण्ड से तथा दूसरे रूप में काशी बनारस से आकर प्रत्यक्ष दर्शन देकर सच्चखण्ड (सत्यलोक) भ्रमण करवा के सच्चा नाम उपदेश काशी (बनारस) में प्रदान किया।